Saturday, May 18, 2024
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सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’ का लेख – संघर्ष से सफलता का अभिनय : विक्रम गोखले

मेरे जीवन में सफलता और असफलता मेरे ही फैसलों का नतीजा हैं तो मैं इस दुनिया में इसका श्रेय या दोष क्यों दूँ। जीवन में बिना डगमगाए आत्मविश्वास से ज़िन्दगी के हर समस्या का समाधान ढूँढने वाले जाने माने फ़िल्म अभिनेता और थिएटर कलाकर श्री विक्रम गोखले के ऐसे विचार हैं।
ब्रिटिश भारत के समय में १४ नवंबर १९४५ को पुणे (महाराष्ट्र) में जन्मे विक्रम गोखले अपने पिता चंद्रकांत गोखले और माता हेमवती गोखले की पहली संतान थे। उनके पश्चात दो भाई भीष्म गोखले एवं मोहन गोखले एवं एक बहन अपराजिता मुंजे है। फ़िल्म अभिनय और मंच कलाकर के गुण उन्हें परंपरागत ही मिले है। उनकी परदादी दुर्गा बाई कामत भारतीय फ़िल्म की पहली महिला अभिनेत्री थी। साल १९१३ में फ़िल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में उनकी दादी कमलाबाई गोखले (उस समय कमलाबाई कामत) जो भारतीय सिनेमा की पहली महिला बाल कलाकार थी। इस फ़िल्म का निर्देशन भारतीय सिनेमा के पितामाह श्री दादा साहब फाल्के ने किया था। उनके पिता एक अनुभवी मराठी फ़िल्म और मंच कलाकार थे और जिन्होंने ७० से अधिक मराठी और हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है।
अपने जीवन से जुड़ी सफलता और कुछ असफलता के उदाहरण समझाने के संदर्भ में जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को विक्रम जी हमारे सामने रखते हैं। उनका घर-परिवार महाराष्ट्र में होने की वज़ह से उनके पिता के साथ-साथ विक्रम जी में भी एक महाराष्ट्रीयन पद्धति की छवि बनी हुई थी। उनकी भूमिका देखकर लोगों ने तय कर लिया था कि विक्रम गोखले अवश्य ही बड़े शांत और धैर्यवान सज्जन होंगे। परंतु सत्ताईस साल की उम्र में भी उनकी अपने पिता से निगाहें नहीं मिला कर बात करने की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पिता चाहते थे कि वे शास्त्रीय गायक बने और संगीत के साथ थिएटर में काम करें। उनके घर की हालत इतनी भी सही नहीं थी। ग़रीबी के कारण कभी-कभी वह रात को भूखे सो जाते और सुबह चार बजे उनके बाबा उन्हें उठाकर तानपुरा बजाना सिखाते थे। दो-दो घंटे का रियाज़ करने से टांगों में दर्द होता पर रियाज़ से वह बिल्कुल भी नहीं बच पाते थे। विक्रम जी को पढ़ाई से ऊब होने लगी थी। लगभग दस-बारह वर्ष बाद जब उनके पिता को इस अत्याचार का आभास हुआ तो उन्होंने अपनी ज़िद छोड़ दी। लेकिन उन दस-बारह सालों में उन्होंने विक्रम को कई बार बड़े-बड़े कलाकारों के गायन-वादन को सुनने के लिए कई जगहों पर ले गए। उनमें से कुछ के नाम हैं जिनको विक्रम जी ने सुना है। उस्ताद खान साहब, बड़े गुलाम अली खान, कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, प्रभाताई अत्रे, किशोरीताई अमोनकर, डागर बंधु, सलामत अली, नज़ाकत अली और साथ ही अहमद जान थिरकवा, अल्लाहरक्खा खान साहब, लालजी गोखले, छोटबा गोखले, विजय दुग्गल आदि। बेशक, यह सब उन्हें कला से प्रभावित करने के लिए था कि यह कला कितनी महत्त्वपूर्ण और महान है लेकिन वह ज़्यादा कुछ सीख नहीं पाये। आज बड़े होकर और सुरीले गायकों को सुनकर उन्हें अपनी मूर्खता पर अंदर ही अंदर बहुत रोना आता था। वह हमेशा कहते हैं कि इन सब बातों से एक बात यह अच्छी हुई कि वह तानसेन तो नहीं बन पाये पर तानपुरा बड़े अच्छे बजाना सिख गए थे। उनके लिए यह एक बड़ी सफलता थी।
