Wednesday, February 11, 2026
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अंजु रंजन की कहानी – द फ़्यूनरल सर्विस

रात के दो बजे हैं। स्वाति चुपचाप रो रही  है। बाहर झींगुर सायं- सायं शोर मचा रहे हैं। रात की कोई हमिंग चिड़िया शायद -केनरी- स्वाति के साथ जाग रही है। कई महीनो से स्वाति और उस चिड़िया में एक बहनापा सा हो गया है- एक अनाम रिश्ते की सूत्र से स्वाति उससे बंध गयी है।
बचपन में स्वाति अपने भाई – बहनों के साथ मैना और गौरैया के झुंड देखकर ताली बजा बजा कर गाती थीं-
चिड़िया चिड़िया उड़ती जाए
चिड़िया चिड़िया ख़ुशी से गाए!
पर अब लगता है कि स्वाति के साथ यह केनरी भी रोते हुए गा रही है- महीन लम्बे विलंबित तान में। जैसे स्वाति के सुर में सुर मिलाना हो उसे!
ग्लासगो में स्वाति के पति – मुखर्जी साहब- ने यह बड़ी सी कैसल की तरह कोठी बनायी थी। एक समय था कि यह कोठी कहकहों और किलकारियों से गुलज़ार  रहती थी- पर अब वीरान है। बच्चे अमेरिका सेट्टल हो गए हैं। बस पति और स्वाति यहीं रह गए हैं। पति बीमार हैं- भूलने की बीमारी हो गयीहै उन्हें। डॉक्टर लोग शायद इसे अलजाइमर रोग कहते हैं। 
उनकी याददाश्त की सुई कहीं अटक जाती है तब वह स्वाति को भी अँचिनही नज़रों से देखते हैं।
मन ही मन, बच्चे और स्वाति मना रहे हैं कि जल्दी ही पति को इस जीवन से मुक्ति मिल जाए तो वे चैन की साँस ले।
सोचने में बड़ा अजीब सा लगता है पर सचमुच अब लोग उनसे तंग आ गए हैं। बच्चे यहाँ हैं नहीं, बस स्वाति ही उनकी तीमारदारी में लगी रहती है।
स्वाति भी अब थक गयी है। वह चालीस  साल से इस आदमी के मूड को भाँपकर काम करती आयी है – मूड के हिसाब से खाना बनाना, बोलना बतियाना और कपड़े पहनना। 
क़रीब चालीस साल पहले भारत से वे लोग यहाँ मुखर्जी साहब की बड़ी नौकरी की वजह से आए थे। यूके की रोबॉटिक्स बनाने वाली कम्पनी में उनकी असाधारण योग्यता के कारण चुन लिया गया था।  उस समय स्वाति की उम्र सिर्फ़ उन्नीस साल थी। वह अपनी पढ़ाई भी पुरी नहीं कर पायी और यूके चली आयी। फिर धड़ाधड़ दो बच्चे आ गए और उसकी पढ़ाई बीच में रह गयी।
शुरू शुरू मे तो उसे स्कोटिश अंग्रेज़ी समझ ही नहीं आती थी और वह बकाठ की तरह लोगों का मुंह देखती रह जाती थी। धीरे-धीरे स्वाति ने  माहौल को समझना शुरू किया।
बच्चे बढ़ने लगे। स्कूल जाने लगे। मुखर्जी साहब को तरक्कियाँ मिलती गयी। वे ब्रिटेन के एक शहर से दूसरे शहर मे नौकरियाँ बदलते रहे और अस्सी सालों तक काम करते रहे। स्वाति उनकी वफ़ादार जीवन संगिनी बनी रही है । उनका खाना- पीना, कपड़े- जुत्ते सरियाती रहीं। उन्हें घर और बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त रखा। 
