Wednesday, May 22, 2024
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नरेंद्र कौर छाबड़ा की कहानी – अपराधबोध

अस्पताल के पलंग पर अर्द्ध निद्रा की अवस्था में हिसाब लगा रही हूँ अपने रिश्‍तेदारों, परिचितों, मित्रों में से कौन- कौन मेरी मिजाजपुर्सी के लिए यहाँ आया है। निराशा हाथ लगती है क्योंकि यह आँकड़ा काफी कम है। यह भी तो सच है जब अपने जाए पुत्र विदेश में जा बसे हों तो दूसरों को क्या जरूरत पड़ी है खोज खबर लेने की। आज की व्यस्त जिंदगी में सब अपनी परेशानियों से ही निजात पाने के तरीके ढूँढ रहे होते है। किसे फुर्सत है मित्रों, संबंधियों के बारे में जानकारी रखने की! वह जमाना गया जब किसी पड़ोसी, परिचित तक की छोटी सी तकलीफ पर सब इकठ्ठे हो जाया करते थे। हर संभव मदद करने में लग जाते थे। एक अनोखा भाईचारा होता था, अब वह सब काल्पनिक बातें लगती है।
अधमुँदी पलकों के आवरण से निकलकर मेरी चेतना विदेश में बसे दोनों बेटों को देख रही है जो अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हैं। जब पति ने उन्हें मेरी बीमारी के बारे में बताया तबसे उनके फोन हर सप्ताह आने लगे हैं जबकि पहले महीने में एक बार आते थे। दोनों की बातचीत का विषय एक ही होता है – ‘माँ,अपना ख्याल रखना। अब इस उम्र में काम मत किया करो, सारे दिन के लिए नौकरानी रख लो। आखिर पैसे किस लिए होते है? अब तुम पर कोई जिम्मेदारी तो है नहीं क्यो बेकार का तनाव पालती रहती हो? हमारे यहाँ की जिंदगी तो बेहद कठिन है। पति-पत्नी दोनों नौकरी में पिसते रहते हैं तब कहीं बच्चों की अच्छी देखभाल हो पाती है। इतनी महँगाई है यहां कि तौबा, उस पर किसी काम के लिए नौकर नहीं होते। सारे कार्य स्वयं करने पड़ते हैं। थककर चूर हो जाते हैं। जैसे ही कुछ समय निकल पाया तुमसे मिलने आयेंगे।
मैं जानती हूँ कितना समय निकाल पायेंगे मेरे लिए! पिछले पंद्रह वर्षेां में दो बार आए हैं। पंद्रह दिन रहे और पंद्रह बार बताया कि यहाँ आने में उनका लाखों रुपया किराए में ही खर्च हो गया। उनकी बातों से अनजाने ही मेरे भीतर अपराध भावना आ गई थी। हमारे कारण इनका इतना पैसा व्यर्थ गया। विदेशी धरती पर रहते-रहते उनके संस्कार भी विदेशी होने लगे थे। स्वार्थता, संवेदनहीनता बढ़ती जा रही थी।
न चाहते हुए भी मैं पड़ोसन रीना की बातों को याद करने लगती हूँ। जबसे उसके पति की मृत्यु हुई हैं दोनों बेटियां बारी-बारी से उसे अपने घर ले जाती हैं। उसकी सभी जरूरतों, सुख सुविधाओं को पूरा करती है। किसी तरह का कोई अभाव, कष्ट उसे नहीं होने देतीं। तब रीना ने कहा था – ‘अगर ऐसी बेटियाँ हों तो बेटे न होने का कोई मलाल नहीं होता। आज के ज़माने में तो सभी देख रहे हैं बेटे किस तरह माँ बाप को असहाय छोड़ मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों के पीछे दौड़ते हैं। हम खुश किस्मत हैं बेटों से बेहतर बेटियाँ पाकर।’ कलेजे में हूक सी उठने लगती है काश, हमारी भी एक ऐसी बेटी होती तो आज इस हालत में देखकर दूर बैठी केवल बातें न बनाती बल्कि साथ रहकर सेवा शुश्रुषा करती। लेकिन सबका भाग्य एक सा कहाँ होता है!