उन्होंने एक प्रसंग के अनुसार अपनी जीवनी में दर्शाया है कि उनकी उम्र लगभग नौ-दस साल रही होगी। दीपावली के दिन थे। अपने घर की खिड़की से मैं, मेरा छोटा भाई और मेरी छोटी बहन, हम तीनों पड़ोस के पुजारी के बच्चों को पटाखे फोड़ते हुए देख रहे थे। अगले दिन, जब काफी उजाला हो गया, तो मैं और मेरा भाई उन पटाखों की तलाश कर रहे थे जो पिछली रात को नहीं जलाए गए थे। इसी बीच पिताजी बाहर से घर आ गए। उन्होंने हमें अंदर बुलाया। बेत की लकड़ी से हम पर मार बरसायी गई। मेरे बड़े होने पर मुझ पर थोड़ा ज्यादा ही और पिटाई के बाद शाम तक पूरे घर में सन्नाटा था। शाम को बाबा बाहर निकल गए। जब वह दोबारा घर आए तो साठ साल पहले उस जमाने के सौ रुपए के पटाखे ले आए थे। उन्होंने हमसे कहा, जाओ अब इसे जलाओ और दीपावली का आनंद लो। हम बच्चे भी भ्रमित हुए परंतु अंदर से बहुत खुश हुए। पटाखे फोड़ते समय मेरी नजर माँ-बाबा पर पड़ी। दोनों की आंखों में आंसू थे। उस शाम उनके आँसुओं ने मुझे अचानक और समय से पहले परिपक्व कर दिया। मुझे आज तक अपने लिए पटाखे जलाने से डर लगता है। मैंने डरते-डरते बाबा से पूछा कि पटाखों के लिए पैसे कहाँ से लाए और दोनों मुझे अपने पास में लेकर फूट-फूट कर रोने लगे। हम तीनों को माँ बाबा ने गले लगाया। मुझे पता चला था कि वे किसी से पैसे उधार लेकर पटाखे लाए थे। मैंने उस रात से अब तक आतिशबाजी नहीं की है। उस रात, बाबा धीरे-धीरे मुझे और मेरे भाई को लगी हुई मार पर तेल लगाया। मुझे वह स्पर्श आज भी याद है। समृद्ध बचपन नहीं था, लेकिन महसूस किया और हमेशा याद किया कि पटाखे फोड़ने का मतलब पैसो को जलाना, पर्यावरण और शोर को प्रदूषित करना है।
पुरखों से पूना-महाराष्ट्र में बसा हुआ गोखले परिवार धर्मार्थ कार्यों में भी शामिल हैं। गोखले परिवार एक धर्मार्थ संगठन चलाता है जो विकलांग सैनिकों, अनाथ बच्चों और अन्य जरूरतमंद लोगों के लिए भी काम करता है। यह काम करने का हौसला भी उन्हें अपने पिता के साथ हुए घटना के दौरान प्राप्त हुआ। एक समय की बात है विक्रम नौवीं कक्षा में पढते थे। उस समय पूना में स्थित पानशेत और खडकवासला डैम के बाँध टूट गए और आधा पूना पानी में डूब गया था। उनके स्वयं के घर में बीस-पच्चीस फिट पानी था। घर के सभी लोग दुखी थे। बहुत नुकसान हुआ था। कुछ हफ्तों के बाद सफाई का कार्य शुरु हुआ। उसके कुछ दिन बाद एक सुबह प्रख्यात नाटककार जोगलेकर, चितरंजन कोल्हाटकर और तत्कालीन मराठी थिएटर के नामचीन कलाकर उनके घर आए थे। वे सभी उनके लिए कुछ आर्थिक मदद और खाद्य सामग्री लेकर आए थे। बाबा ने सब मना कर दिया एक रुपया भी नहीं और कोई घर का सामान। यह अहंकार नहीं था। बाबा ने सभी को समझाकर विनम्रता से मदद लेने से मना कर दिया था। उस