शूल शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह के इच्छा मृत्यु के वरदान को आज अभिशप्त साबित करता ये एक-एक पल, एक -एक युग सा भीष्म पितामह को महसूस हो रहा था।
दर्द जिस्म के पोर – पोर से लहू बनकर सैलाब ला चुका था।
विडंबना यह कि मुख से आह भी निकालना स्वयं का तिरस्कार करने के समान था।
कांटों के बिछौने पर लेटा अपने अधमरे शरीर का बोझ उनके लिए असहनीय हो गया था।
कभी बंद तो, कभी खुली आंखों से, अतीत का एक एक दृश्य चलचित्र सा लहरा रहा था।
अपने कर्मों का लेखा जोखा उन्होंने स्वयं लिखा था मानो—— ज्ञानी, अत्यंत दयावान न्याय प्रिय अपने कुल की रक्षा हेतु, अपना सर्वस्व जीवन समर्पित करने वाले भीष्म पितामह आज अपने बंद चक्षु से खुद के जन्म से अब तक के सफ़र को बारी बारी देखकर आत्ममंथन कर रहे हैं
सारी अभिलाषाओं को उन्होंने एक वचन के तहत् अपने आप को बांध लिया था।
आजीवन सिर्फ और सिर्फ अपने राज्य की रक्षा के लिए और अपने परिवार के लिए भीष्म प्रतिज्ञा लेकर संपूर्ण जीवन बिना विवाह किए अकेले बिताने का प्रण किया था।
और आज अपने कुछ ऐसे कर्मों के कारण ही अर्जुन के बाणों की शूल शैया में ज़िंदगी के बाकी दिनों को यातना पूर्ण बिताना पड़ रहा है और इच्छा मृत्यु के वरदान के बाद भी पश्चाताप की अग्नि में जल कर इस जन्म में ही सब कुछ ख़त्म कर देना चाहते हैं, ताकि अगले जन्म में किसी भी प्रकार की कोई पाप की पुनरावृत्ति होने से फिर तकलीफ ना हो।
पर मेरे पापा हां मेरे पापा, अपने ऐसे कौन से कर्मों का फल भुगत रहे हैं, ये वो स्वयं तो क्या , उनसे जुड़ी हर जिंदगी इस बात से अन्जान है।
हर पल, हर घड़ी इंसानियत का मान रखता , ये देवता सा इंसान ,हर पल तैयार रहता, हर किसी के आंसू पोंछने,और उनका दर्द स्वयं के सीने में भर के अकेले में उनके लिए रोता हुआ दिखता ।
खुद भूखा रहकर भूखे को भोजन कराता था, कंगाली की हालत में भी जरूरतमंदों को रुपयों से मदद करता।
सदा ईश्वर की आराधना मैं लीन नतमस्तक हो जीवन जीता।
अपने परिवार का इकलौता रक्षक, दया, ममता त्याग का जीता जागता, अपने आचरण, सदाचार से, वाणी में सरस्वती का निवास, सौम्यता पोर-पोर में समाई ऐसा जीवन जीते आया था।।
पर प्रकृति का क्रूर प्रहार उनकी सच्चाई ,अच्छाई पर बहुत बुरी तरह हावी हुआ।
अकस्मात हुए इस वार का सामना करना जितना उनके लिए मुश्किल था , उससे कहीं ज्यादा उनके परिवार में पत्नी, तीन बेटों और एक बेटी के लिए था।
आज मृत्यु शैया उनको शूल शैया से कम नहीं लग रही थी। पल-पल स्वयं मृत्यु का इंतजार———-उफ—– कितना भयानक, कितना दर्द, कितनी तड़प—– हर पल ईश्वर से प्रार्थना करता कि — हे ईश्वर अब दे दो इस दर्द से निजात , अब नहीं सहा जा रहा है, जिस्म से रिसता दर्द का सैलाब। मुझे समा लो प्रभु अपने में ही जल्दी ख़त्म कर दो मेरी इहलीला। पर जन्म मृत्यु इंसान के बस में कहा है ।
कोई तो है जो अदृश्य हो चला रहा है इस चक्र को, और उसे हमने भगवान ,ईश्वर ,परमात्मा मान लिया है। खैर जो भी है, पर मेरे पिता , जी हां मेरी जान से भी प्यारे ,मुझे ज़िंदगी सिखाते, जीने के संघर्ष को सिखलाते, मेरे हीरो ,मेरे आइडल, मेरे दोस्त—–