अचानक महसूस होता है पलंग के नीचे पडे गंदगी के डिब्बे में से दो नन्हे हाथ मेरी ओर गुहार लगा रहे है – ‘मम्मी, मुझे बचा लो।मत मारो मुझे। मैं मरना नहीं चाहती।’ यह आवाज तेज़ होती जा रही है। मैं अपने कानों पर हाथ रख इस आवाज से पीछा छुड़ाना चाहती हूँ परन्तु आवाज अब और तेज हो गयी है। डिब्बे में दो की बजाय चार हाथ दिखाई दे रहे है – ‘मम्मी मुझे बचा लो – मत मारो मुझे –’ में पसीने से तर हो गई हूँ। नर्स आकर पूछती है – ‘क्या हुआ?’ ‘कुछ नहीं, एक बुरा सपना देखा था, डर गयी थी।’
वह इंजेक्शन देकर कहती है – आराम करो टेंशन नहीं लेना। इंजेक्शन का असर होने तक मैं फिर से अतीत के गलियारे में पहुँच जाती हूँ। शादी के बाद बिदा होकर जब ससुराल की दहलीज पर पहुँची तो सास ने आशीर्वाद दिया – ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो।’ इसे एक सामान्य आशीर्वाद मान मैं मुस्करा दी थी। सभी बुजुर्ग महिलायें नववधू को यही आशीर्वाद तो देती हैं, एक तरह से यह एक मुहावरा ही बन गया है। परिवार में हम पति, पत्नी, सास, ससुर के आलावा एक देवर व एक ननद बस इतने ही प्राणी थे। सास ने कभी रोक-टोक, प्रतिबंध नहीं लगाए। मैं उनकी उदारता पर स्तब्ध थी। ननद भी माँ जैसी मिलनसार। हँसमुख व स्वतंत्र। दो वर्ष का समय बीतने का अहसास ही नहीं हुआ। सही मायने में वैवाहिक जीवन को हम एन्जॉय करते रहे।
जिस दिन मेरे गर्भवती होने की खबर सास को मिली उन्होंने मुझे हाथों हाथ लिया। प्रेम से आलिंगनबद्ध करते हुए ढेरों नसीहतें दे डालीं – ‘बहू, अब तुम रसोई में मत आना। इन दिनों दिल खराब रहता है। रसोई के मिर्च मसालों की महक से अधिक उबकाई आती है। किसी तरह का वजन नहीं उठाना। धीरे चलना गिरना पड़ना नहीं आखिर हमारे कुल का वारिस आ रहा है –’ उनकी फिक्र व देखभाल अच्छी लगती लेकिन आखरी वाक्य सुनकर मैं परेशान हो जाती। अगर लड़की हो गई तो? पति भी बेहद उत्साहित व प्रसन्न थे अतः अपनी इस शंका को उनके सामने रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। जी मिचलाने, उल्टियां करने, आराम करने, मन बहलाव के लिए कुछ सैर करने आदी में दो महीनों का वक्त बीत गया। अगले दिन ही सास का फरमान हुआ – ‘अस्पताल जाकर चेकअप करा लो, लड़का है तो ठीक वरना गर्भपात करवा के ही आना।’
मेरे पैरों तले से जैसे जमीन सरक गयी। माँ जी यह क्या कह गयीं? पति की ओर सहायता व उम्मीद की नज़रों से देखा तो वहाँ विवशता तथा बेचारगी के स्पष्ट भाव तैर रहे थे। एकांत होते ही वे बोले – ‘वीणा, माँ दिल की बुरी नहीं है, दरअसल हमारे खानदान में परम्परा चली आ रही है परिवार में पहली लड़की को दुर्भाग्यपूर्ण मानते है अतः उसे पैदा ही नहीं होने देते। हां एक लड़के के बाद लड़की के जन्म को सहजता से लिया जाता है। तुम चिंता न करो सब ठीक हो जाएगा –’ अब मेरे पास कहने-सुनने के लिए क्या रह गया था? क्या कहती कि स्वयं को इतने उदार व स्वतंत्र विचारों वाले मानने वाले लोग इतने पोंगापंथी, रूढ़ियों को आँखे मींच अपने से चिपकाए हुए हैं!