बच्चे बड़े हुए तो बच्चों का अपना संसार बना। उनकी दोस्तियाँ हुई फिर शादियाँ और आख़िरी में डिवोर्स भी हो गया। अब वे लोग अपने पार्टनर के साथ रहते है। पति की बीमारी सुनकर भी वे नहीं आ पाए। शायद दूरियों का तक़ाज़ा रहा होगा या नौकरी की मजबूरियाँ। 
पति की बीमारी वह भी मौत के क़रीब ले जाती हुई! ग़ज़ब की सहनशक्ति है स्वाति में ! उसने अकेले सब  सम्भाला। निस्संदेह, कई भारतीय परिवारों ने भी सहारा दिया , क्योंकि स्वाति हमेशा उनके दुःख- सुख मेखड़ी रही थी।
मुखर्जी साहब के कुछ रिश्तेदार भी यूके में थे। पर वे भी व्यस्त थे। उन्होंने सिर्फ़ अपनी शुभकामनाएँ भेजीं। जबकि स्वाति और मुखर्जी साहब ने हमेशा उनके लिए बहुत किया – उनके यूके के वीज़े से लेकर  बच्चों को नौकरी दिलाने तक । पर वे कभी मिलने नहीं आ पाए। 
स्वाति को आज फ़्यूनरल डायरेक्टर से मिलना था। शायद अंतिम संस्कार के बीमे की अंतिम किश्त देनी बाक़ी है।  मुखर्जी साहब ने अपना और स्वाति का फ़्यूनरल की बीमा और बुकिंग कर रखी है ।
यह युरोपीय और अमरीकी देशों की ख़ासियत है कि अपना अंतिम संस्कार के लिए खुद ही इंतज़ाम करके मरो ताकि बच्चे और रिश्तेदार काले चमचमाते सूट में स्मार्ट लगें और उन्हें बाप – माँ के मृत शरीर को न छूना पड़े । बस वे एक गेट टूगेदर करके अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लें।
यहाँ का नैशनल फ़्यूनरल सर्विस वाला बेहद लोकप्रिय है। आज वह मिलने आने वाला है। स्वाति को मुखर्जी साहब और अपने अंतिम संस्कार के अंतिम यात्रा की रूप रेखा बनानी होगी। क़रीब सौ डेढ़ सौ लोग तो आएँगे। उन्हें फ़्यूनरल के बाद चाय नाश्ता भी देना पड़ेगा। 
भारतीयता के नाते स्वाति सोचती है कि शाकाहारी सैंड्विच देना ही ठीक रहेगा । समोसे भी रखे जा सकते हैं- मुखर्जी साहब को पसंद भी हैं। 
कई भारतीय परिवार कुछ न कुछ बनाकर भी ले आएँगे। पर अभी से किसी को पूछना अच्छा नहीं लगता।
स्वाति अधिकांश कम्यूनिटी फ़्यूनरल में सहानुभूति व सांत्वना देने  पहुँचती है इसलिए आशा करती है कि मुखर्जी साहब के फ़्यूनरल में भी कई नामी-गिरामी लोग आएँगे।
उस दिन स्वाति को क्या पहनना चाहिए? सफ़ेद साड़ी ! या फिर काली वेस्टर्न गाउन ?
स्वाति को माँ याद आती है और वह नजारा !  
बाबू के मौत के बाद नदी पर सिंदूर धुलाने के बाद नाइन ने मायके से आयी सफ़ेद साड़ी माँ को पहनाने की कोशिश की थी। सफ़ेद साड़ी और चाँदी की  सफ़ेद चूड़ियाँ!
बड़की मामी की आँखों में आँसू थे और उसके पीछे था गहन संतोष क्योंकि माँ के सौंदर्य व सुख- सौभाग्य से मामी बेहद जलती थीं। 
माँ दहाड़ें मारकर रो रही थीं, “हम सफ़ेद साड़ी न पहिरब! ऐ भौजी न पहिरब!”
