‘रिंगिंग बेल’ क्लिनिक के मालिक डॉ प्रमोद रस्तोगी सप्ताह में दो दिन निशुल्क परामर्श देते थे। आज निशुल्क परामर्श का दूसरा दिन था। सारे दिन के थके मांदे वे उठने ही वाले थे कि एक घबराई हुई स्त्री ने एक लड़की के साथ क्लिनिक में प्रवेश किया –
“डॉ साहब मेरी बच्ची… ” उसने लड़की को ऐसे पकड़ा हुआ था जैसे कि यदि उसकी पकड़ तनिक भी जो ढीली हो गई तो, लड़की हाथ छुड़ाकर भाग जायेगी।
“आराम से बैठिये और तसल्ली से बताइये क्या हुआ है? डॉ प्रमोद ने दोनों को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
“डॉ साहब, प्लीज़ मेरी बच्ची को बचा लीजिए। रात इसने आत्महत्या करने की कोशिश की। पड़ोसन की लड़की ने, अपनी खिड़की से देख लिया वरना…अगर वह समय पर आकर सचेत नहीं करती तो आज… आज… “हिच्च!
आत्महत्या!
जैसे गर्म चिमटा किसी ने उनकी पीठ से छुआ दिया हो।
उन्होंने उस लड़की को देखा- पपड़ाए होंठ, काले घने बाल, बादामी बड़ी-बड़ी सूनी आँखें, पीला ज़र्द चेहरा, मुरझाई देह, मानो पच्चीस छब्बीस वर्ष की, सुंदर युवती की एक ताज़ा ममी।
उनके हृदय में तीख़ी कचोट उठी –
“क्या इनका विवाह…?”
“नहीं, लड़का धोखेबाज़ निकला, प्रेम में धोखा मिला है इसे, दिल टूटा है इसका, लड़का एक अमीर लड़की से शादी कर रहा है।”
कुछ देर तक वे किंकर्त्व्यविमूढ़ से उस स्त्री की हालत, उसका रोना बिलखना देखते रहे।
“आपने मुझे पहचाना नहीं डॉ साहब, मैं नीलम हूँ, जब आप लखनऊ में थे, तब डॉ राजेश के रेफरेंस से, आपने मेरा इलाज़ किया था। मेरे पति ने मुझे धोख़ा दिया था, जिस कारण मैं डिप्रेशन में चली गई थी। तब आपने मुझे बचाया था। बचाया ही नहीं जीवन का सही अर्थ भी समझाया था। आज मेरी एकलौती बेटी उसी स्थिति से गुजर रही है। मेरी बच्ची को आप ही बचा सकते हैं- डॉ साहब। मैं आपको ढूंढती हुई आपके पास पहुंची हूँ। इसे बताइये, आत्महत्या करना किसी समस्या का हल नहीं है, आप समझाइए। यह कायर परिस्थितियों से लड़ने की बजाय, आसान रास्ता चुन रही है।”
डॉ प्रमोद ने नीलम को पहचान लिया, उन्होंने ही उसका इलाज़ किया था। उन पर उसका भरोसा और विश्वास देखकर, उन्होंने संतोष की एक लंबी श्वास भरी।
यह भरोसा और यह विश्वास…
अनायास उनकी आँखों में आत्मविश्वास की गहरी चमक झिलमिला उठी। इसी भाव में उन्होंने लड़की की ओर देखकर कहा – “आप निश्चिंत रहें, इसे कुछ नहीं होगा। ठीक हो जायेगी यह।”
उन्होंने लड़की से उसके मन की बातें बड़े धैर्य से सुनीं। इलाज़ (थैरेपी) से संबंधित ज़रूरी बातें उसको समझाईं। कुछ चुटकुले सुनाए और पाँच दिन बाद आने को कहते हुए, उसके लिए पाँच दिन की कुछ दवाएँ लिखीं। लड़की कुछ रिलेक्स होकर अपने घर लौट गई तो उन्होंने राहत की साँस ली।
आँखे बंद कर उन्होंने सिर कुर्सी से टिका दिया। कुछ घुमड़ आया उनके सीने में, एक यह दिन है उनकी ज़िंदगी में और एक वो दिन था जब… एकाएक पुरानी घटनाएं उनके सन्मुख आकर सजीव होने लगीं –
“मैं इस दुनिया में अब रहना नहीं चाहता…”