अगले दिन पति के साथ मैं अस्पताल गयी। जाँच परीक्षण के बाद वही हुआ जिसका मुझे डर था। गर्भ में लड़की पल रही थी। पति के इशारे पर मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया जहाँ उस नन्हीं जान को मेरे शरीर से अलग कर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया। बेबस, असहाय सी मैं आँसू बहाती रह गई। प्रथम बार माँ बनने के, मातृत्व सुख प्राप्त करने के अहसास को कितनी बेदर्दी से रौंद डाला गया था। घर पहुंचने पर मेरी सूजी आंखें देखकर सास ने हमदर्दी जताई थी – ‘दिल छोटा न करो बहू, उसके घर में देर है अँधेर नहीं। देखना अगली बार जरूर लड़का ही होगा।’ मैं फफक कर रो पड़ी तो उन्होंने सिर पर हाथ फेरते हुए सांत्वना दी।
छः महीने बीतने के बाद मैं दोबारा गर्भवती हुई। इस बार परिवार मे सदस्यों के साथ-साथ मैं भी पूरी तरह आश्‍वस्त थी कि लड़का ही होगा। लेकिन जाँच परीक्षण की प्रक्रिया के पश्‍चात जब डॉक्टर ने बताया गर्भ में लड़की है तो सभी के चेहरों पर मुर्दनी छा गयी। सास की नाराजगी तो शब्दों में व्यक्त हो गयी – ‘पता नहीं कैसी कोख है इसकी, हर बार लड़की आ जाती है।’ मैं अपना यह अपमान बर्दाश्‍त नहीं कर पाई। पहली बार अपना विरोध प्रगट करते हुए कह दिया – ‘माँजी, क्या बेटे-बेटी के लिंग का फैसला कोख करती है? उसका कार्य तो बच्चे को पालना होता है, लिंग निर्धारण नहीं। फिर उसे आप क्यों कोस रही है?’ जब गर्भपात कराने की बात आई तो मैंने उसका विरोध किया लेकिन मेरी बात तो नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई। मेरी एक न चली और फिर एक नन्हीं जान को मारकर कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया। इस बार मैं शारीरिक व मानसिक रूप से भी टूट गयी थी। घर आकर बहुत रोई थी पति से जब कहा – ‘हम कब तक कन्या हत्या करके पाप करते रहेंगे?’ तो उन्होंने कंधे थपथपा कर मुझे सांत्वना दी थी। इस बार सहज होने में मुझे काफी वक्त लगा था। बार बार नन्हें-नन्हें हाथ नजर आते मानो मुझे पुकारकर कह रहे हों – ‘मम्मी, मुझे बचा लो। मैं मरना नहीं चाहती –’
तीसरी बार बेटे का जन्म हुआ तो घर परिवार में उत्सव सा माहौल बन गया। बैंडबाजे बजवाये गये, मोहल्ले में मिठाई बाँटी गयी, गरीबों को खाना खिलाया गया, सास मेरी बलैयां लेती रही पोते की नज़र उतारती रही। तब मुझे बेटे की माँ होने का गर्व अनुभव हुआ। काश पहली बार ही बेटा हो जाता तो उस दुखद स्थिति का सामना न करना पड़ता। फिर वर्तमान की खुशी में अतीत की कड़वी यादों को भुलाती हुई मैं बेटे को पालने में व्यस्त हो गई। दो वर्ष पश्‍चात जब दूसरे बेटे का जन्म हुआ तो सास ने प्यार से कहा – ‘देखा, मैंने कहा था न उसके घर देर है। अँधेर नहीं’ दो बेटों की माँ बनने पर मुझे घर बाहर जो इज़्ज़त, मान, प्यार मिलने लगा उसने मेरी सोच ही बदल दी। मैं भी बेटी को महत्त्वहीन मानने लगी। ओर दो बेटों के परिवार को सीमित कर लिया। जब कभी मेरी मुलाक़ात ऐसी महिला से होती जिसे केवल लड़कियां थीं तो मुझे उस पर तरस आने लगता। उसे मैं बेचारी व अभागिन मानने लगती। समय के साथ-साथ यह संस्कार भी पक्का होता गया।
