Wednesday, February 11, 2026
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हरि हारिल की कहानी – यों सारा हुआ तुम्हारा…

शीर्षक श्रेय:- शेक्सपियर (द मर्चेन्ट ऑफ वेनिस, अंक-तीन, दृश्य-दो)
देहरादून की उस ढलान वाली बस्ती में सूरज की रोशनी सीधे नहीं आती थी…वह नन्हीं और फैलावदार पहाड़ों की चोटियों से फिसलकर, पेड़ों की टहनियों से छनती हुई वहाँ पहुँचती थी। एक पुराना गैरेज, जिसे माधव ने कुछ बरस पहले सस्ते दाम में खरीदा था, जिसे उसने अब अपनी ज़रूरत के हिसाब से ढाल लिया था…अब यही वह स्थान था जहाँ उसका मन और उसकी कला विश्राम पाते थे। कुछ समय से माधव को अपनी माली हालत सही नहीं समझ आ रही थी…खर्च तंगी में चल रहा था इसीलिए उसने गैरेज के आधे हिस्से को किराए पर करने का फैसला किया, उसे अच्छे व्यक्ति की तलाश थी जो साथ तो रहे पर उसके एकांत में दखल न करे। माधव को उसका एकांत प्रिय था…अगर सब सही रहता तो गैरेज के आधे हिस्से को किराए पर करने का फैसला वह नहीं करता…मजबूरी जो न करवाए। कमरे की दीवारों पर सीलन के निशान किसी पुराने नक्शे की तरह उभरे हुए थे और छत की कड़ियों से मकड़ी के जाले लटके थे, जिन्हें माधव कभी साफ़ नहीं करता था। कोई भी मनुष्य पहली नजर में इस गैरेज को गंदे कमरे की उपाधि से नवाज सकता था। इन लटकते जालों के पीछे माधव का अपना दर्शन काम करता था, उसका मानना था कि जाले वक्त की पकड़ को बनाए रखते हैं। पर लोग तो इसे माधव का आलस्य ही कहते थे।
कमरे के बीचों-बीच रखे ‘चाक’ के ऊपर अभी भी ताज़ा मिट्टी का एक लोंदा रखा था, जिस पर माधव की उंगलियों के निशान छपे थे…काफी गहरे निशान। हवा में भारीपन था—मिट्टी की सोंधी खुशबू, जो पानी के साथ मिलकर एक नशा पैदा करती थी।
माधव मिट्टी के छींटों से मैले हो चुके सूती के अंगोछे को अपने कंधे पर डाले लकड़ी के छोटे से स्टूल पर बैठ था। वह चाक पर रखे मिट्टी के लोंदे को निहार रहा था—जिसका अभी कोई चेहरा नहीं था।
तभी बाहर गली…जो कि पथरीली थी, में एक गाड़ी रुकी। पत्थरों के ऊपर टायरों के रगड़ने की आवाज़ आई और फिर सन्नाटा। माधव ने मिट्टी से सनी अपनी उंगलियाँ पोंछी नहीं, बस उन्हें आपस में रगड़ा जिससे थोड़ी बहुत सूखी मिट्टी झड़कर फर्श पर गिर गई।
दरवाजे पर एक दस्तक हुई “क्या मैं भीतर आ सकता हूँ?”
“खुला है,” माधव ने अपनी आवाज़ को साधते हुए कहा। उसकी आवाज़ में रूखापन था, पर कड़वाहट नहीं।
वैदेही ने भीतर कदम रखा। उसके हाथ में एक छोटा बैग था। उसने देखा कि फर्श पर हर तरफ मिट्टी के छोटे-छोटे ढेर लगे हैं। वह रुक गई, मानो डर रही हो कि कहीं उसके सैंडल किसी कलाकृति को कुचल न दें।
“माधव जी? मैं वैदेही,” उसने अपना परिचय दिया। उसकी आवाज़ में एक हल्की थकावट थी, जो शायद लंबी यात्रा की वजह से थी।
माधव खड़ा हुआ। वह कद में लंबा था…झुककर काम करने की वजह से उसके कंधों में एक स्थायी ढलान आ गई थी। उसने वैदेही को देखा। वह शहर की उन लड़कियों जैसी नहीं लग रही थी जो यहाँ सिर्फ सैर-सपाटे के लिए आती थीं। उसकी आँखों में ठहराव था, जैसे ठहरे हुए पानी के नीचे बहुत सारी हलचल दबी हो।
वैदेही ने अपनी बात जारी रखी “मैं अभी हाल ही में यहीं पास के स्कूल में शिक्षिका नियुक्त हुई हूँ…रहने की अच्छी जगह की तलाश में हूँ, पर अभी कोई उचित जगह न मिल सकी…फिर किसी ने आपके घर का पता बताया…।” 
“आइए,” माधव ने कमरे के दूसरे हिस्से की ओर इशारा करते हुए कहा। “सामान यहाँ रख दीजिए।”
उसने फर्श पर एक लकीर खींच रखी थी…काल्पनिक लकीर। यह लकीर पुरानी थी, पर आज उसने उसे फिर से गहरा कर दिया था।
“ये कमरा है” माधव ने सधे लहजे में बात शुरू की। “खिड़की की तरफ वाला हिस्सा आपका। वहाँ धूप अच्छी आती है और बाहर लीची के पेड़ भी दिखते हैं। और ये जो मेज है, इसकी दायीं दराज खाली है। उसे भी आप इस्तमाल में ले सकती हैं। बाकी सब जैसा है, वैसा ही रहेगा…अब ‘मेरा आधा हुआ तुम्हारा…’।” माधव ने अभिवादन में एक हल्की मुस्कान भरी।
वैदेही उस खिड़की के पास गई। उसने खिड़की के पुराने पल्ले को धक्का दिया, तो वह चरमराकर खुल गया। बाहर की ठंडी हवा और पहाड़ी फूलों की मिली-जुली महक अंदर आई। उसने मुड़कर उस खिड़की से उस ‘आधे’ हिस्से को देखा जो अब उसका था।
“और आपका हिस्सा?” वैदेही ने पूछा।
माधव ने लकीर की तरफ इशारा किया। “मेरा आधा शेष मेरे पास है। ये चाक, ये मिट्टी और ये कोना। मैं यहीं सोता हूँ और यहीं काम करता हूँ। रसोई साझा है, जब मर्जी आए इस्तेमाल कर लीजिएगा, बस मेरे बर्तनों को अपनी जगह पर रहने दीजिएगा।”
वैदेही ने अपना बैग एक तरफ रखा और उस काल्पनिक लकीर को गौर से देखा। “मेरा आधा हुआ तुम्हारा… बस इतना ही? क्या आधा देने से घर बँट जाता है?”