भौजी (मामी) ने उन्हें कोरिया लिया था और खुद ही सफ़ेद साड़ी माँ को लपेट दी थी।
“बबुनी! न इतराई पूत भतारे- न इतराई लम्बी केश! भगवान का सबसे सार्थक नाम है – दर्पहारी। तुम्हारा दर्प चूर चूर कर दिया भगवान ने बबुनी। अब सफ़ेद साड़ी या लाल साड़ी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।”
चचेरी दादी ने तुरंत मामी को आड़े हाथों लिया था –
“क्या अँट शंट बक रही हो तुम कनिया, मारे को और भी मुगदर से मार रही हो। चालीस की उम्र कोई उम्र होती है जो कि कफ़न जैसा सफ़ेद साड़ी उठा लायी हो – कम से कम प्याजी या हल्का नीला रंग की तो ख़रीदतीं।” मायके के लिए इसलिए कहा जाता है –
बिना माई के कैसन मायका
और बिन सैंया के कैसन ससुराई।’
स्वाति सोचती है कि क्या  माँ का सुहाग सिर्फ़ साड़ियों और चूड़ियों में था! क्या बाबा के जाने से बड़ा दुःख था उसके लिए सफ़ेद साड़ी और चूड़ियों का जबरन थोप दिया जाना ! 
वह माँ के लिए ममतालु हो उठती है –
माँ के भीतर जो अल्हड़ जवान लड़की साँसे ले रही थी – वह विधवा हो गयी थी । इसलिए माँ सफ़ेदी से इतना घबरा रही थी । समाज ने माँ को रंगो से दूर कर देने की साज़िश रची थी – माँ शायद उसका विरोध कर रही थी।
क्या सफ़ेद रंग सचमुच शांति देता है? स्वाति को कभी भी सफ़ेद रंग नहीं भाया। सफ़ेद गरद की लाल पाड़ वाली साड़ी भी नहीं। जब दुर्गा पूजो में वे साड़ियाँ उसे मिलती हैं – तो सब की सब बाँट देती है। तो अब क्यों सफ़ेद रंग पहने वह!
स्वाति निश्चय करती है कि वह काला गाउन पहनेगी और पति के फ़्यूनरल पर खुद भी जाएगी – शमशान या क्रिमेटोरियम!
यूके में और दूसरे यूरोपीय शहरों में फ़्यूनरल प्लान यानी अपनी अंतिम क्रिया की योजना एक आवश्यक योजना है। यह जीवन नहीं मृत्यु बीमा है। इसके लिए प्रत्येक महीने या वर्ष आपकी तनख़्वाह या बिज़्नेस की आमदनी से एक निश्चित राशि काट ली जाती है जो कि फ़्यूनरल प्लानर के खाते में जाती है।
आपके बच्चों और आपके साथ फ़्यूनरल प्लानर एक अग्रीमेंट पर दस्तख़त करता है जिसमें पूरा ब्योरा होता है कि आपकी अंतिम शोभा यात्रा कैसी होगी , आपको कहाँ और कैसे दफ़नाया या जलाया जाएगा. आपके लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च सर्विस का भी इंतजाम फ़्यूनरल प्लानर की ज़िम्मेदारी होगी। कितने लिमोज़ीन, मर्सेडीज़ या दूसरी गाड़ियाँ होंगी, कौन – कौन से फ़ुल रिथ में लगे होंगे – सब कुछ पहले से ही तय कर किया जाता है। 
आपके बच्चों या पार्ट्नर को यह पता होता है क्योंकि वे भी इस समझौते के साझीदार या विट्नेस होते हैं। अगर बच्चे चाहें तो अपनी तरफ़ से भी कोई अतिरिक्त  कार्यक्रम रख सकते हैं।  पर आजकल यह बहुत कम हो गया है।
अंत में बच्चे या पार्ट्नर ही फ़्यूनरल तय करते हैं वही गवाह भी रहते हैं कि फ़्यूनरल कैसा हुआ – तो वे समयाभाव या किसी निजी कारण वश यही चाहते हैं कि सभी कार्यक्रम जल्द से जल्द निपट जाय।
आज कल की भागती दौड़ती ज़िंदगी में अक्सर फ़्यूनरल सप्ताहांत में होते हैं। और एक- दो दिन में सारे कार्यक्रम निपट जाते हैं। यहाँ, भारत की तरह चौथा, दसवी या तेरहवीं नहीं की जाती। 
