Wednesday, February 11, 2026
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अलका सिन्हा की कहानी – श्रापमुक्त

“बंद करो यह म्यूजिक,” वान्या वैष्णवी झल्ला पड़ी। 
पल भर में वातावरण शांत हो गया। यह घर उसकी मर्जी से चलता है। कुछ देर पहले उसने ही म्यूजिक चलवाया था, पर अब यह उसका ध्यान भटका रहा था। 
“तुम्हारा बस चले तो तुम सबको खामोश कर दो। बुत में बदल दो। एक तान्या काफी नहीं।” कोई आवाज कानों में फुसफुसा गई थी।
“मैंने उसे बुत बना दिया है?” वह पूछना चाहती थी मगर जबान ने साथ न दिया। उसकी आवाज किसी गहरे कुएं में धंस कर रह गई। क्या तान्या के साथ भी ऐसा ही होता होगा? क्या वह भी बहुत कुछ कहना चाहती होगी मगर उसकी आवाज किसी खाई, किसी गुफा में दफ्न हो जाती होगी! 
वह खुद को बेहद असंयत, असंतुलित महसूस करने लगती है। तान्या उसके जीवन का ‘डार्क-स्पॉट’ हो कर रह गई है। क्या उसकी इस स्थिति के लिए वह जिम्मेदार है? कोई उससे बार-बार प्रश्न करता है। वह खुद को कोई माकूल जवाब नहीं दे पाती है। 
घुंघराले बाल और गहरी काली आंखों वाली तान्या कितनी खूबसूरत दिखती थी। हर कोई उससे बात करना चाहता था मगर उसने खुद को अपने ही भीतर ऐसा कैद कर लिया कि वह बेतरतीब पड़ी किसी वस्तु की तरह हो गई, जिस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। तान्या सदा से ऐसी नहीं थी। मगर उम्र के साथ बढ़ती हुए तान्या अपने भीतर गुम होती चली गई। लाख कोशिशों के बावजूद वह मुश्किल से कुछ बोलती। अन्य बच्चों-सी चपलता नहीं थी उसके भीतर। वह अक्सर किसी दीवार पर टकटकी लगाए रहती या फिर, आंख बंद कर कुछ देखती रहती। आंखें बंद कर देखने का उपक्रम कितना कठिन होता होगा मगर उसके लिए यह बहुत सामान्य था। कई बार लगता जैसे खुली आंखों से भी वह उस दुनिया को नहीं देखती जिसे बाकी लोग देखते थे। उसके भीतर का उल्लास शिथिल हो गया था। 
वैसे, ऐसा भी क्या हुआ था उसके साथ? कई बार वान्या वैष्णवी खुद को टटोलती। तब उसे खुद को अवसाद से बाहर निकालने में अकथ मेहनत करनी पड़ती। शहर की नामी मोटिवेशनल स्पीकर वान्या वैष्णवी के शब्द सारी दुनिया के लिए अलग ही अहमियत रखते थे। लोग उसके कहे अनुसार खुद में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करते और वान्या वैष्णवी के व्याख्यानों का जादू सबके सिर चढ़कर बोलता। मगर यह जादू तान्या पर रत्ती भर भी असर नहीं करता। किसी बुत की तरह वह हर बात सुन लेती, अपेक्षित ढंग से कर भी देती मगर बोलती कुछ नहीं।
वान्या वैष्णवी का बड़े-बड़े मंचों पर जाना होता था, भाषण देते हुए उसकी जुबान न थकती थी, मगर क्या था जो अपनी ही बेटी के मामले में उसके शब्द उसका साथ न देते। उसकी आवाज में वह जोश, वह सचाई आने ही न पाती जो दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तान्या को लेकर वह बहुत असहाय थी। असहाय क्या, वह हार चुकी थी। उसने बहुत-सी कहानियां सुनाकर उसे मुखर करने की कोशिश करके देख ली। ऊर्जा से भरे उसके शब्द कुछ काम न करते, जोशीले गीतों का उस पर कुछ भी असर न होता। एक बार वह उसे, केवल उसे अपने साथ सिनेमा दिखाने ले गई। रास्ते भर वह उससे कुछ-कुछ बतियाती रही, उसे हंसाने की कोशिश में खुद बेतहाशा हंसती रही पर तान्या पर रत्ती भर भी फर्क न पड़ा। वह निर्जीव आंखों से उसे देखती रही। एकबार तो लगा कि वह उसे जोर से झकझोर दे। कई बार ‘शॉक थेरेपी’ भी बहुत कारगर होती है। हताशा और गुस्से में भर कर दांत पीसते हुए उसने अपना हाथ तान्या की तरफ उठाया भी, मगर तान्या का बेजान चेहरा देखकर वह खुद ही शॉक में आ गई। 
“आखिर ऐसा भी क्या हो गया है कि तुम कुछ बोलती ही नहीं? बहुतों के साथ बहुत कुछ गुजरता है पर वे जिंदगी से मुंह नहीं फेरते। वे फिर उठते हैं, यत्न करते हैं और दुनिया बदल कर रख देते हैं…” कहते-कहते उसके होठों के किनारों पर थूक जम आया। हताशा में उसकी आंखें जलने लगीं और वह खुद अवसादग्रस्त महसूस करने लगी। आखिर वे सिनेमा देखे बिना ही वापस आ गए। तान्या को किसी बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था। न सिनेमा जाने से खुशी हुई, न लौट आने से नाराजगी। दरअसल, उसके लिए यह सब कुछ मायने ही नहीं रखता था। तब क्या मायने रखता था? कुछ नहीं, वस्तुतः कुछ भी नहीं। मगर उसका यह मौन, उसका यह एकाकीपन वान्या वैष्णवी के लिए बहुत मायने रखता था। तान्या की चुप्पी उसके लिए चुनौती थी और वह बार-बार कमर कस कर उस चुनौती का सामना करने को आ खड़ी होती और हर बार मुंह की खाकर लौटती। तब वह खुद को बड़ा कोसती। 
दरअसल, कई बार उसे भी लगता कि तान्या की इस स्थिति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। पर वह कर भी क्या सकती थी। उसे उस समय जो विवेकशील लगा, उस निर्णय का चुनाव उसने किया और यह मान लिया कि वह कभी गलत नहीं हो सकती। पर सवाल यह भी था कि यदि तान्या के बदले वहां कोई अन्य लड़की वहां होती, क्या तब भी उसका निर्णय वही होता? सोच की सूई यहीं आकर अटक जाती थी।  