दोनों बच्चों की बेहतरीन परवरिश में मैं व्यस्त हो गई। उनकी हर माँग पर ख़्वाहिश पूरी करने की सदा मेरी कोशिश रहती। उन्हें कोई अभाव न हो इसका प्रयत्न करती। सास को तो वैसे ही दोनों पोते बेहद प्रिय थे अतः उनपर कोई प्रतिबंध टोकाटाकी का कोई प्रश्‍न ही नहीं था। बच्चे छोटे थे उन्हीं दिनों सास सुदूर तीर्थयात्रा पर गये। दुर्भाग्यवश रास्ते में उनकी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई तथा दोनों की वहीं मृत्यु हो गई। अब बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी पूरी तरह मुझ पर आ गई थी। उन्हें बेहतर शिक्षा के साथ साथ बेहतर वातावरण प्रदान करने के इरादे से हमने मोहल्ला भी बदल लिया। जहाँ उच्च वर्ग के लोग रहते थे उसी कालोनी में मकान ले लिया। बच्चों को अच्छे सहयोगी, मित्र भी मिलने चाहिए क्योंकि उनके चरित्र स्वभाव व संस्कार पर इन सब का भी प्रभाव पड़ता है यही सोचकर यह कदम उठाया।
बच्चे दोनों ही मेघावी थे। स्कूली शिक्षा अपनी-अपनी कक्षाओं में अव्वल होकर उन्होंने प्राप्त की। उसके पश्‍चात उच्च शिक्षा के लिए देश की जानी मानी संस्थानों में दोनों को ही दाखिला मिल गया। यहाँ की शिक्षा काफी महँगी थी। आम भारतीय की तरह हमारी सोच भी यही थी कि बच्चों के सुखद भविष्य का निर्माण हर अभिभावक का कर्तव्य है। अर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव आते रहे जिसके कारण कई बार हम अपनी जरूरतों में कटौती कर लेते। लेकिन उनकी शिक्षा में कोई अभाव नहीं आने दिया। मन में विश्‍वास था दोनों की बढ़िया नौकरी लग जाएगी फिर उनके विवाह करके पोते-पोतियों की रौनक से अपना दिल बहलायेंगे। आदर्श परिवार की तरह जीवन जीयेंगे। बेटे समझदार हैं माँ-बाप की परवरिश में जो कठिनाइयाँ आती हैं उन्हें समझते हैं। कभी-कभी कहते भी है – ‘माँ, मेरी नौकरी लग जाने दो फिर देखो मैं तुम्हारी सारी इच्छा, कामनाएं पूरी करूँगा। हमारी महँगी पढाई के कारण तुमने अपनी जरूरतों को सीमित किया, तो कभी मन मारा हम सारा हिसाब चुकता कर देंगे।’ मैं मुस्करा कर रह जाती अच्छा है इन्हें यह अहसास तो है वरना आजकल की पीढ़ी इतनी स्वार्थी हो गई है केवल लेना जानती है।
