Wednesday, February 11, 2026
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भावना सक्सैना की कहानी – वो खाली कुर्सी

क्या कहा जाए उस स्त्री से, जिसके हाथों में अभी-अभी नए जीवन की खुशी की उम्मीद थी, और एक ही पल में उसके सपनों की दुनिया ध्वस्त हो गई? क्या कहा जाए उस पिता से, जिसने अपनी आंखों के सामने अपने सबसे प्यारे पुत्र को खो दिया, और उसकी मुस्कान हमेशा के लिए उसके भीतर बस गई?
जीवन कितना क्षणभंगुर है, यह जानते हुए भी कोई आकस्मिक दुर्घटना झकझोर देती है मन को। सामने पड़ी खाली कुर्सी पर नज़र पड़ते ही वह सप्ताह भर पीछे चली गई थी… जब वह दर्दनाक खबर आई थी कि विकास अब नहीं रहा। समय मानो थम गया। एक सड़क हादसा, बाइक फिसली, सिर पर चोट लगी, अस्पताल ले जाने तक उसकी साँसें थम चुकी थीं। 
एक दिन पहले ही तो उससे बात हुई थी। वही रोज़ की तरह ऑफिस में आकर उसने लैपटॉप खोला, फ़ाइलें चेक कीं, और मुझसे काम को लेकर कुछ चर्चा हुई। बातों में कोई उतार-चढ़ाव नहीं था—ना कोई इमोशनल लम्हा, ना कोई गहरी बात—बस वही प्रोजेक्ट की डेडलाइन, रिपोर्ट की लाइनें, और कोड में फंसे कुछ बग्स पर चर्चा।
उसका चेहरा हमेशा की तरह शांत था, लेकिन आज सोचती हूँ—क्या वो शांत था, या बस शांत होने का अभिनय कर रहा था? उसकी आँखों में वो हल्की-सी थकान थी, जो उस समय मुझे बस काम का दबाव लगी, लेकिन अब लगता है, शायद वो किसी और बोझ की परछाईं थी। कभी-कभी वो एकदम ख़ामोश होकर स्क्रीन पर नज़र टिकाए रहता था, जैसे दुनिया से कट गया हो। उस वक्त मैंने बस यही समझा कि वो काम में डूबा है, लेकिन शायद वो अपने भीतर के विचारों में डूबा हुआ था—इतना गहरा कि बाहर की कोई आवाज़ उस तक पहुँच ही नहीं रही थी।
वो मेरा सबॉर्डिनेट था, और हमारा रिश्ता ऑफिस की दीवारों तक ही सीमित था। काम के बाहर उसके बारे में मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की—ना उसकी पसंद-नापसंद, ना उसकी परेशानियाँ। हम अक्सर मान लेते हैं कि सहकर्मी सिर्फ सहकर्मी हैं, इंसान नहीं—जिनके भीतर भी डर, टूटन, और उम्मीदें पलती हैं। शायद मैं भी उसी भूल की शिकार थी।
उसकी मुस्कान अब याद आती है—वो मुस्कान जिसमें होंठ थोड़े ऊपर उठते थे, लेकिन आँखें वैसी ही रहती थीं—थोड़ी थकी, थोड़ी बुझी हुई। उस दिन मैंने बस रिपोर्ट पर साइन किया और अपने काम में लग गई। आज लगता है, काश उस साइन से पहले मैंने उससे एक वाक्य और कह दिया होता—“कैसे हो, सच-सच बताओ?”
लेकिन न मैंने पूछा न उसने कहा।दिन अपनी रफ़्तार में चलता रहा, मीटिंग्स, मेल्स, रिपोर्ट्स। मुझे कहाँ पता था कि अगले ही दिन एक फोन कॉल सब कुछ बदल देगा।
अगले दिन छुट्टी थी, कुछ काम निबटा कर बैठी ही थी कि अचानक फोन बजा। स्क्रीन पर एक अनजाना नंबर था।
मैंने कॉल उठाई तो उधर से किसी न्यूज रिपोर्टर की जल्दी-जल्दी, हड़बड़ी-भरी आवाज़ आई—
“आपके ऑफिस का कोई व्यक्ति सड़क हादसे में गुज़र गया है।”
कुछ सेकंड तक तो शब्दों का मतलब ही समझ नहीं आया। कानों में आवाज़ पड़ी, पर दिमाग ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। लगा जैसे किसी ने गलत नंबर मिला दिया है, या फिर ये कोई बेवकूफ़ी भरा मज़ाक है। लेकिन उनके अगले वाक्य—“नाम विकास था, बाइक पर थे”—ने मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली।
सुबह तक जो आदमी हँसते-बोलते ऑफिस में बैठा था, ईमेल का जवाब दे रहा था, कोड की लाइनों में उलझा हुआ था… वो अब नहीं था।
जो अभी-अभी मेरे सामने कॉफ़ी मग पकड़े खड़ा था, अब किसी ठंडे, बेहरकत शरीर में बदल चुका था। या शायद मैं ही यही सोचती रही कि वो ठीक था, जबकि सच कुछ और था।
मुझे याद आया—उसी दिन लंच के बाद उसने कहा था, “मैं घर जा रहा हूँ, बाइक से निकलूँगा।”
तुरंत कई लोगों ने एक साथ टोक दिया—
“यार, मत जा, मौसम खराब है, रास्ता फिसलन भरा है।”
“अकेले मत जा, कम से कम कार से निकल जा, किसी के साथ जाओ।”
“इतनी लंबी यात्रा बाइक से मत कर, बेवजह रिस्क क्यों ले रहे हो?”