वान्या वैष्णवी आधुनिक ख्यालात वाली बोल्ड महिला थी। बचपन से ही गलत के विरोध में आवाज उठाना उसकी पहचान थी। कॉलेज में भी वह छात्र संघ की अध्यक्ष चुनी गई थी। उसके तेवर ऐसे थे कि बड़े-बड़े नेता थर्रा जाते। राजनीतिक पार्टियों ने उसे चुनाव लड़ने का टिकट भी देना चाहा मगर राजनीति के पचड़ों से दूर रहना भी उसके सिद्धांतों में शामिल था। कॉलेज के समय में ही उसने देख लिया था कि राजनीति ‘कम-से-कम नुकसान और अधिक-से-अधिक मुनाफा’ के नियम पर चलती है। इसमें कोई अपना-पराया नहीं होता। कोई अपना होता है तो बस कुरसी। उसे कुरसी की कोई जरूरत नहीं थी। वह बेताज बादशाह थी। उसे तो शोषितों का हिमायती बनकर गरजना और सत्ता पर आरोप लगाना अधिक जंचता था। ऐसा नहीं था कि वह यह सब लोकप्रियता के लालच में करती थी। गलत का विरोध करना उसका स्वभाव था। मगर जब अपने पर आई तब अचानक जबान ने दगा दे दिया… शब्दों के बाण का तरकश खाली हो गया और इसके लिए वह खुद को कभी माफ नहीं कर सकती थी। यही कारण था कि तान्या को दुरुस्त करने की कोशिश में कई बार वह स्वयं भी अवसाद में जाने लगती। कई बार उसे लगता कि बड़े-बड़े सम्मेलनों में हुंकार कर अपनी बात कहना, नाटक के संवाद-सा नकली है, असल जिंदगी में तो वह उसी दिन खामोश हो गई थी जिस दिन उसने अपने भीतर की उस आवाज को जबरन चुप करा दिया था जो तान्या के पक्ष में उठना चाहती थी। उसी दिन से उसके व्याख्यान नकली लगने लगे। उनके भीतर की सचाई खत्म हो गई। भले ही औरों को उनमें कोई अंतर न दिखाई देता हो मगर अपने भीतर वह भी शून्य हो चली थी। रटे-रटाए संवाद की तरह वह अपना व्याख्यान देती और लौट आती। अपने ही शब्द उसका मुंह चिढ़ाते मालूम पड़ते। 
कई बार यह भी ख्याल आता कि तान्या के बारे में क्यों न वह किसी साइकेट्रिस्ट की मदद ले। मगर अगला ही पल उसे सजग करता — क्या सोच रही हो, लोगों को पता चलेगा तो तुम्हारा अस्तित्व कितना खोखला हो जाएगा! वान्या वैष्णवी को अपनी ही बेटी के लिए मनोचिकित्सक तक जाना पड़ रहा है, चिराग तले अंधेरा! फिर क्या लोग उसकी बातों को उसी भरोसे के साथ सुनेंगे जैसे अब तक सुनते रहे हैं? उसका अब तक का जोड़ा-अर्जा सब एक महा शून्य में बदल जाएगा। तब वह अपना सामना कैसे करेगी? अपना सामना तो वह अब भी नहीं कर पाती है। अकेलेपन से बहुत बचती है वह। हर समय काम की व्यस्तता को ओढ़े रहती है। कभी तेज आवाज में टीवी चला देती है तो कभी खुद ही जोर-जोर से गाने लगती है। कई बार तो पूजा करते समय वह मंत्रों का उच्चारण इतने ऊंचे स्वर में करती मानो ईश्वर से याचना नहीं कर रही, ललकार रही हो। 
वह सदा से संघर्षशील रही है। बिना जद्दोजहद के पाई सफलता को तो सफलता माना ही नहीं कभी, उसकी खुशी कभी नहीं जानी। उसे अपनी उपलब्धियों में गिना ही नहीं, जिसके लिए उसे संघर्ष न करना पड़ा हो। मगर खुद से ही यह कैसा संघर्ष था जो उसे छीजता जा रहा था। वह भीतर-ही-भीतर पीड़ा से कराहती मगर होठों पर मुस्कान रखे, पूरी धमस से अपनी बात कहती। कैसी दोहरी हो गई थी उसकी जिंदगी! कितने झूठे हो गए थे उसके शब्द! अगर उसकी यही दशा रही तो वह दिन दूर नहीं जब उसे खुद को साइकेट्रिस्ट से दिखाना पड़ेगा। तब मजाक बन कर रह जाएगी वह! 
इसलिए वह तान्या से बचने लगी थी। 
तान्या ने तो उसी दिन से उसकी तरफ देखना छोड़ दिया था जिस दिन अन्याय के विरोध में गरजने वाली मां ने उसके मामले में चुप्पी साध ली। उसे भरोसा था कि उसकी मां ऐसी घटना के खिलाफ दहाड़ उठेगी। वह तान्या को समझाएगी, “तुम्हारी क्या गलती है, तुम क्यों मुंह छुपा कर बैठी हो? खड़ी हो और बोलो। समूची दुनिया के सामने उसे बेनकाब कर दो। उसे कहीं मुंह दिखाने लायक न छोड़ो। हिम्मत न पड़े उसे दोबारा किसी लड़की को हाथ लगाने की। किसी को गलत इरादे से छूना भी कम बड़ा गुनाह नहीं है। यही है वह बीज बिंदु जहां से कोई कमजोर अपराधी शातिर गुनहगार में बदलता है…” मां के भाषण के कितने ही वाक्य तान्या के मन में हंगामा कर रहे थे। वह अपनी आवाज बुलंद करने के लिए तैयार भी थी मगर मां ने उसे अनसुना कर दिया।
“इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है?” कुछ देर होठ चबाने के बाद उसने कहा था, “इतनी दुर्घटना तो हर लड़की के साथ होती ही है। इसे बहुत तूल न दो, इग्नोर इट!” 
तान्या सन्न रह गई। इतनी दुर्घटना तो हर लड़की के साथ होती ही है, इसलिए इसे तूल नहीं देना है? इग्नोर कर देना है?
तान्या भले ही उस दिन के बाद से खामोश रहने लगी थी मगर उसकी सुनने की शक्ति बहुत प्रबल हो गई थी। वह पीठ पीछे चलती आहटों को भी बखूबी पहचान लेती और जान जाती कि पीछे से कौन गया है। मां पैरों को हल्का-सा घसीट कर चलती थीं तो आन्या धम-धम करती हुई निकल जाती। पापा की चाल में हमेशा ही हड़बड़ी महसूस होती जबकि पड़ोस के सुरेश अंकल बिलकुल दबे पांव आते। ऐसा उसने पहली बार उसी दिन महसूस किया था जब सुरेश अंकल अचानक उसके पीछे आकर खड़े हो गए और उसे एकदम से गोद में उठा लिया था। वह कोई दस साल की रही होगी। उनकी गोद का कसाव दमघोंटू मालूम पड़ा और वह रोने लगी। उसे चुप कराने की कोशिश में उन्होंने उसका मुंह इतनी जोर से चूमा कि उसकी आवाज गले में घुटकर रह गई। सूजे होठों के साथ वह घर लौटी और मां को इस बारे में बताना चाहा तो मां को अपने अहम कार्यक्रम की हड़बड़ी थी। फिर भी, तान्या का चेहरा पढ़ने में वान्या को पल भर भी न लगा। वह एक पल को तो तिलमिलाई मगर फिर घड़ी की तरफ देखकर खुद को सामान्य कर लिया। उस वक्त वह मां से अधिक ‘वान्या वैष्णवी’ थी जिसे आज मंत्री जी के कार्यालय का से निमंत्रण था। यह बात मीडिया की टीआरपी बढ़ा सकती थी मगर वान्या वैष्णवी की टीआरपी गिरा सकती थी। बतौर मां, उसने तान्या को पुचकार कर समझाया था कि ऐसी परिस्थितियां लगभग हर लड़की की जिंदगी में आती हैं, इस पर ध्यान मत दो। और हां, यह भी समझाया था कि वह पड़ोस के अंकलों के सामने न पड़ा करे।
तो वही अपना मुंह छुपाती फिरे? यानी ऐसे लोगों को मुंह दिखाने के काबिल न छोड़ने की शिक्षा देने वाली मां के अनुसार, वही किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गई थी। वह बहुत कसमसाई, मां से उनके ही शब्दों को दोहराते हुए बहुत कुछ पूछना चाहती थी मगर मां ने इन सवालों को मैले कपड़ों के ढेर में छुपाकर वॉशिंग मशीन ऑन कर दी और आगे की जिम्मेवारी पापा पर छोड़कर अपने कार्यक्रम में निकल गईं।
