Wednesday, February 11, 2026
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दीपक शर्मा की कहानी – दुहाई-तिहाई

“धर्मवीर,” अपनी अर्द्धचेतना में जाई मुझे ठीक पहचान न पाईं। समझीं, मैं यशवीर नहीं हूं। धर्मवीर हूं।
                  “हूं,” मैं ने उन का भ्रम न तोड़ा और भैया के अंदाज़ में हुंकार भरा। यों भी अपने इस चौदहवें साल तक आते- आते जैसे ही मेरे शरीर ने एक निश्चित बनावट और ऊंचाई हासिल की है, पुराने जानने वाले लोग कहने लगे हैं, कैसे तो धर्मवीर को देख कर बारह- तेरह साल पहले वाले यशवीर का धोखा हो जाता है!
                  “मेरा समय पूरा हो रहा है,” जाई बड़बड़ाईं, “शायद इसीलिए शशि बार- बार दिखलाई दे रही है, फूले अपने पेट के साथ…..”
                  वह नाम मेरे लिए नितांत अजनबी था। 
                  लेकिन धर्मवीर भैया के अंदाज़ में मैं फिर ‘हूं’ बोल गया।
                  “अपने यशवीर को छाती से लगा कर दूध पिलाती हुई । मैं उसे अलग करती हूं तो यशवीर को मेरे हाथों से छीन- झपट ले जाती है— ‘मेरा दूध चू रहा है’….. मैं कहती हूं, यशवीर का बाज़दावा जब मेरे हक में अब आ ही गया है, फिर उस पर तेरा दावा कैसा?”
                  क्या बोल रहीं थीं जाई? चौकन्ने हुए मेरे दोनों कान खड़े हो लिए। 
                 “याद है? धर्मवीर? कैसे उसे मैं ने फ़र्श पर धकेल कर उसके गले में उस की साड़ी की गांठ लगा दी थी…..सीं- सीं, सों- सों उस के दोनों नथुने बजा दिए रहे?”
                 कैसी उग्र उत्तेजना रही जाई के स्वर मे! कैसे वह उत्तेजना मेरे अंदर समाने लगी और मेरी सांस फुलाने लगी!!
                 मैं ने बाउजी को उन के कमरे में आन जगाया।
                 “जाई अभी- अभी बोलीं, मैं उन का बेटा नहीं हूं,” मैं रो पड़ा। 
                 “बेहोशी में जो कोई भी कुछ भी बोल दे,” बाउजी की आवाज़ थरथरायी।
                 “यह शशि कौन थीं?” मैं ने उन्हें विमुक्त न किया।
                 “जैवंती उस की मौसी थी। मां उस की गुज़र चुकी थी और बाप ने दूसरा ब्याह रचा कर उसे उस के ननिहाल भेज रखा था।और वे लोग उसे इधर- उधर फेंकते रहते थे। किसी की शादी पड़ती, प्रसूति पड़ती, मृत्यु पड़ती, उसे वहीं चलता कर दिया जाता।”
                 “हमारे यहां वह क्यों आईं?”
                 “जैवंती की ज़िद पर,मेरी भाभियां इस की दुर्गत बना रही हैं।मैं इसे अपने पास रखूंगी।”
                 “फिर उन्हें मार भी डाला अपने हाथों?”
                  “जैवंती भला उसे क्यों मारती?”
                  “क्योंकि उन्हों ने मुझे जन्म दिया था…..”
                  “यह सब जैवंती ने कहा तुम से?” बाउजी स्तब्ध रह गए। 
                  “हां…..”
                  “वह ज़रूर पगला गई है,” अपने बिस्तर से उठ कर बाउजी जाई के कमरे की ओर चल दिए,  “पूछता हूं। पूछता हूं उस से…..”
                    (2)
                   अपनी चेतना जाई वापस न ला पाईं और उसी दिन चल बसीं।
                  खबर मिलने पर सभी लोग आए लेकिन मैं धर्मवीर भैया के पास ही गया। जो अहमदाबाद से आए थे जहां वह मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे थे।
                  “आप के बचपन में कोई शशि हमारे घर रहने आयीं रहीं?” धर्मवीर भैया और मेरी आयु में बारह वर्ष का अंतर है।
                  “हां,” धर्मवीर भैया हैरत से मेरा मुंह ताकने लगे, “तुम्हें किस ने बताया?”