मेरे सब कुछ ,ख़ास सब कुछ बस मेरे पापा — पापा — पापा—– गले को कैंसर ने अपने अधिकार में ले लिया था।
बहुत दिनों से खाने-पीने में तकलीफ़ हो रही थी, दर्द भी बहुत था।
शुरुआत में तो हर बीमार अपने फैमिली डॉक्टर के पास ही जाता है। छोटी बीमारी का जामा पहनाते शहर के बहुत से डॉक्टर से इलाज करवाया। कोई कहता —– सर्दी की वजह से टॉन्सिल बढ़ गए हैं, कोई कहता मामूली सी तकलीफ़ है, इंफेक्शन है ,कुछ दिन में ठीक हो जाएगा।
बस सब अपना – अपना उल्लू सीधा करने में एक इंसान की ज़िंदगी को दांव पर लगा देते है।
और फिर थक हार कर एक डॉक्टर के कहने पर गले की एंडोस्कोपी करवाई गई , क्योंकि पापा को सबसे ज्यादा तकलीफ गले में थी और भोजन करना पूरी तरीके से बंद हो गया था पानी पीने में भी बहुत तकलीफ शुरू हो गई थी, साथ ही वो सभी रिपोर्ट करवाएं गए जो कि बहुत ज्यादा अस्वस्थ व्यक्ति और निरंतर तकलीफ होने पर करवाए जाते हैं।
रिपोर्ट आने के पूर्व ही पापा ने अपने मन की जिज्ञासा को हम मज़ाक ही मज़ाक में सबके सामने व्यक्त किया कि—–
पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि मुझे तो कैंसर हो गया है।
सुनकर सबसे पहले तो उनकी पत्नी ने उनसे बहुत झगड़ा किया कि कुछ भी अपशब्द मुंह से क्यों निकाल रहे हो, ऐसा सब बोलकर आप मुझे कितना दुख दे रहे हो, आपको कुछ नहीं होगा, मेरा कान्हा मेरे साथ है आप जल्दी ठीक हो जाएंगे।
आख़िर में निष्कर्ष निकला और वो भी की गले की स्वर नली में कैंसर है——- शून्य के घेरे में जिंदगी सिमट गई—- पत्नी बच्चे सब टूट गए, प्यार, ममता, और दर्द का दरिया सबकी आंखों से बह निकला। मेरी मां——— मां———वात्सल्य , ममता की जीती जागती इस दुनियां में हम सब के लिए ईश्वर का अवतार। समाचार सुनकर मूर्छित हो गिर पड़ी।
अकस्मात हुए इस ना मिटने वाले रोग पर भी पापा ने हंसकर कहा था कि सब ईश्वर की मर्जी है, वो जो करता है उसमें ही सबका भला होता है, मुझे कोई अफ़सोस नहीं है कि मुझे इस भयंकर बीमारी ने अपनी चपेट में जकड़ लिया है , अरे जी हम आखिर 54 साल तो जी चुके हैं ,बस तुम सब की चिंता है तुम सब मेरे बगैर जीने की अभी से आदत डाल लो।
मां – पापा के प्रेम की मिसालें पूरा समाज देता है।
हर मिलने वाला उनके प्रेम भरे स्वभाव ,अपनेपन का दीवाना हो जाता था।
सफ़र शुरू हुआ मुंबई का , देश के सबसे बड़े हॉस्पिटल टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का——
इंसानी हांड मांस का सामना उन तमाम मशीनों से जूझंना ,जो सही मायने में शरीर राख करने में कहीं भी पीछे नहीं हटती।
असहनीय पीड़ा सहते पापा कभी जुबां से उफ़ भी ना करते।
क्योंकि उनका उफ़ करना उनके परिवार को तकलीफ़ दे जाता।।
ख़ामोशी से दर्द सहते—— आज पापा का ऑपरेशन मुंबई में करना तय हुआ।
कुछ महीनों के इलाज का नतीजा डॉक्टर ने सिर्फ ऑपरेशन बताया।
ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया—- करीब 1 घंटे के बाद अंदर से डॉक्टर ने आकर बताया कि ऑपरेशन नामुमकिन है ,क्योंकि बीमारी गले से होते हुए पूरी छाती के नीचे और पीछे पीठ में भी फैल गई है।
इस ख़तरनाक परिस्थिति में ऑपरेशन संभव ही नहीं है।
