“ये सतयुग नहीं है, कलियुग है — कलियुग!”
ससुर झुँझलाकर बोले, “बीवी तुम्हारी ग़ुलाम नहीं है। जो करना चाहती है, करने दो।”
देव ने घबराकर कहा,
“लेकिन आपकी बेटी कह रही है कि वह घर से भाग जाएगी! ज़रा उसे समझाइए—”
“अरे, तुमसे एक औरत नहीं संभलती! फिर शादी क्यों की तुमने!” यह कहकर ससुर ने फ़ोन काट दिया।
देव कुछ पल फ़ोन हाथ में लिए खड़ा रह गया। तभी उसने देखा—मिताली दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल चुकी थी।
रात के ग्यारह बज रहे थे। देव फ़ोन जेब में डालकर उसके पीछे दौड़ा।
“आई एम सॉरी यार… सच में सॉरी। गलती हो गई। जो कहोगी वही करूँगा। प्लीज़… घर चलो।”
मगर मिताली कहाँ सुनने वाली थी। वह धामिन साँप की तरह सरपट भाग रही थी, मानो पीछे लठैत पड़े हों। देव का दिमाग सुन्न हो चुका था। न ग़ुस्सा समझ आ रहा था, न उसे मनाने का कोई तरीका। उसे अचानक ध्यान आया—घर का दरवाज़ा खुला रह गया है। इन दिनों इंग्लैंड में चोरी की घटनाएँ बढ़ गई थीं। कहीं कोई लैपटॉप उठा ले गया तो? वह तेज़ क़दमों से घर लौटा, दरवाज़ा बंद किया और फिर एक ख़याल आया— शिव को बुला लेता हूँ। शायद उसे देखकर मिताली शांत हो जाए। उसने शिव को फ़ोन लगाया।
देव और शिव पिछले पाँच साल से बेंगलुरु की एक ही आईटी कंपनी में काम कर रहे थे। उसी कंपनी ने दोनों को एक साल के लिए यूनाइटेड किंगडम के लेदरहेड शहर भेजा था। शिव अविवाहित था और देव की शादी विदेश आने से तीन महीने पहले हुई थी। कंपनी ने उसे स्टेशन के पास घर दिलवाया था, और शिव वहाँ से १० मिनट की सीधी वॉक पर लिड्ल सुपरस्टोर के पास रहता था।
शिव ने फ़ोन उठाया और हमेशा की तरह मज़ाकिया अंदाज़ में बोला, “क्या भाई, इतनी रात को फ़ोन? भाभी भाग गई क्या?”
देव की आवाज़ बुझी हुई थी। “हाँ यार… सच में भाग गई है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।”
“अरे! मज़ाक कर रहे हो या सच में?”
“सच में।”
शिव चुप हो गया।
“अरे कुछ नहीं यार। तुम्हें तो उसका पता ही है, घर का कोई काम नहीं करना चाहती। मैं तंग आ गया हूँ यार। हर रोज़ किसी न किसी बात पर हमारी लड़ाई हो ही जाती है। पिछले एक सप्ताह से टेस्को वाले रेडीमेड शाना के पराठे गरम कर खिला रही थी। मैंने बस इतना कह दिया कि इनमें मैदा बहुत होता है, इतना मैदा खाना ठीक नहीं। बस भड़क गई इसी बात पर! कहने लगी – ‘इतना ही रोटी खाने का शौक है तो ख़ुद से बना लिया करो।’ मैंने भी कह दिया कि ‘ठीक है यू ट्यूब से देख कर बना लूँगा।’ इस पर और भड़क गई, कहने लगी – ‘ठीक है फ़िर, मेरी क्या ज़रूरत है? मैं जाती हूँ, कहकर घर से निकल गई।”
शिव ने देव की मनःस्थिति को शान्त करने के लिए कहा -” कोई नहीं। होता है यार। रुक! मैं भाभी को कॉल करता हूँ। अभी नॉर्मल हो जाएगी।”
“अरे भाई वो गुस्से में निकली है। फ़ोन लेकर नहीं गई है। टाउन सेंटर की तरफ हाई स्ट्रीट वाले रास्ते पर गई है। तुम्हारा घर वहाँ से नज़दीक पड़ेगा तू उस तरफ से लिड्ल वाले रास्ते से होते हुए आना। शायद तुम्हें सामने से मिल जाए। कहना तू डिनर के बाद वॉक पर निकला था। मैंने कॉल किया था मत कह देना।”
“ठीक है मैं निकलता हूँ ” कहकर शिव ने अपनी जैकेट उठायी और घर लॉक कर पजामे में ही निकल गया। जुलाई का महीना था, बाहर का मौसम ख़ुशनुमा था, लग रहा था जैसे बाहर ए सी चल रहा हो।
शिव तेज़ क़दमों से लिड्ल सुपरस्टोर वाले रास्ते की ओर बढ़ा। वहाँ पहुँचते ही दूर से मिताली आती हुई दिखाई पड़ी। अपनी तेज़ चाल को बरक़रार रखते हुए जब वह मिताली के इतने क़रीब पहुँच गया कि वह उसे पहचान सकती थी उसने अपनी चाल सामान्य कर ली।
“अरे भाभी, क्या बात है! पोस्ट प्रैंडियल वॉक! वो भी इतनी देर तक, वाह! अब समझा आपकी सेहत का राज़ और वो आलसी कहाँ है?”
