दोपहर की धूप ढलते ढलते वातावरण में गर्मी कम होने लगी थी | शाम की पांच बजने जा रहे थे | मंदिर प्रांगण में लगे विशाल लंबे चौड़े टेंट के नीचे हलचल बढ़ने लगी | मंदिर समिति के मुखिया पांडे जी , अग्रवाल जी , ठाकुर साहब, उपाध्यक्ष मैं तरुण जोशी और अन्य सदस्य सभी व्यस्त थे | सारी तैयारियों का जायजा ले रहे थे | रसोई लगभग तैयार हो चुकी थी पुडी और भजिये तो गरम गरम ही उतारे जाएंगे यह तय किया गया था | सौ सौ फिट लंबी 4–5 कतारों में टाट पट्टी बिछाई जा रही थी क्योंकि 2000 लोगों का भंडारा था |
वैसे तो यह भंडारा विवेकानंद कॉलोनी का ही था लेकिन नगर के सभी जाति वर्ग के दो –दो चार चार प्रमुख लोगों को भी निमंत्रण दिया गया था ताकि इस भंडारे को समरसता की ओर प्रगति करते हुए एक कदम बताया जा सके |
विभिन्न जाति समाज के प्रतिनिधियों के अलावा अति विशिष्ट यानि दलित वर्ग के 11 जोड़े भी निमंत्रित किए गए थे | जल व्यवस्था , पत्तल दोने की व्यवस्था , परोसदारी के लिए विभिन्न टीम बनाना आदि सारे कार्य की योजना फायनल करते करते सात बज गई थी तभी पंडित जी ने ठाकुर साहब को बुलाया “ अरे हुकुम 11 जोड़ों का क्या हुआ उनको आने का टाईम बता दिया था ? आ जाएंगे समय पर ?
ठाकुर साहब ने सीधे मुझसे मुखातिब हो कर कहा “ तरुण जोशी जी आप जाओ यार मैंने उन्हें बोल दिया था कि 7:30 बजे के पहले उन्हें आना है , कहीं देर ना करदे वरना यहाँ लोगों को रोकना मुश्किल हो जाएगा | “
मैंने अपनी बाईक उठाई और गांधी कॉलोनी की तरफ चल दिया | हमारी कॉलोनी के मंदिर वाले एरिया का जो सफाई कामगार था , मंगू और उसकी पत्नी जमुना उन्हीं के मार्फत हमने दलित समाज के 11 जोड़ों को भंडारे में आने का बोला था ताकि उनका सम्मान कर सकें और उन्हें हम सब के साथ बल्कि हम सब से पहले भोजन प्रसादी करवा सकें | हमारी विवेकानंद कालोनी की ये एक अच्छी परंपरा थी जो हम ने ६-७ साल पहले से शुरू की थी जिसे नगर के सभी लोग सराहना करते थे , हमें धन्यवाद देते थे आभार प्रकट करते थे | और हम भी खुश होते थे कि हम एक अच्छी परम्परा डालकर लोगों को अनावश्यक कुरीतियाँ छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं | हमारी कॉलोनी में इन गतिविधियों से कोई राजनीतिक व्यक्ती नहीं जुडा था ना ही किसी को सत्ता की राजनीति के लिए इनके वोटों की चिंता थी | किंतु हम यह चाहते थे कि कुछ लीक से हटकर काम हो ५-६ सालों से हम हनुमान जयंती के उपलक्ष में यह भंडारा करते थे |
गांधी कालोनी सामने ही थी | मैं सीधे मंगू के घर पर पहुंचा वहाँ बड़ी भीड़ इकट्ठी थी | हमने जो ग्यारह जोड़ों को निमंत्रित किया था वह अपने बच्चों के साथ जाने के लिए तैयार खड़े थे | लेकिन उनके सामने खडा गांधी कॉलोनी का पार्षद जो कुछ नशे में भी था अपने साथ दो तीन दोस्तों को लिए उन्हें रोक रहा था | उन्हें हमारे कार्यक्रम में आने का विरोध कर रहा था | “ वहाँ मत जाओ मंगू दादा मत जाओ | वो लोग तुम को चुतिया बनाते हैं | बुलाते हैं , अपने साथ बिठाकर खाना खिलाते हैं फिर फोटो खींचते हैं और अखबार में देते हैं अपने को इससे क्या फ़ायदा ?”
