Wednesday, February 11, 2026
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अनिता ‘सुरभि’ की कहानी – एक रिश्ता ऐसा भी

बात कोई ज़्यादा पुरानी नहीं है, पर आज के माहौल को राजनीति ने और धर्म के ठेकेदारों ने जिस प्रकार दूषित कर दिया है, उस सब को देख कर लगता है कि मेरी इस बात पर कितने ही लोगों को विश्वास नहीं होगा। हो सकता है कुछ लोग तो मुझे देशद्रोही होने तक का तमग़ा भी दे सकते हैं।
दो दिन पहले ही तो अली भाई ने कलकत्ता से फोन किया था कि मैं कल रात की ट्रेन से दिल्ली आ रहा हूँ, फिर वहाँ से अपनी सारी कलेक्शन करके अगले दिन शाम तक तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा। उन्होंने बताया कि अगले महीने बेटी सायरा का विवाह है। कोरोना में सब कुछ बन्द हो जाने की वजह से मैं अपने पैसे इकठ्ठे करने नहीं आ सका। अब धीरे-धीरे सब सामान्य हो रहा है तो बेटी की शादी से पहले आकर मैं और हाबिद एक बार अपनी बंद दुकान भी खोलते हैं और यास्मीन तुम्हारे लिए राखी का उपहार भी भेज रही है। अभी कुछ बोल रहे थे तो फोन कट गया। मैंने वापिस मिलाया तो मिला ही नहीं। मैं सोचने लगी यहाँ से जाने के बाद  ऐसा कभी नहीं हुआ कि दोनों पति-पत्नी मुझे ईद और राखी का उपहार देना कभी भूले हों।
हमारे नए घर के पहले और अन्तिम किराएदार अली भाई ही थे। उनका अली से अली भाई बनना भी किसी क़िस्से से कम नहीं था। हम जब यहाँ अपने नए घर में आए थे तो तब तक यह सेक्टर पूरा बसा नहीं था बल्कि बस रहा था। हमारे आस-पास अकेलापन था। हमसे कुछ दूरी पर एक दो घर बन रहे थे। हमारे सामने घर में कोई बुजुर्ग दम्पति रहते थे, जोकि बड़े मिलनसार थे। आते-जाते हमेशा बोलते, हाल-चाल पूछते। एक दिन सामने रहने वाली आन्टी हमारे घर किसी व्यक्ति को लेकर आईं और बोलीं- “यह है अली अहमद, कलकत्ता के रहने वाले हैं। बहुत सालों से यहाँ इस शहर में आते हैं अपना माल बेचने। इन्हें अपने परिवार के लिए दो कमरे का सैट चाहिए”। मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही आन्टी ने कहा- “इनकी शराफ़त और ईमानदारी की गवाही मैं देती हूँ कि अली बहुत अच्छे व्यक्ति है।” मैंने मन ही मन कुढ़ते हुए सोचा- “इतने अच्छे हैं तो अपने घर में क्यों नहीं रख लेतीं पूरा घर तो ख़ाली पड़ा है!”
“तुम सोच रही होगी मैं अपने घर में क्यों नहीं रख लेती।”
आन्टी की बात सुन कर मैं कुछ झेंप सी गई, जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो। अपनी झेंप को छिपाने के लिए मैं हँसने लगी।
“अली कुछ साल पहले हमारे यहाँ उपर वाले कमरे में कई साल रह कर गया है। तब यह अकेला था, पर अब अपनी बीवी और बच्चों को भी साथ ले आया है। हमारे यहाँ आया तो मैंने कहा, हम तो अगले महीने अपने बेटे के पास कैनेडा जा रहे हैं। मैं तुम्हें बहुत अच्छे लोगों से मिलवाती हूँ, तो तुम्हारे यहाँ ले आई”।
“आप कैनेडा जा रहे हैं?” मैंने हैरानी से कहा । “वापिस कब आओगे”?