पर ये लापरवाही डॉक्टरों के कारण हुई ,ऐसा परिवार के लोगों का मानना था क्योंकि पापा को लेकर बड़ा बेटा पूरे 2 महीने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के चक्कर लगाता रहा।
डॉक्टरों के अनुसार हॉस्पिटल में बेड खाली ना होने की वज़ह से आज नहीं कल ,कल नहीं परसों ऑपरेशन की डेट आगे बढ़ती जा रही थी, इतने बड़े हॉस्पिटल में एक बेड का मिलना नामुमकिन हो रहा था।
हॉस्पिटल के मरीजों को देख कर कैंसर से जूझती उनकी ज़िंदगी किस प्रकार दर्द और तकलीफ़ में गुजर रही है, देख पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था।
मरीजों की तादाद इतनी थी कि उनके लिए उचित रहने की व्यवस्था भी नहीं हो पा रही थी यहां तक कि पापा के लिए जमीन में अगर एक बेड डालकर ऑपरेशन के बाद रखा जा सके यह भी तय किया गया था, पर जमीन पर भी एक बिस्तर डालकर मिलने की जगह नहीं मिल पा रही थी।
अब तो गिनती के दिन बचे हैं आप इन्हें घर ले जाएं,
गले में एक नली होल कर के फिट कर दी गई , जिससे सिर्फ लिक्विड जैसे—सूप, जूस, मूंग दाल का पानी आदि ये सब पेट भरने के लिए दिया जाता रहे।
और एक पेट में भी होल कर के एक नली सेट कर दी गई थी, पेट मैं क्यों होल किया गया ये किसी की समझ में नहीं आया ,ना ही किसी के पास इतनी समझ थी कि डॉक्टर से पूछा जा सके के शरीर में दो-दो छेद करके इस प्रकार क्यों नलियां फिट करी हुई है।
घर आते ही ——– तबीयत देखने वालों का तांता लग गया।
देर रात तक यहीं क्रम चलता, पापा की उदारता ने सबको उनका चहेता बनाया था।
बस इसी कारण रात दिन देखने वालों की भीड़ लगी रहती।
समय-समय पर गले की नली से कभी सूप ,जूस ,पानी सभी प्रकार के लिक्विड दिए जाते थे।
पर—-+-
गले की नली से जैसे डाला जाता, पेट की नली से सब बाहर आ जाता था।
और इस प्रकार नित्यक्रम से लिक्विड खिलाने की प्रक्रिया के तहत पेट की चमड़ी में जहां से सब पिलाया हुआ बाहर आता था ,वो पूरी जगह धीरे-धीरे ज़ख्म का रूप लेने लगी।
बुरी तरह से छिल गया था, पेट उस जगह से जहां से सब कुछ बाहर निकलता था।
ज़ख्म रिसने लगे थे, लहू बहने लगा था।
हर थोड़ी देर में डेटाॅल और कपड़े से उस जगह को आहिस्ता आहिस्ता साफ करना और फिर उन कपड़ों को तुरंत गरम गरम डेटॉल के पानी में धोना।
उफ़ बयान के बाहर था ,सब कुछ और पापा—–
इस असहनीय दर्द को सह कर भी ख़ामोश थे।
आवाज तो चली गई थी ,बोलना बंद हो गया था,कुछ कहना होता तो स्लेट में लड़खड़ाते हाथों से लिखते।
आज रात तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई—–
ऐसा प्रतीत होने लगा कि बस अब अगले पल कुछ ऐसा होने वाला है ,जिसका कि यहां सभी लोगों को पता है , कि बस अब मौत आ घेरेगी और अंधकार छा जाएगा।
कुटुंब की बड़ी -बूढी पापा की काकी ने अचानक सब को आदेश दिया कि—
जल्दी से जमीन पर लिटा दो, गंगाजल दो, ब्रजभूमि का चरणामृत मुंह में दो—-
हम सब कृष्ण के उपासक हैं इसलिए ब्रजभूमि से लाया गया चरणामृत ही सुबह लेकर दिन की शुरुआत करते है।
उनके आदेशों का पालन किया गया–++
पापा को जमीन पर लिटा दिया गया—-
मां जिसको की कुछ देर पहले सब के समझाने पर सोने को कहां गया था अभी नींद लगी ही थी कि—-
अचानक घबरा कर दूसरे कमरे से बाहर आकर चिल्लाने लगी—
ये सब क्या कर रहे हो तुम लोग—?