मंगू बहुत समझदार व्यक्ति था उसने पुरी कालोनी वालों का व्यवहार देख रखा था | उसने पार्षद की बात काटते हुए कहा “ वो हमें बुलाते हैं , हमारा सम्मान करते हैं साथ में बैठकर खाना खाते हैं इसमें क्या गलत है ? “
एक लड़के ने विरोध करते हुए कहा “ वही तो मैं कह रहा हूँ कि तुम को चुतिया बनाते हैं | साथ बिठा के खाना खिलाते हैं फोटो खींचा के अखबार में देते हैं ताली बजाते हैं वाहवाही लूटते हैं | यदि उनको हमारी ज्यादा ही चिंता है , हमारा सम्मान करना है तो क्या कल से वह खुद झाड़ू हाथ में लेकर कॉलोनी की गली मोहल्ले की सफाई करेंगे ? हममें से किसी को मंदिर का पुजारी बना कर दिखाएंगे ? तो मैं मान लूंगा कि हम को सम्मान दे रहे हैं “ मंगू का गुस्सा चरम पर पहुंच चुका था वह चिल्लाया “ वाह रे बेटा वह झाड़ू क्यों पकड़ेंगे पढ़े लिखे हैं उन्होंने मेहनत की है कायदे से जीवन बिताया है इसके बावजूद वह हम सब को सम्मान दे रहे हैं | “
मंगू बोल रहा था “ तू अपने दिन कैसे निकाल रहा है ? आवारागर्दी कर रहा है रोज दारू पीता है मेहनत नहीं करता | कभी स्कूल पढ़ने नहीं गया | तू भी पढ़ लिख जाता | मत उठाता झाडू | कौन किसके साथ जबरदस्ती कर रहा है ? सब अपने अपने मालिक हैं | और तू जो उनको पूछ रहा है कि तुझे पुजारी बना दे तो कभी सुबह जल्दी उठ कर कुछ पूजा पाठ धर्म-कर्म किया है ? कभी कुछ धार्मिक किताब पढी है ? अच्छे लोगों की संगत करी है ? पुजारी बनने चला है साला | सामने वाला युवा पार्षद भी बहस में कम नहीं था पलट कर बोला “ हमको करने कब दिया कुछ अच्छा काम इन लोगों ने | हमको स्कूल नहीं जाने दिया हमको मंदिर नहीं जाने दिया | हमको ढंग से रहने नहीं दिया तो कैसे करते ये सब ? “ मंगू कुछ जानकार भी था उसने फिर विरोध किया पार्षद का | रविदास बाबा ने कैसे पढ़ाई कर ली और वो संत बन गए ? संत कबीर बिना स्कूल गए कैसे महान आदमी बन गए और वाल्मीकि भी तो हमारे में से ही थे उन्होंने रामायण कैसे लिख डाली और ऐसे ही कितने-हमारे समूह के , वर्ग के लोगों ने झाड़ू छोड़ कर अच्छे कर्म करे हैं और उनको दुनिया ने गले से लगाया उनको सम्मान दिया और उन्हें पुजारी से बढ़ कर देवता बनाया | तू भी कुछ करता तो तू भी पूजाता किसने रोका तुझे ? कौन कह रहा तेरे को झाड़ू लगाने का ? छोड़ दे झाड़ू मत करें ये काम कोई दूसरा काम कर , अच्छा काम कर |
पार्षद तमतमाया हुआ बोला “ अरे मंगू दादा हम को कौन अच्छे काम करने का मौका देता है ? फालतू है हम तो और हमको तो ये सब गंदे निकृष्ट काम ही करने को मिलते हैं “
