बड़े परिवारों की अजीब दिक़्क़त है। एकाध लोग हाशिए पर ही रह जाते हैं। वजह कोई बड़ी नहीं होती। दो बच्चों के बीच फँसा एक बच्चा, दादी की सेवा में लगी कोई पोती या ख़ामोश रहने वाला छोटा-बड़ा सदस्य।
पन्नू इनमें से कोई न थी। पर रह गई। छूट गई। और साल बीतते चले गए।
पन्नू का असली नाम पावनी भी घर के छोटे-बड़ों को नहीं पता था। किसी के लिए वह पन्नू दीदी थीं, किसी के लिए पन्नू बुआ, तो किसी के लिए सिर्फ़ पन्नू। कहते हैं कि एक वक़्त में वह बहुत पढ़ाकू हुआ करती थीं। फिर पढ़ाई से ध्यान हटाकर चित्रकारी में ध्यान लगाया। घर के लोगों की हूबहू तस्वीर बना दिया करती। बल्कि ये भी कहा जाता था कि घर में जब भी बाहर से कोई मेहमान आता, तो पन्नू से कहा जाता कि उसकी स्केच बनाकर भेंट करे। सालों किया पन्नू ने। शाबाशी भी बटोरी। पर फिर भी अनदेखी रह गई। बिना किसी ख़ास वजह के।
ऐसा नहीं था पन्नू दिखने में अच्छी नहीं थी। ज़रूरत से थोड़ी ज़्यादा लंबी थी, दुबली भी ख़ासी थी। बाल तो ख़ूब लंबे, ये घने कि दो चोटियाँ करके पीछे की तरफ़ लटकाती तो लगता– मोटे नाग-नागिन आपस में गुफ़्तगू कर रहे हों। परिवार के हिसाब से रंग भी सही था। न ज़्यादा गोरी न साँवली। प्यारा-सा संदली रंग। चंदन से घुला हुआ।
ख़ास ज़िद्दी भी नहीं थी। अम्मा ने किचन में मदद को बुलाया तो वहाँ हाज़िर, बाबा ने कहा ताश की महफ़िल जम रही है तो पन्नू जी वहाँ भी हाज़िर। बच्चों के साथ तो ख़ूब जमती थी उसकी। हर खेल में पन्नू शुमार होती। मतलब हर कहीं थी पन्नू एक समय में।
फिर हुआ यह कि पन्नू के घर बाबा के पुराने दोस्त आए अपने परिवार के साथ। कहा किसी ने नहीं कि वह घर की बेटी से रिश्ता करना चाहते हैं। पर अम्मा ने ज़रूर पन्नू को हिदायत दे दी कि दो दिन ज़रा ठीक से सज-धजकर रहे। पन्नू बड़ी बेटी थी, उसके बाद उसकी अपनी बहन सुरांगिनी, फिर चाचा की बेटियाँ आराधना और कमलिनी।
पन्नू बाईस की होने वाली थी। ग्रेजुएशन के बाद सोशलॉजी में एमए कर रही थी। परिवार के हिसाब से सही वक़्त था उसकी शादी का। सच पूछें तो पन्नू को भी यही लग रहा था। उसकी परवरिश की कहानी कुछ इसी ढंग से लिखी गई थी। कोई अलग नहीं थी पन्नू, न ही उसकी सोच।
यहाँ तक सब ठीक था। घर की बड़ी बेटी को जो रुतबा मिलता है, उसे मिल रहा था। अम्मा, बाबा, दोनों छोटे भाई बहन सब ठीक-ठाक तवज्जो देते थे। बस यहीं तक रह गई उसकी कहानी।
अगले अध्याय में कुछ ऐसा हुआ, जो पन्नू को बौना बना गया। ज़्यादा नाटकीय बात नहीं थी। बस, जो परिवार पन्नू को देखने और पसंद करने आया था, उन्हें पन्नू की छोटी बहन सुरांगिनी भा गई। सबको नहीं, बस परिवार के लड़के को, होनेवाले जमाई को। सुरांगिनी हद से अधिक चंचल और चपल थी। उसका होना हर कहीं नज़र आता था। थी वह पन्नू से बस साल भर छोटी, पर इतनी जगमगाती रहती कि हर किसी की नज़र में आ जाती।