यहाँ पुजारी या चर्च भी बहुत तंग नहीं करता क्योंकि फ़्यूनरल प्लानर उसे भी पहले ही बुक करके रखते हैं और एक निश्चित राशि उसे अड्वैन्स दे देते हैं।
दूसरे दिन फ़्यूनरल डायरेक्टर स्टीव  के साथ स्वाति की मीटिंग ठीक ठाक रही। फ़्यूनरल डायरेक्टर ने उन्हें दस प्रतिशत का डिस्काउंट भी देने का वादा किया। स्वाति ने अर्थी के साथ सफ़ेद फूल की बजाय गुलाबी करणेशसं को चुना जिसे स्टीव ने  सहर्ष मान लिया ।
“आपने कभी हिंदू फ़्यूनरल करवाया है?” स्वाति ने चाय का सीप लेते हुए उससे पूछा।
“मेरी सौतेली माँ हिंदू थी और मैंने ही उसका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से करवाया था। मेरे पिता का देहांत हो चुका था । आपको अन्दाज़ नहीं होगा कि पचीस साल पहले यूके में हिंदू पुजारी की ब्यवस्था करना कितना कठिन रहा होगा । फिर भी मैंने सरोज के लिए यह सब किया ।”
“गॉड ब्लेस यू।”
“पर मेरी सौतेली माँ मेरे साथ उतनी दयालु नहीं थीं। वे मुझे नापसंद करती थीं।”
“भारतीय सौतेली माँएँ अक्सर ऐसी ही होती हैं।”
“शायद वे इन्सिक्योर थीं। क्योंकि मेरे पिताजी यूके के एक ज़िले के अटर्नी थे और अपनी क़ानूनी ज्ञान की धौंस उनपर चलाते रहते थे।”
“ओह!’ स्वाति समझ गयी कि स्टीव बहुत बातूनी था।”
पर स्टीव ने शायद किसी भारतीय महिला से बहुत दिनो से बात नहीं की थी और स्वाति उसे बहुत कोमल सी लगी तभी वह बोलता चला गया।
“मुझे लोगों की मदद करना अच्छा लगता था। फिर थोड़ा लोन लेकर मैंने अपनी फ़्यूनरल सर्विस की कम्पनी खोली। यह बहुत बढ़िया बिज़्नेस है। और जब तक मनुष्य जाति रहेगी – इस काम में कभी मंदी नहीं होगी।”
“यानी तुम उनके मरने की दुआ मांगते हो? तुम्हें शायद पता नहीं होगा कि भारत में श्राद्ध कराने वाले ब्राह्मण को घर में घुसने नहीं दिया जाता… उन्हें मनहूस माना जाता है।
स्टीव हँसा, “मुझे सब पता है। आप भारतीय लोग मुर्दों से भी बहुत डरते हो। मेरी सौतेली माँ – सरोज – भी मुर्दों से बहुत डरती थीं और एक बार कड़कड़ाती सर्दी में मुझे घर से बाहर निकाल दिया था।”
“क्यों?” अब स्वाति को थोड़ा इंट्रेस्ट आने लगा था या वह किसी के प्रति रूक्ष नहीं दिखना चाहती थीं।
“क्योंकि मुझे दूसरी कोई गाड़ी नहीं मिली और मैं मुर्दे को अपनी गाड़ी में बिठाकर जैसे तैसे घर लाया। मेरा दोस्त अगली सुबह कॉफ़िन लाने वाला था। मैंने मुर्दे को बीच वाली सीट पर लिटाकर उसे सम्मान पूर्वक ढँक दिया और कार का एससी ऑन कर दिया। गैराज बंद करके मैं अपने कमरे में चला गया । बहुत थका हुआ था… सो गया। बदक़िस्मती से सरोज को गाड़ी लेकर किसी को स्टेशन से लाना था। वह गैराज में गयी । गाड़ी की बीच वाली सीट पर मुर्दे को देखकर डर गयी और ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी। मेरे डैड सरोज को बेहद प्यार करते थे। उन्होंने मुझे उसी दिन घर से बाहर निकाल दिया। अफ़सोस, बहुत दिनो तक सरोज मुझे माफ़ नहीं कर पायी।”
“सारा दोष उसका भी नहीं था।”
“देखिए! मैं अपने काम में बहुत कमिटेड हूँ। मैं मुर्दों को भी डिग्निटी देता हूँ। सम्मान करता हूँ। लोग तो कम पैसे देकर भी रॉयल फ़्यूनरल चाहते हैं – लिमोज़ीन में बॉडी, आगे पीछे चार चार मर्सेडीज़- कारनेशन के फूलों से भरा कॉफ़िन!