उस दिन से वह दबे पांव आ धमकने वाली पदचाप को लेकर सजग हो गई। किसी अन्य की चाल में भी उस तरह की आहट मिलती तो वह सहम जाती। इस आहट ने उसके मस्तिष्क में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया था। वह अनायास ही चौकन्नी रहने लगी थी। उसे नहीं पता कि वह क्यों चौकन्नी हो गई, उसे किस बात से सावधान रहना था मगर वह पीठ पीछे चलते लोगों की आहट को एक भाषा की तरह समझने लगी थी।  
स्कूल में टीचर ने ‘बैड टच’ की जानकारी देते हुए उसकी पीठ पर हाथ फिराया और पूछा था, ‘गुड टच या बैड टच?’ फिर शरीर के कुछ हिस्सों की तरफ हाथ ले जाते हुए उसे फिर ‘बैड टच’ के बारे में आगाह किया। उसे लगा, वह इस छुअन से पहले ही वाकिफ है। बस, उसे इसका नाम नहीं मालूम था। पर अगर वह ‘बैड टच’ थी तो मां ने इसका प्रतिरोध करने के बदले उसे खामोश क्यों करा दिया? वही वान्या वैष्णवी जो हर किसी को गलत के विरोध में आवाज उठाने की सलाह दिया करती थीं? वही वान्या वैष्णवी जो अन्याय को चुपचाप सहन करने वालों को लानत भेजती थीं? क्यों किया उन्होंने ऐसा? वह कहती थीं कि किसी के साथ कोई तभी ज्यादती कर सकता है जब हम उसे इसकी छूट देते हैं। तो क्या वान्या वैष्णवी ने सुरेश अंकल को छूट दी थी? अलग-अलग शब्दों के लिबास में यही प्रश्न बार-बार तान्या के जहन में उभरते और वह घुटी हुई चीख के साथ खामोश हो जाती।
उस दिन वान्या वैष्णवी की अंतरात्मा ने भी उसे बहुत झकझोरा था। उसके लिए चुप रहना कहीं अधिक कठिन था। इस हरकत पर आवाज उठाना या फिर, अपनी गरजती आवाज से ऐसे लफंडरो को घायल कर देना तनिक भी कठिन नहीं था वान्या वैष्णवी के लिए। मगर उसने ऐसा नहीं किया। उसने ऐसा क्यों नहीं किया, यह प्रश्न उसके भी कलेजे की हूक बनकर टीसता रहता। उसने पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई, विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई? उसकी एक आवाज पर पत्रकारों की भीड़ उसके दरवाजे पर खड़ी होती। बस, यही तो नहीं चाहती थी वह। शिकायत लिखाते ही यह खबर बवाल बन जाती। हर न्यूज चैनल उसकी खबर को नमक-मिर्च लगाकर बताता, बार-बार बताता कि वान्या वैष्णवी की बेटी के साथ किसी ने कुकृत्य करने की कोशिश की। पीड़ित होने का इतना दर्द न होता जितना इस शोर पर होता। चैनलों को क्या है, उन्हें तो टीआरपी से मतलब है। वे किसी का दर्द क्या समझें!
बस, इतना ही? क्या यह सच नहीं था कि उस दिन उसे नए नियुक्त हुए आईएएस अधिकारियों को संबोधित करने जाना था। इस घटना पर आवाज उठाने से वह यह महत्वपूर्ण अवसर चूक नहीं जाती? घर पर पत्रकारों की लाइन लग जाती और वह उस दिन व्याख्यान नहीं दे पाती। वैसे देखा जाए तो इतना क्या हुआ था, पड़ोसी सुरेश ने उसे गोद में उठाकर चूमा था, जगह-जगह छूना चाहा था मगर तान्या के चीख पड़ने पर उसे झट से नीचे उतार दिया था। देखा जाए तो तान्या ने चीखकर सुरेश को इतना शरमिंदा तो कर ही दिया था कि वह कभी दोबारा ऐसी जुर्रत न करता। यही अपेक्षित था। अब इस घटना को तूल देने से तान्या की ही बदनामी होती। वह कोई साधारण औरत होती तो चल भी जाता मगर वह एक सेलिब्रिटी थी। उनकी बेटी के साथ छेड़छाड़ की घटना भी सुर्खियों में आ जाती और फिर तान्या को सामान्य जिंदगी में ला पाना कठिन हो जाता। इस पर शोर मचाने से तो वह भी खबर बन जाती जो हुआ ही न था। इतनी दुर्घटना से तो लगभग हर लड़की गुजरती है। वान्या वैष्णवी ने खुद को भी समझाया था और समय पर घर से निकल गई थी।
इतनी दुर्घटना से तो लगभग हर लड़की गुजरती है… तो क्या उसे गलत नहीं आंका जाना चाहिए, उसे सही का दर्जा दे दिया जाना चाहिए? अगर ऐसा ही था तो उस दिन ‘जेंडर सेंसटाइजेशन’ पर अपना वक्तव्य देते हुए वह इतना उत्तेजित क्यों हो गई थी? उसने तो द्विअर्थी संवादों को भी गुनाह के दायरे में बताया था और सभी को उसके प्रतिरोध में आवाज उठाने के लिए पर्याप्त आगाह किया था। मानसिक उथल-पुथल के बावजूद उसका उस दिन का व्याख्यान बहुत प्रभावशाली रहा था। यहां तक कि उसे उनकी ‘पॉश कमिटी’ में बाहरी सदस्य के रूप में नामित कर दिया गया था।  
‘क्या तुम्हारा भाषण इस घटना से अधिक अहमियत रखता है?’ धीमे स्वर में कोई सवाल उभरता जिसे वह अपनी दहाड़ती आवाज में दबा देती। तब गहरी काली आंखों वाली तान्या की खामोशी उसके भीतर चीत्कार करने लगती और उसकी प्रतिरोध शक्ति कमजोर पड़ जाती। 
मां के इस बर्ताव से तान्या सकते में आ गई थी। उसे लगने लगा कि यह स्पर्श जिसे टीचर ‘बैड टच’ कहती है उसे सहन किया जाना चाहिए। यह स्वाभाविक है। मगर मां के ही भाषण इसका विरोध भी करते। टीचर ने भी इस बात को रोकने के लिए उसे जागृत किया था। वह दोनों धाराओं के बीच टकराती चलती। कभी वह जोर से चीखती तो कभी उसकी आवाज घुट जाती। वह टुकुर-टुकुर मां की तरफ देखती और वह दृष्टि इतनी मारक होती कि वान्या वैष्णवी झट अपना चेहरा घुमा लेती। 
धीरे-धीरे तान्या की आवाज गुम होती चली गई। वह चुप रहने लगी। हल्की-सी आहट पर भीतर तक सिहर उठने वाली तान्या का आत्मविश्वास बिलकुल खत्म हो चुका था। वह अकेली रहती और कभी-कभी तो ‘एब्नार्मल चाइल्ड’ की तरह बरताव करने लगती। मगर एक बात थी कि वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अतिरिक्त सजग रहती। अपनी पढ़ाई का कोर्स खामोशी से पूरा करती। वह आत्मनिर्भर थी — खुद से अपना काम कर लेने वाली। किसी स्थान पर दिक्कत आती तो वह उसका बार-बार अभ्यास करती मगर टीचर से नहीं पूछती।   
सभी को उसके खामोश वजूद की आदत पड़ चुकी थी। सभी ने उसे वैसे ही स्वीकार लिया था। उसका होना-न-होना एक-सा था। आकर्षक व्यक्तित्व के बावजूद उसकी किसी से मित्रता न होने पाई। 
 