खिड़की के नीचे, दीवार से सटी छोटी मेज़ पर पेपरवेट के नीचे दबा काग़ज़ हवा में बार – बार फड़फड़ा उठता। उन्होंने उसे देखा, फिर नज़र फेर ली।
वाक्य अधूरा था। जिसे उन्होंने पूरा करने की ज़रूरत नहीं समझी। शब्द वही थे, जो कई दिनों से उनके अंतर को मथ रहे थे।
घर शांत था। असहज रूप से शांत। इतनी शांति कि हर आवाज़ अधिक स्पष्ट सुनाई दे रही थी – घड़ी की टिक-टिक, पंखे की धीमी घरघर, और उनकी अपनी साँसें।
सब कुछ अचानक नहीं हुआ था। महीनों से वे भीतर ही भीतर टूट रहे थे। वे जानते थे, उनको क्या हुआ है, वे उस बीमारी का नाम भी जानते थे और लक्षण भी। फिर भी…
जब उन्होंने वह नोट लिखा, उनका जिस्म पसीने-पसीने हो गया था। मगर पंखे से फंदा बाँधते समय उनके हाथ नहीं काँपे। यह उन्हें हैरान कर गया।
रात के नौ बजे जाते थे। एक अबूझी वहशत उन पर हावी होने लगी थी। अपने बच्चों को देखने की अपनी अंतिम इच्छा का उन्होंने मान रखा। मोबाईल खोला…
ओह! मेरे बच्चे… अपने बच्चों की तसवीरों को देखते हुए उनका दिल नहीं भर रहा था। आह! एक तेज टीस उठी और उनके सीने में धँसती चली गई।
वे जीवन से पूरी तरह संतुष्ट थे, ऐसा नहीं था, लेकिन वे इतने विरक्त और उदासीन भी कभी नहीं हुए थे कि अपने लिए फंदा बुनते।
‘आकांक्षा… तुम तुम तो वही रहीं, जो तुम थीं। मगर मैं, मैं तो वह नहीं था, जो हो गया हूँ…’ उनके मुँह से आह निकली।
उन्हें आकांक्षा की याद अनायास नहीं आई। वह तो हर समय मौजूद थी। अब वे यह मानने लगे थे कि आकांक्षा कोई अपवाद नहीं थी। वह उस खाली जगह में आई थी, जो पहले से मौजूद थी।
यों उस जगह को वे सदा खाली रखना चाहते थे, ऐसा नहीं था। पर ऐसा भी नहीं था कि वे उसका विज्ञापन करते फिरते हों। भले उस खाली स्थान से अब विरक्ति हो गई हो, उससे उबकाई आती हो। पर हर किसी को इतनी अनुमति तो नहीं थी न।
आकांक्षा की बात अलग थी। वह आई तो बस आती चली गई। यहाँ न अनुमति की जरूरत थी न हठ की।
“आपसे बात करके सुकून मिलता है मुझे, आप वैसे ही इंसान हैं, जैसा मैं हमेशा से चाहती थी।” उसने कहा तो उन्हें लगा था, बरसों से सूखी पड़ी हृदय की बंजर धरती पर जैसे झूमकर मेह बरसा है। जो शब्द उनके कानों में कभी नहीं पड़े थे, जिन्हें सुनने को वे आजीवन तरसे थे। वे शब्द इस उम्र में सुनने को मिलेंगे, सोचा नहीं था।
शहर के बाहर स्थित, एक पॉश कॉलोनी में बनी, अपनी शानदार दुमंजिला कोठी ‘सुहासिनी’ की बालकनी में बैठे – वे, शाम ढले अक्सर, सामने बने हाईवे से गुजरते लोगों को देखा करते। साठ पार कर चुके थे, पर चेहरा अब भी तना हुआ, चाल में ठसक थी।
सीएमओ के पद से रिटायर हुए थे। प्रशासनिक सेवा में ऊँचा पद यानी पेंशन भी अच्छी ख़ासी मिलती थी और निवेश भी ठीक-ठाक था। पर धन खुशियों की गारंटी तो नहीं…
कोई ऐसा न था, जिसके साथ बैठकर शाम की चाय पी जा सके—
पत्नी सुहासिनी उनसे वर्षों पहले अलग हो चुकी थी। वह भी डॉक्टर थीं। पहले प्रेम की असफलता के बाद, उन्होंने ‘हमपेशा’ से विवाह तो कर लिया था, पर ‘हमसफर’ उनको कभी न मान सकी। और दूसरे प्रेम को सफल बनाने के लिए उन्होंने उनसे संबंध विच्छेद भी जल्दी कर लिया। यों उनके मन का कोना जो रिक्त था, सदैव रिक्त ही रहा।
