ओंकार के शांत और प्रवाहमय नाद के साथ उस दिन की योग कक्षा संपन्न हो गई। हर बार की तरह फिर स्वेता के आस पास उत्साही युवाओं का झुंड़ घिर आया था। वो उनके शहर आ सकती है क्या कभी योगाभ्यास की गुरु बनकर, कुछ उससे केवल संपर्क में रहना चाहते थे और कुछ ….
स्वेता जानती है इस अक्सर उसके आस पास बहते जाने वाले कुछ.. को। पिछले पांच वर्षों से यहां पर योगाभ्यास के शिविरों में सेवाएं दे रही है। विदेशी होने के कारण एक अतिरिक्त ध्यानाकर्षण उसके आस पास होता है। स्वेता भी अभिभूत हुआ करती थी अपनी उस प्रतिभा पर, जो उसे एकदम सामान्य लगती थी उन दिनों। 
फिर यहां का गोरे रंग के प्रति अतिरिक्त रुप से आकृष्ट होता दृष्टिकोण, उसकी योग्यता, साधना से परे भी कुछ खोजने लगता, तब स्वेता अपनी सीमा टटोलकर खोल में चली जाती थी।
कितनी ही साधिकाएं देखी थी उसने। वे केवल कुछ अलग देखने, करने और अनुभूत करने आई थी। लेकिन थोड़े ही प्रयत्न में जब काफी कुछ मिलने लगा, तब उनका मन बदल गया और वे विदेशी होकर यहां के लोगों को यहीं का ज्ञान बांटने लगी थी। 
’एक समुंदर भी बार बार देखे जाने पर पुराना सा लगता है, उसका नीला रंग सर्वव्यापी होकर भी आकाश के नित नूतन सिंदूरी अलंकार जैसा नही हो पाता’  ये अंशुमन के शब्द थे।
कुछ महीनों पहले आया था अंशुमन यहां पर। इतने सालों में, एक परिपक्व लेकिन कम उम्र का लड़का। बाकी सभी इस उम्र के होकर बर्फीली चोटियों के आकर्षण में बिंधे, जीवन के एक नवीन अध्याय को पढ़ने के कौतूहल के वशीभूत हो वहां आते थे। योगाभ्यास के शिविर में रहते हुए कुछ दोस्तियां पाना और आगे के रास्ते पर निकल जाना ही इनमें से अधिकांश का ध्येय हुआ करता था।
अंशुमन मन का पक्का था। उसे नदी चाहिये थी, योगाभ्यास के साथ। और उसने कुछ महीनों तक बस अपने मन की ही सुनी थी। अंशुमन के साथ स्वेता ने भी कुछ प्रवाह महसूस किया था। उसने स्वेता को उसके रंग से नही, प्रतिभा से जाना था और कहा भी था, कि उसे एक आदर महसूस होता है उसकी साधना को लेकर।
योग साधिका के रुप में उसे अपने अभ्यास की नियमितता और यम नियम के द्वारा ही कर्तव्य पथ पर बने रहना आवश्यक था। चटख नीले, लाल और हरे रंग के प्राकृतिक रंगों से भरे अपने देश को स्वेता मन ही मन याद करती थी। यहां पर जब कभी ’जननी जन्मभूमिश्च….’ का उच्चारण होता, उसके मन में समूह गीत गाकर किसी त्योहार को मनाती उसकी मां, जतन से अपने नन्हों के आगमन की प्रतीक्षा में मेज पर विविध पकवान सजाए प्रतीक्षा करती दादी नानी और सैनिकों के प्रति विशेष आदर के चलते निभाई जाने वाली परंपराएं कुलांचे मारने लगती थी।
हां, वह इस संस्कृति से प्रभावित है। उसे यहां कुछ ऎसा गहरा मिला है जो पहले अपने जीवन में महसूस नही किया। यह भी उतना ही सही है कि उसकी संस्कृति को लेकर उसकी अपनी जड़ें उतनी गहरा ही नही पाई थी कि वो यहां पर आ गई। 
लेकिन इतना होकर भी स्वेता यहां की नही है। वह यहां की नही है लेकिन इस स्थान को पसंद करती है, इसलिए उसे यहां के लोगों से ज्यादा आदर क्यों मिलता है, यह अभी भी उसे समझ में नही आया है। लेकिन एक विशेष बिंदु के बाद, आपस की कुछ बातों मुलाकातों के बाद, संवेदना के एक विशेष स्तर को पार करने के बाद किसी भी संबंध को लेकर आगे जाने में, उसका यहां का न होना अवरोध बनने लगता है।
अपनी योगमुद्राओं में स्थिर होकर पूरी तरह एकाग्र होने के प्रयास में स्वेता अब उन चुभती प्रारंभिक दृष्टि आक्षेपों से निर्लिप्त होकर अपना अभ्यास जारी रखती है, जो उसे पहले विचलित किया करते थे। दो तीन दिनों के निरंतर अभ्यास से वे दृष्टियां भी धीरे धीरे निर्मल होने लगती हैं। उन्हें अभ्यास में रस आने लगता है।
स्वेता कुछ उलझी सी बातें अंशुमन से किया करती थी। क्योंकि वह स्वेता को यौगिक स्रोत के रुप में देखता था। सीखता था तब स्वयं को ज्यादा देखता था, तुलना करता था और एक निश्छल मन के साधक के समान अपनी प्रगति का साक्षी स्वेता को बनाया करता था।
अंशुमन का विचार आने पर स्वेता के मन का उछाल इन दिनों थोड़ा बहुत शांत होने लगा था। वह तो इस प्रकार के किसी अटकाव के लिए यहां नही आई। फिर उसमें और उसकी उन सहेलियों में फर्क ही क्या रह जाएगा, जो पर्यटन के लिए यहां आई और किसी को चुनकर यहीं की हो गई।
स्वेता के लक्ष्य अलग है, जीवन का राग भिन्न है! और यही सोचकर वह प्राणायाम की साधना को और अधिक देरी तक करने लगी है इन दिनों। तब भी कभी कभी देश का समुद्र, उसमें बहती विशालकाय नौकाओं में बिताए हुए सपनीले दिन, कोई नीली आंखों वाला सहपाठी, उसकी हवा में गुम हो जाने वाली मर्दानी सी आवाज का आमंत्रण और झूमते हुए उस आमंत्रण को स्वीकार करने को लालायित होती स्वेता। फिर अचानक उस बहाव में एक मजबूत चट्टान का आ जाना। और उस चट्टान का अंशुमन बन जाना।
प्राणायाम के बंध खोलकर अपने आप को समेट लेती है स्वेता। नदी तट पर जाने पर वह चट्टान और अधिक तराशी हुई, धूप में खिली हुई और स्पष्ट रुप से अंशुमन के रुप में सामने आने लगी है। तो क्या वह साधना में कम मेहनत कर रही है? क्यों भटकाव है इन दिनों?
नही, उसे नही चाहिए वह सपनीला जीवन। नही चाहती वह कि कहीं से अंशुमन दौड़ता हुआ आकर उसे यहां से लेकर जाए अपने जीवन में। वह बसाए अपने सपनों का संसार उसके साथ और….
ना… 
लेकिन फिर क्या? उम्र भी आधी अधूरी सी है। वैराग्य के नगर में रहकर वह अनुभव की छेनी से अपने भौतिक जीवन को सही आकार में तराशने का कठिन कार्य करती जा रही है।
’अब तक जगी हो स्वेता?’
गुरुदेव का गंभीर स्वर गूंजा। स्वेता नतमस्तक हो गई। एक पवित्र आदरभाव और स्नेह का आश्रय उसने अपने आस पास महसूस किया। कुछ वैसा ही, जैसा नदी के सामने हो जाने पर लगता था।
और एक बार फिर, एक उच्च प्रवाह को देखकर वह अपने अंतस के बहाव को रोक नही पाई। गुरुदेव ने स्नेह से सिर पर हाथ रखा। अपेक्षित रुप से स्वेता का रुदन अचानक बढ़ गया। उस मौन अभिव्यक्ति में गुरुदेव की गरिमामय उपस्थिति, स्वेता की अपनी उलझन को लेकर अश्रुआर्द्र होकर की गई प्रार्थना और उत्तर में उसके सिर पर रखा गया एक संपूर्ण विश्वास का हाथ, आज पता नही किन गांठों को खोल गया था।
वह समझती गई। यहां शब्द मौन थे। सिर पर रखे हाथ की आश्वस्ति को कैसे भूल चली थी वह? क्यों इस अल्हड़ बहते मन को उसने इस पावन आश्रय की स्नेहमयी खूंटी से बांधकर नही रखा! क्यों अपेक्षा करती रही, कि कोई उसके मन के आवेग को समझकर किसी प्रवाह में बहता हुआ आएगा और उसे अपने साथ बांधकर ले जाएगा?
वह तो यहां पर संयम से अपने आप को बांधने आई है। उसके जीवन की दिशा अलग है, और उसे इस दिशा पर गर्व है। होता है ऎसा कभी कभी, कि इस दिशा में जाते हुए भी कुछ क्षण को भटकाव के पड़ाव आ जाते हैं।
स्वेता ने महसूस किया, गुरुदेव कब के जा चुके हैं। वे आज इस बांध तोड़कर अनुशासनहीन होने जा रहे प्रवाह के समक्ष अटल चट्टान से खड़े होकर आश्वस्ति का एक प्रखर तेज स्वेता को दे गए थे। उसे अपने आप में अनुभूत करते हुए वह नवीन दीप्ति से स्नात सी, अपने आप में खड़ी थी। पूर्ण एकाग्र।
बिखरे मन के अनेक कोने समेटते हुए वह धीरे धीरे इस बिखराव के स्रोत पर भी पहुंच गई। अंशुमन का पत्र था पिछले दिनों। एक बार फिर उसके साथ समय बिताने, उलझाव सुलझाने और कुछ सपनों का आदान प्रदान करने के लिए वह आने को इच्छुक था। क्या वह उसे अपनी साधना के साक्षी स्वरुप में स्वीकार करेगी? 
किसी नवायौवना सी भ्रमित हुई थी स्वेता उस दिन, जब यह सब पढ़ा। फिर वास्तविकता के कठोर धरातल पर आकर, साधना, अपने जीवन के पूर्व में ही तय किए गए ध्येय का दबाव और विकल होते विचारों के मध्य, पता नही कहां तक बहकर निकल गई थी। आज गुरुदेव ने एक आशीष के साथ प्रकाश स्तंभ के रुप में उसे अपना मार्ग दिखा दिया है।
स्वेता अंशुमन को पत्र लिखने बैठी है। आनेवाले समय में उसे नवीन आश्रम की स्थापना और योग शिविर के संचालन का उत्तरदायित्व निभाना है। अंशुमन चाहे, तो एक सामान्य शिविरार्थी के रुप में आकर उसकी सार्वजनिक साधना का साक्षी अवश्य हो सकता है। उसकी आत्म साधना अब जीवन पर्यन्त उसकी अपनी पूंजी है।
स्वेता के कमरे में आकर सेवक ने गुग्गुल का धूप दिखाते हुए मंत्रोच्चार के मध्य ही उससे इशारे में पूछा, कि वह इतने अंधेरे में क्यों बैठी है, सब ठीक तो है? 
उसे आश्वस्त कर, शांत भाव से उठकर स्वेता ने पूजन की वेदिका पर रखे दीप को प्रज्वलित कर दिया। गुग्गुल का सुवास, दीप की पवित्र ज्योति और स्वेता का हाल ही में खिला हुआ मन मिलकर आत्मदेव की पूजा करने को उद्यत थे। 
अब कमरे में पर्याप्त प्रकाश था।
अंतरा करवड़े
अनुध्वनि
117, श्रीनगर एक्स्टेंशन
इंदौर 452018
म.प्र.
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