                  “जाई ने। उन्हों ने यह भी कहा वह मेरी मां थीं…..”
                   “तुम ने ज़रूर गलत सुना होगा। जाई के प्यार में कोई कमी पाई तुम ने?” धर्मवीर भैया ने मेरी पीठ घेर ली।
                   “नहीं। लेकिन जाई ने कहा मुझ से। शशि मुझे अपना दूध पिलाया करती थीं। वह मेरी मां थीं। जाई मेरी मां नहीं थीं,” सच मापने के लिए अतिरंजना ज़रूरी थी।
                   “तो फिर उन्हों ने गलत कहा। बेहोशी में लोग अक्सर अनाप-शनाप बोल दिया करते हैं…..”
                    “लेकिन अनाप-शनाप का भी कोई आधार तो होता ही है,” मैं अड़ गया।
                    “यह सच है शशि जीजी तुम्हें बहुत प्यार करती थीं और …..”
                    “मगर मुझे वह याद क्यों नहीं?”
                     “उन की बात छोड़। और कोई बात सुना। अपनी क्रिकेट के बारे में।अपनी स्कूल टीम के बारे में।किसी मैच के बारे में…..”
                    “नहीं। पहले आप बताइए वह मरीं कैसे?”
                    “मैं नहीं जानता। मैं स्कूल में था। स्कूल से लौटा तो घर में भीड़ जमा थी और वह बीच में लेटी थीं।”
                    “किसी से आप ने पूछा नहीं, वह मर कैसे गईं?”
                    “बीमार तो वह अक्सर रहती ही थीं। किसी दिन बुखार है तो किसी दिन मिचली। उल्टी उन्हें बहुत आती थी…..”
                   “मगर उन चीज़ की दवा भी तो होती है…..”
                   “तुम ऐसे- कैसे बोल रहे हो? जाई तो उन का बहुत ख्याल रखती थीं। और  फिर उन के मरने का सब से ज़्यादा दुख तो जाई ही को था। उन से कौन क्या पूछता? अब जाई चली गईं हैं तो नानी अम्मा को कौन घेरे बैठा है, वह कैसे मर गईं…..”
                   “शशि मेरी मां थीं? थीं न?” मैं ने एक अंतिम प्रयास किया।
                   “नहीं भई,” धर्मवीर भैया ने मुझे अपने अंक में भर लिया, “हम दोनों सगे भाई  हैं। जाई की अनाप-शनाप भूल जा…..”
             ( 3 )
                   मैं नानी अम्मा के पास चला आया। वह सोने जा रहीं थीं।मैं उन की बगल में जा बैठा।
                  “शशि को आप जानती थीं? उन के बारे में बताइए।” 
                   “तू क्यों पूछ रहा है?” वह चौंक उठीं।
                   “क्यों कि मैं जान लिया हूं, वह मेरी मां थीं। जाई ने आज मुझे सब बताया…..”
                   “दोनों अभागी थीं। दुख ही दुख ऊपर से लिखवा कर आईं थीं। और अपने- अपने लेखे का दुख भोग कर चली गईं,” नानी अम्मा रोने लगीं।
                   “शशि की जान जाई ने ली थी?”
                   “जैवंती ने उस के कारण बहुत दुख भोगा,” मेरी बात पर उन की रुलाई ने कान न धरने दिया, “शुरू में तेरा बाऊ शशि को अपने घर पर रखने को तैयार न था, बोला था,लड़की की ब्याहने लायक उम्र है। किसी से ऊंच- नीच हो गई तो बदनामी मेरी होगी…..”
                  “क्या उम्र थी उन की?”
                  “उम्र क्या पूछते हो उस की? अभी बीस भी पार न की थी जब उम्र उस की पूरी हो गई…..”
                  “नहीं, नानी अम्मा, मैं तो यह पूछ रहा था वह किस उम्र में जाई के पास रहने आई रहीं?”