दादी मानी नहीं, कहती रहीं, “ग़लत है। पहले बड़ी की शादी करो। मना कर दो इस रिश्ते से।”
अम्मा ने दलील दी, “इतना अच्छा रिश्ता हाथ से कैसे जाने दें? लड़का अमेरिका में काम करता है। छुट्टी लेकर आया है। अगली बार पता नहीं कब आना होगा! फिर सुरांगिनी की भी शादी करनी ही है। एक ही साल तो छोटी है पन्नू से।”
अम्मा के तर्क के आगे सब फ़ेल हो गए। आनन-फ़ानन शादी हो गई। किसी ने पन्नू से कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझा। वह जो अपनी तरुणाई पर इठलाती घूम रही थी, उसने अचानक हँसना-रोना-गाना छोड़ दिया, इस तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। हाँ, उसके सामने पड़ते ही अम्मा दिन में पचास बार यह ज़रूर कहतीं कि बस साल भर के भीतर पन्नू की शादी कर देंगे। इसके बाबा देख रहे हैं लड़का।
पन्नू पहले इस बात पर हलकी-सी रोमांचित हो जाती। धीरे-धीरे वह सुन्न पड़ने लगी। अम्मा की बातें झिलाने लगीं।
ऐसे ही उपेक्षिता हो जाती हैं मिडिल क्लास घरों में एक अच्छी-ख़ासी लड़की। बात भी आज की नहीं, तीस साल पहले की है। छोटे शहर अलियों-गलियों में कई मिल जाएँगी पन्नू सरीखी। पहले से पता होता कि ज़िंदगी कुछ ऐसी होनी है, तो एमए के बाद बीएड कर लेती, स्कूल में नौकरी कर लेती। स्कूटर चलाना सीख लेती। पैसे कमाना सीख लेती। ज़िंदगी जीना सीख लेती। अपनी पसंद-नापसंद बताना और जताना भी सीख लेती। पर वह तो लगातार एक आस की डोर से उलझी रही। गधे के आगे गाजर का एक टुकड़ा लटकता रहा और गधा दौड़ता रहा इस उम्मीद में कि एक न एक दिन जब वह रुकेगा तो यह लाल-लाल गाजर जो उसे टँगा दीख रहा है, लपक लेगा अपने मुँह में। वाह, कितना बढ़िया स्वाद होगा उसका! रस से भरा! न गधे को मालूम न पन्नू को, कि उसका मुँह तो सूख गया है और उस लाल रसीले लपलप करते गाजर का स्वाद कभी न लेने लायक़ रह गया है।
पन्नू की क़िस्मत! ठीक उसी समय दादी बाथरूम में फिसलकर गिर गईं। कूल्हे की हड्डी फ्रैक्चर हो गई। सर्जरी करने का सवाल ही नहीं। दादी ने बिस्तर पकड़ लिया। अम्मा ने रोना रोया अपने मेनोपॉज का। कहने लगीं, हर वक़्त शरीर जलता रहता है। सही भी है। यही होता है मेनोपॉज में। अम्मा को हॉट फ्लेशेज जब-तब आते। जब काम दिखता तो ज़रूर आते। अम्मा का काम तो काम वाली बाई ने सँभाल लिया। पर दादी का? पन्नू थी न। सही उम्र, सही जगह। पन्नू लग गई दादी की सेवा में। चौबीस घंटे नर्स रखने का किसी को ख़याल नहीं आया। नर्स को पैसे देंगे नहीं, बेटी से ज़रूर काम करवा लेंगे। पन्नू कब दादी की ज़रूरत बन गई, पता ही नहीं चला!
आया था एक अच्छा-सा रिश्ता, पर अम्मा ने दबी ज़ुबान से कह दिया– अभी तो दादी बीमार हैं, मेरी भी तबीयत ठीक नहीं रहती। पन्नू की शादी कैसे निबटा पाएँगे?