“हेलो शिव। कैसे हो? हाँ, आज मौसम अच्छा था इसीलिए थोड़ी लम्बी वॉक हो गई। मैं बस वापस जाने वाली थी।” कहकर मिताली ने सामान्य ढंग से व्यवहार करने की कोशिश की।
“देव नहीं आया वॉक पर?”
“नहीं मैं अकेले अपनी स्पीड से धीरे धीरे वॉक करना प्रेफर करती हूँ।”
“ओ ओके, अच्छी बात है। मैंने भी आज फ्राइडे के चक्कर में काफी देर से डिनर किया। मुझे अभी थोड़ी देर और वॉक करनी है। चलिए आपके साथ चलता हूँ।”
मिताली चाह कर भी ना नहीं कर पाई। दोनों थोड़ी दूर आगे बढ़े ही थे कि सामने से देव आता दिखा।
“लो, थिंक ऑफ़ द डेविल एंड डेविल इज़ हियर” शिव ने मज़ाक किया। मिताली की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
“अरे, आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया या यूँ कहें कि सूरज रात में कैसे निकल आया। देव निकला है वॉक पर? मुझे तो लगता है तुम भाभी के प्रोटेक्शन के लिए पीछे पीछे आये हो। क्यूँ सही बात है ना?” देव के कंधे पर हाथ रखते हुए शिव ने पूछा।
“हाँ भाई तुम कह रहे हो, तो बात सही होगी।” देव ने जवाब दिया।
इस तरह यहाँ वहाँ की बातें करते वे देव के घर पहुँचे। रास्ते भर मिताली चुप ही रही। घर पहुँचते ही मिताली ने अपना फ़ोन चेक किया तो देखा कि व्हाट्स एप्प पर उसके पिता जी का मिस्ड कॉल था। फ़ोन लेकर वह बेडरूम में चली गई और पिताजी को कॉल लगाया।
“हेलो पापा।आपने कॉल किया था? अभी तो इंडिया में साढ़े चार बज रहे होंगे, इतनी सुबह कैसे उठ गए?”
“हाँ। देव ने कॉल किया था। सब ठीक है तो? तुम ठीक हो? घर पर हो ना?”
“हाँ मैं ठीक हूँ। कल डिटेल में बात करती हूँ, आप अभी सो जाओ।” कहकर मिताली ने फ़ोन काट दिया।
देव अभी भी डरा हुआ था कि पता नहीं फिर से मिताली कुछ बखेड़ा न खड़ा कर दे। सो उसने शिव को चाय पिलाने की ज़िद कर रोक लिया। शिव ने भी सोचा कि थोड़ी देर ठहर कर देख लिया जाये कि सब नॉर्मल हो गया है या नहीं। मिताली उनके साथ नहीं बैठना चाहती थी। उसने थकन और सिरदर्द का बहाना किया और सोने चली गई। चाय पीकर शिव निकल गया और देव बेडरूम में सोने आया। देखा तो मिताली अभी भी जगी हुई थी। जैसे ही देव बगल में लेटा वह बोली, “मैंने पहले भी कहा है फिर से कह रही हूँ – मुझे तलाक़ चाहिए। मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है।”
“अरे यार ऐसा क्या हुआ? तुम हर छोटी बात पर तलाक़ तक क्यूँ पहुँच जाती हो?”