प्राइम लोकेशन में बरीयल फिर तीन सौ लोगों को भोज! 
जहाँ तक होता है… उनको अजस्ट करने की कोशिश करता हूँ। मैं आदमी को देखकर ही उसकी फ़ितरत समझ जाता हूँ पर माफ़ कीजिए मुझे आदमी की नहीं मुर्दों की अधिक पहचान है । वे भाग नहीं सकते और न ही धोखा दे सकते हैं।’
स्टीव अपने जोक पर खुद हँस पड़ा।
स्वाति ने मन ही मन सोचा।
“भारत में फ़्यूनरल सर्विस देने वाले को क्या कहते हैं- डोम! कितना घृणित काम माना जाता है- जबकि ज़िंदगी की सबसे महत्वपूर्ण संस्कार – मृत्यु में उसका योगदान अतुलनीय है। काश! भारत में भी ऐसी फ़्यूनरल सर्विस होती।”
स्वाति को आज फ़्यूनरल प्लानर स्टीव से बहुत सी बातें पता चली – कि मुखर्जी साहब ने अपने लिए तो प्लैटिनम फ़्यूनरल प्लान लिया था और स्वाति के लिए साधारण वाला।
उन्होंने खुद के लिए तीन सौ लोगों की ब्यवस्था करने के लिये पैसे अदा किए थे जबकि स्वाति के लिए पचास लोगों की व्यवस्था थी।
छि! यह आदमी कितना स्वार्थी निकला।
पर स्वाति के लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। 
मुखर्जी साहब घर के बाहर जितने सभ्य और शालीन थे – घर के भीतर  उतने ही सामंती और कड़े स्वभाव के थे। कई बार तो जेल भी जाते जाते बचे क्योंकि उन्होंने बच्चों को और स्वाति को पीटा था।
तब स्वाति ने ही पुलिस को झूठा बयान देकर उनको बचाया था कि उन दोनो के बीच कोई समस्या नहीं है। यूके में आप पत्नी और बच्चों को पीट नहीं सकते – उनसे दुर्व्यवहार नहीं कर सकते – तुरंत पुलिसकर्मी आकर आपको अरेस्ट कर सकते हैं।
बच्चों को स्कूल में कविता की तरह एक वाक्य सिखाया जाता है-
‘डायल नाइन नाइन नाइन
एंड यू विल बी फ़ाइन!’
(अर्थ- नौसौ निन्यानवे डायल करो तो तुम हमेशा ख़ुश रहोगे) 
नाइन नाइन नाइन यानी / बच्चों के हाथ में ब्रह्मास्त्र! बच्चे तुरंत डायल कर अपने माता पिता की शिकायत कर सकते हैं। शुरू में तो स्वाति को भी बहुत तकलीफ़ हुई थी । वह रोमा और गौतम को डाँट नहीं सकती थी… मारना तो दूर की बात थी!