पर विकास ने किसी की भी बात पर गौर नहीं किया। उसने हल्के से कंधे उचका दिए, होंठों पर एक फीकी-सी, थकी हुई मुस्कान आई और बस इतना कहा—
“अब कुछ फ़र्क नहीं पड़ता… वैसे भी यहाँ रहकर क्या करूँगा?”
उस पल ये बात सुनकर सबने इसे मज़ाक या चिड़चिड़ेपन में कही हुई लाइन समझा। किसी ने रुककर ये नहीं सोचा कि “अब कुछ फ़र्क नहीं पड़ता” जैसे शब्द एक चेतावनी हो सकते हैं—एक खिड़की, जो अंदर के अँधेरे की झलक दिखा रही हो।
पर उस वक़्त, हम सब बस काम में लौट गए। और उसने हेलमेट पहना, बाइक स्टार्ट की, और चला गया—सीधे उस सफ़र की ओर, जहाँ से वापसी नहीं थी।
बाद में पता चला कि उसके परिवार ने भी उसे अकेले बाइक से आने को मना किया था।
पिता ने फोन पर समझाया था—आवाज़ में एक सख़्ती थी, पर उसमें चिंता की परत साफ़ सुनाई देती थी—
“बेटा, अकेले मत आ, किसी को साथ ले ले। सड़कें गीली हैं, मौसम अच्छा नहीं है।”
माँ ने भी अपनी तरफ़ से मनाने की कोशिश की थी। वो जानती थी कि बेटा कभी ज़िद पर आ जाए तो आसानी से नहीं मानता, पर फिर भी बोली—
“ट्रेन से आ जा न… इतनी दूर बाइक से जाने की क्या ज़रूरत है? दो दिन बाद आना, लेकिन सुरक्षित आना।”
विकास ने उन्हें भी वही मुस्कान दिखाई, जो शायद वह सबको दिखाता था—थोड़ी थकी हुई, थोड़ी खोई हुई। उसने झूठ बोल दिया—
“मैं अकेला नहीं आ रहा, ऑफिस के आठ लोग और साथ हैं। चिंता मत करो।”
पर सच ये था कि वो अकेला ही निकला था।
शायद उसे पता था कि अगर उसने सच कह दिया, तो कोई उसे रोक लेगा।
शायद वो खुद भी नहीं चाहता था कि कोई उसे रोके।
शायद वो बस निकल जाना चाहता था—एक ऐसे सफ़र पर, जहाँ उसके सवालों का जवाब कोई न माँगे, जहाँ उसे अपने टूटे हुए रिश्तों और बिखरी हुई ज़िंदगी का सामना न करना पड़े।
अब सोचती हूँ—उसके इस झूठ में कितना गहरा सच छुपा था।
वो एक ऐसा सच था, जो उसने किसी को बताना नहीं चाहा, और हम सब उस मुस्कान के पीछे छिपी थकान को देख ही नहीं पाए।
वो हमेशा से थोड़ा अलग-सा था। ऑफिस में जब बैठता, तो कभी-कभी कंप्यूटर स्क्रीन के पार देखता रहता—जैसे कोड की लाइनों में नहीं, बल्कि किसी अदृश्य गहराई में खो गया हो।
कभी ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सा हो जाता, छोटी-सी बात पर तकरार कर लेता, और अगले ही पल चुपचाप बैठकर काम में डूब जाता, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कभी अपने प्रोग्रामर होने पर बहुत गर्व महसूस कराता, टीम को नए-नए आइडिया देता, और कभी कई-कई घंटे बस अपने डेस्क पर झुके हुए, बिना किसी से नज़र मिलाए बैठा रहता।
मैंने कई बार सोचा था—“शायद वो डिप्रेशन में है?”
पर सच कहूँ, तो हम सब इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
हम सोचते हैं, “ये तो फेज़ है, चला जाएगा।”
हम मान लेते हैं कि जब तक कोई खुद आकर मदद न मांगे, तब तक हमें टोकने का हक नहीं।
फिर धीरे-धीरे बातें खुलीं।
उसकी शादीशुदा ज़िंदगी बिखर रही थी। उसकी पत्नी, जिससे उसने बेइंतहा प्यार किया था, शायद उसे वैसा प्यार नहीं दे पा रही थी।
किसी और का साया उनके रिश्ते के बीच आ गया था। वो जानता था, और यही सच उसे अंदर से खा रहा था।
उसने अपने कुछ दोस्तों से कहा भी था—“अब घर, घर जैसा नहीं लगता।”
और उस घर में एक मासूम बेटी थी—जिसे वो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था।
एक और बच्चा आने वाला था—लेकिन शायद अब वो पिता बनने की खुशी भी महसूस नहीं कर पा रहा था।
जब एक इंसान भीतर से पूरी तरह टूट जाता है, तो बाहरी रिश्ते, जिम्मेदारियाँ, वादे… सब धुंधले पड़ने लगते हैं।
उसके पास लड़ने की ताक़त ही नहीं बची थी।
वो धीरे-धीरे घुल रहा था—जैसे रात में बुझती हुई अगरबत्ती, जिसका धुआँ कमरे को भर तो देता है, लेकिन किसी को उसकी खुशबू में छुपा दर्द नज़र नहीं आता।
वो हमेशा से थोड़ा अलग था। कभी ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सा, कभी एकदम शांत। कभी अपने प्रोग्रामर होने पर बहुत गर्व दिखाता, कभी घंटों खोया-खोया रहता। मैंने कई बार सोचा था कि शायद वो डिप्रेशन में है, पर डिप्रेशन को हम अक्सर तब तक नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जब तक कि कोई हादसा न हो जाए।