बड़े बेटे का कोर्स पूरा होते ही उसे बहुराष्ट्रीय कंपनी में बढ़िया नौकरी मिल गई। हम सब का खुश होना स्वाभाविक था। साल भर उसे राजधानी में रहने के बाद विदेश जाने का आदेश दिया गया। वह बेहद प्रसन्न, उत्तेजित था। बेशक उसके कैरियर की यह बडी छलांग थी फिर भी हमारे भीतर जैसे कुछ दरक गया था। हमारी मनोस्थिति को जान वह बोला – ‘आप लोग चिंता न करें। दो तीन साल में मैं वापस लौट आऊँगा – ’ दो साल बाद उसका फ़ोन आया अपने साथ काम करने वाली विदेशी युवती के साथ उसने शादी कर ली थी। मन कसैला हो गया था। अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति का पहला नमूना उसने दिखा दिया था। जन्मदाता थे अतः उसके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए बधाई दी।
अब हमारी सारी उम्मीदें छोटे बेटे पर आकर ठहर गई थीं। कहीं वह भी बड़े के पदचिन्हों पर चलते हुए विदेश न चला जाए इस सोच से हम स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे। इसी भय व आशंका के कारण हमारा उसके प्रति स्नेह व फ़िक्र बढ़ गयी थी। उसकी छोटी-छोटी बातों का, सुविधाओं का ख़्याल करने लगे। गाहे-बगाहे उसे संयुक्त परिवार के फायदे, माँ-बाप के प्रति संतान के फ़र्ज़ जैसे विषयों पर संकेतात्मक उपदेश भी दे डालते। सालभर बीतने के बाद उसकी शिक्षा पूरी हुई और तभी वह धमाका हुआ जिससे हम डर रहे थे। किसी बड़ी प्रतिष्ठित विदेशी कंपनी ने उसे बहुत बढ़िया नौकरी के लिए चुना। हमारी हालत साँप-छछुंदर जैसी थी। न तो उसे जाने के लिए कहने की हिम्मत हो रही थी और न रोकने की। हिम्मत करके मैंने कह दिया – ‘बेटा, विदेश में अगर पैसा अधिक है तो महँगाई भी उतनी ही है। सिर्फ़ पैसों के लिए वहाँ अलग-थलग पड़े रहने से तो अच्छा है यहीं कोशिश करो। अपने देश में भी आजकल लाखों की नौकरियां मिलती हैं। अपने परिवार के साथ रहकर जो शांति सुकून मिलता है, वह विदेश में कहाँ मिल सकता है?’वह फ़ौरन बोल उठा – ‘माँ, मैं वहांँ बसने थोड़े ही जा रहा हूँ? दो-चार साल रहकर पैसा कमा कर लौट आऊँगा। आख़िर तो मुझे यहीं रहना है आप लोगों के साथ-’ थोड़ी सी आस बँधी थी उसकी बातों से।
दिन महीने और वर्ष बीतने लगे। चार साल बाद छोटे बेटे ने पत्र के साथ एक फ़ोटो भेजी, जिसमें वह उसकी पत्नी और साथ में सालभर का बेटा था। उसने लिखा था कि अति व्यस्त दिनचर्या के कारण वह अपनी शादी व बेटे के जन्म के बारे में सूचित नहीं कर पाया। अगले साल वह परिवार सहित हमसे मिलने आएगा कुछ दिनों के लिए। हमारे पैरों तले से जैसे जमीन सरक गयी थी। लगा था जीवन में भूकंप आ गया है। सब कुछ तहस नहस हो चुका है। आस के जो दिए आँखों में टिमटिमा रहे थे वे भी बुझ गये। अब तो उसका यहाँ हमारे साथ रहने का प्रश्‍न ही नहीं रहा। बेशक दोनों बेटों के इंद्रधनुषी स्वप्न फलीभूत हो गये थे और यह खुशी की बात थी। लेकिन वृद्ध माँ बाप के लिए क्या बेटों का कोई कर्तव्य नहीं होता? यही बात दिल की गहराइयों में उतरती चली गई। परिणामस्वरूप अवसाद तनाव बढ़ते चले गये और बीमारियाँ अपना स्थान बनाने लगीं। पति भी उदास, चिंताग्रस्त रहने लगे। असहाय से हम मूक नजरों से एक दूसरे को देखते। अपनी परेशानियाँ भीतर समेटे हुए नीरस, उद्देश्‍यहीन सा जीवन जीने लगे थे।