मुखर्जी साहब ने स्वाति को सदा साड़ी पहनने को बाध्य किया – हाँ रात को भी। उन्हें शक करने की बीमारी थी जो जीवन पर्यंत नहीं गयी। हर किसी पर उन्हें शक था कि वह व्यक्ति स्वाति को पटाने की कोशिश कर रहा है। ऑफ़िस में वे टास्क मास्टर थे तो घर के हिटलर!
स्वाति का बेटा गौतम उनसे बहुत डरता था। उनके लगातार घुड़कने के कारण ही वह हकलाने लगा और उसकी हकलाहट कभी नहीं गयी। बेटी के साथ हुए उस हादसे में भी उन्होंने स्वाति को ही ज़िम्मेदार ठहराया था।
रोमा – उसके मना करने के बावजूद स्वाति की छोटी बहन  के घर कनाडा गयी थी । वहीं वह दुर्घटना घट गयी। रोमा को उसकी मौसेरी हमउम्र बहन टीना रात में एक बदनाम बार में ले गयी। वही शायद किसी ने उसे ड्रग्स दे दिया और उसका शारीरिक शोषण किया।
पर रोमा को कुछ भी याद नहीं था। आज तक नहीं है। उसकी यादयाश्त से वह शनिवार हमेशा के लिए डिलीट हो गया था। 
रोमा वापस जब ब्रिटेन आयी तो गुमसुम और मानसिक रूप से बीमार रहने लगी थी। बड़ी मुश्किल से स्वाति ने उसे संभाला। रोमा की पढ़ाई का बड़ा नुक़सान हुआ। वह साल ही बेकार गया।
उस कठिन दौर में भी मुखर्जी साहब ने स्वाति को प्रताड़ित किया । उनका आरोप था कि स्वाति के कहने से ही रोमा कनाडा गयी और अपनी इतनी क्षति पहुँचायी- जिसकी भरपायी मुश्किल है। बंगाली – बिहारी समुदाय में सब दबी जुबान से इस घटना की निंदा करते और मुखर्जी परिवार से दूरी बनाने की कोशिश करते। दुर्गा पूजा जिसकी संस्थापिका स्वाति और मृणमयी थीं- अब किनारे खड़ी रहकर लोगों की उपेक्षा झेल रही थीं।
बाद में बड़ी मुश्किल से रोमा ने जैसे तैसे अपनी पढ़ाई पूरी की। तब उन लोगों ने शहर बदल लिया और ग्लैज़्गो आ गए।
मुखर्जी साहब  ऑफ़िस में तरक़्क़ी पाते जाते थे क्योंकि वे अपने काम में बहुत ईमानदार और स्ट्रिक्ट टीम लीडर थे। 
उनकी कम्पनी को पहला मेडिकल रोबाटिक्स बनाने का श्रेय जाता है।
परंतु, घर में उनका रवैया एक कड़क भारतीय बाप का था। पत्नी और बच्चों को वे दोयम दर्जे का समझते थे। वे यह मानते थे कि अगर आदमी घर का कर्ता है – सर्वेसर्वा है तो उसे अपनी ज़िंदगी में स्वच्छंदता की खुली छूट है। उनके ज़िंदगी के मापदंड पुरुषों और स्त्रियों के लिए अलग अलग थे।
उनके जीवन में अनेक स्त्रियाँ आयीं। सबको स्वाति चुपचाप झेलती रहीं। कभी कुछ कहा नहीं।
बस रात को वह रो पड़ती। बेटा गौतम हकलाता हुआ पूछता
“क्या हुआ म्ममा? ”
“कुछ नहीं शोना! बुरा सपना देखा था।”
“स्सो ज्जाओ।”
हद तो तब हो गयी जब वे एक आधी फ़्रेंच और आधी भारतीय महिला को घर ले आए और उसका परिचय अपने कार्यालय में सहयोगी के तौर पर कराया। शोना का रूम ख़ाली करवा कर उस औरत को छःमहीने घर में रखा।