अब जाकर समझ आ रहा है कि वो इतना टूट क्यों गया था। उसकी शादीशुदा ज़िंदगी बिखर रही थी। उसकी पत्नी, जिससे उसने बेइंतहा प्यार किया, शायद उसे वैसा प्यार नहीं दे पाई। उसका किसी और से रिश्ता था। वो जानता था, और यही उसे अंदर से खा रहा था। अब सवाल यह है कि वो लड़ा क्यों नहीं? अपनी बेटी के लिए क्यों नहीं रुका? आने वाले बच्चे के लिए क्यों नहीं सोचा? क्योंकि जब एक इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाता है, तो उसके पास लड़ने की ताकत ही नहीं बचती। वो धीरे-धीरे घुल जाता है, जैसे रात में बुझती हुई अगरबत्ती, जिसका धुआँ किसी को नज़र भी नहीं आता।
अब हर कोई अफसोस कर रहा है।
“हमें समझना चाहिए था…”
“काश किसी ने सही से बात की होती उससे…”
“काश हम उसे रोक पाते…”
लेकिन क्या ये “काश” उसे वापस ला सकते हैं? नहीं। अब उसकी कुर्सी खाली है। अब उसकी बेटी बड़े होकर पूछेगी, “मेरे पापा कहाँ हैं?” अब उसकी पत्नी, जो किसी भी दिन अपने बच्चे को जन्म देने वाली है, वो पूरी ज़िंदगी इस अपराधबोध के साथ जिएगी कि शायद उसने किसी को इतना तोड़ दिया कि उसने अपनी जान दे दी।
उसके अंतिम संस्कार में भीड़ थी, पर उस भीड़ में भी एक अजीब-सी दूरी थी। लोग थे, लेकिन जैसे सबके बीच में एक मोटी, अदृश्य दीवार खड़ी हो—जो किसी को किसी तक पहुँचने नहीं दे रही थी। शोर था—मंत्रों का, लकड़ियों के चटकने का, किसी-किसी की सिसकियों का—पर उस सबके बीच एक ऐसा सन्नाटा भी था जो भीतर तक उतर जाए।
उसके पिता की आँखों में अजीब-सी स्थिरता थी, जैसे आँसू भीतर ही कहीं जम गए हों और अब बहने से इनकार कर रहे हों। वो बस सामने जलती चिता को देख रहे थे, जैसे यह यकीन करने की कोशिश कर रहे हों कि यह सच है, कि उनका बेटा सचमुच यहाँ, इन लपटों में है। उनकी उंगलियाँ बार-बार कांप रही थीं, जैसे किसी अदृश्य सहारे को टटोल रही हों।
उसकी माँ एक कोने में बैठी थी, गोद में दुपट्टे का कोना मरोड़ते हुए—इतना कसकर, कि उंगलियों के पोर सफ़ेद पड़ गए थे। शायद वो उस कपड़े को मसलकर दर्द निकालना चाह रही थी, लेकिन दर्द कहाँ निकलता है? वो तो भीतर ही भीतर जड़ें जमा लेता है, नसों में उतर जाता है, साँसों में बस जाता है। उसकी नज़र बार-बार उस जगह ठहर जाती जहाँ कभी उसका बेटा बैठा करता था, और फिर अचानक कहीं दूर खो जाती—जैसे स्मृतियों की लहरें उसे बहा ले जा रही हों।
ऑफिस के लोग भी चुप थे। कोई उसकी टेबल पर रखी अधूरी फाइलों को देख रहा था—कागज़ों पर उसके लिखे आधे-अधूरे नोट्स, जैसे कोई वाक्य बीच में ही रुक गया हो और कभी पूरा न हो सका हो। कोई उसके मोबाइल की आख़िरी कॉल्स देख रहा था, जैसे वहाँ किसी छिपे हुए जवाब की तलाश हो। लेकिन जवाब कहाँ थे? जवाब तो उस आग में जलकर धुएँ में बदल चुके थे।
मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी यह सोचने से—आख़िरी बार मैंने उससे कब सच में बात की थी? कब मैंने उससे पूछा था, “तुम सच में ठीक हो?” शायद कभी नहीं। मैंने भी उसकी मुस्कान को ही सच्चाई मान लिया, जैसे बाकी सबने। मैंने भी उसके “मैं ठीक हूँ” को सच मान लिया, बिना यह देखे कि उसकी आँखों में कितनी थकान, कितनी उदासी ठहरी हुई थी।
कुछ लोग अपने जाने के बाद हमें सबसे कठिन सबक देकर जाते हैं—कि अगली बार जब कोई कहे, “मैं ठीक हूँ”, तो बस यूँ ही मान मत लेना। एक बार आँखों में झाँककर देखना कि कहीं भीतर कोई तूफ़ान तो नहीं चल रहा। एक बार हाथ पर हाथ रखकर कहना कि तुम अकेले नहीं हो।
क्योंकि कुछ मौतें सिर्फ एक इंसान की नहीं होतीं। वो सिर्फ एक ख़ाली कुर्सी नहीं छोड़तीं, वो एक पिता की आँखों का उजाला बुझा देती हैं, एक माँ की गोद का वज़न छीन लेती हैं, एक बेटी के बचपन से हँसी चुरा लेती हैं। वो ऑफिस के गलियारों में लंबे समय तक गूँजती रहती हैं, और उन सभी ज़िंदगियों में एक खालीपन छोड़ जाती हैं जो कभी उसके होने से भरी रहती थीं।