माधव ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसे देखा, जो उसकी दाढ़ी के पीछे लगभग छिप गई थी। “घर नहीं बँटता वैदेही जी, बस जिम्मेदारियाँ बँटती हैं। प्रेम और नफरत दोनों में इंसान को अपना हिस्सा बचाकर रखना चाहिए। मैं बस वही कर रहा हूँ।”
वैदेही ने कुछ नहीं कहा। उसने अपने बैग से एक किताब निकाली और उस मेज पर रख दी जिसे माधव ने ‘आधा’ कहा था। वैदेही ने किताब मेज पर रखी ही थी कि माधव को लगा जैसे उसकी एकांत की शांति में किसी ने पत्थर फेंक दिया हो।
“चाय पीती हैं?” माधव ने अचानक पूछा, शायद सन्नाटे को काटने के लिए।
“हाँ, पर बिना चीनी के,” वैदेही ने जवाब दिया।
माधव रसोई की ओर मुड़ गया। उसने केतली में पानी चढ़ाया। चूल्हे की नीली लौ और बर्तन की खड़खड़ाहट कमरे में एक नई जान फूँक रही थी। उसे लगा कि अब तक वह जो ‘मेरा-मेरा’ कहता था, उसकी दीवारों में आज से एक खिड़की खुल गई है। यह आधा-आधा, मेरा-मेरा, आधा शेष तुम्हारा, आधा मेरा- यह सब माधव की शनक का हिस्सा था, पर जो भी था माधव का अपना था । 
बाहर बारिश की पहली कुछ बूंदें गैरेज के बाहर की टिन की छत पर गिरीं—’टप-टप-टप’।
माधव ने चाय के दो प्याले भरे। एक उसने वैदेही की ओर बढ़ाया, लेकिन ध्यान रखा कि उसका हाथ उस लकीर को पार न करे। उसने प्याला मेज की उस सीमा पर रख दिया जहाँ से वैदेही का ‘आधा’ शुरू होता था।
वैदेही ने प्याला उठाया और गरम चाय की भाप को महसूस किया। “धन्यवाद! पर माधव जी, अगर ये चाय गिरकर आपकी लकीर के उस पार चली गई, तो क्या वो भी आपकी हो जाएगी?”
माधव ने उसे देखा। वैदेही की आँखों में एक हल्की सी शरारत थी। वैदेही अभी कुछ समय पहले ही आई थी…लेकिन वह बहुत जल्दी माधव से घुलने लगी थी।
माधव ने अपनी चाय का प्याला कसकर पकड़ा हुआ था। उसे लग रहा था जैसे वैदेही के उस एक सवाल—”अगर ये चाय गिरकर आपकी लकीर के उस पार चली गई, तो क्या वो भी आपकी हो जाएगी?”— ने उसके बरसों पुराने सन्नाटे में एक सुराख कर दिया हो। वह चुप रहा, क्योंकि उसे जवाब देने की जल्दी नहीं थी। मूर्तिकारों का धैर्य अलग होता है; वे जानते हैं कि मिट्टी को जल्दबाजी में आकार दो तो वह चटक जाती है। माधव बिना जवाब दिए शांत रहा। कमरे में चुप्पी छायी रही।
उसने कमरे के कोने में रखी एक अधबनी मूर्ति की ओर देखा। वह एक स्त्री का हाथ था, जो किसी अदृश्य चीज़ को थामने की कोशिश कर रहा था। माधव को लगा कि आज उस मूर्ति में कुछ बदल गया है। शायद रोशनी का खेल था या फिर कमरे में किसी दूसरे इंसान की मौजूदगी का दबाव। 
कमरे में पसरी चुप्पी को तोड़ते हुए- “यहाँ सीलन बहुत है,” वैदेही ने प्याला मेज पर रखते हुए कहा। उसने अपनी उंगलियों से दीवार की पपड़ी को छुआ। “क्या आपको डर नहीं लगता कि आपकी ये मूर्तियाँ नमी से खराब हो जाएंगी?”