बच्चे भी किशोर अवस्था में जो विदेश पढ़ने गए। फिर देश नहीं लौटे। दोनों ने आस्ट्रेलिया में अपनी नई दुनिया बसा ली। अब वे उनके लिए पिता नहीं, व्हाट्सएप कॉन्टैक्ट थे। जिससे कभी-कभी वे उनके हालचाल ले लिया करते, या उनके पोतों, दोहितों की तस्वीरें साझा कर दिया करते थे। यही एक लालच था और यही एक मोह बचा था उनके पास। उनकी दुनिया अब मोबाइल और व्हाट्सअप तक सीमित होकर रह गई थी।
पूरा दिन उनका वाट्सअप चैक करते-करते बीत जाता। जिस दिन बच्चों की कोई फ़ोटो, वॉट्सएप से मिल जाती तो वे सारा दिन होंसे होंसे फिरते। न मिलती तो दिल न लगता कहीं। दिन भर की खामोशी उन्हें खलती। घर बड़ा था और उसमें खालीपन और भी बड़ा। जिसमें रात सबसे कठिन।
होने को तो वे किताबों के आदमी थे, पर किताबें भी मन की तन्हाई कहाँ भरती हैं। धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि तन्हाई भी शोर करती है।और उस तन्हाई से बचने के लिए आदमी कहीं भी भाग सकता है, ख़ुद से दूर, सोशल मीडिया पर भी। वे भी सोशल साइट्स की ओर आकर्षित होने लगे। देर रात तक पता नहीं क्या-क्या खोजते रहते। कभी फेसबुक… कभी इंस्टाग्राम… कभी कोई और साईट।
दिल बहलने लगा तो उन्होंने फेसबुक पर अकाउंट बना लिया। उनकी शानदार प्रोफ़ाइल देखकर, फ्रेंड रिक्वेस्ट धड़ाधड़ आने लगीं। इन्ही में एक नाम था – आकांक्षा। चालीस के आसपास की स्त्री। तस्वीरों में मुस्कुराती। फेसबुक पर वह कविताएँ लिखती थी। खाली प्रेम की उदास कविताएँ।
‘शायद कोई खालीपन है इसके जीवन में’, उसकी कविताओं में उनको अपना खालीपन दिखने लगा था।
उन्हें ही ऐसा लगा या दूसरे लोगों को भी लगता था, न मालूम। पर उसकी कविताओं के वे बड़े प्रशंसक हो गए थे। उन्होंने एक दिन टिप्पणी की – “बहुत गहराई है आपकी पंक्तियों में।”
इस टिप्पणी पर कुछ देर बाद ‘लाल दिल’ (रेड हार्ट) उभरा। बस उतना ही। पर उस ‘दिल’ से उनके भीतर जैसे कोई जलतरंग बज उठा था। अब वे उसकी हर पोस्ट पढ़ने लगे थे। नई पुरानी, बार-बार।
इनबॉक्स बातों का माध्यम बना। कविताओं से शुरू हुई बातें कब जीवन और फिर अकेलेपन पर पहुँच गयीं, उन्हे पता भी नहीं चला। आकांक्षा बहुत ध्यान से पढ़ती उनकी बातें। कहती – “आपकी बातें मुझमें ऊर्जा भर देती हैं, जैसे आप सूर्य और मैं धरती।”
ऐसे शब्द अपने लिए, उन्होंने उस तरह कभी नहीं पढ़े / सुने थे, जैसे आकांक्षा लिखती थी। धीरे-धीरे फोन नंबर बदले, और जल्द ही व्हाट्सएप पर गुड मॉर्निंग, गुड नाइट के संदेश आकर्षक चित्रों के साथ उभरने लगे।
अब वे सुबह जल्दी उठने लगे थे। रात देर तक जागते। मोबाइल तकिये के पास रहता। मानो जीवन ने इतना व्यस्त उन्हें कभी नहीं रखा था। न भोजन का होश। न शाम की इवनिंग वॉक का। आकांक्षा का जादू उनके सिर चढ़कर बोलने लगा। उन्होंने एक दिन कहा – “मिलोगी आकांक्षा, मैं आऊँ?”