                  “यही कोई सत्तरह- अठारह की रही होगी। दीन- हीन। जैवंती को उस समय अपनी सनक दिक किए थी, अपनी बहन की बेटी को अपनी भाभियों के हाथों इतनी दुत्कार- फटकार पाते हुए मुझ से और देखा नहीं जाता।इसे मैं अपने घर पर रखूंगी। अपनी निगहबानी में…..”
                 “बाउजी की मर्ज़ी के खिलाफ?”
                 “नहीं, पहले तो यही बोली,भेज दूंगी वापस। ज़रूर भेज दूंगी लेकिन अब लाई ही हूं तो कम से कम एक दो हफ़्ते तो रख ही लूं। वरना भाभियों के सामने मेरी गर्दन नीची हो जाएगी। बस उन्हीं दो हफ़्तों में जैवंती ने तेरे बाऊ को तैयार करने में तरकीब क्या लगाई कि अपनी कब्र आप ही खोद ली…..”
                 “कैसी तरकीब?”
                 “तेरे बाऊ के कपड़े- लत्ते, जूते- चप्पल,नाश्ता- पानी सब शशि के सुपुर्द कर दिया। और जब जैवंती की पूरी तसल्ली हो गई कि शशि तेरे बाऊ को कायल कर चुकी थी तो उस से शशि की वापसी की पूछी, शशि को छोड़ने जाना है, कब जाऊं? तो तेरे बाऊ ने कहा, अभी जल्दी क्या है? देख तो, हमें और हमारे घर को कैसे संभाले है!”
                 “फिर?”
                 “बस फिर उसी दिन से तेरे बाऊ ने जो खरीदारी जैंवंती के लिए भी कभी न की थी, अब नाम जैवंती का ले और दो- दो जोड़ी साड़ी लाए, चार- चार दोनों में नमकीन- मीठा लाए और कहे, तुम्हारा और शशि का हिस्सा एक बराबर। जैवंती अगर कुछ समझी भी तो देखी- अनदेखी कर गई। शशि से लाड़, मानो उसी का सत्कार। शशि आखिर उसी की इकलौती  बहन की निशानी थी। सगी मौसी को छलेगी तो कैसे छलेगी? ठगेगी तो कैसे ठगेगी? पति कुछ ऊंची- नीची करेगा तो भांजी उसे बताएगी ही बताएगी। शिकायत करेगी। मगर   अनहोनी हो कर रही…..”
                 “कैसी अनहोनी?”
                 “शशि को गर्भ ठहर गया। तेेरे बाऊ ने उसे गिराने नहीं दिया। जभी मैं ने रास्ता निकाला उन मौसी- भांजी को अपनी भरोसेमंद एक रिश्तेदारिन के घर जा ठहराया। वहां से लौटीं तो जैवंती ने तुम्हें अपना बताया,यह मेरा यशवीर है। मेरा छोटा बेटा।”
                 “बाउजी को तो पता रहा होगा मैं किस जाई का बेटा हूं…..”
                 “क्यों नहीं पता था? सब पता था। अब जैवंती कहे,शशि यहां नहीं रहेगी। और बाऊ तेेरा कहे शशि यहां से नहीं जाएगी। ऊपर से उस के चोर- थन। तुझे दूध पिलाए तो खटपट, न पिलाए तो आफ़त। तेरा बाऊ घर में कोहराम मचाए, वह अलग…..”
                 “और ऐसे में जाई ने उन्हें मार डाला?”  अनदेखी अपनी उस मां के लिए मेरे मन में अथाह करुणा जाग आई।
                “सब तेरे बाऊ की करतूत थी। जिस ने शशि को दोबारा गर्भ दे कर घर में दो कंकाल तैयार कर दिए। एक अपनी बदचलनी के चलते और दूसरा उस की बदचलनी को बर्दाश्त न कर पाने की मजबूरी के रहते…..”
                 दुखदायौ नानी अम्मा की दुहाई- तिहाई ने हवा में एक साथ कई गेंद उछाल दिए। 
                मेरे साथ दांव खेलने के वास्ते।


दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. एक शौकी वेव की तरह कहानी ज़हन में ठहर गई। किस्मत क्या गुल खिलाती है..!
    सच्चाई कई प्रश्न लिए सामने आ खड़ी हुई।
    अंतिम वाक्य विचलित कर गया।

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