अच्युत मामा मेरी दूसरी नानी के तीसरे बेटे थे | (नाना जी ने दो शादियाँ करी थीं | बड़ी नानी अब इस दुनिया में नहीं थीं|) अच्युत मामा, मेरे मामा कम, बड़े भाई अधिक थे | जब वे वन विभाग में अधिकारी हुए तो सबसे अधिक ख़ुशी मुझे ही हुई थी | हाँ, तो अच्युत मामा के लिए रिश्तों की बहार सी आ गई थी उन दिनों | लेकिन बड़े नखरे थे मामा के विवाह के लिए | चूँकि छोटी नानी की पहलौठी की दो सन्तानें पैदा हो कर चल बसी थीं और अच्युत मामा बड़ी मान मनौतियों के बाद पैदा हुए थे, साथ ही फूल पान की तरह पाले भी गए थे सो घर वालों ने उनके नखरे भी सिर आँखों पर लिए | कितनी ही लडकियाँ देखी गईं उनके ब्याह के लिए | देख देख कर छोड़ी गईं | किसी का रंग दबा तो किसी की हाईट कम, कोई मोटी है तो किसी की आँखें छोटी हैं | दर्जनों रिश्ते छोड़े गए लेकिन मामा का ब्याह कहीं तय नहीं हो पाया | माँ और नानी को कई बार कहते सुना कि अच्युत को तो कोई हूर की परी ही चाहिए | हाँ, मेरे अच्युत मामा थे ही ऐसे कि उनके साथ कोई ऐसी वैसी लड़की जँचती ही नहीं | गोरे, उजले, स्वस्थ, सुदर्शन, आकर्षक, हँसमुख, कितने विशेषण दूँ मैं उनके लिए | मामी के लिए मेरा चाव भी काफी था | लेकिन हुआ कुछ ऐसा कि एक दिन अच्युत मामा और उनके घनिष्ट मित्र यश जब स्वीमिंग पूल में तैरने गए तो पता नहीं कैसे यश गहराई में डूबता चला गया | मामा तो तैर कर बाहर निकल आए लेकिन यश की दम घुटने से मृत्यु हो गई | यश अपने परिवार का अकेला लड़का था | अच्युत मामा जब उनके वृद्ध माता पिता को दिलासा देने पहुँचे तो नाना भी साथ थे | कहीं न कहीं अच्युत मामा स्वयं को उनका अपराधी मान रहे थे | इसीलिए जब बिलखते हुए उनकी माँ ने नाना से कहा, “ भाईसाहब, मेरी बेटी विवाह योग्य है | अगर अच्युत से उसकी शादी हो जाती है तो मैं समझूँगी कि मेरा यश वापस लौट आया है |”
और इस तरह अच्युत मामा का ब्याह उस अनदेखी, अनजानी लड़की से चटपट ही हो गया था | भावनाओं का ज्वार इतना अधिक था कि एक बार मिलने या तस्वीर देख लेने की औपचारिकता भी नहीं बरती गई | हफ्ते भर के अन्दर ही उषा मामी ब्याह कर अच्युत मामा के घर चली आईं | उस दिन नाना ने अपने घर को रोशनियों से सजाया था | माँ ने उषा मामी की मुँह दिखाई सोने की गिन्नी से करी थी लेकिन उन्हें उषा मामी बिल्कुल पसंद नहीं आई थीं | रसोई में जा कर नानी से बोली थीं, “कैसी जगह ब्याह दिया अच्युत को पिता जी ने ? बला डाल दी गले में | लेकिन जब उषा मामी ने ढोलक की थाप पर “ बोले रे पपीहरा ‘’ गाया तो सभी मंत्रमुग्ध रह गए | मानना पड़ा कि कोयल काली ही होती है |
फिर अगली सुबह ऊपर वाले जीने से अच्युत मामा धड़ धड़ करते नीचे उतरे और बरामदे का दरवाज़ा भड़ाक से बंद करते हुए बाहर चले गये | मुझे आज भी उनका वो तमतमाया चेहरा याद है और नानी का कांपता स्वर –“ अच्युत को पसंद नाय आई दुल्हन |’’