आकांक्षा ने संकोच के साथ कहा था – “आप नहीं, मैं आती हूँ। यहाँ किसी परिचित ने देख लिया तो…फिर तुरंत सकुचाते हुए कहा, ‘ वहाँ भी मैं अकेली कैसे ही आ पाऊँगी। वह भी इतनी दूर, जहाँ कोई रिश्तेदार भी नहीं, जहाँ रात को ठहरा जा सके।”
उन्होंने उसकी हर आशंका को निर्मूल साबित करते हुए कहा था- “उसकी सुरक्षा, उसके आने जाने और ठहरने की व्यवस्था वे स्वयं करेंगे।”
कुछ दिनों बाद वह आई। पहली मुलाकात, किंतु यूँ लगा उनको जैसे वे बरसों से एक दूसरे को जानते हों। आकांक्षा ने पहली बार में ही उनका दिल जीत लिया। कहने को चंद बातें हुईं, कुछ खामोशियाँ, झिझक और दोपहर का लंच। बस। फिर भी उनका चैन ले गई आकांक्षा।
दूसरी बार वह देर तक रुकी। कुछ हँसाया, कुछ हँसी। थोड़ा रुलाया, थोड़ा रोई। उनका नाम रखा – कृष्णा और अगली बार दोबारा जल्दी आने का वादा किया।
तीसरी बार में उसने उनका हाथ थाम लिया – प्रेम से। जीवन में पहली बार किसी के लिए ज़रूरी होना महसूस किया उन्होंने।
“मेरा आस्तित्व तुम्हारे साथ से जी उठा है आकांक्षा, वरना मैं जीवित कहाँ था। मेरे जीवन में कितना अकेलापन था, तुम्हें इसका आभास भी नहीं…”
वे इसके आगे कुछ और कहते उससे पहले ही, आकांक्षा ने प्रेम से उनके मुख को अपने कोमल हाथों में ले लिया। उनके चौड़े सीने में ऐसे दुबक गई, जैसे बिल्ली का बच्चा। उनका रुआं रुआं उसका ऋणी हो गया था पल में। ठीक उसी पल, एक झटके से उनसे अलग होकर, अपना बैग उठाकर, तेजी से घर से बाहर की ओर दौड़ गई – वह, यह कहते हुए कि – “काश! मैं आपके लिए कुछ कर सकती… । काश! मुझ पर घर की जिम्मेदारियाँ न होतीं। कृष्णा, प्लीज़ मुझे भूल जाइए।”
इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, उसको रोक पाते, वह चली गई थी।
वे टूटे वृक्ष से सोफ़े पर गिर पड़े। गर्म आँसुओं की अविरल धारा आँखों से बह निकली थी – हाय! अभी तो प्रेम परवान भी न चढ़ा था और सब ख़त्म…। सारी शाम, पूरी रात वे आकांक्षा को फोन मिलाते रहे, हर बार नोट रिचेबल आता रहा। उनकी समझ में नहीं आया कि उनसे क्या भूल हुई जो आकांक्षा उनको यूँ छोड़कर चली गई।
कई दिन मानसिक उथल-पुथल में गुजर गए।आकांक्षा के बगैर वे अब जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। इतना भान था उन्हें कि शायद वे विवाह बंधन में न बंध सके, पर ‘एक ‘दोस्त’ जो प्रेमी की तरह हो’ की चाह तो रख ही सकते थे।
अंततः कई दिनों की रिंग के बाद उनका फोन उठा। वे फूट-फूटकर रो पड़े। उनके रोने पर उधर आकांक्षा भी रो पड़ी थी।
उन्होंने पूछा था –