“क्यूँकि दम घुटता है मेरा तुम्हारे साथ रहकर, मैंने पापा को भी बोल दिया है। वो भी तुमसे बात करेंगे।”
“पापा? अच्छा! हाँ! क्राइम लॉयर जो ठहरे!”
“तुम्हारी इन्हीं बातों से मेरे बदन में आग लग जाती है। मेरा टिकट करवा दो, मुझे इंडिया जाना है।” कहकर मिताली ने तकिया उठाया और लिविंग रूम में जाकर सोफ़े पर लेट गई। देव ने इस बार कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। थोड़ी देर बाद जब लिविंग रूम से खर्राटे की आवाज़ आने लगी तब जाकर देव ने चैन की साँस ली और सो गया।
अचानक मोबाइल की घंटी बजी। देव हड़बड़ाकर उठा और फ़ोन उठाया तो देखा उसके ससुर का कॉल था। घड़ी पर नज़र पड़ी, सुबह के सवा सात बज रहे थे।
“जी प्रणाम” कहकर देव ने अभिवादन किया।
“क्या ड्रामा कर रहे हो तुम मेरी बेटी के साथ। तुम्हारी वज़ह से उसे कल देर रात घर से निकलना पड़ा। आखिर चल क्या रहा है ये सब? शादी के पहले दिन से ही तुम उसे टॉर्चर कर रहे हो। हमने दहेज़ नहीं दिया तो तुम इस तरह से बदला लोगे।”
“ये आप क्या कह रहे हैं? ड्रामा तो आपकी बेटी करती है हर रोज़। जीना हराम कर रखा है मेरा।”
“अरे! जीना तो तुमने हराम कर रखा है उसका। ज़्यादा उड़ो मत। तुम्हें पता नहीं है तुम्हारे जैसे कितनों को ठीक किया है मैंने। यह मेरा रोज़ का काम है।सुधर जा वर्ना सीधे जेल जाएगा। समझा।”
“जी आप ग़लत समझ रहे हैं” इससे पहले कि देव आगे कुछ कहता फ़ोन कट चुका था।
ससुर के धमकी भरे लहजे को सुनकर देव सकते में आ गया। उसे लगा कहीं सचमुच उसके ख़िलाफ़ वे शिकायत न दर्ज़ करा दें। सोचा शिव के पास जाकर उसकी राय ली जाये। इंग्लैंड में किसी और को वह जानता भी नहीं था। ब्रश करके फटाफट उसने चेंज किया और शिव के घर पहुँचा।
सुबह सुबह देव को देखते ही शिव समझ गया कि बात बिगड़ चुकी है।
“आ जा। मैं चाय चढ़ाने ही वाला था। घर पर सब नॉर्मल ?”
“नहीं यार! मुझे लगता है इस लड़की को कोई मेन्टल प्रॉब्लम है।आज तक मैंने कभी उसे डाँटा नहीं, मारा नहीं, पर ये बाप बेटी मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हैं जैसे मैं कोई राक्षस हूँ। आज तक उसने मेरे पेरेंट्स से सही ढंग से बात नहीं की। मैं जो कुछ भी कहता हूँ या करता हूँ उसे मेरी हर बात ग़लत ही लगती है। कभी हँसी मज़ाक में कुछ कहो तो उसे लगता है मैं उसे ताने मार रहा हूँ। हमारे ख़्यालात बिलकुल नहीं मिलते। बात बात में कहती है मैं फाँसी लगा लूँगी। घर से भाग जाऊँगी। इट्स इम्पॉसिबल टू गो ऑन लाइक दिस यार।”
“अगर तुम्हें लगता है कोई मेन्टल प्रॉब्लम है तो हम काउंसलिंग के लिए सोच सकते हैं।”
“मैंने एक बार बहला फुसला कर प्यार से कहा था उससे। उसका कहना था उसे नहीं मुझे काउंसलिंग की ज़रूरत है। और भी कई बातें हैं अब मैं क्या क्या बताऊँ तुम्हें। मैं तो रोज़ भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि हमारा गृहस्थ जीवन सुखमय हो। यहाँ तक कि मैंने एक तांत्रिक को पच्चीस हज़ार रुपये दिए थे कि वो हमारे अच्छे फैमिली लाइफ के लिए पूजा पाठ करे। मगर उसका भी कुछ असर नहीं हुआ। मैं चाहता हूँ कि यूके में सेटल हो जाऊँ पर उसे यहाँ रहना बिलकुल अच्छा नहीं लगता। वह घर का कोई काम नहीं करना चाहती। बस उसे दिन भर मोबाइल लेकर रील बनानी है। अब यहाँ मैं नौकरानी कहाँ ढूँढू। प्रोफ़ेशनल क्लीनर्स अफोर्ड करने की तो मेरी औकात है नहीं। मैं सोचता हूँ डिवोर्स ही दे दूँ। मुझे शान्ति चाहिए यार।”