माधव ने सिर हिलाया। “ये मिट्टी की हैं वैदेही जी। मिट्टी नमी से नहीं डरती, वह तो उसमें सांस लेती है। जब तक कच्ची है, तब तक उसे नमी चाहिए। जब पक जाएगी, तब वह पत्थर जैसी कठोर हो जाएगी। तब उसे किसी की ज़रूरत नहीं होगी।”
वह उठा और चक पर रखे पुराने लोंदे…जिसे कुछ समय पहले आकार देने वाला था…वह सूखता जा रहा था…माधव ने उसमें पानी का छींटा मारा…गीली मिट्टी की एक तेज़ महक कमरे में फैल गई। यह महक इतनी सघन थी कि वैदेही को लगा जैसे वह किसी जंगल के बीचों-बीच खड़ी हो जहाँ अभी-अभी मूसलाधार बारिश थमी हो।
चाक की घरघराहट शुरू हुई। वह आवाज़ कमरे की लय बन गई। वैदेही चुपचाप उसे देखने लगी। माधव की उंगलियाँ उस लोंदे के बीच में एक छेद करती हैं, फिर उसे धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाती हैं। एक पतली सी दीवार खड़ी होने लगती है—एक सुराही का आकार।
“आप बहुत कम बोलते हैं,” वैदेही ने अपनी जगह से बिना हिले कहा। “क्या मिट्टी के साथ रहने से शब्द खत्म हो जाते हैं?”
माधव ने चाक की गति धीमी की। उसके हाथ मिट्टी में सने थे “शब्दों में मिलावट हो सकती है, मिट्टी में नहीं। जो आप सोचते हैं, वही आपकी उंगलियों से मिट्टी में उतर जाता है। अगर मैं गुस्से में हूँ, तो यह सुराही टेढ़ी बनेगी। अगर मैं शांत हूँ, तो इसका घेरा एकदम सही होगा।”
उसने अपनी आँखें वैदेही पर टिकाईं। “आप यहाँ रहने आई हैं, तो आपको भी इस खामोशी की आदत डालनी होगी। यहाँ दीवारें नहीं बोलतीं, यहाँ सिर्फ काम बोलता है।”
वैदेही उठी और कमरे के उस ‘आधे’ हिस्से की खिड़की पर जाकर खड़ी हो गई। बाहर अब अंधेरा पूरी तरह उतर आया था। दूर पहाड़ों पर जलती लाइटें ऐसी लग रही थीं जैसे किसी ने काली चादर पर जुगनू टाँक दिए हों।
उसने धीरे से कहा, “खामोशी से डर नहीं लगता माधव जी, अकेलेपन से लगता है। और इस कमरे में हम दोनों अकेले ही हैं।”
माधव का हाथ एक पल के लिए काँपा। सुराही की गर्दन पर एक हल्का सा उभार आ गया। उसने उसे ठीक करने की कोशिश की, पर वह निशान रह गया। उसने मन ही मन स्वीकार किया कि वैदेही का यहाँ होना वह उसके एकाग्र मन पर प्रहार था।
“आपका सामान…” माधव ने बात बदली। “अगर आपको कुछ और चाहिए हो—कंबल या कुछ और—तो बता दीजिएगा। वह सब मेरे ‘आधे’ में रखा है, पर मैं आपको दे सकता हूँ।”
वैदेही मुस्कुराई। इस बार उसकी मुस्कान में एक अजीब सी चमक थी। “नहीं, अभी के लिए ये आधा ही काफी है। मेरा आधा हुआ तुम्हारा… आपने कहा था न? अभी तो मैंने सिर्फ अपनी किताबें यहाँ रखी हैं। जब मेरी यादें, मेरा दुख और मेरी उम्मीदें इस आधे हिस्से में फैलेंगी, तब आप देखिएगा कि ये लकीर कितनी छोटी पड़ जाएगी।”
माधव ने चाक बंद कर दिया। उसने गीली सुराही को एक धागे से काटकर अलग किया और उसे सूखने के लिए पटरे पर रख दिया।
“रात हो गई है,” माधव ने कहा। “मैं बरामदे में सोऊंगा। आप अंदर का हिस्सा इस्तेमाल कीजिए। लकीर अपनी जगह रहेगी।”
वैदेही ने उसे जाते हुए देखा। माधव की चाल में एक भारीपन था, जैसे वह अपने साथ उस सारी मिट्टी का बोझ ढो रहा हो जिसे उसने आज तक आकार नहीं दिया था।
जब वह बाहर चला गया, वैदेही ने उस लकीर को अपने पैर के अंगूठे से छुआ। वह सिर्फ एक रेखा थी, पर माधव के लिए वह उसकी सुरक्षा कवच थी। उसने खिड़की बंद की और उसकी कुंडी की चरमराहट ने सन्नाटे को फिर से ज़िंदा कर दिया।
उधर बरामदे में, माधव तारों को देख रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसने वैदेही को सिर्फ आधा कमरा नहीं दिया है, उसने उसे वह हिस्सा दे दिया है जिसे उसने बरसों से किसी को छूने नहीं दिया था—उसका एकांत।