नहीं – नहीं इनको कुछ नहीं हो सकता उठाओ इनको—- अरे इनको तो हमेशा बहुत ठंड लगती है क्यों जमीन पर सुला कर रखा है।
काकी ने मां को डांट कर समझाने का प्रयास किया—-कि अब इनके पास ज्यादा वक्त नहीं है ,अच्छा होगा जो ये अपनी देह धरती पर त्यागे, इसलिए जमीन पर ही रहने दो और काकी पापा के पास जोर-जोर से भगवान का नाम लेने लगी—- पापा को भी कहती रही बोलो बेटा बोलो श्री कृष्ण शरणम् मम् , श्री कृष्ण शरणम् मम् – ——- राम – राम, राम राम
साथ ही सब को भी भगवान का स्मरण करने को कहती रही।
यह क्रम निरंतर लगातार चार रातों तक चलता रहा।
रोज रात होते पापा की तबीयत बहुत बिगड़ जाती ,रोज रात उन्हें जमीन पर सुलाया जाता।
मुंह में गंगाजल ,चरणामृत और ढेर सारी तुलसी जो पहले से ही तोड़ कर रखी थी वह भी मुंह में दी जाती।
किसी पंडित के कहने पर कि यह अमावस्या के 3 दिन निकल जाए तो अच्छा है।
बस घर के मंदिर में एक अखंड ज्योत जला दो—-
इस आज्ञा का भी पालन किया गया—-
अमावस्या भी बीत गई पर शायद अभी और ज्यादा पापा की सांसे लिखी थी जीने की, साथ ही और ज्यादा दर्द, तकलीफ़ सहना लिखा था।
आज सुबह से पापा के चेहरे पर बहुत नूर नजर आ रहा था।
देखने वालों का तांता अब भी लगा हुआ था।
शहर के बाहर रहने वाले सभी करीबी रिश्तेदार भी आ चुके थे।
अखंड ज्योत को अभी जलाए रखा हुआ था ,तेल डाल – डाल कर उसकी जिंदगी बढ़ाई जा रही थी।
हमने कई बार जा जाकर उसकी मध्यम होती लौ को बढ़ाकर जीवनदान दिया था।
क्योंकि मन में एक भ्रम था कि दीपक जलते रहने से पापा की जिंदगी भी बनी रहेगी।
शाम का धुंधलका घिरने लगा था—-
पापा के सबसे प्यारे दोस्त पापा का हाथ पकड़ कर बैठे बातें कर रहे थे—-
पापा उनकी कहीं वो बातें जो बहुत पुरानी हो चुकी थी यारी, दोस्ती बड़े मस्ती भरे बिताए दिनों को सुनकर बात-बात पर मुस्कुरा देते थे।
और फिर लड़खड़ाते हाथों से स्लेट पर कुछ अपने मन की बातें भी लिख रहे थे—–
मां पास बैठी पापा का माथा सहला रही थी— पूरा परिवार सब पापा को घेरे हुए था।
पापा को देख ऐसा लग रहा था कि पापा तो अब ठीक हो गए हैं।
2 महीने की मझंलें बेटे की बेटी को देखने के लिए पापा ने अपनी इच्छा इशारे से ज़ाहिर की —
इतने दिनों से इसलिए इस बच्ची को और बाकी बडे बेटे के दो बच्चों को भी अपने पास नहीं आने दिया था, क्योंकि पेट का ज़ख्म बहुत फैल गया था ,और खुला होने के कारण डर था पापा को, कि कहीं बच्चों को इन्फेक्शन ना हो जाए और हर किसी को अपने से पापा दूर रखते थे कि किसी को कुछ ना हो जाए।
पेट की सफाई का काम सबसे ज्यादा बड़े बेटे की पत्नी बहुत सेवाभाव, लगन और प्यार से करती थी।
जब पापा को इस बीमारी ने नहीं डसा था तब सारा दिन दोनों बेटों के बच्चों संग खेलकर पूरा घर परिवार सर पर उठा लेते थे।