“हम्म्म मैं समझ सकता हूँ तुम्हारी मानसिक स्थिति। मेरा एक दोस्त वकील है तुम कहो तो मैं उससे बात करूँ।”
“नहीं यार मैंने ख़ुद एक वकील से बात की थी पिछले महीने। सॉरी मैंने तुम्हें बताया नहीं। पर उससे बात करने के बाद मुझे यह बात समझ में आ गयी कि डिवोर्स प्रोसेस इतना आसान नहीं होने वाला। समय भी बहुत लगता है और फिर बार बार मुझे इंडिया जाना पड़ेगा। कोर्ट और वकीलों का चक्कर सोच कर मेरा दिमाग घूम जाता है। सोचा था यूके में काम करके बैंगलोर वाले फ़्लैट की लोन अमाउंट जल्द से जल्द चूका दूँगा पर लगता है किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर है।”
“कमाल है यार तुम इतना कुछ सोच चुके हो ऑलरेडी! मतलब तुम रिश्ता सुधारने के लिए जो कुछ कर सकते थे, सब कर चुके हो? क्या उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई देती?”
“हाँ यार पिछले दो महीने में मैंने सारी कोशिशें कर लीं। उसे महँगे गिफ्ट्स दिए, बाहर खाना खिलाया, मूवीज़ दिखाए। सोचा था फॉरेन आ कर उसका मन कुछ बदल जायेगा। मगर यहाँ आकर वह और एग्रेसिव हो गई है। कभी-कभी बिलकुल पागल की तरह व्यवहार करने लगती है अगर उस पागलपन में उसने कुछ कर लिया तो मैं बुरी तरह फँस जाऊँगा।”
“तुमने अपने मदर-इन-लॉ से बात की इस बारे में कभी?”
“मिताली जब पाँच साल की थी तभी उनकी मौत हो गई थी। उसके घर में बस वो और उसका कमीना बाप ही है जिसे बात करने की तमीज़ तक नहीं। उससे डील करना बहुत मुश्किल होने वाला है।”
अचानक फ़ोन की घंटी बजी और देव जिससे डील करने की बात कर रहा था उसका नाम स्क्रीन पर फ़्लैश होने लगा। देव डर गया। शिव ने ईशारा किया कि फ़ोन उठाओ और स्पीकर ऑन करो।
“हेलो कहाँ हो तुम? अभी फिर से मुझे मिताली का फ़ोन आया था। उसे डाइवोर्स चाइये। मैं पेटिशन फाइल करने जा रहा हूँ। तुम्हें कुछ कहना है?”
“क्या बात कर रहे हैं ? डिवोर्स ? मगर मुझे तो डिवोर्स देना नहीं है। आप उस को समझाइये न।”
“देखो प्यार से मान जाओगे तो अच्छा होगा, वर्ना मैं दस केस लाद दूँगा तुम्हारे ऊपर। फिर, मेरे क़दमों में नाक रगड़ के ख़ुद डाइवोर्स की भीख मांगोगे।”
देव को कुछ समझ नहीं आ रहा था सो अभी बस बात टालने के लिए उसने कह दिया “ठीक है मुझे एक दो दिन का समय दीजिये। मैं बताता हूँ। “
“और सुनो आज ही जो फ्लाइट मिले उसका टिकट कराकर मेरी बेटी को उसके सारे गहने के साथ बाइज्जत कोलकाता भेजो।”
देव ने अभी ठीक से “ठीक है ” कहा भी नहीं था कि फ़ोन कट चुका था।