जहां उसकी खामोशी उसके वजूद की मौजूदगी को गैर-मौजूदगी में बदलती रहती वहीं कुछ ऐसे भी शोहदे थे जो इस चुप्पी का फायदा उठाने से नहीं चूकते। जब जिसे मौका मिलता, वह उसे छूता हुआ निकल जाता। वे यह जान चुके थे कि वह विरोध नहीं कर सकती। 
एक रोज खाली पीरियड में वह कैंटीन के पीछे बैठी लिखने में तल्लीन थी कि कुछ कदमों की आहट ने उसे चौकन्ना कर दिया। वह हड़बड़ा कर उठ गई। वह वहां से निकलने की कोशिश में थी कि तीन-चार लड़कों का एक झुंड उसके बिलकुल पास आ गया और जानबूझकर उससे सटकर चलने लगा। तेज चाल से आगे बढ़ने की कोशिश में तान्या उन लड़कों से टकरा गई। वह उनसे बचकर तो निकल आई मगर उसे अपने शरीर से, अपने आप से अजीब-सी वितृष्णा हो गई। वह जान नहीं पाई कि जो उसे मित्रता के लायक भी नहीं समझते, वे उसके साथ छू जाने के लिए इतने अधीर क्यों रहते हैं? और यह कैसा स्पर्श है जो होता तो शरीर पर है मगर आहत आत्मा हो जाती है? इन्हीं ख्यालों में डूबी वह अपनी क्लास में बैठी थी कि अचानक वर्गीस मैम क्लास में आ गईं और पूरी क्लास का मुआयना करते हुए उसे बाहर निकल आने का इशारा किया।
कॉलेज का वार्षिकोत्सव नजदीक आ रहा था। कलात्मक अभिरुचि वाली मिसेज वर्गीस इतिहास पढ़ाने के साथ-साथ नाटक विभाग की भी जिम्मेदारियों को सहर्ष देख लिया करती थीं। हर बार की तरह इस बार भी वे कुछ अनूठी प्रस्तुति तैयार करने में मगन थीं। नाटक की कहानी ऐतिहासिक संदर्भों से उठाई गई थी। पटना के दीदारगंज की जमीन खोदकर निकलने वाली यक्षिणी की मूर्ति किस प्रकार मौर्य काल की मूर्तिकला का अद्भुत नमूना बनकर प्रसिद्ध हुई कि पटना संग्रहालय में रखी इस यक्षिणी की मूर्ति को देखने के लिए दुनिया के लोग यहां आते हैं। मैम वर्गीस ने इसी कथा को कॉलेज के वार्षिकोत्सव में मंचित किए जाने वाले नाटक के लिए चुना था। अब उन्हें इसके मुख्य पात्र यानी यक्षिणी की मूर्ति के लिए कोई कलात्मक चेहरा चाहिए था। कॉलेज के हर क्लास में चक्कर लगाने के बाद उनकी निगाह तान्या की गहरी काली आंखों पर आकर ठहर गई। उन्होंने क्लास के हर बच्चे को भरी-पूरी नजर से देखा और फिर इशारा कर तान्या को बाहर बुला लिया। 
तान्या सूखे पत्ते-सी कांपने लगी। उस पर तो कभी किसी की नजर ही नहीं पड़ी अब तक, उसे क्यों बाहर बुलाया है? दुविधाओं की चुप्पियां समेटे वह क्लास से बाहर निकल आई। वर्गीस मैम ने उसे सिर से पांव तक देखा। उनके खांचे में पूरी तरह से फिट थी यह लड़की। मैम ने उससे कुछ भी पूछे बिना अपने नाटक ग्रुप में शामिल कर लिया। 
ऐसा पहली बार हुआ था कि पूरी क्लास का मुआयना करने के बाद उसे चुना गया था। पहली बार किसी की नजर उस पर आकर ठहर गई थी। पहली बार उसे किसी स्थान पर पूरी तरह फिट पाया गया था। वह नाटक की मुख्य भूमिका में थी। यह निर्विकार, भावशून्य चेहरा किसी नाटक की मुख्य भूमिका के लिए उपयुक्त हो सकता है, यह सोचना भी कठिन था। मगर मूर्ति की भूमिका में उसे न कोई संवाद बोलना था, न ही चेहरे पर भाव लाने थे। निर्विकार-सा चेहरा लिए, खास तरह की भंगिमा में खड़े रहना था। यह भूमिका तान्या के लिए भी सुविधाजनक थी। नाटक के रिहर्सल में जाना उसे अच्छा लगने लगा। तान्या को अच्छा लग रहा था कि उसकी खामोशी भी केंद्र में होकर दुनिया को आकर्षित कर सकती है। अपनी तमाम खामियों के बावजूद, वह उपयोगी है। 
वार्षिक उत्सव का समय निकट आता जा रहा था। नाटक की तैयारी उसी रफ्तार से चल रही थी। इसी अवसर पर कॉलेज पत्रिका का विमोचन भी किया जाना था, इसलिए यह जरूरी था कि पत्रिका भी समय से तैयार हो जाती। पत्रिका के प्रूफ पढ़े जाने थे और मैम अपनी व्यस्तताओं के कारण समय नहीं निकाल पा रही थीं। कॉलेज के प्राध्यापक बहुत हद तक अपने छात्रों से मित्रवत् हो जाते हैं। मैम वर्गीस ने अपनी समस्या बताते हुए आग्रह किया कि क्या कोई छात्र मैगजीन के प्रूफ देखने में उनकी सहायता करना चाहेगा। जाने किस प्रेरणा से तान्या ने हाथ ऊपर उठा दिया। मैम को बहुत तसल्ली हुई। चलो, एक बार यह इसे देख ले, फिर वे भी अंतिम प्रूफ देख लेंगी। उन्होंने तान्या को प्रिंटेड कागजों की फाइल थमा दी।  
तान्या ने पहली बार अपनी ओर से किसी काम के लिए पहल की थी। वरना वह तो यह सोच भी नहीं सकती थी कि वह भी किसी लायक है। उसे भी कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। बोले बिना भी उसकी उपस्थिति को जाना जा सकता था! 