“तू फिर झूठी बात कर रहा है | “ मंगु हार मानने वाला नहीं था “ हमारे दलितों में हमारे वंचितों में मुश्किल से 5 से 10% लोग हैं जो सफाई का काम करते हैं | जो झाड़ू पकड़ते हैं बाकी ज्यादातर मलाई मार रहे हैं | नोकरी करते हैं , बाबू जी बने हैं , अफसर बने हैं पैंट शर्ट पहनते हैं शानदार तनखा लेते हैं | अगर कोई ये साफ़ सफाई का काम कर भी रहा है तो तनखा पाता हैं | दोनों मियां बीवी मिल कर अच्छे पैसे कमाते हैं और घर चला रहे हैं | हम नही पढ़े तो मजबूरी में ये काम करते हैं पर हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं बड़े होकर नोकरी करेंगे | तो दूसरों को दोष देना छोड़ , तेरे को आगे बढ़ना है तो कोई दुसरे काम कर | और हमको मत रोके हम तो जाएंगे | वह हमारा सम्मान दिल से करते हैं | “ अपनी बात पुरी कर पलटा मंगू सभी साथियों को कहा “ चलो रे चलो “ तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी | बहुत देर हो गई 7:30 बजने वाली है मंगू चलो जल्दी करो |
बाबूजी हम 10 मिनट में आ रहे हैं मंगू ने मुझे विश्वास दिलाया और मैं अपनी गाड़ी लेकर वापस मंदिर आ गया |
भगवान की आरती शुरू हो चुकी थी पूरा मंदिर प्रांगण कॉलोनी वासियों से भर चुका था | पांडे जी गुप्ता जी और ठाकुर साहब चिंतित दिखे | मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह लोग रास्ते में ही है अभी पहुंचते हैं | घड़ी का कांटा तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था आरती पूरी हुई प्रसाद वितरण हुआ और सारे उपस्थित लोग भोजन प्रसादी के लिए टाटपटटियों पर बैठने को दौड़ पड़े | उन पांचों पंक्तियों में से से पहली पंक्ती को सुरक्षित रखा था ताकि आने वाले विशिष्ट अतिथियों , नगर के पाटीदार समाज कुर्मी समाज जैन समाज अग्रवाल समाज ठाकुरबाड़ी के लोग ब्राह्मण सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को बिठाया जा सके | बाकी सभी पंक्तियों में जनसामान्य बैठ चुका था | तभी हल्ला मचा | परिसर के प्रवेश द्वार पर पच्चीस तीस लोगों का वह समूह जिसका सभी को बेसब्री से इंतजार था , दलित समाज के पुरुष और महिलाओं का बच्चों सहित नजर आया | ये समूह उस स्थान का निवासी था जिस स्थान को देश के एक महान जननायक का नाम दिया गया था “ गांधी कॉलोनी “ इस कॉलोनी में नगर के ज्यादातर सफाई कर्मी रहते थे चमड़े का काम करने वाले नगर की सडको गलियों की साफ़ सफाई करने वाले झाड़ू बनाने वाले नालियां ड्रेनेज की साफ़ सफाई आदि सेवा कार्य करने वाले सब लोग रहते थे |
हमारी कॉलोनी में मंगू और उसकी पत्नी जमुना झाड़ू बुहारा एक लम्बे समय से करते चले आ रहे थे | अपने बेटे प्रकाश के साथ सबसे आगे थे | उनके साथ रामू दीनू गुड्डू सोनू तेजकरण जुम्मन अन्य सफाई कर्मी अपनी पत्नियों के साथ और बच्चों के साथ चले आ रहे थे उपस्थित जन समूह ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया |
हम लोगों ने उन्हें संकेत देते हुए प्रथम पंक्ति में बैठने का इशारा किया | आश्चर्य की बात कि वे सारे पति पत्नी और बच्चे साफ स्वच्छ शुद्ध धवल वस्त्रों और साड़ियों में नहाए धोए बड़े प्रसन्न नजर आ रहे थे | हमने उन सब को प्रथम पंक्ती में बिठाया और नगर के समाज के अन्य वर्गों के लोग भी बैठे इसके बाद मंदिर समिति के सदस्यों और अन्य लोगों ने पवन पुत्र हनुमान का जयकारा करते हुए मंदिर समिति की ओर से सभी का स्वागत करते हुए तालियां बजाई |