इन सारी बातों को सुनकर शिव को याद आया कि देव की शादी के पहले वह देव को हमेशा मज़ाक में कहा करता था कि गाँव की लड़की से शादी करना, बहुत सुखी रहोगे। वो भले जॉब न करे मगर खाना तो पकायेगी ही और साथ में पाँव भी दबाएगी। शायद कहीं न कहीं यह बात देव के मन में घर कर गई थी तभी उसने शादी डॉट कॉम पर वेस्ट बंगाल के मेदिनीपुर गाँव की एक लड़की को चुना था। लड़की वालों के विशेष आग्रह पर शादी बैंगलोर में ही हुई थी। शादी में लड़की वालों के तरफ से बस उसके वकील ससुर के कुछ वकील मित्र ही आये थे। पूछने पर बताया गया था कि गाँव में किसी की मौत हो गई थी इस वजह से लोग नहीं आ पाए।
“सॉरी यार मुझे लगता है मेरे कारण ही तुम ऐसे परिवार के चक्कर में फँस गए” शिव ने कहा।
“नहीं यार शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है, पता नहीं यह सब सुनकर मेरे पेरेंट्स पर क्या बीतेगी। मैं चलता हूँ फ्लाइट की टिकट बुक करनी है।” बाईं आँख के कोर से लुढ़कते आँसू की एक बूँद को छुपाते हुए देव ने कहा।
“ठीक है तू टेंशन मत ले। मैं हूँ तेरे साथ। मैं बात करता हूँ एक वकील से दिल्ली में।” शिव ने उसे हिम्मत दी।
घर पहुँच कर देव ने शाम की फ्लाइट लंदन हीथ्रो से कोलकाता के लिए बुक कर दी। उड़ान के निर्धारित समय से तीन घंटे पहले देव मिताली को एयरपोर्ट ड्राप कर आया। देव सारी रात ठीक से सो नहीं पाया। सोचता रहा कि वह केस लड़े या तलाक़ के लिए मान जाये। बिस्तर पर लेटे हुए गूगल सर्च किया तो गूगल ने भी यही सुझाव दिया कि आउट ऑफ़ कोर्ट सेट्लमेंट ही बेहतर है। सुबह जाकर उसकी आँख लगी। डोर बेल की आवाज़ से उसकी नींद खुली, देखा तो ११ बज गए थे। दरवाज़े पर शिव था।
“अभी भी सो रहा है तू ?” शिव ने पूछा।
“हाँ यार। रात में नींद नहीं आई। तू बैठ मैं तुरत ब्रश करके आता हूँ।”
देव ब्रश करके आया। तब तक शिव ने केटल में पानी उबाल कर दो कप चाय तैयार कर ली थी। दोनों कप लेकर बैठे।
“और… भाभी पहुँच गयी घर?”
“हाँ शायद पहुँच गई होगी।”
“देख मैंने दिल्ली के एक वकील से बात किया। तुम दोनों भारतीय नागरिक हो और अभी दो महीने पहले ही यूके आये हो तो डिवोर्स इंडियन लॉ के अनुसार ही होगा। हम केस लड़ सकते हैं। थोड़ी मोटी फ़ीस देंगे तो दिल्ली से ही बढ़िया वकील मिल जाएगा। तुम बताओ क्या करना है आगे?”
“कुछ समझ नहीं आ रहा यार। बार बार इंडिया आने जाने, वकील की फ़ीस और ओवरऑल डिवोर्स प्रोसेस में भी पैसे खर्च होंगे और एन्ड ऑफ़ द डे सरकार ने महिला सम्बन्धी कानूनों को जितना पावरफुल बना रखा है, एलिमनी तो मुझे देना ही पड़ेगा। तो मैं ये सारे ख़र्च क्यूँ करूँ। एकमुश्त एलिमनी अमाउंट दे के मैं इस लम्बे मेन्टल और फिज़िकल टार्चर से बच सकता हूँ। तुम तो मुझे जानते हो ज़रा सी टेंशन हो जाये तो मुझे नींद नहीं आती। इतना लम्बा प्रोसेस मैं नहीं झेल पाउँगा यार। मुझे यूके में सेटल होना है मैं उस दिशा में आगे बढ़ना चाहता हूँ।”
“हाँ शायद सही कर रहे हो तुम। तुम्हें क्या लगता है? कितना माँगेंगे वो लोग?”
“पता नहीं यार। कमीने लोग हैं। लेट्स सी।”
उधर कोलकाता एयरपोर्ट से टैक्सी लेकर मिताली अपने घर मेदिनीपुर पहुँच चुकी थी। नौकर ने चाय बनाई और हाथ मुँह धोकर मिताली अपने वकील पापा के साथ चाय लेकर बैठी।
“क्या लगता है तुम्हें वो मान जाएगा?” वकील ने पूछा।
“हाँ मुझे लगता है वो समझ चुका है कि मैं उसके साथ नहीं रहने वाली।”
“फिर कितना माँग सकते हैं?”