अंदर की बात किसी ने नहीं कही कि पन्नू चली जाएगी तो दादी को कौन सँभालेगा! बिना कहे सब समझ गए। पापा ने भी जाने दिया।
दादी बिस्तर पर ज़रूर थीं, पर थीं जीवट। जी गईं और दस साल। इस बीच चाचा ने दोनों बेटियों की शादी कर दी। दादी को पोता-पोती देखने का मोह लहलहा आया, सो पन्नू के छोटे भाई रक्षित की भी शादी हो गई।
देखते-देखते गुज़र गया ज़माना। दादी के जाने के बाद पन्नू ने उसी शिद्दत से अम्मा को सँभाल लिया। फिर भाई के बच्चों को। तीस साल बीतते वक़्त ही कितना लगता है! तीस नहीं, उनतीस कहें। पन्नू पचास की होने वाली है। अब अम्मा नहीं रहीं, बाबा भी नहीं। चाचा का परिवार अलग हो गया है। पन्नू अपने दोनों भाइयों– रक्षित और पराग के परिवार का अभिन्न हिस्सा है। अभिन्न कहने को है। पर ऐसा लगता नहीं। नई पीढ़ी के बच्चे भी उस उम्र में आ गए हैं, जहाँ कभी पन्नू हुआ करती थी। आज़ाद और मनमौजी। पन्नू बुआ का बर्थडे इसलिए मनाना है क्योंकि पचास एक कूल नंबर है। बुआ बूढ़ी हो रही हैं। उनके बुढ़ापे के नाम एक जश्न सही। लेकिन पन्नू तैयार ही नहीं हो रही। ऐसा नहीं है कि वह समझ नहीं रही पचास में आने का मतलब। दिखने में दो-चार साल बड़ी ही लगती है। पर उसे दिक़्क़त है अपने नाम का कोई भी उत्सव मनाने से। कभी किया नहीं, पर बच्चों की ज़िद। दोनों भाइयों की ज़िद। दीदी का बर्थडे मनकर रहेगा। वह भी किसी अच्छे होटल में। पन्नू दीदी के लिए अच्छी और महँगी साड़ी आएगी। बच्चे ब्यूटी पार्लर ले जाएँगे। बाल कलर होंगे। नई स्टाइल में काटे भी जाएँगे। छोटी भाभी फ़ेशियल, स्पा और मैनिक्योर-पैडिक्योर का ख़र्च उठाने को तैयार। मेरी तरफ़ से तोहफ़ा। बड़ी कंपटीशन में आ गई हैं– ‘बोलो न दी, क्या चाहिए? प्लीज़ कुछ अच्छा-सा ले लीजिए। आप तो कभी कुछ नहीं लेतीं।’
पन्नू मुस्कुरा रही है। सकुचा भी रही है। ऐसी कोई चीज़ नहीं जो चाहिए। अचानक रक्षित को आइडिया सूझा, “पन्नू दी, हम सब तो छोटे थे आपसे। हमें नहीं पता कि आपकी शादी क्यों नहीं हुई! आप कहें तो देखें आपके लिए रिश्ता? आप चाहेंगी तभी…”
पीछे से भाभी अपने पति को चुप करवा रही हैं। पन्नू दीदी को ये मज़ाक़ पसंद नहीं आएगा। नहीं की है, तो कोई वजह होगी न?
रक्षित रुक ही नहीं रहा, “मेरे ऑफ़िस में कलीग हैं, आपकी ही उम्र की होंगी वह। दो साल पहले डाइवोर्स लिया था अपने पति से। अब शादी कर रही हैं दोबारा। हम सबसे मिलवाने लाई थीं। ख़ुश लग रही थीं। बोलो न पन्नू दी! आप भी तो अकेलापन महसूस करती होगी! अक्सर हम सब अपनी फ़ैमिलीज़ के साथ बाहर जाते हैं तो आप अकेली रह जाती हैं। उम्र बढ़ेगी तो आपको भी तो किसी का साथ चाहिए होगा न! आप अपने दिल की बात बताइए दी।”
पन्नू ने कुछ कहा नहीं। बस आँखों ही आँखों में आँसू दबाए बैठी रही। एक-एक कर पुराने दिन रील की तरह उस आँसू में तैरते नज़र आ रहे थे। कितने-कितने अनदेखे-अनहुए सपने बह चले। वह रोककर पकड़ना चाहती थी सपनों को, पूछना चाहती थी– ‘क्या मेरा कोई सपना पूरा होगा?’
पन्नू कुछ नहीं कह पाती। इस समय इस परिवार में सबसे बड़ी है। ऐसे कैसे कह दे मन की बात! अपने भीतर छिपे राक्षस की तरह उसके डर अट्टहास लगाते। अब वह भी उसी उम्र में आ गई है, जब अम्मा कहा करती थीं– गर्मी लगती है पन्नू, हर समय बगलों में।
अम्मा का ख़याल रखती थी पन्नू, हमेशा गीला टॉवेल लिए उनके पास हाज़िर। अब वह भी उम्र के उसी ढलाव पर आ पहुँची थी, उसे भी तो लगने लगी है गर्मी। हॉट फ्लेशेज। उम्र में उससे छोटी भाभियाँ खुलकर कहती हैं, “ज़ालिम पीरिएड, न जाने कब रुकेगा! थक गए सँभालते-सँभालते। अभी से चक्कर आने लगा है मेनोपॉज को लेकर।”
लेकिन पलटकर पूछती नहीं– ‘दीदी, आप भी तो गुज़र रही होंगी, कैसे सँभाल रही हैं? कोई दवाई ले रही हैं क्या?’
पन्नू ख़ुद से डॉक्टर के पास हो आई। सबसे कहा कि गैस की दिक़्क़त है। शर्म आती है औरतों वाली दिक़्क़त के बारे में कहते हुए। गाइनेकॉलोजिस्ट ने चार साल पहले कहा था कि उसे जल्दी होगा मेनोपॉज। जो औरतें सेक्स नहीं करतीं, उनको कई दिक़्क़तें आती हैं। मज़ाक़ में बोली थी– अपना औज़ार कभी इस्तेमाल नहीं किया, तो जंग तो लगेगा न!
औज़ार, हाँ औज़ार ही तो। सालों तक गुदगुदी होती थी सेक्स के बारे में सोचकर। सोते-सोते उठती तो लगता कोई है पास में, बहुत पास। उसका औज़ार कंपकंपाने लगता। सोचती, कैसा लगता होगा सेक्स करने पर! अपने औज़ार को हाथ से दबाकर वह करवट लेकर सोने की कोशिश करती। उपन्यासों और कहानियों में सेक्स के दृश्य पढ़कर रोमांचित होकर ख़ुद ठंडी पड़ जाती। वह अपने खेल में बिलकुल अकेली थी। दाएँ हाथ की मध्यमा उँगली थी उसकी सच्ची संगिनी। सुबह उठकर लगातार अपनी उँगली पर साबुन लगाते हुए मन में बस यही ख़याल आता कि– काश ये उँगली किसी और की होती! किसी मर्द की? औरत की? पता नहीं!
और आज उसका भाई उससे पूछ रहा है– दीदी, आपके लिए रिश्ता देखें क्या?
अंदर बवाल-सा मचा है। क्यों नहीं खुलकर कभी कहा कि उसे भी साथ चाहिए किसी का! सालों पहले यानी छोटे भाई की शादी के समय उसके ससुर के घर से प्रस्ताव आया था। वह विधुर थे। पन्नू से शादी करना चाहते थे, पर भाइयों ने मना कर दिया– ऐसा थोड़े ही होता है! हम अपनी दीदी की शादी के लिए मरे थोड़े ही न जा रहे! फिर एक बार जब घर आए भाई के ससुर, तो पन्नू को घेरकर फ़्लर्ट करने की भी कोशिश की। अश्लील चुटकुले सुनाए। हाथ पकड़ने की कोशिश की। पन्नू बचती थी उनसे, पर अंदर ही अंदर उसे ज़रा भी बुरा नहीं लगा। उनसे नज़रें मिलतीं तो लगता था वह पूरी औरत है।
रक्षित को लग रहा था, उसने कुछ ऐसा कह दिया है कि दीदी के दिल को चोट लग गई है। पास आकर उसने पन्नू का हाथ थामकर कहा, “सॉरी दी, आपको शायद बुरा लगा, पर मुझे मेरी उस कलीग ने ही सलाह दी थी। कहा था कि कल को जब घर के बच्चे पढ़ने बाहर चले जाएँगे, दीदी अकेली हो जाएँगी।”
पन्नू के दिल को सच में चोट लगी थी। कई बातें थीं, जो अब तक किसी से कह नहीं पाई। पापा ने ये घर दोनों भाइयों के नाम कर दिया। उसके लिए बस इतना कहा कि पन्नू तुम दोनों की ज़िम्मेदारी है। जब तक रहना चाहेगी, उसे अपने पास रखना, उसका ख़र्चा उठाना। बस, सिर्फ़ यहीं तक। न अम्मा ने कभी कहा कि पन्नू को उतना तो दो, जितना अपनी दूसरी बेटी को दिया है। घर का एक हिस्सा उसके नाम कर देते। कुछ पैसे डाल देते बैंक में उसके नाम। पैसे थे, वही जो दादी दिया करती थीं कभी। छोटा-सा अमाउंट। बस उतना कि हर साल घर के बच्चों को छोटा-मोटा तोहफ़ा दे सकें। पापा से मुँह खोलकर कहने की हिम्मत नहीं हुई। उन दिनों की बात थी, जब अम्मा ज़िंदा थीं और वह अक्सर वही कहा करती, वैसा ही करती, जैसा अम्मा कहती थीं। जैसे अम्मा ने बाद-बाद में यह कहना शुरू कर दिया था कि– तेरी ज़िंदगी अच्छी है पन्नू, किसी घर-परिवार का झंझट नहीं, पति-ससुराल की चिखचिख नहीं। हमें देखो, सारी ज़िंदगी इसी घचपच में कट गई, फिर भी हाथ कुछ नहीं आया।
अम्मा होतीं तो पूछती– ‘हाथ उसके भी क्या आया? बस यही कि घर-परिवार की ज़िम्मेदारी नहीं रही? पर क्या कम ज़िम्मेवारियाँ उठाई हैं उसने?’
पन्नू ने सबके लिए किया, लगातार किया। इसलिए भी किया कि वह कुंद न हो जाए। शरीर चलता रहे। अब जैसा वक़्त थोड़े ही था चालीस साल पहले कि जो जी में आया बोल दो। सुरांगिनी थी समय से आगे। मुँह खोलकर माँग लेती थी दूसरों के हिस्से का भी। पन्नू का डीनए ही कुछ अलग था। इसलिए आज भी नहीं खोल पा रही अपना मन। बस किलस रही है।
भाभी कह रही थीं, “दीदी की ज़िंदगी सही तो चल रही है। क्यों दिल दुखा रहे हो रक्षित?”
रक्षित भावुक हो गया। अच्छा भाई है। ख़याल रखता है उसका। जब भी सामने पड़ता है, हाथ पकड़कर पूछता है– ‘दी, ठीक तो हो? कुछ परेशानी हो तो बता देना।’ यह सुनकर वह मुस्कुरा भर देती। भाई का इतना पूछना ही उसे गदगद कर देता। रक्षित से बस एक साल छोटा है पराग। पर वह अलग धुन में रहता है। रक्षित राखी के दिन ख़याल रखता है उसे कोई ज़रूरत का सामान दे, पराग तो जो उसकी पत्नी हाथ में थमा दे, वही आगे कर देता है।
ठीक ही चल रही है ज़िंदगी अब तक। खाने-पीने की कोई तकलीफ़ नहीं। घर का एक छोटा-सा कमरा उसके नाम है। वहीं मंदिर है और बच्चों के खेल-कूद का सामान भी वहीं डंप रहता है। पन्नू को इससे भी कोई शिकायत नहीं। उसी कमरे के एक कोने में उसकी एक अलमारी है, साथ में छोटा-सा टेबल और उसके ऊपर किताबों की शेल्फ़। हाँ पन्नू को उपन्यास पढ़ने का शौक़ है, रोमांस और रहस्य से भरा उपन्यास। ख़रीदकर पढ़ती है। अब बच्चों की कृपा से अपने लैपटॉप पर ऑनलाइन पढ़ लेती है। रक्षित ने ही कुछ साल पहले उसे राखी पर तोहफ़े में किंडल दिया था, कुछ किताबें भी डाउनलोड करवा दी थीं। यही उसकी रातों का साथी है। आधी-आधी रात तक किताबें पढ़ती है और सपने बुनती है पन्नू। उसकी अपनी दुनिया, यहाँ पन्नू नहीं पावनी रहती है। उसे अक्सर उपन्यासों में अपने तरह के किरदार लुभाते हैं। चाहकर भी वह हीरोइन नहीं बन पाती, बल्कि हीरोइन की ऐसी सहेली, जो मन-ही-मन हीरो को चाहती है, उसके लिए जान दे देती है, वह होती है पन्नू।
इस वक़्त वह जो उपन्यास पढ़ रही है, उसमें भी ऐसा ही एक किरदार है। नायिका की बड़ी बहन रोशनी। उसने शादी नहीं की, क्योंकि उसका प्रेमी दग़ाबाज़ निकला। रोशनी हमेशा टेसुए नहीं बहाती, बल्कि कमर कसकर परिवार की मुखिया के रोल में आ गई है। पापा बीमार हैं। बहन की शादी हो गई है और वह अपने पति के साथ रहती है। पापा की किडनियाँ फ़ेल हो गई हैं। उन्हें डोनर चाहिए। सब मानकर चल रहे हैं कि रोशनी अपनी एक किडनी उन्हें देगी, क्योंकि एक वही है जो अकेली है। भाई और बहन की शादी हो गई है। माँ तो ख़ैर बूढ़ी हो गई है। पन्नू की आँखें बह निकली हैं। हाँ, रोशनी को यह करना पड़ेगा। त्याग करना पड़ेगा। लेकिन कहानी में ट्विस्ट है। जब माँ उससे कहती है कि कल उसे अस्पताल जाकर जाँच करवानी होगी, डॉक्टर बताएगा कि कब पापा की किडनी रीप्लेस होनी है, तो रोशनी जवाब देती है कि वह अपनी किडनी नहीं देगी।
माँ के साथ-साथ पन्नू भी चौंक रही है। रोशनी ऐसा कैसे कह सकती है? मना करना और अपनी इच्छा की बात करना तो उसे सिखाया ही नहीं गया। रोशनी कहती है– ‘बहन और भाई कल को बूढ़े होंगे तो उन्हें उनके जीवनसाथी सँभालेंगे। मुझे कौन सँभालेगा? मुझे तो अकेले रहना है। मुझे अगर ज़रूरत पड़ेगी तो कौन देगा किडनी? बताओ माँ? क्या सिर्फ़ इसलिए मैं आसान शिकार हूँ, क्योंकि मैं अकेली हूँ और बिना शिकायत के पूरे परिवार के लिए लगी रहती हूँ?
पन्नू ने उपन्यास बंद कर दिया। रात के दो बज रहे हैं। शाम को रक्षित का सुझाव और अब उपन्यास में रोशनी का सवाल उसे हथौड़े की तरह चुभ रहा है। रोशनी की बग़ावत उसे खल रही है।
सुबह तक पन्नू को नींद ही नहीं आई। वह लगातार रोशनी के बारे में सोचती रही। उपन्यास से आगे उसकी कहानी। सुबह होने से पहले उठकर वह किचन में आ गई। एक कप गर्म चाय पीने की तलब। चाय और दो बिस्किट लेकर वह बालकनी में आ गई। झूले पर बैठकर इत्मीनान से चाय में बिस्किट डुबोकर खाते हुए उसने अँधेरे में उजाले की हल्की किरणें देखी। तार-तार गुलाबी किरणें अँधेरे आसमान को सँवारती हुई उसके पैरों तक चली आई।
कुछ देर बाद पूरा घर जग जाएगा। बच्चे कॉलेज के लिए निकल जाएँगे। दोनों भाभियाँ काम करने वाली को हिदायत देने में लग जाएँगी। भाई नाश्ता कर गाड़ी में बैठकर दफ़्तर के लिए निकल जाएँगे। उस कोलाहल के बीच कोई पूछ लेगा– बुआ क्या सोचा? कहाँ रखें पार्टी? कोई थीम बताइए न? जल्दी बुआ। बाद में ढंग का होटल नहीं मिलेगा। और हाँ, गेस्ट लिस्ट भी डिसाइड कीजिए।
भाभियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखेंगी, फिर उसका। इस डर से कि कहीं बाहर वाले रिश्तेदारों को न बुला ले।
पन्नू क्या कहेगी? हाँ या ना?
मन तो कर रहा है हाँ या ना से अलग कुछ करे। कभी तो रोशनी बने अपने आप के लिए। ठंडी होती चाय के साथ लंबी-सी साँस लेते हुए पन्नू ने तय किया– अबकि जब रक्षित पूछेगा तो कह देगी, उसे पेरिस ले जाए। एफिल टॉवेर देखना है। बर्फ़ पर फिसलना है और हाँ, पैरों में स्केटिंग पहननी है। बचपन का शौक़ है। और ज़ोर देगा तो कह देगी साथ में डिज़नी लैंड भी घुमा दे। फ़िल्मों में देखा है, नॉवेल में पढ़ा है। देखें, सामने से कैसे दिखता है सब! और फिर पूछे कि और कहीं भी जाना है दी? तो कह दे कि हाँ, समंदर में… बड़े से जहाज़ पर। क्रूज़ पर। जैसे फ़िल्मों में और…
रक्षित जल्दी उठ गया था। पन्नू को बालकनी में देखकर वहीं चला आया, “क्या दी? इतनी जल्दी उठ गई? वॉक पर चली जाती। तुम्हारी उम्र की कितनी लेडीज़ सुबह जल्दी उठकर पार्क में जाती हैं। अपनी हैल्थ के लिए कुछ करो दी।”
पन्नू ने ‘हाँ’ में सिर हिलाया। रक्षित मोढ़ा खींचकर उसके पास बैठ गया, “दी, कल मैं कुछ ज़्यादा तो नहीं बोल गया? आपको बुरा तो नहीं लगा न दी? अच्छा, अभी बताओ, आपको कैसे मनाना है अपना जन्मदिन? कुछ ख़ास करना है तो बताओ, प्लीज़ दी, खुल के बोलो। कोई नहीं है यहाँ।”
पन्नू सोचने लगी। भाई का चेहरा देखा और अपने पैरों पर पसरे उजाले की किरणों को। वह रुककर बोली, “मेरे पास सब कुछ तो है भाई। तुम लोगों को जो ठीक लगता है, वह करो। मेरी आँखों के सपनों ने कब से सच होना छोड़ दिया है!”
पन्नू ने कह तो दिया, पर अपनी आँखों को सँभाल नहीं पाई, जिसने उसका झूठ पकड़ लिया था और बूँद इस इंतज़ार में आँखों में क़ैद थी कि कब उसे एकांत मिले और कब वह बरसकर सूखे मरुस्थल बने गालों का खुरदरापन मिटा सके।
उनकी *
जयंती आपकी कहानी पसंद आयी
अच्छी कहानी है। ऐसे बहुत से चरित्र आस पास ही हैं।
जयन्ती जी!
आपकी कहानी पढ़ी।
नारी जीवन की विसंगतियों में एक कहानी इस तरह भी होती है।
वैसे तो कोशिश यही होनी चाहिये कि पहले बड़ी बहन की शादी हो जाए फिर छोटी की हो।फिर उम्र इतनी अधिक नहीं थी कि इंतजार न किया जा सके।
कभी-कभी माता-पिता के निर्णय बड़े गलत साबित होते हैं।
दादी की बीमारी या माँ की प्रॉब्लम ऐसी वजह नहीं थी जिसके कारण पन्नू की शादी रोकी जाती।
इसमें कोई दो मत नहीं की मिडिल क्लास के कई घरों में ऐसी स्थिति नजर आ जाएँगी आज भी।
इस कहानी में पन्नू की स्थिति की दोषी माँ नजर आती है।
कहानी अपने आप को जिस तरह से पढ़ा ले जाती है, पन्नू का दुख उससे कहीं अधिक भारी है। कहने-सुनने-पढ़ने से अधिक भारी होता है उसे भोगना। समय के साथ-साथ सारे स्वप्न टूटते और छूटते चले जाते हैं। और जीवन धीरे-धीरे खाली होने लगता है
अपने थोड़े से हित के लिये हमें अपने बच्चों के साथ इस तरह अन्याय नहीं करना चाहिये, वह भी ऐसा जिसके लिए बाद में स्वयं को पश्चाताप हो। हालांकि इस कहानी में किसी को भी पश्चाताप नहीं हुआ। आप तो चले जाते हैं स्वर्गवासी होकर पीछे जैसे अकेलापन भोगना रहता है अपने दर्द को सिर्फ वही महसूस कर पता है और फिर इतना अन्याय कि सबको सब कुछ देते हुए उसके लिए कुछ नहीं छोड़ा जाये। लेकिन बच्चे जो पन्नू की पूर्व जिंदगी के बारे में नहीं जानते थे वे उनके लिए चिंतित थे।
एक सजग पात्र के रूप में रक्षित का चरित्र बहुत अच्छा लगा। वह भावनाओं को समझ पाया।
कहानी माता-पिता ही नहीं बल्कि परिवार की तरफ से बेटी के प्रति उपेक्षा व अन्याय के भाव को तो दर्शाती ही है, साथ ही एक बेटी की कर्तव्यबध्यता के चलते एकाकीपन के दुख को भी गंभीरता से व्यक्त करती है।
कहानी का शीर्षक सार्थक है वाकई कभी-कभी कोई बेटी अपने ही घर में रहते हुए लाइन के बाहर हो जाती है।
एक अच्छी कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।