तभी छम छम करती उषा मामी ऊपर से नीचे उतरीं | आज उन्होंने चेहरे से पूरा घूँघट हटा रखा था | गहरा साँवला रंग, कुछ कुछ फैली सी नाक और छोटा कद | आँखें ज़रूर शरबती थीं लेकिन उन आँखों में डूबने की फुरसत कहाँ थी अच्युत मामा को | उन्होंने तो पहली दृष्टि में ही नापास कर दिया था उषा मामी को | सच, मुझे भी बहुत निराशा हुई थी उन्हें देख कर | जयमाल के समय तो ब्यूटी पार्लर वाली ने उनका काया पलट ही कर दिया था किन्तु कलई उतरते ही असली रंगत सामने आ गई थी | भरपूर दान दहेज़ और धन दौलत देने के बाद भी घर में कोई भी उषा मामी को मन से स्वीकार नहीं कर पाया | ईश्वर ने उषा मामी को रूप रंग देने में कृपणता अवश्य बरती थी लेकिन उनकी बुद्धि, गुण और व्यवहार अद्भुत थे | बोली में इतनी मिठास कि परायों को भी अपना बना लें | समय के साथ घर भर में सबकी दुलारी बन चुकी उषा मामी, अच्युत मामा का प्यार नहीं पा सकीं | पुरुष तो स्त्री के सौन्दर्य से ही बंधा होता है शायद | मैं भी विवाह की उम्र के आसपास ही थी और जानती थी, समझती थी कि विवाह के सुर्ख जोड़े में आरम्भ की गई यात्राएँ कितना सब्र मांगती हैं | एक शहर में रहने के कारण अक्सर मैं अकेले ही नानी के घर चली जाती थी | उस दिन अचानक ही ऊपर उषा मामी के कमरे में उनसे मिलने पहुँच गई थी | वे दरवाजे की तरफ पीठ किये आरामकुर्सी पर अधलेटी थीं | मैंने देखा – मामा की कमीज़ उनकी गोद में थी और वे उसके बटन बाँहें चूम रही थीं, सूँघ रही थीं | शायद वे मामा की महक में डूबी हुई थीं | मेरी आहट सुन कर पलटीं और शरमा गईं | उस समय सच, मुझे वे बहुत प्यारी लगी थीं |
‘’ ये क्या मामी ? दिन में भी मामा को याद करती रहती हो | मैंने उन्हें छेड़ा तो उनकी आँखें छलक उठीं | उनके आँसुओं की उस तरलता में एक परछाई थी जिसे मैंने न जाने कितनी बार देखा था |
वे उठ कर खिड़की के बाहर के आसमान में न जाने क्या ढूँढ रही थीं | शायद अपने टूटे हुए सपनों की किरचें ? उनके मन में अत्यधिक दुःख था जो उस दिन उन्होंने मुझसे टुकड़ा टुकड़ा बाँट लिया था | उनके ब्याह को चार बरस होने को आए थे और उनकी गोद अभी तक सूनी थी | सर्दी की उस पूरी दोपहर मैं उषा मामी के साथ रही | बहुत से दुःख निःशब्द समझे जाते हैं | विवाह की पहली रात से ही अच्युत मामा ने उषा मामी से दूरी बरत ली थी | पहली ही रात वे उषा मामी का घूँघट उठाने के बाद अपना तकिया उठा कर दूसरे कमरे में सोने चले गए थे | धीरे धीरे वे बाहर वाले कमरे में ही सोने लगे | लेकिन मामा की उपेक्षा के बाद भी उषा मामी टूटी नहीं | अपने लिए एक ज़मीन, एक आकाश ढूँढ लिया था उन्होंने जो उनका अपना था | डिग्री थी उनके पास | राजकीय कन्या विद्यालय में संगीत शिक्षिका हो गईं थीं |
समय के साथ नानी पोते पोती के लिए अकुला उठी थीं | एक ही लड़का, वह भी निरबंसिया | हे भगवान ,ये कहाँ का न्याय है ? लेकिन भगवान है ही कहाँ जो हम उससे सवाल करें ? उसे तो हम बेकार में यश अपयश देते रहते हैं |
फिर मामा की वंश बेल बढती भी तो कैसे ? जब पुरुष स्त्री का संग साथ होगा तभी न वंश बेल बढ़ेगी | जब मन ही पूरा नहीं बन पाता तो पौध कहाँ से बनेगी ? ये कौन समझाए घरवालों को ? नानी के तानों से मामी का कलेजा छलनी होता जा रहा था | धीरे धीरे वो ढीठ होती जा रही थीं | चार बरसों में आठ बार भी मायके नहीं गईं | मैं सोचती कि क्या अच्युत मामा और उषा मामी के बीच कोई भी ऐसा तंतु नहीं होगा जो उन्हें परस्पर जोड़ देता | लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं बच सका था | फिर एक दिन पता नहीं क्या हुआ कि उषा मामी सच में मायके चली गईं, हमेशा के लिए | फिर कभी वापस नहीं आईं | सुना था नानी ने चिड़चिड़ाहट में उन्हें ‘ बंजर, बाँझ ‘ कह कर दुत्कार दिया था | शायद एकाध हाथ भी उठा दिया था उन पर | दुखी मन लिए, बिना कुछ कहे सुने उषा मामी चली गईं | किसी ने उन्हें रोका भी नहीं |
समय गुज़रता गया | माँ से सुनती रहती कि अच्युत मामा के लक्षण ठीक नहीं हैं | मामी के चले जाने के बाद वे भटकते रहे, इस औरत से उस औरत तक | उनकी उम्र बढ़ती जा रही थी | समय, मौसम और उम्र कहाँ रुकते हैं किसी के लिए | फिसल जाते हैं बंद मुठ्ठी में से रेत की तरह | अच्युत मामा अपनी उम्र को मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे | मन और उम्र की एकसंगता साथ बनी रहनी चाहिए | यदि किसी बिन्दु पर मन और उम्र की एकसंगता छूट जाये, उम्र आगे निकल जाये और मन वहीँ ठहरा रह जाये तो एक अजीब सी त्रासदी झेलनी पड़ जाती है |
अच्युत मामा दूसरा ब्याह करना चाहते थे लेकिन कैसे करते ? मामी ने तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था | उम्र के निशान अच्युत मामा के चेहरे और शरीर दिखने लगे थे | गिरते बाल और बढ़ता मोटापा | वे कैसे न कैसे अपने यौवन को मुठ्ठी में कर लेना चाहते थे | लेकिन वे ययाति तो थे नहीं कि कोई पुरु अपना यौवन उनको दान में दे देता |
फिर एक दिन सरकारी दौरे से लौटे मामा अकेले नहीं थे | एक १७/ १८ बरस की कमसिन लड़की उनके साथ थी | नाना, नानी, माँ और मैं, सबके साथ पूरा परिवार स्तब्ध, हतप्रभ, आश्चर्यचकित था |
“ ये अरुंधति है, आज से ये यहीं रहेगी | मेरी पत्नी और आपके घर की बहू बन कर | नानी कुछ नहीं बोल पाई थीं | धीरे धीरे कुछ दिन बीते | कोई कहता अरुंधति विधवा थी, कोई कहता विधवा नहीं परित्यक्ता थी | जो भी हो अरुंधति बहुत बहुत सुन्दर थी | वास्तव में सुदूर गाँव में गये अपने दौरे में गरीबी से हारे एक परिवार की कन्या अरुंधति को देख कर अच्युत मामा लट्टू हो गए थे और ५००० रुपये में उसे खरीद लाये थे | अरुंधति के लिए सुख का अर्थ था ‘ मन भर खाना और तन भर कपड़ा |’
फ़िलहाल अरुंधति को घर में ऐसे ही नहीं रखा जा सकता था | नानी और मामा ने मुझ पर ज़िम्मेदारी सौंपी, “ गुड्डी,इसे कुछ तौर तरीके सिखा |’’ अरुंधति काफी फूहड़ और मूर्ख थी | लेकिन उसकी व्यावहारिक बुद्धि गजब की थी | एक महीने में ही उसका काफी कुछ काया पलट कर दिया था हम लोगो ने | इतने दिन नानी ने उसे अपने पास ही रखा |
समय की बलिहारी कि पता नहीं कैसे उषा मामी ने भी तलाक के कागज़ों पर दस्तख़त करके भिजवा दिए थे | अच्युत मामा के ब्याह का मुहूर्त दोबारा निकला | तिस पर अच्युत मामा का दोबारा ब्याह का हौसला भी गज़ब का था | सिर के बचे खुचे बालों को कस कर रंगा था उन्होंने | मंहंगी शेरवानी, जूतियाँ, कलगीदार मौर, सब कुछ एवन | अरुंधति भी हांथों में मेहंदी, पैरों में महावर, भर भर हाथ चूड़ियाँ और बारीक काम का लहँगा चुनरी पहन कर जब तैयार हुई तो उसके माथे की लाल बिंदिया जैसे लपटें मार रही थी | इस बार ब्याह में कोई धूमधाम नहीं थी | घर के आँगन में ही फेरे पड़ गए | फेरों के बाद मामा ने नईकी मामी के साथ नाना नानी के पैर छुए | झुक कर जैसे ही उठे सामने ही बरामदे का बड़ा सा आदमकद आईना खिलखिला उठा | उसमें अच्युत मामा और अरुंधति का प्रतिबिम्ब साफ़ साफ़ झलक गया | कच्ची कली सी अरुंधति जो अपनी पूरी सुन्दरता के साथ बेहद मासूम लग रही थी | दूसरी तरफ तेज़ी से बुढ़ाते अच्युत मामा जो उम्र में अरुंधति से लगभग दुगने थे | अनियमित दिनचर्या और ऊटपटांग आदतों के कारण वे अरुंधति के साथ कितने बेमेल लग रहे थे | अगणित बार फेशियल और हेयर कलरिंग के बाद भी उनके चेहरे की झुर्रियां स्पष्ट झलक रही थीं | आँगन में बैठी मैं साफ़ साफ़ देख रही थी कि अच्युत मामा के चेहरे की रंगत बदलती चली गई | उन्होंने अपनी मुठ्ठियाँ भींच ली थीं | उड़ती सी एक नज़र सभी पर डाली , एक खाली खाली सी नज़र और हाथ में पकड़ा नारियल पूरी ताक़त के साथ आईने पर दे मारा |
आभा श्रीवास्तव
फ्लैट नं-३०३, प्लाट नं २६/१०,
कुमार एन्क्लेव, वज़ीर हसन रोड ,लखनऊ, २२६००१
संपर्क- ९६५१७६९३२२
आपकी कहानी पढ़ी ।
शादी की भी एक उम्र होती है ।सही कहा आपने कि समय, मौसम और उम्र किसी के लिए नहीं रुकते।
काबीलियत का भी महत्व है यह बात सबको समझनी चाहिये।
उषा की क्या ग़लती? बीज जब बोया जाएगा, अंकुरण तभी न होगा!
तलाक के पेपर पर साइन न करना उस मानसिक प्रतारणा का प्रतिरोध रहा जो उषा ने झेला।
पता नहीं क्या मजबूरी रही होगी कि 5000 में बेटी को बेच दिया गया।
अंत में बेमेल ही सही,बहू तो आई।
प्रश्न फिर भी वहीं के वहीं रहा। जोड़ी बेमेल तो तब भी थी जब उषा से ब्याह हुआ और जोड़ी बेमेल अब भी है।
बधाई आपको।
कहानी पढ़ कर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत आभार, नीलिमा जी
आप की , “समय,मौसम, और उम्र” कहानी पढ़ी। यह कहानी मनुष्य के अहम्, सौंदर्य-बोध और भावनात्मक रिक्तता की मार्मिक प्रस्तुति है। आपने रूप और सत्व के संघर्ष को बड़े सूक्ष्म ढंग से उकेरा है।
अच्युत मामा वह व्यक्ति हैं जो बाहरी सुंदरता की तलाश में अपने भीतर की सच्चाई से दूर हो जाते हैं, जबकि उषा मामी उपेक्षित होकर भी गरिमा, संवेदना और आत्मबल की प्रतिमूर्ति बन जाती हैं। उनका मौन विद्रोह और आत्मनिर्भरता स्त्री की गहराई को उजागर करते हैं।
कहानी का अंत , ‘आईने का टूटना’, केवल वस्तु का नहीं, अच्युत मामा के अंतर्मन के विखंडन का प्रतीक है। यह दृश्य कहानी को मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक ऊँचाई देता है।
सरल भाषा, सशक्त प्रतीक और सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति के कारण “समय,मौसम औ उम्र” केवल एक पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि मानव स्वभाव और स्त्री-अस्मिता का सजीव दस्तावेज़ बन जाती है।