“उसकी सालाना सैलरी पच्चीस लाख रूपये है और अभी यूके में कम्पनी की तरफ़ से रोज़ाना ख़र्च के लिए पर-डीएम अमाउंट भी रोज़ का लगभग डेढ़ सौ पाउण्ड मिलता है। पचास लाख तो आराम से डिमाण्ड कर सकते हैं।”
“ठीक है तुम नहा धो के आराम करो। मैं उस से बात करता हूँ।”
देव के फ़ोन की घंटी बजी। अब तक देव और शिव दोनों साथ बैठे इस विषय पर मंथन कर रहे थे। कॉल पिक कर देव ने स्पीकर पर डाल दिया ताकि शिव भी सुन सके। वकील ने डिवोर्स सेट्लमेंट के लिए पचास लाख का डिमांड रखा। सुनकर देव के होश उड़ गए।
“पचास लाख !? क्या कह रहे हो आप ? इतने पैसे कहाँ से लाऊँगा मैं ?दस लाख से ऊपर की मेरी औकात नहीं है
“पचास तो तुझे देना ही पड़ेगा। कल तक मुझे बताओ। मैंने ड्राफ्ट बना लिया है कल फैमिली कोर्ट में म्यूचुअल कंसेंट पेटिशन डाल दूँगा।” ससुर ने कहा।
लगभग एक सप्ताह चले फ़ोन कॉल्स और नेगोशिएशन के बाद तीस लाख एकमुश्त एलिमनी पर समझौता हुआ।ईमेल के ज़रिये देव को पेटिशन और हियरिंग आदि की डिटेल्स भेजी गई। पन्द्रह लाख तत्काल ट्रांसफर करने को कहा गया और पन्द्रह लाख फाइनल हियरिंग के बाद।
मिताली के मोबाइल पर बैंक का मैसेज चमका।
₹15,00,000 credited.
वह कुछ पल स्क्रीन को देखती रही। फिर बिना कोई भाव बदले ड्रॉइंग रूम में चली गई। वकील अख़बार पढ़ रहे थे। “आ गया?” उन्होंने बिना नज़र उठाए पूछा।
“आ गया,” मिताली बोली।
वकील ने अख़बार मोड़ा, चश्मा उतारा। “मैंने कहा था, डर जाएगा।”
“डर तो गया था,” मिताली बोली, “कल फ़ोन पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।”
“यह सिर्फ़ ट्रायल रन था। अगला?” वकील ने पूछा।
मिताली ने मोबाइल खोला। शादी डॉट कॉम का नया प्रोफ़ाइल लाइव था।
स्थान: नोएडा
पसंद: सीनियर आईटी प्रोफ़ेशनल
मिताली ने पूछा, “पापा…मिशन का नाम वही रहेगा?”
वकील ने सिर हिलाया। “हाँ। मिशन: तलाक़।”
घड़ी की टिक–टिक कमरे में गूँज रही थी – हर सेकंड, किसी और के ख़ुशियों की उलटी गिनती।

आशुतोष कुमार
संपर्क – [email protected]

आशुतोष की कहानी ‘मिशनःतलाक़ ‘पढ़ी ,समसामयिक समस्या को उठा कर सहज ,सरल शब्दों में जिस प्रकार कथानक को अंत तक ले गए ,यह इस बात की अपने आप ही पुष्टि करता है कि यह सब समाज में कितना सहज हो गया है।ऐलीमनी के लिए शादी करने के ‘मिशन ‘में पिता और वकील भी शामिल हैं।यह एक निकृष्ट धंधा है मगर यह पनप रहा है ,कारण यह है कि लोगों में समाज का भय समाप्त हो गया है,शादी जैसी पवित्र संस्था मज़ाक बना कर रख दिया है।कहानी समाज को आईना दिखाने में सफल हुई।
आदरणीय सुमन जी,
आपने ‘मिशनः तलाक़’ को जिस गहन दृष्टि और सामाजिक सरोकार के साथ पढ़ा, उसके लिए हृदय से धन्यवाद।
आपने जिस निकृष्ट प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है—जहाँ ऐलीमनी को लक्ष्य बनाकर विवाह को ‘मिशन’ बना दिया जाता है—वह आज के समय की एक कड़वी सच्चाई है।
कहानी का उद्देश्य भी इसी सामाजिक पतन और भयहीन होते समाज के आईने को पाठकों के सामने रखना था।
यदि यह कथा आपको सोचने पर विवश कर सकी और समाज के प्रति प्रश्न खड़े कर सकी, तो यही लेखन की सार्थकता है।
आपकी सजग और बेबाक प्रतिक्रिया मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।
सादर आभार
एक नया कथ्य है कहानी मिशन तलाक
सामाजिक व्यवहार में एकदम से परिवर्तन आया है। भौतिकतावाद हर देश में व्याप्त है जिसकी वजह से मानवीय मूल्यों और सम्वेदनाओं का पतन हुआ है ।
एक अलग से विषय पर कहानी सुंदर ,सहज रूप से लिखी गई है।शुभकामनाएं
Dr Prabha mishra
आदरणीया डॉ. प्रभा मिश्रा जी,
कहानी ‘मिशन : तलाक़’ पर आपके विचारों और शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार।
आपने जिस संवेदनशीलता से सामाजिक व्यवहार में आए परिवर्तन और भौतिकतावाद के प्रभाव को रेखांकित किया है, वही इस कथ्य का मूल उद्देश्य भी है।
आपकी सराहना मेरे लिए प्रेरणा है।
सस्नेह धन्यवाद।
सादर,
आशुतोष कुमार
आशुतोष जी
आप की कहानी पढ़ी
कहानी बहुत सामयिक है।
आजकल इस तरह की घटनाएँ बहुत ज्या घरदा हो रही हैं।
बहुत ज्यादा कानूनी सुविधाओं का स्त्री के पक्ष में होना कई जगह पुरुषों के लिये तकलीफ देह होता जा रहा है।
सीधे सच्चे लोग ऐसे लोगों के चंगूल में उलझ जाते हैं तो उन लड़कों की जिंदगी ही खत्म हो जाती है।
हमारे अपने ही परिचितों में इस तरह के धोखे खाने वाले दो-तीन परिवारों की कहानी हमारे सामने है।
कानून को इस मामले में सजग होने की बहुत जरूरत है।
संबंधों को तय करते हुए पूरी परख कर लेना बहुत ज्यादा जरूरी है।
वैवाहिक संबंध तय करते समय सतर्कता का अलार्म बजाती हुई अच्छी कहानी के लिये बधाई आपको।
आदरणीय नीलिमा जी,
सादर प्रणाम
आपने कहानी को इतने ध्यान और संवेदनशीलता से पढ़ा, यह मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान है। आपकी प्रतिक्रिया ने कहानी के मूल उद्देश्य को पूरी तरह सार्थक कर दिया।
आपका यह कहना बिल्कुल सही है कि आज के समय में कुछ मामलों में कानूनी असंतुलन सीधे-सादे लोगों के लिए गहरी पीड़ा और जीवनभर का संकट बन जाता है। आपने इसे केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ और आसपास घट रही घटनाओं से जोड़कर देखा—यही किसी रचना के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
विशेष रूप से आपके द्वारा “सतर्कता का अलार्म” कहे गए शब्द मेरे लिए बहुत अर्थपूर्ण हैं। यदि कहानी पाठक को सोचने, परखने और निर्णय से पहले सजग होने के लिए प्रेरित कर सके, तो लेखन का उद्देश्य पूरा होता है।
अपने अनुभव साझा करने और इतनी आत्मीयता से लिखने के लिए हृदय से धन्यवाद। आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए प्रेरणा और संबल दोनों है।
सादर,
आशुतोष
अच्छा लगा आशुतोश जी। अपने टिप्पणी पर संज्ञान लिया।
एक संतोष हुआ कि जिस रचनाकार ने अपनी रचना डाली है उसे कम से कम यह जानने की उत्सुकता तो है कि रचना के बारे में पाठकों का मत क्या है?
वरना लिखना सार्थक नहीं होता ।पढ़ना तो खैर बेकार कभी नहीं जाता।
आदरणीय नीलिमा जी,
आपकी इस संवेदनशील टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद।
एक रचनाकार के लिए पाठक की प्रतिक्रिया ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है।
जब पाठक पढ़कर सोचते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं और संवाद बनता है—तभी लेखन सार्थक होता है।
आपकी जैसी सजग पाठक की उपस्थिति लेखन को निरंतर बेहतर होने की प्रेरणा देती है।
सादर आभार