इसके पश्चात कालोनी के कुछ सदस्य अपने पत्नियों सहित इन सब का सम्मान करने आगे आए | कालोनी के पुरुषों ने उन ग्यारह वंचित ,पिडीत साथियों का तिलक लगाकर उन्हें श्रीफल भेंट कर सम्मान किया और कालोनी की स्त्रियों ने उनकी पत्नियों का वस्त्र देकर एवं सुहाग चिन्ह देकर स्वागत किया | उपस्थित जनसमूह सारी गतिविधियों का तालियाँ बजाकर स्वागत कर रहा था खुशियाँ प्रकट कर रहा था |
भोजन प्रसादी का प्रारम्भ हो गया था | उन 11 जोड़ों के पति पत्नी और उनके बच्चों के चेहरे पर एक संतुष्टि की झलक एक प्रसन्नता और समाज के अन्य वर्गों के साथ एकाकार होने की अनुभूति झलक रही थी | उन्हें यह आशा और विश्वास था कि जैसे आज समाज के प्रमुख लोग उन्हें गले लगा रहे हैं उन्हें सम्मान दे रहे हैं चाहे आज यह सब प्रतीकात्मक ही हो लेकिन शीघ्र ही वह दिन भी आएगा जब पूरा समाज उन्हें सम्मान देगा उन्हें बराबरी का हक देगा |
एक आश्चर्य यह भी था कि जितने प्रफुल्लित और हर्षित वे वंचित चेहरे थे उनके बच्चे थे उतने ही उत्साह में उनका स्वागत करने वाले भी ऐसी ही खुशी महसूस कर रहे थे | उन्हें यह भान था कि हमारे पूर्वजों द्वारा जाने अनजाने में जो अन्याय अत्याचार किया गया उसका प्रायश्चित करते हुए हम उसकी भरपाई कर रहे हैं |
जिन लोगों को कई वर्षों में हमने अपने नजदीक नहीं आने दिया उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया सम्मान नहीं दिया आज उन्हें वो सब कुछ बल्कि भरपूर देना चाह रहे हैं |
वहां उपस्थित जनसामान्य तो प्रफुल्लित था लेकिन पूर्ण सुधार अभी शायद बाकी था | पंडाल में लगी कुर्सियों पर मंदिर प्रांगण में कुछ दूरी पर बैठे चार पांच व्यक्ति एक अलग ही बहस में लगे थे | उनके बीच में बैठा एक बुजुर्ग क्रोध में हाथ उठा उठा कर अपना विरोध व्यक्त कर रहा था “ मैं कहता हूं यह सब अधार्मिक कार्य करने की क्या जरूरत है ? क्यों बुला लेते हो इन अछूत लोगों को मंदिरों में ? क्यों हम सबका धर्म भ्रष्ट करते हो ? ये कोई अच्छा काम नहीं कर रहे हैं ये मंदिर समिति वाले | उनकी बातों का विरोध करते हुए एक युवा मंदिर समिति के सदस्य बोले “ अरे काका जी क्यों नाराज होते हो इन पर , यह बेचारे सैकड़ों सालों से हमारी उपेक्षा भेदभाव और नफ़रत सहते आ रहे है अब तो इनको उचित सम्मान दो इनके द्वारा निकृष्ट कार्य करने के बदले इनका एहसान मानो |
“अरे तो निकृष्ट कार्य कर रहे है तो मजदूरी भी तो ले रहे है | फ़ोकट में तो कुछ नहीं कर रहे।” काका के तेवर अभी भी वही थे |
अच्छा तो ये बताओ काका तुमको मजदूरी देंगे तुम यह वाला सब काम कर डालोगे साफ-सफाई का?