पिछले सप्ताह मुझे दिल का दौरा पड़ा है तब से अस्पताल मे हूँ। काफी थकान, कमज़ोरी महसूस कर रही हूँ। बेटों को ख़बर की तो उनकी ओर से केवल एहतियात बरतने की हिदायतें मिल रही हैं। बीमारी में खर्च भी बहुत हो चुका है परंतु किससे कहें? बेटों को कहने की हिम्मत नहीं वे स्वयं अपनी तंगहाली बयान करते रहते हैं। विचारों के द्वंद्व में फँसी मैं अपराधबोध से घिरने लगी हूँ। क्यों दो दे बेटियों की हत्या करवा दी? क्यों विरोध नहीं कर सकी? अगर आज एक भी बेटी होती तो क्या हमें इस तरह एकाकी, असहाय, अवसादग्रस्त स्थिति में जीने देती? बेटी के दिल में माँ बाप के प्रति स्नेह, ममता व प्रेम जीवनपर्यंत रहता है। उनकी बदहाल स्थिति से वह केवल चिंतातुर ही नहीं होतीं बल्कि उन्हें सहारा देने के लिए आगे भी आती हैं। मेरी सोच भी कितनी ग़लत हो गई थी दो बेटों की माँ बनकर! महसूस होता है चार नन्हें हाथ मेरी तरफ बढ़े आ रहे है – ‘माँ, हम तो तुम्हें इतना प्यार करती थीं, फिर हमें अपने से अलग कर क्यों फेंक दिया? अब तो तुम दो-दो बेटों की माँ हो फिर खुश क्यों नहीं हो? हमें मरवाकर क्या प्राप्त हुआ?’ मेरी आँखों से आँसुओं का रुका बाँध टूट पड़ा है। झरझर बहते आसूँओं के बीच में अपनी अजन्मी बेटियों से माफ़ी माँगती हूँ। पश्‍चात्ताप के आँसूओं के बीच मैं दृढ संकल्प कर रही हूँकि स्वस्थ होने के बाद परिचितों, रिश्‍तेदारों, मित्रों के साथ-साथ सभी अभिभावकों से खुला आह्वान करूँगी कि बेटी की हत्या न करें। उसे जन्म लेने दे, पालें-पोसें, प्यार स्नेह दें क्योंकि बेटी बड़ी अनमोल होती है।
नरेंद्र कौर छाबड़ा
नरेंद्र कौर छाबड़ा
संपर्क - narender.chhabda@gmail.com
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2 टिप्पणी

  1. अच्छी और प्रेरणास्पद कहानी हैआपकी नरेंद्र जी! पता नहीं लोगों को लड़कियों से क्या दिक्कत है? हम लोग तो पाँच बहने थे लेकिन हमारे पिताजी ने कभी भेदभाव नहीं किया। खुद अच्छे से रखा। अधिक पढ़ी-लिखे लोग ही इस तरह की उलझन में उलझते हैं। आज के समय में तो लड़के और लड़कियाँ सब बराबर हैं।
    किंतु आपकी कहानी भी सच्चाई के करीब है।बच्चे भी विदेश चले जाते हैं और उनकी मानसिकता फिर वहीं की तरह हो जाती है ।वापस लौटना नहीं चाहते ना ही माता-पिता की खबर रखते।
    बहुत सच्ची कहानी है बधाइयां आपको।

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