वह फ़्रेंच औरत अंततः मुखर्जी साहब को सिफ़लिस का सौग़ात देकर विदा हुई और यह राजरोग आवश्यक रूप से स्वाति को मिल गया। फिर ट्रीटमेंट, उपेक्षा और बदनामियों के भँवर के बीच स्वाति जीने की कोशिश करने लगी। 
मध्यवित्त घराने की स्वाति बच्चों और घर में काम करके पस्त हो चुकी होती तब साहेब का पति जाग उठता। घर में सहूलियत नहीं सुविधाएँ नहीं और उन्हें सारा शान-शौक़त राजसी चाहिए था। 
स्वाति इस दिखावे में बूरी तरह पीस जाती। इसी तरह उनकी अन्य महिला मित्रों को स्वाति ने दाँत पीसकर और मुँह सीकर झेला। लिजी, अलीन, शायरा और मैत्री सान्याल ! सबने अपनी सेवाएँ मुखर्जी साहब को दिया और स्वाति को  दिया आँखों के नीचे काले घेरे, माइग्रेन और डिप्रेशन की बीमारी!
“तुम इतना क्यों सहती हो? दी?” मृणमयी ने उनसे पूछा था। 
मृणमयी – स्वाति की सबसे अच्छी सहेली ! अब वह ओल्ड्ज़ केयर होम (वृद्धाश्रम) में रहती है। 
मृणमयी और स्वाति – दोनो जमशेदपुर से आयी थीं। उन दोनो के पति कलकत्ता यूनिवर्सिटी के मेधावी विद्यार्थी थे। स्वाति के पति पुंडरीकाक्ष मुखर्जी ने रोबॉटिक्स में रिसर्च पर साठ के दशक में यूके का फूल ब्राइट वज़ीफ़ा पाया था – यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। 
ठीक उसी तरह मोज़ार्ट की कई धुनों का भारतीय संस्करण बनाने के लिए मृणमयी के पति – सुब्रत रॉय- फ़िल्म इंडस्ट्री में बेहद पॉप्युलर थे। बाद में उन्हें भी पीके मुखर्जी ने इंग्लैंड बुला लिया था। स्वाति और मृणमयी दोनो जमशेदपुर की थीं- दोनो लोयोला कॉन्वेंट की पढ़ी निकलीं। स्वाति दो साल सीनियर थीं।
मृणमयी के आने के बाद स्वाति को एक अच्छी सहेली मिल गयी । दोनो साथ शॉपिंग जातीं… पियानो बजाना और केक बनाना सीखतीं।कभी वे लोग पिकनिक पर जाते तब स्वाति पुरियाँ बनाती और मृणमयी आलू दम।
दोनो के दो दो बच्चे हुए । एक लड़की और एक लड़का । बच्चे भी एक ही स्कूल में पढ़ते । लड़के हमउम्र और लड़कियाँ हमजोलियाँ थीं।
ज़िंदगी कितनी गुलज़ार थी। सब कुछ व्यवस्थित। समय से बच्चे – उनकी परवरिश – शादियाँ- नौकरियाँ। एक सुंदर पार्सल की तरह यह ज़िंदगी स्वाति को पसंद थी।
नव वर्ष पर वे लोग बंगाली कम्यूनिटी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित गायकों की तरह गाते।
‘से जे पुरानो दिनेर कोथा भूलबि कि रे नाँय-
औल्ड लैंग साइन माई जो औल्ड लैंग साइन-‘
गुरुदेव रवींद्र और रॉबर्ट बर्न्स की कोमल – मृसण धुनें एक दूसरे से गुँथती चली जातीं और वे लोग नए साल में प्रवेश कर जाते।
इसी तरह कितने सालों की विदाई दी और कितनों का स्वागत किया – इसका हिसाब स्वाति ऊँगलियों पर नहीं लगा पाती।
चालीस साल हो गए देश से बाहर आए हुए। शुरुआत में बड़ी दिक़्क़त होती थी। मौसम इतना ठंडा और लोग इतने रूखे- सूखे। ट्रेन वैगेरह में साथ वाली सीट ख़ाली हो यो भी आपके बग़ल में नहीं बैठेंगे। भले ही खड़े होकर हिचकोले खेला रहे हों।
विश्व अभी बाई-पोलर था । भारत की रुस के साथ नज़दीकियाँ बढ़ रही थीं और अमेरिका व ब्रिटेन दूर जा रहे थे।अमेरिका, ब्रिटेन व रुस अपनी सामरिक और वैज्ञानिक क्षमता बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। रोबाटिक्स को और भी सुगम और उपयोगी  बनाने के लिए मुखर्जी साहब का चयन ब्रिटेन की एक रक्षा विशेषज्ञ के तौर पर महारानी ने किया था । वे अपने काम में पूरी तरह डूब गए थे और अक्सर ऑफ़िस से लेट हो जाते। घर पहुँचते पहुँचते बहुत देर हो जाती। स्वाति घबरायी बैठी रहती। बच्चे पापा की राह ताककर सो चुके होते।
स्वाति कभी धीरे से कभी लड़कर उनसे ऑफ़िस से जल्दी आने की इसरार करती तो मुखर्जी साहब पिनक जाते।
“बच्चों को इतना कमज़ोर मत बनाओ स्वाति कि ये पापा को देखे बिना सो न सकें। मैं आख़िर इन्हीं के लिए तो खट रहा हूँ ताकि उन्हें वे सारी सुविधाएँ दे सकूँ जो मुझे और तूम्हे नहीं मिलीं। मैं आज व्यस्त हूँ बेहतर कल के लिए। कल हम सब साथ-साथ रहेंगे।” 
अब मुखर्जी साहब को जबकि फ़ुरसत ही फ़ुरसत है तब बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। स्वाति अकेले सब कुछ सम्हाल रही है । ज़िंदगी का अंतिम पड़ाव कितना तनहा और उबाऊ है। एक एक दिन बोझ सा बन गया है मानो।
स्वाति के पति की हालत और भी बिगड़ती जा रही है। डॉक्टर ने हॉस्पिटल से जवाब दे दिया है। मुखर्जी साहब को कल हॉस्पिस शिफ़्ट करना है।  हॉस्पिस- जहाँ मृत प्रायः टर्मिनल मरीज़ों को रखा जाता है। होसपाईस में एक सप्ताह तक ही मरीज़ रह  सकते हैं। इसी एम सप्ताह में मरीज़ को मर जाना पड़ता है। अगर नहीं मरे तो उसके घर वालों को बड़ी तगड़ी फ़ीस अदा करनी पड़ती है। 
उस हॉस्पिटल पर भी ऐक्शन हो सकता है जिसने अपने मरीज़ को यहाँ शिफ़्ट करने के लिए रेकमेंड किया था। हॉस्पिस में हर दम कॉफ़ी और सैंड्विच रखी मिल जाती है। लोग बाहर लाउंज में बैठकर शीशे से और सीसी टीवी में अपने मरीज़ों को देख सकते हैं। एक निश्चित घंटे में डॉक्टर मरीज़ों के पास जाते हैं।
डॉक्टर विज़िट आवर में मुखर्जी साहब चिड़चिड़े हो जाते हैं। स्वाति को, बच्चों को गंदी-गंदी गालियाँ बकते हैं – मुख्यतः बाँगला में।  डॉक्टर को कुछ नहीं समझ आता पर स्वाति सब कुछ समझती है।
उनका मानसिक विकार मरते वक्त भी स्वाति को कोंच रहा है – प्रताड़ित कर रहा है।

अंजु रंजन
संयुक्त सचिव – विदेश मंत्रालय
नई दिल्ली
ईमेल – [email protected] 


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