“अबे चुप साले क्या बोलता है “ काका अब भड़क गए थे |
“ क्यों लगी मिर्ची “ युवा लड़का मुस्कराया बोला काका इनसे सफाई का काम करालो ये तो चलेगा पर इनकी उपेक्षा तो मत करो | इनको सैकड़ों सालों से वंचित पीड़ित और दुखी बना कर रखा है अब तो जागो | अब तो इनको समझो जब तुम कुमार से सुतार से हलवाई से कारीगर से मजदूर से तो सम्मान से बात करते हो तो इन्होने क्या बिगाड़ा है ? इनको भी तो इज्जत दो | काकाजी ने कुछ बोलना चाहा तभी एक तीसरे आदमी ने उन्हें फिर रोका दादा गए पुराने जमाने भेदभाव के , अब सब बराबर सब पवित्र सब एक समान हैं | अब पढ़े लिखे लोगों का ज़माना है अब कोई शोषण कोई अन्याय नहीं चलेगा | सबकी इज्जत करना होगी सब का सम्मान करना होगा|
तभी काका ने फिर दिमाग लगाया एक नया तर्क पेश किया “ सब समझ रहा हूँ मैं तुम लोगों का क्या प्लान है | पहले इन लोगों को अपने बराबर बिठाकर सम्मान करके फोटो खींच रहे हो फिर अखबार में फोटो छापोगे और फिर पूरे साल उसका फ़ायदा उठाओगे |
काका का यह तर्क सुनकर कुछ क्षण तो सब लोग चुप हो गए तभी एक शिक्षित युवा ने आगे आकर काका से बोला “ यहाँ कोई नेता तो नहीं दिख रहा है काका , ना ही यहाँ कोई चुनाव है जिसमे किसी को इनका वोट लेना है | इन को सम्मान करने से हमको क्या मिल जाने वाला है , क्या कोई धन की पोटली देगा ? ये तो समिति वालों की मंशा थी कि कुछ नया करना कुछ ऐसा करना जिससे समाज को कुछ संदेशा जाए |” काका चुप थे युवा का बोलना जारी था |
“हमने सबको मीटिंग करके समझाया था कि हम को समाज के लिए कुछ अलग करना चाहिए जैसे हम पहले कभी मैदान की सफाई करते थे कभी बावड़ी की सफाई करते थे ऐसे ही कभी-कभी मन की सफाई भी कर लेना चाहिए | और यदि कोई यह काम अच्छा कहलाने के लिए भी करता हो तो भी क्या बुरा है काका | पीड़ितों दलितों की सेवा करके उनका सम्मान करके अच्छा कहलाने का लालच भी क्या बुरा है|
अब यह तर्क सुनकर तो काका की बोलती बंद हो गई थी | वो समझ रहे थे की इन बातों में दम है | तभी उनका एक साथी बोला चलो काका उठो , इन सफाई के देवताओं से हाथ मिलाओ ताली बजाओ | तीनों चारों साथी काका जी को उठाकर उस प्रथम पंक्ति की ओर धकेल कर ले चलें जहां आसपास के सभी वर्ग के लोग सफाई के इन देवताओं के सम्मान में खड़े थे | तभी उनकी ओर आते हुए काका ने अपनी बात को संभाली “ यार मैं तो मजाक कर रहा था मुझे मालूम है कि इन लोगों ने कितनी तकलीफ उठाई है | अब समाज में परिवर्तन की लहर चल रही है तो हम सबको इसका स्वागत करना चाहिए | प्रथम दौर का खाना निपट चुका था वो सभी ग्यारह जोड़े भी अपने बच्चों के साथ उठकर जाने की तैयारी में थे | उनका मुखिया मंगू आगे आया बड़ी विनम्रता से हम सब उपस्थितो को हाथ जोड़ कर अभिवादन किया | धन्यवाद दिया और दो चार बाते ऐसी बोल गया कि सबकी आँखे नम हो गई दिल भर आया |
