“तुम्हें यह गलती करनी ही नहीं चाहिए थी।” उसने कहा ।
“यार! बात को इतना तूल मत दो । इन्सान , भगवान नहीं है। गलती हर इन्सान से हो जाती है।” मैने सफाई पेश की ।
“तुम जानते हो कि तुम मेरे लिये सिर्फ एक इन्सान नहीं हो। ” उसने चेहरे को मासूमियत ने ढक रखा था ।
” क्या मतलब ? “
” पूजा करती हूं तुम्हारी और पूजा सिर्फ भगवान की , की जाती है , मेरा भगवान कोई गलती करे ,यह मेरी बर्दाश्त से बाहर है । ” उसके साथ उसकी आँखे भी बोल रहीं थीं ।
” इन्सान हूं और मुझे इन्सान ही रहने दो । कभी परिस्थितियां बदल गयीं तब मुझे ही नहीं, खुद को भी माफ़ नहीं कर सकोगी कि तुमने जिसे अपना भगवान मान लिया था वो तो एक अदना सा शक्श था। ” मैंने कहा।
” देखो ! कनफ़्यूज़ मत करो। मैं तो बस इतना जानती हूं कि तुम मेरे भगवान हो और मेरा भगवान कभी कोई गलती नहीं कर सकता । अगर आगे कभी वो मिले तो उससे तौबा कर लेना। डाइन है , खा जाएगी तुम्हें ! “
विशवास से लबालब भरे उसके शब्दों से वह डर गया।वो जानता था कि डरा हुआ आदमी कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता। इससे पहले कि उसका डर उसे कोई नुकसान पहुंचाए उसने सोचा इस डर को अपने अंदर से जल्द से जल्द निकाल देना चाहिये । यह तभी सम्भव था जब वह कोई ऐसा काम करे जो उसके अन्दर से उसका डर निकल जाये और वो उसे सिर्फ इंसान ही समझे।
उसी समय उसके सामने वही बिल्ली आकर खड़ी हो गयी जिसे वो कुछ दिन से दूध पिला रहा था। बिल्ली को आज भी भूख लगी थी और वो पहले की तरह म्याऊं – म्याऊं करके उससे दूध की उम्मीद कर रही थी । उसे लगा कि आज बिल्ली से उसे पिलाए गये दूध की कीमत वसूल की जा सकती है । उसने अपने पास पड़ा एक बड़ा सा पत्थर उठाया और दूध की आस लगाये उस बिल्ली के सिर पर दे मारा। बिल्ली चीखी और चीख एक ही पल में खामोश हो गयी ।
वो उसकी इस हरकत से हतप्रभ थी। बिल्ली की चीख के बीच वो खुद ही चीखने को हुई और बोली , ” तुम इंसान हो या हैवान जो तुमने एक भूखे और निरीह जीव को जिंदगी देने की जगह हैवानियत भरी मौत दे दी। ” वो बेहद ग़मगीन भी थी।
” मैंने तो पहले ही कहा था कि गलती किसी से भी हो सकती है। बात को तूल मत दो। मैं भगवान नहीं हूँ। ” मैंने अपना तर्क दिया।
” अपनी इतनी सी बात को सच साबित करने के लिए तुमने एक मूक प्राणी का खून कर दिया। ” उसने चीख कर कहा ।
” क्या अब भी मैं तुम्हारा भगवान् हूँ ? “
” मुझे चाहिए कि मैं इसी पत्थर से तुम्हें ही कुचल दूँ। तुम तो हैवान से भी बद्द्तर शक्स हो ।कोई इतना भी निर्दयी हो सकता है , मैं सोच भी नहीं सकती। तुमने सिर्फ इसलिये एक जीव को कुचल दिया कि तुम खुद को सच साबित कर सको । ” वो रो रही थी । “
मै उसे देखता रहा और वो अपने पल्लू में अपना चेहरा छुपाकर वहां से भाग गयी। मुझे लगा बिल्ली के मृत शरीर का ठंडा लहू मेरी धमनियों में रेंग रहा है। मैं चीखना चाहता हूं और मेरी चीख मेरे अन्दर अटकी पड़ी है ।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद


https://www.thepurvai.com/short-story-by-surendra-kumar-arora/
सुरेन्द्र जी!
आपकी लघुकथा पढ़ी।
पर यह लघुकथा https://www.thepurvai.com/short-story-by-surendra-kumar-arora/
सुरेन्द्र जी!
आपकी लघुकथा चीख पढ़ी।
पर यह लघुकथा जैसी लगी नहीं।
समझ में नहीं आया कि इसे क्या कहा जाए?
सिर्फ इसलिए कि नायक पत्नी को समझाना चाहता है कि वह ईश्वर नहीं है, उससे भी गलती हो सकती है, वह पत्नी को छोड़ अन्य किसी से प्यार कर सकता है। सिर्फ समझाने के लिये… आप क्रूरता पर उतारू हो जाएँ ?और वह भी ऐसी क्रूरता कि जिसे भूख मिटाने के लिए दूध पिलाते रहे उस बिल्ली को पत्थर से मार डाला वह भी गलती से नहीं *जानबूझकर!!!!!*
यह तो मानसिक विक्षिप्तता है
आपके लेखन का उद्देश्य हमारी नजर में एक पाठक की हैसियत से सार्थक नहीं हुआ। गलती और जानबूझकर करना; दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीज हैं, एक दूसरे के विपरीत। कथा का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि सामने वाली उसे ईश्वर न समझे, जरूरत से ज्यादा विश्वास ना करें। यह नहीं कि क्रूरता देखकर इतनी नफरत करने लगे कि स्वयं नायक को मार डालने के बारे में सोचने लगे।
माफ कीजिएगा सुरेन्द्रौ जी पर पढ़कर हमें ऐसा ही लगाजैसी लगी नहीं।
समझ में नहीं आया कि इसे क्या कहा जाए?
सिर्फ इसलिए कि नायक पत्नी को समझाना चाहता है कि वह ईश्वर नहीं है, उससे भी गलती हो सकती है, वह पत्नी को छोड़ अन्य किसी से प्यार कर सकता है। सिर्फ समझाने के लिये… आप क्रूरता पर उतारू हो जाएँ ?और वह भी ऐसी क्रूरता कि जिसे भूख मिटाने के लिए दूध पिलाते रहे उस बिल्ली को पत्थर से मार डाला वह भी गलती से नहीं *जानबूझकर!!!!!*
यह तो मानसिक विक्षिप्तता है
आपके लेखन का उद्देश्य हमारी नजर में एक पाठक की हैसियत से सार्थक नहीं हुआ। गलती और जानबूझकर करना; दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीज हैं, एक दूसरे के विपरीत। कथा का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि सामने वाली उसे ईश्वर न समझे, जरूरत से ज्यादा विश्वास ना करें। यह नहीं कि क्रूरता देखकर इतनी नफरत करने लगे कि स्वयं नायक को मार डालने के बारे में सोचने लगे।
माफ कीजिएगा सुरेन्द्रौ जी पर पढ़कर हमें ऐसा ही लगा