और अब अपनी आंखों के तारों को अपने मन पर पत्थर रख कर दूर करवाया था ।
आज बच्चों को पास बुलाकर प्यार से सर पर हाथ फेरा मानो आशीर्वाद दे रहे हो। और अलविदा कह रहे हो।
एक इंसान के लिए कितनी कठिन परिस्थिति होती है ,जब उसे मालूम होता है कि अगला पल उसकी मौत का संदेशा लेकर आ जाएगा ,और इस ज़िंदगी इस दुनियां को उसे अलविदा कहना पड़ेगा ,मन में दर्द का सैलाब जोर मारता रहता है, इंसान तो मौत के पहले ही अपनी मौत के समाचार सुनकर ही मर जाता है।
इसी प्रकार पापा भी अपनी बची हुई, ज़िंदगी का एक- एक लम्हा मौत का सामना करते हुए, चेहरे पर हंसी दिल में दर्द लिए जी रहे थे।
आवाज़ बंद होने की वजह से अपने जज़्बातों को किसी से बयान भी नहीं कर पा रहे थे।
एक चलचित्र की तरह उन्हें अपनी आज तक की बिताई हुई ज़िंदगी के सुख दुख भरे पल याद आते रहते ,और इन लम्हों को पापा जब-जब याद करते उनके चेहरे की मुख मुद्रा उनकी भाव भंगिमा साफ स्पष्ट नजर आती कि वे कुछ सोच रहे हैं ,कभी आंखों में आंसू आते तो कभी खुशी उनके चेहरे से झलक उठती थी।
हमने सबसे ज्यादा अपनी पत्नी यानी हमारी मम्मी की चिंता थी क्योंकि मम्मी को बिल्कुल भी पापा के बिना रहने की आदत नहीं थी बहुत ज्यादा दोनों में प्रेम था और यहां तक कि अक्सर पापा यही कहते थे कि जानती हो——-
तुम्हारा और मेरा साथ पिछले 3 जन्मों से है और आने वाले हर जन्म हम साथ ही रहने वाले हैं पापा आप बहुत ज्यादा अध्यात्म से जुड़े थे ईश्वर भक्ति में लीन थे और कभी-कभी लगता था पापा में कुछ अजीब प्रकार की शक्तियां है जो भविष्य बताती है पापा की हर बात सत्य निकलती थी।
कभी किसी पंडित ने पापा मम्मी की कुंडली देखकर कहा था कि आप दोनों का साथ तो जन्मो जन्म का है और जितने जन्म ओके आप दोनों साथ रहेंगे।
पति पत्नी में ऐसा प्यार शायद ही कहीं देखने को मिलता हो जितना हमारे पापा मम्मी में था।
हमने अपनी ज़िंदगी में कभी भी पापा मम्मी को झगड़ते नहीं देखा तू तू मैं मैं करते नहीं देखा।
शाम ने हल्की हल्की कालिमा का आवरण ओढ़ना शुरू किया, पंछी कलरव करते अपने नीड की ओर उड़ चले थे।
रोज के बोंझल वातावरण से आज के वातावरण में थोड़ी आद्रता और खुशबू सी थी।
वहां उपस्थित हर एक व्यक्ति आज पापा से अपने मन के उदगार व्यक्त कर रहा था—–
घड़ी की सुईयां टिक- टिक करती अपने गंतव्य पर चढ़ाई चढ़कर अपनी मंजिल तय करने की होड़ में लगी थी।
पर अचानक—-
इस पल को वक्त अब घर में थम सा गया——
मां की चीख से सारा वातावरण कृंदित हो गया—- आज पहली बार मैंने शरीर से प्राण कैसे निकलते है——देखा
उफ़—-