शाम उनके मना करने का मतलब विक्रम नहीं समझ पाए थे परंतु उस दिन के वाकया को याद कर के आज उनके बाबा का फैसला क्यों सही था यह समझ आता है। उसी शाम बाबा उन्हें पूना के संभाजी पुल पर ले गए और ओंकारेश्वर मंदिर से पूर्व की दिशा में देखते हुए खड़े हो गए। पाँच मिनट तक विक्रम भी उस जगह को देखते रहे। उस जगह को देखकर विक्रम को रोना आया। तब उनसे बाबा ने उस दिशा में अपनी उंगली दिखाते हुए कहा था देखो, हमारे पास चार दीवार और छत है। जिन लोगों को तुम देख रहे हो उनके पास ना तो छत है ना चार दीवार। इस बाँध के फटने से जिनके घर बह गए है उनकी पीड़ा और अवस्था को समझते हुए मैंने आज सुबह आयी हुई मदद को लेने से इनकार कर दिया। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस समय हम से ज्यादा उन लोगों को इसकी ज्यादा जरूरत है? उस दिन विक्रम की छाती और चौड़ी हो गई थी अपने बाबा के सत्कर्म और अच्छाई को देखकर। बाँध के फूट जाने से उन्हें भी लम्बे समय तक भूख, दरिद्रता, वस्त्र और सामान का अभाव झेलना पड़ा। लेकिन इसी घटना से उन्होंने उन लोगों के विचारों को जाग्रत रखना सीख लिया जो उनसे ज्यादा दर्द और परेशानी में हैं और इसलिए कुछ पैसे जमा करने के बाद उन्होंने सोशल पब्लिक ट्रस्ट फंड के लिए भुगतान करते हुए तीस साल पहले एक ट्रस्ट स्थापित करने का फैसला लिया जो आज भी कार्यरत है। उस ट्रस्ट के माध्यम से वे पिछले कई वर्षों से छोटे-छोटे कणों के रूप में महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य कर रहें है। उनके लिए यह भी एक बड़ी सफलता रही है।
लगभग साठ के दशक में उन्होंने मराठी नाटकों के साथ फिल्मों में मिली भूमिकाओं को स्वीकार करना शुरु किया। उस समय अधिकांश निर्माता, निर्देशक आश्वस्त थे कि वे विक्रम गोखले नाम के एक युवा और शारीरिक रूप से सुंदर दिखने वाले लड़के को फिल्म कलाकार के रूप में मौका देने का एक महत्त्वपूर्ण काम कर रहे थे। उस समय किसी भी कलाकर के पास निर्माता, निर्देशक को किसी भी काम के लिए मना करने की हिम्मत नहीं होती थी और ना ही विक्रम के पास उतना धैर्य था। बेशक, सिर्फ संघर्ष करने वाले अभिनेताओं को ही नहीं बल्कि कुछ हद तक स्थिर दुनिया भर के सभी अभिनेताओं, कलाकारों, कवियों, लेखकों, संगीत निर्देशकों और कुछ हद तक यहाँ तक कि निर्देशक के पास भी शिकायत करने का लाइसेंस नहीं था और अगर कोई बदतमीजी करता था उसे बाहर का दिखाया जाता था। ऐसा रास्ता आज तक किसी ने विक्रम नहीं दिखाया। उन्होंने कभी ऐसा व्यवहार किया ही नहीं कि उन्हें वह नौबत आए। पर हाँ, कुछ नाटक कारों, थिएटर कंपनियों के मालिकों और कुछ सिनेमा / नाट्य निर्देशकों के साथ कभी-कभी विक्रम का झगड़ा या बहस पूरे महाराष्ट्र में भी प्रसिद्ध हो गई थी। कभी प्रसिद्धि के नशे में रहते हुए उन्होंने जबरदस्त बेवकूफी की थी। जिस तरह निर्माताओं के पास अपने कलाकारों के लिए अनुबंधों की शर्त होती है उसी तरह विक्रम ने निर्माता, निर्देशक के लिए स्वयं का ऐग्रीमैंट मुद्रित किया था। वे इस बात पर अड़े  रहते थे कि अगर मुझे प्रोड्यूसर का कांट्रैक्ट साइन करना है तो प्रोड्यूसर को भी मेरा कांट्रैक्ट साइन करना पडेगा। उसी के चलते विक्रम को सालों तक नाटक और सिनेमा से दूर रखा। इससे उनके फिल्मी कैरियर पर कोई खास प्रभाव नहीं पडा लेकिन अंत में उन्होंने ने अपनी मूर्खता के संकेत के रूप में उस अनुबंध की एक प्रति अपने पास रख ली और बाकी सभी कूड़े दान में स्वाहा कर दी।
विक्रम जी का हमेशा यही मानना रहा है कि जिसकी जेब में पैसा नाम की शक्ति होती हैं और कंधे के ऊपर वाले अंग में अज्ञानता का गड्ढा होता है। उनकी उस ताकत के आगे दुनिया झुकती हैं। ऐसी झुकी हुई दुनिया में उन्होंने कई साल बिताए हैं। इसलिए वे जीवन के उस हिस्से को सफलता या असफलता के तराजू में नहीं तौलते। वे कहते हैं कि उम्मीदों की दौड़ पर अंकुश न लगाएँ। अगर हम इस बात का ध्यान रखें कि आपके पैर जमीन पर रहेंगे तो हम बहुत कुछ सोच सकते हैं। वे कहते है कि शैक्षणिक रूप मैं असफल रहा हूँ। जिसे बोलचाल की भाषा में शिक्षा कहा जाता है। पर इसका अर्थ यह क़तई नहीं था कि मैं बिलकुल भी कमजोर विद्यार्थी रहा हूँ। उन्होंने बड़ी निर्भयता से अपने बाबा से कॉलेज की शिक्षा में दिलचस्पी न होने की बात भी कही थी। परंतु अपनी बेटियों के शिक्षा के प्रति वे बहुत ही अनुशासित और सख्त रहें है। इसलिए उनकी बड़ी बेटी अन्वया गोखले ने बी.ई इलेक्ट्रॉनिक्स किया और उन्होंने अमेरिका जाकर एम एस भी किया और आज वे इंटेल में सीनियर इंजीनियर हैं। छोटी बेटी शक्ति गोखले स्नातक हैं और मुंबई में व्यवसाय उन्मुख कार्य में लगी हुई हैं। विक्रम जी ने अपने पूरे जीवन में केवल आठ दिनों के लिए नौकरी की है। लेकिन शादी के बाद उनकी पत्नी वृशाली गोखले को काम करने की इजाजत थी। अगर उन्होंने आठ साल पहले इस्तीफा नहीं दिया होता, तो वह मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमीरात की दूसरी सबसे बड़ी अधिकारी होती।
विक्रम गोखले सबसे प्रतिभाशाली अभिनेता थे जो सितारों के परिवार के सदस्य होने के लिए जाने जाते थे। सन २००१ में उन्होंने टेलीवीजन धारावाहिक ‘संजीवनी’ में गुरदीप कोहली के साथ काम करने से विशेष प्रसिद्धि हासिल हुई थी। २०११ में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी मराठी फिल्म ‘अनुमति’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। २०१५ में विष्णूदास भावे लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, बलराज साहनी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। २०१७ में जीवन गौरव पुरस्कार और २०१८ में पुलोस्तव सम्मान तथा चित्रपति वी. शांताराम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।
सन २०१६ में उन्होंने गले की परेशानी से नाटक में अभिनय से संन्यास ले लिया था। एक लंबी बीमारी के बाद २९ नवंबर २०२२ में पूणे के निजी अस्पताल में उनका देहांत हो गया।

सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’  साहित्य से बरसों से जुडे होने साथ-साथ कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में लेख, कविता, गजल, कहानियाँ प्रकाशित।
चलभाष: +२५५ ७१२ ४९१ ७७७
ईमेल: surya.4675@gmail.com
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