***
देहरादून की सुबह किसी कच्ची नींद से जागने जैसी होती है। कोहरा जब चीड़ के पेड़ों की टहनियों से लिपटकर नीचे उतरता है, तो माधव के घर की पुरानी दीवारें और भी ठंडी हो जाती हैं।
माधव सुबह सूरज के जागने के पहले ही जाग जाता था। यह उसकी बरसों की आदत थी। उसके लिए सुबह का वह वक्त सबसे कीमती था, जब दुनिया सो रही होती थी और उसकी मिट्टी जाग रही होती थी। लेकिन आज, जब वह अपनी खाट से उठा और कमरे की ओर बढ़ा, तो उसे ठिठकना पड़ा।
दरवाजे की दरार से छनकर आती रोशनी में उसने देखा कि वैदेही अपने ‘आधे’ हिस्से में रखे तख्त पर सो रही थी। उसके बाल तकिये पर बिखरे हुए थे और एक हाथ बेतरतीब ढंग से उस लकीर के ऊपर पड़ा था, जिसे माधव ने कल ही खींचा था।
माधव वहीं रुक गया। उसने देखा कि वैदेही का हाथ उस लकीर को पार कर चुका था। वह हाथ अब माधव के ‘हिस्से’ में था। माधव को एक अजीब सी बेचैनी हुई। उसे वह हाथ हटा देने का मन हुआ, पर उसने ऐसा नहीं किया। उसे पहली बार अहसास हुआ कि लकीरें खींचना आसान है, पर इंसान की मौजूदगी को उन लकीरों में कैद करना उतना आसान नहीं जितना हम सोंचते हैं।
उसने दबे पाँव अपने आधे हिस्से की ओर कदम बढ़ाए। आज वह एक बड़ी मूर्ति पर काम शुरू करने वाला था—एक ऐसी मूर्ति जिसमें मिट्टी को बहुत ऊँचा उठाना था। इसके लिए बहुत एकाग्रता चाहिए थी।
उसने चाक शुरू किया। चाक की धीमी ‘घूँ-घूँ’ की आवाज़ सन्नाटे में गूँजने लगी। वह मिट्टी को आकार दे ही रहा था कि पीछे से एक आवाज़ आई।
“इतनी जल्दी काम शुरू कर देते हैं आप?”
माधव चौंक गया। उसकी उंगली मिट्टी के एक नाजुक हिस्से पर जोर से दब गई। मूर्ति का ऊपरी हिस्सा टेढ़ा हो गया। उसने मुड़कर देखा, वैदेही अपनी चादर कंधे पर लपेटे खड़ी थी। उसकी आँखें अभी भी नींद से बोझिल थीं, पर उनमें एक सरलता थी।
“मिट्टी का अपना एक वक्त होता है वैदेही जी,” माधव ने थोड़ा झुँझलाकर कहा। “सूरज चढ़ने के बाद यह जल्दी सूखने लगती है। और मेरा काम… मेरा काम व्यवधान पसंद नहीं करता।”
वैदेही ने उस बिगड़े हुए आकार को देखा। “माफ कीजिएगा। मेरी वजह से आपकी मेहनत खराब हो गई।”
वह धीरे से चलकर उस लकीर के पास आई। उसने देखा कि माधव के हिस्से में मिट्टी के छींटे दीवारों तक उड़े हुए थे। “क्या मैं यहाँ की सफाई कर दूँ? आपके हिस्से में धूल बहुत है।”
“नहीं!” माधव की आवाज़ थोड़ी सख्त हो गई। “मेरे हिस्से में जैसी धूल है, उसे वैसी ही रहने दीजिए। मुझे पता है कि कौन सा सामान कहाँ पड़ा है। आप बस अपने हिस्से का ख्याल रखिए।”
वैदेही चुप हो गई। वह वापस मुड़ी और स्ट्रोव पर चाय चढ़ाने लगी। कुछ ही देर में अदरक और इलायची की महक ने मिट्टी की सोंधी महक को चुनौती देनी शुरू कर दिया।
“चाय पी लीजिए,” वैदेही ने प्याला अपनी तरफ की मेज पर रखते हुए कहा।
माधव ने काम नहीं रोका। “बाद में।”
“ठंडी हो जाएगी तो कड़वी लगेगी,” वैदेही ने जोर दिया। “और वैसे भी, आपने कहा था न कि रसोई साझा है। तो ये चाय भी साझा हुई।”
माधव ने हार मानकर चाक रोका। उसने अपने हाथ धोए और प्याला उठाने के लिए लकीर के पास आया। जब उसने प्याला उठाया, तो उसकी उंगलियां वैदेही की उंगलियों से हल्के से छुईं। वह स्पर्श बिजली जैसा नहीं था…गीली मिट्टी के अहसास जैसा था—ठंडा, नर्म और चिपचिपा।
माधव ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। प्याला लेकर वह अपनी खिड़की के पास चला गया।
“कल रात आप बाहर सोए,” वैदेही ने अचानक कहा। “क्या आपको बुरा लगा कि मैंने आपका आधा कमरा ले लिया?”
माधव ने बाहर धुंध को देखते हुए कहा। “वह सिर्फ एक खाली जगह थी। आपने उसे भरा है। इसमें बुरा लगने जैसी कोई बात नहीं है।”
“कहना आसान है,” वैदेही ने खिड़की की ओर देखते हुए कहा। “पर आप जिस तरह से अपनी मिट्टी को पकड़ते हैं, उससे लगता है कि आपको चीजें साझा करना पसंद नहीं है। आप हर चीज़ को मुट्ठी में बंद रखना चाहते हैं।”
माधव ने वैदेही की ओर देखा। उसकी आँखों में गहराई थी, जैसे वह माधव के भीतर के उस डर को पढ़ रही हो जिसे उसने बरसों से मिट्टी के नीचे दबा कर रखा था।
“मैं मूर्तिकार हूँ वैदेही जी, अगर मैं मिट्टी को पकड़ूँगा नहीं, तो वह बिखर जाएगी। मेरी दुनिया इसी ‘पकड़’ पर टिकी है।”
वैदेही मुस्कुराई। “लेकिन कभी-कभी मुट्ठी खोलने से जो बिखरता है, वह और भी खूबसूरत होता है। जैसे ये चाय की खुशबू… ये किसी लकीर को नहीं मानती। ये आपके हिस्से में भी जा रही है और मेरे भी।”
माधव को पहली बार लगा कि वह हार रहा है। वह आदमी जो मिट्टी को अपनी मर्जी से मोड़ सकता था, आज एक साधारण सी लड़की के शब्दों के सामने निरुत्तर था।
उस दिन दोपहर में बारिश और तेज हो गई। पुरानी छत से पानी टपकने लगा। पानी ठीक उसी जगह टपक रहा था जहाँ माधव की अधबनी मूर्तियाँ रखी थीं।
“हटाओ इन्हें!” वैदेही चिल्लाई।
माधव घबराकर उठा, पर मूर्तियाँ भारी थीं। वैदेही ने बिना सोचे लकीर पार की और माधव के साथ मिलकर उन भारी मूर्तियों को उठाना शुरू किया। दोनों के हाथ मिट्टी में सन गए। दोनों के कपड़े कीचड़ से भर गए। उस वक्त कोई लकीर नहीं थी, कोई ‘आधा’ नहीं था। सिर्फ दो इंसान थे जो कुछ बचाने की कोशिश कर रहे थे।
जब सारी मूर्तियाँ सुरक्षित जगह पर पहुँच गईं, दोनों हाफ रहे थे। माधव ने देखा कि वैदेही के सफेद कुर्ते पर मिट्टी के बड़े-बड़े धब्बे थे।
“आपका कुर्ता खराब हो गया,” माधव ने धीमे से कहा।
वैदेही ने अपने कुर्ते को देखा और फिर माधव के चेहरे को। “मिट्टी ही तो है। धुल जाएगी। पर देखिए, आपकी मूर्तियाँ बच गईं।”
माधव ने उस जगह को देखा जहाँ से मूर्तियाँ हटाई गई थीं। वहां फर्श गीला था और वह लकीर लगभग मिट चुकी थी। उसने वैदेही को देखा, जो अपने भीगे बालों को पीछे हटा रही थी।
***
बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में वह नमी बाकी थी जो हड्डियों तक पहुँच रही थी। कमरे के फर्श पर वह लकीर अब धुंधली पड़ चुकी थी, जैसे किसी पुराने वादे का निशान। माधव ने उसे फिर से खींचने की कोशिश की परन्तु इस बार लकीर उतनी गहरी नहीं थी जितनी वह चाहता था। 
उस दोपहर माधव ने एक पुरानी संदूक खोली। उसमें से उसने कुछ औजार निकाले—हड्डियों और लकड़ी के बने बारीक छेनी-नुमा औजार, जो बारीकियों को उकेरने के काम आते थे। वैदेही अपने हिस्से में बैठी एक पुरानी डायरी में कुछ लिख रही थी।
वैदेही ने बिना सिर उठाए कहा, “ये जो मूर्तियाँ आप बनाते हैं, इनके चेहरे क्यों नहीं होते?”
माधव का हाथ रुक गया। उसने उस धड़ को देखा जिस पर वह सुबह से काम कर रहा था। “चेहरा एक सीमा है, वैदेही जी। चेहरा दे देने से मूर्ति एक व्यक्ति बन जाती है। बिना चेहरे के, वह एक अहसास है। अहसास को हर कोई अपना चेहरा दे सकता है।”
वैदेही उठी और धीरे-धीरे चलकर माधव के पास आई। इस बार उसने लकीर के पास रुकने की औपचारिकता नहीं निभाई। वह माधव के इतने करीब खड़ी थी कि माधव को उसके कपड़ों से आती बारिश और पुरानी किताबों की महक महसूस हो रही थी।
“यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है…मुझे लगता है अहसास को चेहरा देना मुश्किल होता है” वैदेही ने मूर्ति के उस ठंडे कंधे को छूते हुए गंभीर होकर “मैंने कोशिश की थी। मैंने अपने दुखों को चेहरा देने की कोशिश की, ताकि मैं उनसे नफरत कर सकूँ। पर वे हमेशा बेचेहरा ही रहे।”
माधव ने पहली बार वैदेही की आँखों में सीधे झाँका। वहाँ सिर्फ उदासी नहीं थी,… एक अनुभव था—जैसे कोई पुरानी जलती हुई लकड़ी, जो अब बुझ चुकी है पर जिसमें अभी भी तपिश बाकी है।
“आप यहाँ क्यों आईं? इस छोटे से घर में, एक सनकी मूर्तिकार के साथ अपना ‘आधा’ बाँटने?” माधव का स्वर सहज था।
वैदेही खिड़की की ओर मुड़ गई। “क्योंकि शहर में सभी ‘पूरा’ दिखने की खोखली कोशिश में लगे हैं, पूरी उम्मीदें, पूरा शोर, पूरे लोग। असल में वहाँ सब खोखले हैं…आधे भी नहीं पूरे खोखले। वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे मैं अपना कह सकूँ। मुझे एक ऐसी जगह चाहिए थी जहाँ मैं खुद को फिर से मिट्टी की तरह कच्चा महसूस कर सकूँ। जहाँ कोई मुझे तराशने की कोशिश न करे…इत्तफाक मेरी नियुक्ति भी यहाँ हो गई।” 
माधव ने मिट्टी का एक छोटा सा टुकड़ा अपनी उंगलियों में मसला। “यहाँ कोई किसी को नहीं तराशता। यहाँ हम सिर्फ वक्त काटते हैं। पर याद रखिएगा, कच्ची मिट्टी बहुत जल्दी दूसरों के निशानों को अपना बना लेती है।”
शाम ढलते-ढलते माधव ने वैदेही के हिस्से वाली मेज के पास एक छोटा सा मिट्टी का दिया बनाकर रख दिया।
“रात को रोशनी कम रहती है उधर,” उसने बिना देखे कहा।
वैदेही ने उस दिए को देखा। वह अभी भी गीला था। “मेरा आधा शेष तुम्हारा…क्या ये दिया उस शेष का हिस्सा है?”
“…” माधव चुप रहा। उसने अपनी पीठ फेर ली और फिर से अपने चाक पर झुक गया।
“कल मैं स्कूल जा रही हूँ,” वैदेही ने कमरे के दूसरे कोने से कहा। “मेरा पहला दिन है। क्या आप…क्या आप मेरे लिए दुआ करेंगे?”
माधव का चाक रुक गया। कमरे के सन्नाटे में उसकी आवाज़ गूँजी, “मिट्टी सिर्फ साथ निभाती है। आप जाइए, आपका आधा हिस्सा यहाँ आपका इंतज़ार करेगा।”
***
अगले दिन सुबह की पहली किरण अभी चीड़ के पेड़ों की फुंगियों पर ही थी कि वैदेही तैयार हो गई। उसने एक हल्के पीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो सुबह की धुंध में किसी खिले हुए अमलतास जैसी लग रही थी। वह अपनी कुछ किताबें और कुछ जरूरी सामान करीने से झोले में भर रही थी।
“मैं निकल रही हूँ,” वैदेही ने देहरी लांघते हुए कहा।
माधव ने सिर्फ सिर हिलाया। उसने कुछ कहा नहीं, पर उसकी आँखों ने वैदेही के पीछे-पीछे दरवाज़े तक का सफर तय किया। जैसे ही वह गई, कमरे में एक अजीब सी रिक्तता छा गई। वह ‘आधा हिस्सा’ अब एक खाली घाव की तरह उसे घूर रहा था।
माधव अपने चाक पर बैठा। उसने मिट्टी उठाई, पर आज मिट्टी उसके हाथों की बात नहीं मान रही थी। उसे बार-बार खिड़की के बाहर उस रास्ते की ओर देखने की आदत हो रही थी, जहाँ से वैदेही गई थी।
दोपहर तक माधव ने तीन आकृतियाँ बनाईं और तीनों को खुद ही मसल दिया। वह जो भी बनाता, उसमें अनजाने में एक ऐसा मोड़ आ जाता जो वैदेही की गर्दन के झुकाव जैसा था या उसकी साड़ी की सिलवटों जैसा। उसकी कला, जो कभी शुद्ध और निर्लिप्त थी, अब एक ‘दूसरे’ के प्रभाव से दूषित—या शायद समृद्ध—हो रही थी।
उसने झल्लाकर चाक बंद कर दिया और उठकर वैदेही के हिस्से में कदम रखा। यह पहली बार था जब वह बिना किसी काम के, बिना किसी बहाने के उस लकीर के पार गया था।
वहाँ की हवा अलग थी। मेज पर एक खुली हुई किताब। माधव ने किताब देखी—वह कविताओं की थी।
माधव के खुरदरे हाथों ने पन्ने को छुआ। उसे लगा जैसे वह किसी की आत्मा को छू रहा है। अचानक उसे अपनी बनाई हुई मूर्तियों पर शर्म आने लगी। वह तो मिट्टी को रूप दे रहा था, पर वैदेही तो उसके ‘मौन’ को रूप दे रही थी।
शाम को जब वैदेही वापस आई, तो वह थकी हुई थी, पर उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने देखा कि माधव ने आज कुछ भी नया नहीं बनाया है। फर्श पर मिट्टी के लोंदे बिखरे पड़े थे।
“आज काम नहीं किया?” उसने अपना झोला रखते हुए पूछा।
“मिट्टी आज रूठी हुई थी,” माधव ने जवाब दिया। “शायद उसे नमी कम मिली।”
वैदेही उसके पास आई। उसने देखा कि माधव के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। उसने बिना किसी झिझक के रसोई से पानी का लोटा भरा और माधव की ओर बढ़ाया। “लीजिए, हाथ धो लीजिए। आज मैं खाना बनाऊंगी।” शरारत से “आधा काम आपका, आधा मेरा… याद है न?”
माधव ने पानी हाथ में लिया, और शांत भाव से सोचने लगा “आज आधा-आधा नहीं होगा वैदेही जी। आज जो भी बनेगा, वह साझा होगा। मेरा आधा अब तुम्हारे आधे में मिल गया है।” माधव को अहसास हुआ कि जिसे उसने अपना ‘शेष’ समझा था, वह दरअसल एक बोझ था। वैदेही को वह शेष सौंपकर वह हल्का महसूस करना चाहता था। परन्तु अभी वह इतना साहस नहीं जुटा पा रहा था कि सीधे तौर पर वैदेही के सामने अपने भाव व्यक्त कर सके। 
अंधेरा गहराने पर माधव फिर से अपने हिस्से में गया। उसने चाक नहीं चलाया। उसने अपने हाथों से मिट्टी को सहलाया और एक नई मूर्ति की बुनियाद रखी। इस बार उस मूर्ति का चेहरा था। वह चेहरा वैदेही का नहीं था, वह चेहरा उस ‘अहसास’ का था जो वैदेही के आने के बाद माधव के भीतर जागा था।
***
वह रात इतनी खामोश थी कि कमरे में रखे मिट्टी के पात्रों के सूखने की हल्की चटकन भी सुनाई दे रही थी। फर्श से लकीर मिटने लगी थी, साथ ही माधव के मन के किसी कोने में एक अजीब सी खलबली भी स्थान बनाने लगी थी। जब सीमाएँ मिटती हैं, तो सुरक्षा का अहसास भी चला ही जाता है। अब माधव के पास छिपने के लिए अपना कोई ‘आधा’ हिस्सा नहीं बचा था।
“माधव जी, आप इस मूर्ति को पूरा क्यों नहीं कर रहे?” वैदेही ने पूछा।
माधव अपने चाक के सामने स्थिर बैठा था। उसके सामने मिट्टी का एक विशाल पिंड था, जिसे उसने कई दिनों से नहीं छुआ था। “यह अधूरी नहीं है वैदेही जी। यह बस इंतज़ार कर रही है। कभी-कभी मिट्टी को आकार देने से ज्यादा उसे महसूस करना ज़रूरी होता है।”
वैदेही उठी और उसके पास आकर बैठ गई “मुझे लगता है आपको अपनी मूर्तियों को प्रदर्शनियों में लेकर जाना चाहिए…आप अपनी मूर्तियों में बहुत अर्थ भरते हैं…इनके बहुत अच्छे दाम मिल सकते हैं”
माधव ने एक ठंडी साँस ली। “प्रदर्शनी उन लोगों के लिए होती है जो ‘देखना’ चाहते हैं। मेरी मूर्तियाँ तो ‘होने’ के बारे में हैं। उन्हें गैलरी की तेज लाइटों के नीचे रखना वैसा ही होगा जैसे किसी पेड़ को उसकी जड़ से उखाड़ लेना।”
“लेकिन, दुनिया को पता चलना चाहिए कि इस छोटे से कमरे में क्या रचा जा रहा है,” वैदेही ने उसका हाथ थाम लिया। माधव के खुरदरे और मिट्टी से सने हाथों के ऊपर वैदेही की नरम उंगलियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे सूखी ज़मीन पर कोई बेल चढ़ रही हो।
“आप जानती हैं, अगर मैं बाहर गया, तो यह शांति टूट जाएगी। मेरा आधा बिखर जाएगा।”
“मैं फिर से वही बात दोहराती हूँ, कि कभी-कभी बिखर जाना भी बहुत खूबसूरत होता है माधव जी” 
माधव हर घड़ी जाने क्यों पर वैदेही के सामने हारता ही जा रहा था शायद अब उसे वैदेही से हारना अच्छा लगने लगा था।
अगले कुछ हफ्ते पागलपन भरे थे। माधव ने अपनी उस अधूरी मूर्ति पर काम शुरू किया। इस बार वह किसी एक आकृति को नहीं उकेर रहा था। वह दो रूहों के मिलन को मिट्टी में ढाल रहा था—जहाँ एक हाथ दूसरे में विलीन हो रहा था, जहाँ एक चेहरा दूसरे की परछाईं में खो रहा था।
कमरे का परिवेश बदल गया था। अब वहां केवल ‘कार्यशाला’ नहीं थी, वहां एक ‘घर’ की महक थी। रसोई से आती छौंक की खुशबू और मिट्टी की महक आपस में मिल रही थीं। माधव अब काम करते समय गुनगुनाता था—वही धुन जो वैदेही अक्सर स्कूल से लौटते समय गुनगुनाती थी।
माधव के निर्णय, उसकी कला और उसकी साँसें अब वैदेही के साथ गुथी हुई थीं। परन्तु अभी सब कुछ अनकहा ही था।
प्रदर्शनी का दिन आया। देहरादून से दूर, दिल्ली की एक चकाचौंध भरी गैलरी में माधव की मूर्तियाँ रखी गईं। लोग आए, उन्होंने चश्मे चढ़ाकर मूर्तियों की बारीकियों को देखा, उनकी कीमत पूछी। माधव एक कोने में खड़ा यह सब देख रहा था। उसे लग रहा था जैसे लोग उसकी आत्मा का मुआयना नग्नता से कर रहे हों।
तभी एक कला के बड़े पारखी ने माधव से पूछा, “मिस्टर माधव, आपकी इस मुख्य कृति का शीर्षक क्या है? इसमें दो लोग एक-दूसरे में इतने उलझे हुए हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन कहाँ खत्म हो रहा है।”
माधव ने वैदेही की ओर देखा, जो भीड़ के बीच खड़ी उसे गर्व से निहार रही थी।
माधव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “इसका शीर्षक है—’आधा शेष’।”
वह हैरान रह गया। “आधा शेष? पर इसमें तो सब कुछ पूर्ण लग रहा है।”
माधव “साहब, मेरी मूर्ति में दो लोग है, दोनों एक सफर में हैं, दोनों अपना आधा-आधा एक दूसरे को देकर पूर्णता पाना चाहते हैं…आपको ये दोनों पूर्ण जरूर लग सकते हैं, परन्तु अभी इनमें कुछ शेष है…आधा शेष।” माधव की मूर्ति ने गैलरी में उपस्थित सभी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। मूर्ति का अच्छा दाम मिला। 
उस रात, गैलरी की भीड़ और तालियों की गूँज से दूर, माधव और वैदेही होटल की बालकनी में खड़े थे। दिल्ली का आसमान देहरादून जैसा साफ नहीं था, पर उन दोनों के बीच की स्पष्टता अब पहले से कहीं ज्यादा थी।
***
प्रदर्शनी के बाद माधव और वैदेही जब देहरादून के उस पुराने घर में वापस लौटे, तो घर पहले जैसा नहीं लग रहा था। कुछ बदल गया था। दीवारों की सीलन अब उदास नहीं लगती थी, बल्कि वे उन यादों की गवाह लग रही थीं जो इन कुछ महीनों में वहाँ रची गई थीं।
माधव ने घर के भीतर कदम रखते ही फर्श की ओर देखा। धूल की एक पतली परत उस जगह जम गई थी जहाँ कभी ‘लकीर’ हुआ करती थी। उसने झाड़ू उठाई और उसे साफ़ करने लगा, पर इस बार वह कोई नई लकीर खींचने के लिए नहीं, बल्कि ज़मीन को एकसार करने के लिए था।
“माधव जी, आप अब पुरानी मूर्तियों को तराशते क्यों नहीं?” वैदेही ने एक शाम पूछा। 
माधव ने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ पहाड़ अब बर्फ की सफेद चादर ओढ़ने लगे थे। “जब मूर्ति पूरी हो जाती है वैदेही जी, तो उसे बार-बार छूना नहीं चाहिए। मुझे लगता है कि मैंने अपने भीतर की सबसे बड़ी मूर्ति बना ली है।”
“कौन सी?” वैदेही ने जिज्ञासा से पूछा।
माधव ने वैदेही के हाथों को अपने हाथों में लिया। “हमारा यह रिश्ता। मैंने बरसों मिट्टी को रूप दिया, पर तुमने मुझे रूप दे दिया।” यह पहली बार था जब माधव ने बिना किसी औपचारिकता के वैदेही को ‘तुम’ कहा “अब मुझे पत्थर या मिट्टी में कुछ खोजने की ज़रूरत नहीं लगती। मैं जो कभी समझता था कि तुम्हारा ‘आधा’ हिस्सा केवल तुम्हारा था, वह अब मेरे भीतर इतनी गहराई से रच-बस गया है कि मैं खुद को तुम्हारे बिना देख ही नहीं पाता।”
“…” वैदेही ने कोई जवाब नहीं दिया, बस माधव को निहारती रही।
समय बीतता गया। साल दर साल गुज़रते रहे। माधव की दाढ़ी अब पूरी तरह सफेद हो चुकी थी और वैदेही की आँखों के कोनों में झुर्रियों का एक सुंदर जाल बुन गया था। अब वे स्कूल या कार्यशाला की भागदौड़ में नहीं थे।
एक दोपहर, जब धूप घर के आँगन में गुनगुनी होकर फैल रही थी, माधव ने एक पुरानी गीली मिट्टी का लोंदा उठाया। उसके हाथ अब थोड़े काँपते थे, पर चाक की गति अभी भी उतनी ही सधी हुई थी।
वैदेही उसके पास आकर बैठ गई। उसने देखा कि माधव ने मिट्टी से दो छोटे-छोटे गोले बनाए और उन्हें एक-दूसरे में मिला दिया। फिर उसने उन्हें गूँथना शुरू किया।
“ये क्या बना रहे हो?” वैदेही ने मंद स्वर में पूछा।
माधव ने मुस्कुराते हुए उन दोनों गोलों को एक बड़े पिंड में बदल दिया। “मैं देख रहा हूँ कि क्या मैं इन्हें फिर से अलग कर सकता हूँ। पर देखो, वैदेही… मिट्टी एक बार मिल जाए, तो फिर यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा हिस्सा किसका था।”
शुरुआत ‘मेरा-तुम्हारा’ से हुई थी, फिर ‘आधा-आधा’ हुआ, और अंत में स्थिति यहाँ आ पहुँची थी कि ‘मैं’ का अस्तित्व ही समाप्त हो गया था।
वैदेही ने माधव के कंधे पर सिर रख दिया। बाहर पक्षियों का शोर धीमा हो रहा था और पहाड़ों पर शाम की पहली धुंध उतर रही थी।
“माधव” वैदेही ने फुसफुसाते हुए कहा, “मेरा आधा हुआ तुम्हारा, आधा शेष तुम्हारा…मेरा मेरा कहना था, पर यदि मेरा, सो भी रहा तुम्हारा…”
माधव ने उसके वाक्य को पूरा किया, “…यों सारा हुआ तुम्हारा।”
उस शाम, उस पुराने घर की देहरी पर कोई लकीर नहीं थी। वहाँ केवल एक शांति थी—वैसी ही शांति जैसी एक पूर्ण मूर्ति के बन जाने के बाद छा जाती है।

हरि हारिल                                   
स्नातक/परास्नातक- हंसराज कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय 
पीएचडी- डॉ. भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा 
पता- vill.jamuni purwa,post-Tindwara,Dist.- Banda,pin-210001
मोब. न.- 7701931907 
ईमेल- [email protected]


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