पत्रिका के आर्टिकल्स से गुजरते हुए तान्या को महसूस हुआ कि जो वह अपनी कॉपी के पीछे लिखा करती है, वे सब इन लेखों से कहीं कम नहीं हैं। आखिर संकोच त्याग कर उसने अपनी कॉपी वर्गीस मैम के सामने रख दी। समय बहुत नजदीक आ गया था और अब इस वक्त कोई नया लेख वे लेना नहीं चाहती थीं मगर तान्या की आंखों में जाने कैसा आग्रह था कि वे उसे मना नहीं कर पाईं और उन्होंने चुपचाप उसकी कॉपी अपने पर्स में रख ली।
घर पहुंच कर जब वह पर्स रखने लगीं तब अचानक हाथ कॉपी से जा टकराया। उन्होंने कॉपी खोली तो जगह-जगह तुकांत- अतुकांत कविताएं लिखी थीं। रूमानियत से भरी इस उम्र में तो कविताएं लिखी ही जाती हैं। उत्सुकता में भरकर वे कॉपी के पन्ने पलटने लगीं। मगर यह क्या, यहां तो कई तरह के सर्पदंश कागज पर चुभे दिखाई पड़ रहे थे। उसने चुनौती देते हुए लिखा था — 
‘‘श्रापग्रस्त नहीं थी अहिल्या 
वह तो एक घृणित स्पर्श था 
जिसने सुकोमल नारी को 
पत्थर में बदल दिया।’’
एक आहत अहसास हर पंक्ति में व्याप्त था। कागज पर कलम का दबाव भी तान्या की भावतीव्रता की गवाही दे रहा था। उसने कामना की थी कि संभव होता तो वह भी पत्थर ही हो जाती ताकि किसी अनधिकृत स्पर्श का अहसास नहीं होता। तब अपनी चुप्पी के लिए वह स्वयं को अपराधी नहीं महसूस करती। फिर अगली ही पंक्ति में खुद को अपराध मुक्त करने की कोशिश में उसने पूरी शिद्दत से लिखा था —
‘‘मैं हाशिए पर किया गया रफ वर्क नहीं हूं 
कि सवाल हल कर दिए जाने के बाद 
जिसे काट कर खारिज कर दिया जाए…’’
कविता की अंतिम पंक्ति ने तो जैसे मैम को हिला कर रख दिया। आखिर उसने ऐसा क्यों लिखा? वह पंक्ति लगातार दिमाग में गूंजती रही। कभी ‘हाशिए’ पर दबाव बनता तो कभी ‘रफ वर्क’ पर। कभी ‘श्रापग्रस्त अहिल्या’ की छवि बनती तो कभी वितृष्णा जगाते स्पर्श का अहसास सालता। सवाल हल हो जाने के बाद, काट कर खारिज कर दिये जाने का दर्द उन्हें रात भर टीसता रहा। वर्गीस मैम तान्या के भीतर उमड़ते तूफान का अनुमान लगा पा रही थीं। उन्हें लग रहा था कि यक्षिणी की ही भांति वह भी अब तक अपने ही भीतर दफ्न रही है। अपने पात्र की खोज करते हुए आज वर्गिस मैम से जो अचानक आ टकराई है, वह कोई साधारण लड़की नहीं है। हजारों वर्ष पूर्व मौर्यकाल की मूर्तिकला के अद्भुत प्रमाण की तरह यह भी ईश्वर की गढ़ी अनूठी दुनिया का अद्वितीय प्रमाण है।    
मैम लगातार उसके बारे में सोचती रहीं। सोचती रहीं कि नाटक में पत्थर की मूर्ति बनी तान्या, वास्तविक दुनिया में भी पाषाण प्रतिमा ही थी। किसी अवांछित स्पर्श से पथरा गई यह मूर्ति और कब तक किसी राम के स्पर्श की प्रतीक्षा करती रहेगी! रिहर्सल के दौरान वह तान्या की जिस मौन भंगिमा पर मोहित हुई जाती थीं, आज पता चला कि उसके जीवंत अभिनय में मैम के निर्देशन का नहीं, तान्या के बरसों का अभ्यास था। अब उन्हें तान्या की चुप्पी बेचैन करने लगी थी। उन्हें लग रहा था, जैसे बरसों तक अंतर्मन में दफ्न हो चुकी इस आवाज और इंसान को जीवंत करने में उन्हें ईश्वरीय प्रेरणा मिल रही है। साधारण अध्यापक होते हुए भी उनकी स्नेहिल छुअन ने पथरा चुकी तान्या को द्रवित कर दिया था। वह खुद अपनी कॉपी लेकर उनके पास आई थी, यानी वह यह सब कहना चाह रही है। उसकी पीड़ा का सस्वर वाचन होना ही चाहिए। वर्गीस मैम अपने भीतर उस सामर्थ्य को महसूस कर पा रही थीं जो पाषाण को सजीव कर सकता था। मैम ने तय कर लिया कि कार्यक्रम के अंत में यह प्रतिमा अपनी लिखी कविता का पाठ भी करेगी।
अगले दिन वर्गीस मैम ने तान्या को रिहर्सल के बाद रोक लिया। कविताओं की प्रशंसा करते हुए मैम ने कहा, ‘‘देखो, पत्रिका तो पूरी तैयार हो चुकी है। इस स्टेज पर तुम्हारी कविता शामिल करना कठिन होगा, मगर मैं चाहती हूं कि तुम एनुअल फंक्शन पर इसे पढ़कर सुनाओ।’’
तान्या अजीब से पशोपेश में पड़ गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी कविता को इतने श्रोताओं के बीच पढ़कर सुनाने का यह प्रस्ताव उसके लिए खुशी बनकर आया है या चुनौती बनकर। एक अनजाना भय उसे आतंकित कर रहा था, एक अनदेखी खुशी उसे विभोर कर रही थी।
आखिर वह दिन भी आ ही गया, जब उस नाटक का मंचन होना था। सब निःशब्द देख रहे थे —
‘‘दीदारगंज के नजदीक बहती नदी के किनारे रसूल नाम का धोबी पत्थर पर कपड़े धो रहा है कि अचानक उसे एक सांप दिखाई दिया। उसे पकड़ने की कोशिश में वह उसकी तरफ दौड़ा कि उसका पैर कीचड़ में किसी ठोस वस्तु से जा टकराया। उसने हड़बड़ा कर नीचे देखा तो पाया कि कीचड़ वाली जमीन में कुछ धंसा हुआ है। उत्सुकता में भरकर उसने जमीन को थोड़ा कुरेदा तो गहराई में गड़ी कोई बड़ी वस्तु मालूम पड़ी…’’ 