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1 टिप्पणी

  1. भावना जी!

    कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जो हम देख रहे होते हैं ,वह सच नहीं होता और जो सच होता है वह दिखाई नहीं देता।
    मुस्कान के पीछे छुपे हुए दर्द को पहचानना इतना आसान नहीं होता।
    “सब ठीक तो है” पूछने पर मुस्कान के साथ “ठीक है” के नीचे दबी हुए पीड़ा का अहसास नहीं हो पाता।
    कहानी इसी पीड़ा को व्यक्त करती है।

    किसी एक इंसान का जाना सिर्फ उसका जाना नहीं होता, उसके जाने के साथ ही न जाने कितने रिश्ते सिर्फ टूटते ही नहीं, बल्कि
    टूट के बिखर जाते हैं ,छूट जाते हैं।
    और नौकरी करने वाले ऑफिस में एक कुर्सी खाली हो जाती है।
    जो एक अनहोनी घटना की याद बनकर निरंतर सालती रहती है।

    पति-पत्नी के प्यार के बीच किसी तीसरे का आना परिवार के बिखरने का सूचक होता है।
    लेकिन कुछ लोग जिंदगी से जल्दी हार मान लेते है।
    कहानी के नायक विकास का यही दर्द था।

    वह जानता था कि लंबी दूरी पर बाइक का सफर, वह भी बारिश की स्थिति में, उसके लिए हितकारी नहीं है।
    उसे सब ने रोका उसके मित्रों ने उसके माता-पिता ने लेकिन जिसने मरने की ठान ली हो उसे फिर जीवन की आवाज सुनाई नहीं देती या वह सुनकर भी अनसुनी कर देता है
    और रिश्ते भी मौत के आगे हार जाते हैं।

    कहानी का संदेश दरअसल पाठकों के लिये है कि शब्दों के स्वर को पहचानने की कोशिश करें ।अगर उसमें थोड़ी भी निराशा महसूस हो या जो जीवन के प्रति उपेक्षा का दर्द समझ आए तो सक्रिय रहें।
    एक जीवन का सवाल है।
    उसका “सब ठीक है” सुनकर निश्चिंत न हों।
    चिंता करें और पड़ताल करने की कोशिश करें, ताकि आपके साथी की, या आपके परिचित के जीवन को बचाया जा सके।
    कहानी बहुत हृदय स्पर्शी है।
    बहुत -बहुत बधाई कहानी के लिये।
    प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

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