मंगू बोला आप सब साब जी , हमारे वालो ने बरसो बरस बहुत दुःख पाया है | बहुत उपेक्षा नफ़रत सही है | अपमान सहा है | किसी ने हमारी स्थिति सुधारने का गंभीरता से नहीं सोचा | हमारे वाले नेताओं में भी और दूसरे राजनीति वाले भी हमारे पक्ष में बड़ी बड़ी बातें तो बहुत करते रहे पर कोई ईमानदारी से दिल से हमारे साथ नहीं आया |
जो भी आया उसने हमें सारे सवर्णों के विरुद्ध भड़काया सबसे दूरी बनाने का सन्देश दिया हमारी नफ़रत को बढाया तो हम भी उग्र हुए | हमारे नई उम्र के साथियों के दिलों में आग जलती रही अब आप लोगो ने हमारे लिए प्रेम प्यार का सम्मान का रास्ता बनाया है तो हम भी इतने दुष्ट नहीं है कि तुम्हारे प्यार और सम्मान का सही जवाब ना दे |
हम जो सफाई का निकृष्ट काम करते है , हमें इसका कोई मलाल नहीं किसी को तो ये काम करना होगा हम नहीं करेंगे तो और कोई करेगा | हम बस ये चाहते है कि जो आपकी इतनी सेवा कर रहा है , जो इतने निम्न स्तर पर जाकर आपको सुविधा दे रहा है ,उनका कुछ आभार तो मानो | उनका कुछ सम्मान तो करो | बस और हमें क्या चाहिए | मंगू बहुत भावुक हो गया था |
पांडे जी ने उसे गले लगाया | बेटा मंगू हम कोई राजनैतिक लोग नहीं है | हमें तुम्हारा वोट या और कुछ भी नहीं चाहिए | हम निस्वार्थ भाव से तुम्हारा सम्मान करते हैं तुम्हे अपने से जोड़ना चाहते हैं | हमारे दिल में तुम्हारे प्रति सम्मान है |
बस बाप जी हमें यही चाहिए |
मंगू ने पांडे जी को सर झुकाया और वो सफाई कामगारों का काफिला वर्षो से उपेक्षित पिडीत वंचित सेवा धारियों का समूह वापस अपने घरों कि ओर चल दिया | मै मूल्यांकन कर रहा था , हमने उनकी सेवा के बदले क्या दिया ? थोड़ा सा सम्मान, थोड़ी सी हार्दिक सच्ची भावनाऐ | क्या उनका इतना भी हक़ नहीं ?
भंडारे का दुसरा दौर शुरू हो गया था | अभी तीन चार दौर और होना था तभी सब भोजन प्रसादी ले पायेंगे | भंडारे का काम निर्बाध चल रहा था , लेकिन मै अभी तक उन वंचितों पीडितो की अपेक्षाओं में उलझा था कि अपनी इतनी सेवाओं के बदले वो क्या चाह रहे है सिर्फ और सिर्फ थोड़ा सा सम्मान थोड़ा सा अपनत्व और हम उन्हें ये तो दे ही सकते हैं
कहानी “भंडारा” एक सार्थक लक्ष्य की ओर इशारा कर रही है।
वैसे तो भंडारा का उद्देश्य यही होता है के बिना निमंत्रण के भी कोई भी वहाँ आएँ और खाएँ विशेष तौर से दीन- हीन और गरीब लोग। आसपास के चाहे कोई भी लोग हों, सुनकर भी कोई आ जाए ,तो वहाँ खाने की पात्रता रखता है।जाति और पद के भेदभाव से परे ,लेकिन फिर भी एक नियम सा बन गया है अपने समर्थ परिजनों व मित्रों को भी निमंत्रण देने का।
वंचित और पीड़ित लोग सिर्फ आर्थिक रूप से ही वंचित या पीड़ित नहीं होते। रोजी रोटी कपड़ा और मकान के अलावा सम्मान से भी वंचित होते हैं वे और बदले में कोई अपेक्षाएँ नहीं होतीं। सेवा भाव ही उनके उनका कर्म और पूजा है।
लेखकीय -मन उनके प्रति संवेदनशील है कि अपनी इतनी सेवाओं के बदले में क्या चाह रहे हैं? सिर्फ और सिर्फ थोड़ा सा सम्मान! थोड़ा सा महत्व, और हम उन्हें ये तो दे ही सकते हैं।”
दिक्कतें सारी वहीं से शुरू होती हैं, जहाँ से राजनीति शुरू होती है।
1-कुछ तो बनते हुए काम को बिगाड़ने की आदत।