दर्शक सांस रोके इस मंचन को देख रहे थे। 
‘‘… मजदूर बुलाकर उस स्थान को खोदा गया। खुदाई में निकली एक खूबसूरत मूर्ति जिसे देख कर लोग हतप्रभ रह गए। बड़े-बड़े पुरातत्वविदों ने मूर्ति पर की गई पेंटिंग को मौर्यकालीन बताया जिससे यह सिद्ध हुआ कि वह तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की कला का अनूठा नमूना थी। बलुआ पत्थर से बनी मूर्ति के रूप में तान्या उस काल के अवर्णनीय सौंदर्य का जीवंत प्रतिरूप बनकर मंच पर स्थापित थी।’’ 
सभी दर्शक इस प्रस्तुति से अभिभूत हुए बिना न रह सके। 
नाटक समाप्त होने के बाद हॉल तालियों से गूंज उठा। तालियों की अनुगूंज में सुध-बुध खोई तान्या नाटक खत्म होने के बाद भी मूर्तिवत खड़ी रही। नजर उठाकर दर्शकों को देखने का साहस तक नहीं जुटा पाई। 
कार्यक्रम खत्म होने से पहले कॉलेज की पत्रिका का विमोचन करने और सभी कलाकारों को सम्मानित करने के लिए जब मुख्य अतिथि को मंच पर बुलाया गया तो तान्या हैरान रह गई। मोटिवेशनल स्पीकर वान्या वैष्णवी जलसे की मुख्य अतिथि के रूप में सभी कलाकारों को सम्मानित कर रही थीं। जब तान्या का नाम पुकारा गया तो वह सचमुच पत्थर-सी जड़ हो गई। वर्गीस मैम उसे लगभग घसीट कर मंच पर लाईं। 
“अरे, मैं तो इसे सचमुच की मूर्ति समझ रही थी। आर यू रियल, क्या तुम बोलती भी हो?” उल्लास से गदगद हो वान्या वैष्णवी उसकी ओर देख रही थी। उसके चेहरे पर लगाया मौर्यकालीन पेंट अभी उतारा नहीं गया था, जिससे वह उसे ठीक से पहचान नहीं पाई थी। 
इसी बीच मैम ने उसके स्वरचित कविता-पाठ की भी उद्घोषणा कर दी।
‘‘श्रापग्रस्त नहीं थी अहिल्या…’’ आत्मविश्वास बटोर कर उसने अपनी कविता का वाचन प्रारंभ कर दिया। उसकी कविता का हर शब्द उसके आत्मविश्वास को दृढ़ता प्रदान कर रहा था। वान्या वैष्णवी का प्रेरक स्वर जिस सत्य को उद्घाटित नहीं कर पाया, तान्या आज स्वयं उसे जमाने के सामने उजागर कर रही थी। किसी संकोच से परे वह पूरी बुलंद आवाज में कह रही थी — 
‘‘वह तो एक घृणित स्पर्श था 
जिसने सुकोमल नारी को 
पत्थर में बदल दिया।’’
वान्या वैष्णवी हतप्रभ अपनी ही संतान को देख रही थी। वह सच कह रही थी, अहिल्या श्रापग्रस्त कैसे हो सकती है? छल तो अवांछित स्पर्श का था! गौतम ऋषि की तरह ही उन्होंने भी सुरेश को दंडित करने के बदले तान्या को ही बुत क्यों बन जाने दिया? वह अनुभव कर रही थी कि यक्षिणी की मूर्ति से कलंकित स्पर्श का रंग धुलता जा रहा था। वह अपने स्वरूप में लौट रही थी। उसका मौन टूट चुका था। वह गरज रही थी —
“मैं हाशिए पर किया गया रफ वर्क नहीं हूं 
कि सवाल हल कर दिए जाने के बाद 
जिसे काट कर खारिज कर दिया जाए…”
वान्या वैष्णवी यह भी देख रही थी कि बुत बन चुकी तान्या को सजीव करने की कोशिश में जहां वह मोटिवेशनल स्पीकर खुद हार चुकी थी वहीं एक साधारण अध्यापक के अपनत्व भरे स्पर्श से तान्या सजीव हो उठी थी। अपने भीतर की ग्लानि से परे, स्वयं पर विश्वास के साथ वह मौर्य काल से निकल कर अपने वर्तमान में प्रवेश कर रही थी…
अलका सिन्हा
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त प्रतिष्ठित कथाकार। भागलपुर, बिहार में जन्म। एम.ए., एम.बी.ए.। एअर इंडिया से सेवा निवृत्त। 
उपन्यास
परुष वेश्या पर केंद्रित बहुचर्चित उपन्यास ‘जी-मेल एक्सप्रेस’
कविता संग्रह
हैं शगुन से शब्द कुछ, तेरी रोशनाई होना चाहती हूं, मैं ही तो हूं ये, काल की कोख से 
कहानी संग्रह
सुरक्षित पंखों की उड़ान, मुझसे कैसा नेह, खाली कुरसी, पीपल पुरखे और पुरानी हवेली(प्रकाशनाधीन)
डायरी
रूहानी रात और उसके बाद
लेखन पर एम.फिल. और पीएच.डी उपाधियां प्रदत्त। रचनाएं शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में सम्मिलित। 
मीडिया कर्म
लगातार 13 वर्षों तक गणतंत्र दिवस परेड का आंखों देखा हाल सुनाने का गौरव प्राप्त आकाशवाणी की नेशनल कमेंटेटर, 15 वर्षों से अधिक तकदूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम पत्रिका की नियमित प्रस्तोता। विश्व हिंदी सम्मेलन, साहित्य अकादमी के शब्दोत्सव, राष्ट्रपति भवन में आयोजित साहित्य मिलन के कार्यक्रमों का गरिमामय संचालन।
सम्मान   
वातायन अंतरराष्ट्रीय सम्मान, हिंदी अकादमी, परंपरा ऋतुराज, नई धारा सहित अनेक सम्मान प्राप्त।
निवास दिल्ली।
संपर्क : 9910994321
ईमेल : [email protected]
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4 टिप्पणी

  1. अलका जी!

    आपकी बेहद संवेदनशील कहानी पढ़ी।

    “तुम्हारा बस चले तो तुम सबको खामोश कर दो। *बुत* में बदल दो। एक *तान्या* काफी नहीं।”*
    पूरी कहानी तान्या और उसकी माँ वान्या पर केन्द्रित है। बुत शब्द यहाँ पर महत्वपूर्ण है।
    यह छोटा सा संवाद बहुत बड़ी बात कहता है। क्योंकि संवाद बेटी के प्रति माँ के लिये है।
    अपनी ही बेटी, के प्रति ऐसा व्यवहार की वह मूर्ति जैसी बनकर रह जाए!!!!!!!!
    ऐसा क्योंकर, किस लिये और किस कारण से हुआ होगा यह जिज्ञासा पाठक को अंत तक कहानी पढ़ा ले जाती है।
    भले ही स्वभावगत हो, पर आदत में शुमार हो जाने वाला यश और वाहवाही सुनने की आदत ऐसा कारण बन जाती है जहाँ सम्मान के दूध में पड़ने वाली खटाई भी सहन नहीं कर पाते! भले ही वह अपने घर के दूध की हो।

    इस कहानी में मोटीवेशनल स्पीकर माँ वान्या अपने दो चेहरों में नजर आती है। कथनी और करनी में अंतर दिखाई देता है।

    दूसरों पर अहमियत रखने वाले शब्द उसकी अपनी बेटी तान्या के लिए काम नहीं आते थे!
    इसलिये तान्या उसे अपने जीवन का ‘डार्क-स्पॉट’ लगती थी।
    बाल-मन बहुत नाजुक होता है और उस समय अगर किसी बच्चे के मन में कोई बात या घटना दिमाग में गहरे से बैठ जाती है तो वह या तो उसका जीवन बना देती है या बिगाड़ देती है। उसे भूलना सहज नहीं होता।
    इस कहानी को पढ़ते हुए हमें शक्ति पिक्चर
    में अमिताभ के बचपन के किरदार की,साथ ही नीलिमा शर्मा जी के कहानी संग्रह,”कोई खुशबू उदास करती है” की कहानी “उत्सव” की याद दिला गई। हालांकि तीनों ही कथानकों में बहुत अंतर है किंतु यहाँ मुख्य रूप से बाल-मन में घटित और मन में घर बना लेने वाली एक घटना ही है।
    किसी संवेदनशील मामले में अगर माँ स्वयं अपने स्वार्थवश बेटी की महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज कर दे तो यह 10 वर्ष की बेटी के लिये अप्रत्याशित ही रहता है और उसका खामोश हो जाना भी स्वाभाविक।
    बेटी के प्रति सुरेश अंकल के गलत हरकतों की सुनवाई जब माँ तक अपनी झूठी शान बढ़ाने के कारण न चले, फिर उसका यह कह देना कि ऐसी घटना तो……… फिर तो उसका चुप हो जाना स्वाभाविक ही है।

    बहरहाल कहानी का उत्तरार्ध काफी अच्छा लगा। कम से कम किसी शिक्षिका ने उसके मन को समझा, उसकी भावनाओं को समझा, उसकी चुप्पी और उसके मूर्ति बन के रह जाने के रहस्य को समझा। और उसकी माँ के सामने ही उसी के द्वारा उसकी माँ की आँखें खोलीं।

    कहानी तान्या के सदृश काफी मार्मिक लगी।
    जो बहुत अच्छा लगा-
    तान्या की कविता-

    *शापग्रस्त नहीं थी अहिल्या*
    *वह तो एक घृणित स्पर्श था*
    *जिसने सुकुमोल नारी को*
    *पत्थर में बदल दिया!*

    और-

    *मैं हाशिए पर किया गया रफ वर्क नहीं हूं*
    *कि सवाल हल कर दिए जाने के बाद*
    *जिसे काट कर खारिज कर दिया जाए”*

    कहानी का शीर्षक श्रापमुक्त अंत में तब सार्थक सिद्ध होता है‌ जब वह अपने जीवन में बुत से बाहर निकल मुक्त हो पाती है।

    एक बात कहना चाहेंगे सही शब्द शाप होता है,श्राप नहीं जैसा हम जानते हैं।

    एक बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई!
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार तो बनता है।

  2. कहानी में लेखिका ने एक युवा लड़की के मन में चलने वाली आहत हुई भावनाओं का बखूबी चित्रण किया है। एक असहज करने वाली घटना को लेकर लड़की के मन में जो द्वंद्व चल रहा है, और उसपर थोपी गई अपराध भावना के प्रति उसके मन में जो रोष है वह एक स्त्री मन की भावनाओं को संवेदनशीलता से दर्शाता है। साथ ही, उसके भीतर की वेदना के और समाज की सोच के टकराव को भी बहुत अच्छे से रेखांकित किया गया है। ऐसे में एक संवेदनशील हस्तक्षेप युवा मन को शक्ति दे सकता है और उसके आंतरिक द्वंद्व को सकारात्मक मोड़ दे सकता है, यह भी कथानक में दर्शाया गया है। अपनी संपूर्णता में कहानी बहुत सार्थक है और पाठक को अधिक संवेदंशील बनाने वाली है।

  3. ‘पुरवाई’ पत्रिका की आभारी हूं कि मेरी कहानी को स्थान दे कर उसे देश-विदेश के अनंत पाठकों तक पहुंचा दिया। नीलिमा करैया जी की प्रतिक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहानी के परिवेश और पात्रों को नए सिरे से व्याख्यायित किया है। कहानी के प्रति आपकी यह अंतर्दृष्टि अभिनंदनीय है।
    हृदय से आभार।
    तेजेन्द्र जी एवं नीलिमा शर्मा निविया जी का भी हार्दिक आभार।

  4. यह कहानी स्त्री-अनुभव के उस मौन पर केंद्रित है जो अन्याय, भय और सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव में जन्म लेता है। तान्या एक संवेदनशील किशोरी है, जो एक अवांछित अनुभव के बाद भीतर ही भीतर टूट जाती है। उसका चुप रहना कमजोरी नहीं, बल्कि उस विश्वासघात का परिणाम है जहाँ उसकी सबसे बड़ी संरक्षक—उसकी माँ वान्या वैष्णवी—सार्वजनिक छवि और सामाजिक दबाव के आगे सच का साथ नहीं दे पाती।

    वान्या वैष्णवी मंचों पर अन्याय के विरुद्ध मुखर स्त्री है, पर अपनी बेटी के मामले में वही साहस नहीं दिखा पाती। यह विरोधाभास कहानी के केंद्र में है—सार्वजनिक विमर्श और निजी यथार्थ का टकराव। तान्या धीरे-धीरे बोलती हुई बच्ची से एक “बुत” में बदल जाती है—चुप, जड़ और भयग्रस्त।

    कहानी में वर्गीस मैम का प्रवेश आशा का क्षण है। उनका संवेदनशील विश्वास तान्या को फिर से स्वयं से जोड़ता है। कविता के माध्यम से तान्या अंततः अपनी आवाज़ पाती है—यह उसकी चुप्पी के विरुद्ध पहला प्रतिरोध है।

    अहिल्या, यक्षिणी और मूर्ति जैसे प्रतीक स्त्री-देह, अवांछित स्पर्श और थोपे गए मौन के अर्थों को गहराई देते हैं। अंततः कथा यह प्रश्न छोड़ जाती है कि क्या चुप्पी भी हिंसा का ही एक रूप नहीं है, और क्या सच के साथ खड़े हुए बिना कोई भी प्रतिरोध पूरा हो सकता है।

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