“अब कहाँ वापिस आएँगे! हम तो हमेशा के लिए बेटे के पास जा रहे हैं। ओहो…तुम्हें बताया नहीं न कि बेटा जब पिछली बार आया था तो इस घर का सौदा कर गया था। हमें अपने कुछ काम निपटाने थे, बाहर जाने के लिए कुछ डाक्यूमेंटस बनवाने और पूरे करने थे। इसीलिए यहाँ रूके थे। अब बेटा आएगा हमें अपने साथ ले जाने”।
यह सुन कर बड़ी हैरानी हुई कि अंकल-आन्टी ने कभी इस बात का ज़िक्र ही नहीं किया।
आन्टी ने कहा, “बेटा अब अकेले रहने की उम्र नहीं रही । दोनों में से कोई बीमार हो जाए, किसी को कुछ हो जाए तो कौन देखे? बेटा यहाँ आ नहीं सकता वहाँ उसका जमा-जमाया काम है, वह हमारे लिए परेशान होता है। जब भी आता है अपने साथ रहने की ज़िद करता है। इस बार हमने उसकी ज़िद मान ली। आन्टी अंकल चले गए और अली अहमद अपने बच्चों और पत्नी के साथ हमारे ऊपर वाली मंज़िल के दो कमरे के सेट में किराएदार बन कर आ गए। लेकिन धीरे-धीरे अली भाई परिवार का एक ख़ास हिस्सा बन गए। हर ईद पर सेवइयों से भरे कटोरे को कढ़ाई वाले रूमाल से ढक कर खुद आते थे मुझे देने और शर्माते हुए सौ रूपए की ईदी मुझे देना कभी नहीं भूलते थे। उनकी अपनी कोई बहन नहीं थी, इसलिए उनका सारा स्नेह मुझ पर ही बरस जाता था। वो बात अलग है कि जब भी घर में मीठे चावल और फिरनी बनते तो उन सब में भी हमारा हिस्सा अवश्य होता था।
हर दिवाली पर बनी मिठाइयों का पहला थाल और होली पर बनी गुझियाँ सबसे पहले मैं अपनी बेटी के हाथों अली भाई के घर भेजती। उनकी बेटी सायरा और बेटा हाबिद मेरे बच्चों के ही हमउम्र थे और पत्नी यास्मीन एक सीधी सादी ख़ुशमिज़ाज महिला थी। अली भाई की माँ कलकत्ता में रहती थी जोकि वहाँ का काम  देखती थी। वहाँ वह अपने जेठ व देवर के परिवार के साथ रहती थी। अली भाई की नेक दिली की पहचान तो उन कठिन दिनों में हुई। जब मेरे बेटे अरुणाभ का गंभीर एक्सीडेंट हुआ था, और मेरे पति अपनी कम्पनी के काम से विदेश गए थे। उस समय एक अली भाई थे जो हमारे साथ खड़े थे। मुझे रोते हुए और बहुत परेशान देखकर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, “बहन तुम्हारे हिम्मत हारने और परेशान होने से तो काम नहीं चलेगा, तुम्हें हिम्मत रखनी होगी अल्लाह मियाँ सब कुछ ठीक कर देंगे और तुम्हारा यह भाई हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा है। आज तुम्हारे धैर्य की परीक्षा है।”
वो बात अलग थी कि मुझे हिम्मत देते हुए उनकी आँखों से भी आँसू बह रहे थे। वाकई में अली भाई ने न दिन देखा ना रात बस मेरे साथ रहे। दवाइयाँ लानी हों, कोई रिपोर्ट लानी हो, हर जगह अली भाई। इतनी भागदौड़ में भी दुआ पढ़वा कर पीर का धागा लाकर मेरे बेटे के हाथ में बाँधना नहीं भूले थे अली भाई। पूरा घर और बेटी का ध्यान यास्मीन रख रही थी।
बेटे के घर आने पर मैंने और मेरे पति ने बस शिष्टता वश एक दिन उनसे ‘शुक्रिया’ कहा। हम जानते थे कि उनके सहयोग के सामने यह बहुत ही छोटा शब्द था। बस इतना सुनते ही अली भाई की आँखें छलछला गईं। उन्होंने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, “तुम हमारी बहन हो और हम तुम्हारे भाई- बस एक यही रिश्ता है हमारा और हमेशा रहेगा। शुक्रिया या धन्यवाद कह कर कभी इस रिश्ते को छोटा मत करना।”
मैंने अली भाई से क्षमा माँगते हुए यह वायदा किया, “हम बहन भाई के बीच ऐसे औपचारिक शब्द कभी नहीं आएँगे।”
उस दिन अहसास हुआ कि दिलों के, भावनाओं के रिश्ते हर धर्म और मज़हब से कितने ऊँचे होते हैं। अली भाई हमारे घर पूरे सोलह साल रहे। हमारे चारों बच्चे गुड़ियों से खेलने और पतंगे उड़ाने की उम्र को पीछे छोड़ कर अब बड़े हो गए थे। कनिका इंजीनियर बन गई थी तो सायरा ने फ़ैशन डिज़ाइनिंग का चार साल का कोर्स पूरा कर इंटर्नशिप भी पूरी कर ली थी। अरूणाभ अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चला गया तो हाबिद अपना कालेज पूरा कर अली भाई के काम में हाथ बँटाने लगा था। माँ की मौत के बाद और परिवार में अपने चचेरे भाईयों के साथ बँटवारे के बाद अली भाई ने अपनी पत्नी यास्मीन और बेटी को वापिस कलकत्ता भेज दिया। उनका कहना था कि अब बेटी की शादी करनी है जोकि अपने परिवार वालों के बीच में ही करेंगे। रिश्ता तो माँ ही तय कर गई थी अपनी बहन के पोते से, लड़का अच्छा है। सबसे बड़ी बात पढ़ा लिखा है। परिवार का अपना अच्छा ख़ासा बिज़नेस है। अली भाई ने कुछ साल पहले शहर से थोड़ी दूर एक दुकान क़िस्तों पर ख़रीद ली थी। अब घर-घर घूमने की बजाय कलकत्ता से ला कर सारा सामान दुकान पर ही रखने लगे थे। अपनी पत्नी और बेटी के जाने के बाद अली भाई हाबिद के साथ दुकान के पास ही एक कमरा लेकर रहने लगे। अली भाई और उनका परिवार हमारे घर से दूर हो गए थे, पर दिल के उतने ही क़रीब थे। मेरी ईदी और रक्षा बंधन की सौग़ात कभी न लेट हुई न कभी रास्ता भटकी। जब भी अली भाई कलकत्ता से वापिस आते तो यास्मीन मेरे लिए कभी कढ़ाई वाला बैडकवर, कभी कुशनकवर कभी कोई बेल बूटों वाली कुरती अपने हाथों से काढ़ कर भेजती। अली भाई भी आने से पहले कहते- “बहुत दिन हुए दीदी तुम्हारे हाथ के कढ़ी चावल नहीं खाए।” और मैं भी जुट जाती अपने भाई की पसंद के कढ़ी चावल और साथ में राजस्थानी गट्टे की सब्ज़ी बनाने। अली भाई के फोन आने के बाद भी सोच लिया था कि खाने में इस बार क्या-क्या बनाऊँगी। इस बार कुछ अलग बनाती हूँ। इस बार हाबिद की पसंद के छोले -पूरी बनाऊँगी, पर जब दो दिन के चार दिन हो गए तो मैंने अली भाई को फोन मिलाया, फोन स्विच ऑफ़।
शाम तक कई बार फोन मिलाने पर जब स्विच ऑफ़ का ही मैसेज आता रहा तो दिल कुछ परेशान सा हो गया। मैंने कहा हाबिद को फोन मिलाया, फोन हाबिद ने नहीं किसी और ने उठाया, “आपको नहीं पता अली अहमद का इंतक़ाल हो गया है।”
“क्या कह रहे हैं आप?” मैंने फोन का नम्बर चेक किया कि कहीं ग़लत नम्बर तो नहीं मिल गया या फिर मेरे कानों ने गलत सुना।
मैंने उनकी दुकान पर रहने वाले लड़के को फोन मिलाया तो पता चला उस दिन फोन पर बात करते-करते उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था, उन्हें अस्पताल में भरती कराया और आज सुबह फिर उन्हें दौरा पड़ा, जिसने उनकी जान ले ली।
“हम तुम्हारे भाई-तुम हमारी बहन एक यही रिश्ता है हमारा, और हमेशा रहेगा।” उनके कहे यह शब्द मेरे आँसुओं में गूंजने लगे- मैं भी अपने भाई के अंतिम दर्शन करने के लिए हवाई जहाज़ की टिकट बुक कराने जुट गई।
अनिता ‘सुरभि’
संपर्क – [email protected]
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास साये हुए पराये, प्रदक्षिणा, विडंबना, तिलस्मी महल (बाल उपन्यास)
कहानी संग्रह स्मृतियों केखंडहर, काग़ज़ की पुतली, फूल सहजन के, मनु, कनु एवं अन्य कहानियाँ (बाल कहानी संग्रह)
काव्य संग्रह स्मृतियों के कोने से, मैं हूँ ना.., शब्द-नाद
अन्य प्रकाशन
सौरमंडल की विचित्र दुनिया (भूगोल विज्ञान)
अटल बिहारी वाजपेयी: एक व्यक्तित्व (जीवन परिचय)
राष्ट्र ऋषि माधव सदाशिव राव
बंगाल केसरी डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी
युग पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय
विराट व्यक्तित्व नाना जी देशमुख
त्याग की मूर्ति डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
क्रान्तिकारी विनायक दामोदर सावरकर (निबंध)
– World of Proverbs – Idioms
प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं
पुरस्कार एवं सम्मान
कलांकुर पुरस्कार
वसुंधरा पुरस्कार
साहित्य कला-भारती पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ रचनाकार पुरस्कार (दिल्ली)
बाल उपन्यास तिलस्मी महल‘ – चंडीगढ़ साहित्य अकादमी से पुरस्कृत
काव्य संग्रह मैं हूँ ना…‘ – चंडीगढ़ साहित्य अकादमी से बेस्ट बुक पुरस्कार  
संपर्क 
अनिता सुरभि
1103, सेक्टर 18-सी
चंडीगढ़ – 160018
दूरभाष: +91-9463655786
ईमेल: [email protected] 
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