2-कुछ आगे बढ़ते हुए लोगों की टांग खींचने की आदत।
3-किसी -किसी की मानसिकता इस तरह की भी होती है कि गिरे हुए को उठाने के लिए अगर कोई आगे बढ़ता है तो अच्छे काम में भी उन्हें स्वार्थ का खटका लगता है ।
कहानी में भी भंडारा समानता और समरसता की और बढ़ता एक कदम था।
लीक से हट कर काम करना सरल नहीं होता।
रास्ते में रोड़े बिछाने वालों की भी कमी नहीं नहीं रहती।
यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ। शुद्ध सकारात्मक भाव से जो एक नेक काम किया जा रहा था। उसमें बाधा उत्पन्न करने पार्षद आ गया, वह भी नशे में।
मंगू की समझदारी काम आई।
विकास की रोशनी में सुधार हो तो रहे हैं, कहीं नजर भी आ रहे हैं, लेकिन कहीं आज भी वही स्थिति है।
सुंदर, संदेशप्रद कहानी।
बहुत ही उचित और सामयिक कहानी लिखदी आपने। धन्यवाद। काश समाज में बदलाव आए और भेदभाव कम हो।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैंगलोर की होटल लीला पैलेस ने वहां सड़को की सफाई कर्मचारियो को एक पार्टी देकर बहुत सुंदर अभिनन्दन किया है
महेश जी
कहानी “भंडारा” एक सार्थक लक्ष्य की ओर इशारा कर रही है।
वैसे तो भंडारा का उद्देश्य यही होता है के बिना निमंत्रण के भी कोई भी वहाँ आएँ और खाएँ विशेष तौर से दीन- हीन और गरीब लोग। आसपास के चाहे कोई भी लोग हों, सुनकर भी कोई आ जाए ,तो वहाँ खाने की पात्रता रखता है।जाति और पद के भेदभाव से परे ,लेकिन फिर भी एक नियम सा बन गया है अपने समर्थ परिजनों व मित्रों को भी निमंत्रण देने का।
वंचित और पीड़ित लोग सिर्फ आर्थिक रूप से ही वंचित या पीड़ित नहीं होते। रोजी रोटी कपड़ा और मकान के अलावा सम्मान से भी वंचित होते हैं वे और बदले में कोई अपेक्षाएँ नहीं होतीं। सेवा भाव ही उनके उनका कर्म और पूजा है।
लेखकीय -मन उनके प्रति संवेदनशील है कि अपनी इतनी सेवाओं के बदले में क्या चाह रहे हैं? सिर्फ और सिर्फ थोड़ा सा सम्मान! थोड़ा सा महत्व, और हम उन्हें ये तो दे ही सकते हैं।”
दिक्कतें सारी वहीं से शुरू होती हैं, जहाँ से राजनीति शुरू होती है।
1-कुछ तो बनते हुए काम को बिगाड़ने की आदत।
2-कुछ आगे बढ़ते हुए लोगों की टांग खींचने की आदत।
3-किसी -किसी की मानसिकता इस तरह की भी होती है कि गिरे हुए को उठाने के लिए अगर कोई आगे बढ़ता है तो अच्छे काम में भी उन्हें स्वार्थ का खटका लगता है ।
कहानी में भी भंडारा समानता और समरसता की और बढ़ता एक कदम था।
लीक से हट कर काम करना सरल नहीं होता।
रास्ते में रोड़े बिछाने वालों की भी कमी नहीं नहीं रहती।
यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ। शुद्ध सकारात्मक भाव से जो एक नेक काम किया जा रहा था। उसमें बाधा उत्पन्न करने पार्षद आ गया, वह भी नशे में।
मंगू की समझदारी काम आई।
विकास की रोशनी में सुधार हो तो रहे हैं, कहीं नजर भी आ रहे हैं, लेकिन कहीं आज भी वही स्थिति है।
काश! समाज बदल पाए, लोगों की सोच बदल पाए।
प्रेरणास्पद कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको।