सुरेंद्र आज अपने गृह नगर में वापस आया ।सरकारी सेवा में जगह-जगह पर पोस्टिंग के वर्षों बाद, उसे अपने गृह नगर में जब पोस्टिंग मिली तो उसे सबसे पहले अपने लंगोटिया यार वीरेंद्र की याद आई। जिसका अपना व्यवसाय था,,,, व्यवसाय क्या था,,,!छोटी-मोटी पुस्तकों की दुकान थी, और कभी-कभी पुस्तक प्रकाशित भी कर लिया करता था। समय के साथ साथ सुरेंद्र अपने करियर में प्रगति करता चला गया और उप सचिव बन गया था और वीरेंद्र अब नामी प्रकाशक।
सुरेंद्र अपने गृह नगर के ऑफिस ज्वाइन करने के बाद,चहकता हुआ सीधे वीरेंद्र के दिल्ली के जाने माने बाजार स्थित प्रकाशन ऑफिस में जा पहुँचा। वहां वीरेंद्र अपने शानदार एसी केबिन में बैठा था।सोने के फ्रेम का चश्मा,गले में मोटी सी सोने की चेन,हाथों में रंग -बिरंगी कीमती पत्थरों वाली सोने की अंगूठियाँ, किसी पांडुलिपि में आँखें गड़ाए बैठा था। सुरेंद्र ने चहकते हुए पूछा और भाई वीरेंद्र कैसे हो,!!! वीरेंद्र ने बस उसे देखा और अपना मुँह घुमा लिया और फिर से पांडुलिपि पढ़ने लगा। सुरेंद्र ने सोचा , उसका मित्र अब बड़ा प्रकाशक है,सो कुछ देर उसकी बुकगैलरी में पुस्तकें देखीं और फिर से वीरेंद्र के केबिन में जा पहुँचा। वीरेंद्र अभी भी उसे देख कर ,अपनी पहले की मुद्रा में आ गया।सुरेंद्र ने हैरत से देखा और पूछा, अरे वीरेंद्र ,तुमने पहचाना नहीं , मैं तुम्हारा पुराना लंगोटिया यार सुरेंद्र हूँ।
वीरेंद्र ने उसे देखा और बोला ,पहचान कर भी करना क्या है????
सुरेंद्र सकते में आ गया और तुरंत बाहर आ गया।बाहर एक पुराना गाना बज रहा था,ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?!
सूर्य कांत शर्मा मानसरोवर अपार्टमेंट
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