कितनी शांति थी पूरे शरीर में और मुख मंडल मै ,आंखें कितनी ख़ुश नजर आ रही थी , कितनी कोमलता से पापा के प्राण धीरे-धीरे उनकी देह
का साथ छोड़ते हुए खुली आंखों से बाहर निकल गये—–
देह के इस पिंजरे से फड़फड़ाते ज़ख्मी पंछी को आज आजादी मिल गई थी।
मुस्कुराता मुख मंडल, अब भी मुस्कुरा रहा था।
अब देखो ना किसी को समझ ही नहीं आया कि कुछ देर में पापा की ज़िंदगी हम सबका साथ छोड़ देगी।
वो सब बड़े बुजुर्ग अब तक जिन्होंने ना जाने कितनी बार पापा की जीवित देह जमीउन पर रखी थी ,पर अभी उनको भी धोखा हो गया।
उनको भी पता नहीं चल पाया कि कुछ ही पल में पापा की देह शरीर त्यागने वाली है , घर में कोहराम मच गया —— हौसला तोड़ता परिवार के सदस्यों का क्रंदन ———- सब कुछ असहनिय तो था पर निर्धारित था ।
आनन-फानन बर्फ की पेटी आ गई,
तो मां चीख कर बोली——
क्योंकि रात को शवयात्रा, और दाह संस्कार करना शायद शास्त्रों में वर्जित है ,इसलिए सुबह ही दाह संस्कार करना निश्चित हुआ था।
नहीं—-नहीं इनको हमेशा बहुत ही ठंड लगती है ,इनको बर्फ पर मैं नहीं रखने दूंगी——मत रखो इनको ज़मीन पर इन्हें जरा सी भी ठंड में तुरंत ही सर्दी हो जाती है। मैं हमेशा इनका बहुत इन सब बातों का ख्याल रखती हूं—-
मां की बातें सब को और ज्यादा दर्द के गर्त में ले जा रही थी, परेशान कर रही थी,
चीखते रोते मां बेहोश हो गई किसी ने डॉक्टर बुलाने को कहा।
पूरी रात पापा बर्फ की शैया पर थे।
आज उनको शूल शैया से ,अपनी बहुत ही दर्द देती कैंसर की तकलीफ़, परिवार को अपने दुख से दुखी होते देख , और अपने आपको स्वयं को पल-पल मरते देखती ज़िंदगी से मुक्ति मिल गई——–
पूरे 20 दिन तक यह नियति का चक्र पापा की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमता रहा।
20 दिन के इस चक्र ने ना जाने सब के कितने अरमानों को ,कितने सपनों को ,और सबसे ज्यादा पापा को जीने की तमन्ना के तहत् पल – पल ख़त्म होती ज़िंदगी के पल ख़त्म किए।
शूल शैया से मुक्ति मिल गई थी,।
भीष्म पितामह की भांति कृष्ण ने मानो आज पापा का उद्धार किया।
अनगिनत सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच, पापा की शव यात्रा चल रही थी बड़े भाई के हाथ में आग की हंडी थी,
राम नाम सत्य है राम नाम सत्य है के जयकारे के साथ आंगन से पापा को अपनी आखरी मंजिल श्मशान की ओर जैसे ही ले जाया जाने लगा,
मां पापा से लिपट कर फूट-फूटकर रुदन करने लगी—–
मैं नहीं जाने दूंगी आपको, मैं नहीं रह पाऊंगी आपके बिना, मैं भी चलूंगी आपके साथ और भी ना जाने क्या-क्या मां कहती रही, कहती रही ,मां को संभालना उनके बच्चों ,परिवार और रिश्तेदारों को और उनकी अपनी बेटी दिव्या के लिए भी बहुत मुश्किल हो गया दिव्या जो की मां, पापा की सबसे लाड़ली, सबसे प्यारी बेटी थी , दोनों की जान एक दूसरे में बसती थी , मुंह मांगी फरमाइश हमेशा पापा पूरी करते थे दिव्या को मांगने से पहले सब कुछ मिल जाता था।
लेकिन आज दिव्या निःशब्द है, कलेजा हलक में आ गया है, रो रो कर बुरा हाल है, रात भर पापा के सिरहाने बैठकर मन ही मन उनसे बातें कर रही थी ,उनके माथे को सहला रही थी, उसकी इस प्रकार की परिस्थिति को देखकर सभी लोग बार बार पापा से उसे दूर ले जा रहे थे, पर आज उसने जो खोया है उसके लिए कितना अनमोल था इसकी कीमत सिर्फ और सिर्फ़ दिव्या स्वयं जानती थी, अपने मन की हर बात सिर्फ़ और सिर्फू पापा से करती थी चाहे वह खुशी की हो दर्द की हो अपने ससुराल की बातें हो सब कुछ सिर्फ और सिर्फ उसके लिए पापा ही थे पापा ही सुनकर हर समस्या का समाधान करते थे।
आज अपने दोस्त अपने गुरु ,पल पल के साथी, अपनी परछाई को, अपने पापा के रूप में उसने खो दिया।
जैसे तैसे दिव्या ने अपनी मां को अपने कलेजे से लगा के पापा से अलग किया, और फिर चल पड़ी पापा की अंतिम यात्रा अपनी उस मंज़िल की ओर जहां इंसान का असली बसेरा होता है जहां इंसान की ज़िंदगी ज़िंदगी से मिलती है , जहां ना कोई कारवां होता है ना कोई आगे ना कोई पीछे होता है बस सिर्फ होती है तो वह ईश्वर के सानिध्य की शरण और अपनी कभी ना ख़त्म होने वाली एक ठहरी हुई मंज़िल ।
बहुत मार्मिक कहानी है प्रियंका आपकी।
पिता का जाना ही तकलीफदेह होता है। और इस तरह तो और भी तकलीफदेह। कैंसर बहुत तकलीफ देह बीमारी है। ईश्वर दुश्मन को भी उससे बचाए। हमने बिल्कुल पास से उस तकलीफ में अपनों को देखा है। हम महसूस कर सकते हैं।
प्रिया प्रियंका आपकी कहानी शुभ शैय्या पढी, यह कहानी की समरी मैं आपके मुख से आपके साथ सुन चुकी हूं यह कहानी नहीं एक हकीकत है जो आपके साथ वह आपके पिता के साथ गुजारी है, महाभारत के पात्र भीष्म के पात्र के साथ कैंसर का दर्द मानो शूल पर बिछे हुए तीरों पर लेते हुए भीष्म का दर्द,शूल शैय्या से आपने बहुत अच्छी तरह सामंजस्य किया है
ईश्वर का लेखा-जोखा बहुत ही अलग है उसका हम कहीं पार नहीं पा सकते, कई कत्ल किए हुए इंसान के पैर भी मखमली कालीन से नीचे नहीं उतरते और कहीं इस जन्म में चींटी को भी बचाकर चलने वाला इंसान शूल सैया पर सोता नजर आता है यह कर्मों का लेख जन्म दर जन्म चलता है अगर किसी जन्म का पाप बच जाए तो वह भी अगले जन्म में भुगतना पड़ता है ।
हम तो सिर्फ जी जन्म में जन्म लिया है उसी का लेखा-जोखा जान पाते हैं प्रिय प्रियंका बहुत ही मार्मिक हृदय स्पर्शी दारुण दुख महसूस कराने वाली कहानी।
प्रियंका जी बेहद मार्मिक कहानी।मेरे पिता और पति दोनों ही ऐसी ही स्थिति में इस संसार से विदा हुए थे । कहानी पढ़कर ज़ख़्म ताज़ा हो गए।