“ऐसी क्या बात है अक्कू, जो मुझसे दूर जाना चाहती हो। क्या मैं अच्छा आदमी नहीं? ”
“ऐसा मत कहिए, आप तो बहुत अच्छे हैं। आप… आपसे मैं दोबारा मिली तो फिर अपने घर न लौट सकूँगी”
आकांक्षा के भीगे स्वर में विवशता महसूस हुई थी उन्हें – “तो फिर क्या बात है अक्कू, मुझे बताओ ना!” वे व्याकुल हो उठे थे।
“कुछ नहीं, आप जाने दें, ये मेरी परेशानियाँ हैं, मुझे ही इनसे जूझने दें।आप, आप मुझे भूल जाइये कृष्णा।” आकांक्षा की आवाज़ भर्रा गई थी।
वे भावना में बह गए। उनका मन किया वे युवाओं की तरह सारी दुनिया से विद्रोह कर दें और अपनी आकांक्षा को अपने घर ले आएँ। उन्होंने गंभीर होकर पूछा –
“बताओ अक्कु, यदि मुझे अपना समझती हो तो… और यदि पराया हूँ तो…” व्यग्रता की पराकाष्ठा में उनका गला रुँध गया था।
“मुझे अपना घर छुड़ाना है, गिरवी पड़ा है, यदि इस सप्ताह में नहीं छुड़ाया तो हम सड़क पर आ जाएंगे।”
“क्या? तुमने कभी बताया नहीं” वे जोर से चौंके थे।
“हाँ…मगर बताकर भी क्या होता।”
“मुझे बताओ तो!”
इसके बाद आकांक्षा ने जो बताया, वह दिल दहलाने देने वाला था – ‘उसके पिता ने, उसके भाई के लीवर ट्रांसप्लांट के लिए, अपनी करोड़ों की कोठी गिरवी रखकर ब्याज पर पैसा लिया था। लीवर ट्रांसप्लांट के लिए भाई को जिस कार से उसके पति और पिता ले जा रहे थे, उसका भयानक एक्सीडेंट हो गया था। भाई और पति तो दुर्घटना स्थल पर ही खत्म हो गए थे। और पिता ने दोनों पैर खो दिये थे।
बड़ी विपदा टूटी थी उन पर। एकलौती बची संतान होने के नाते, उनको संभालनें की नैतिक जिम्मेदारी उसकी थी। इसलिए अपनी बेटी प्रिया के साथ उनके पास रहने आ गई। ससुराल में यों बचा भी क्या था उसका। एक होटल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी कर ली। पर छोटी सी नौकरी की छोटी सी तंख्वाह में तो गुजारा भी ढंग से नहीं होता तो, कर्ज़ कैसे ही चुकाती। पाँच साल में अब इतना ब्याज़ हो चुका है कि कोठी पर लेनदार कब्ज़ा करना चाहता है।
‘या तो घर खाली करो, नहीं तो उसकी बात मानो।’ अल्टीमीटम दे चुका है। इसलिए न चाहते भी, सत्तर वर्षीय लेनदार की शर्त उसको माननी ही होगी। अपने बूढ़े माँ – बाप और अपनी छोटी – सी बच्ची को लेकर सड़कों पर तो नहीं रह सकती न।’
“क्या शर्त है उसकी ” उन्होंने पूछा था
“यदि मैं पिछत्तर साल के उस कामुक व्यक्ति की ‘उपपत्नी’ बन जाऊँ, तो वह सारा क़र्ज़ा माफ कर देगा और इस घर से हमें निकालेगा भी नहीं।” यह कहकर आकांक्षा रोने लगी।
“उप पत्नी! यानी…” उन्हें जैसे बिच्छु ने डंक मारा था।
“रखै…ल”
“शटअप! जो मैं सुन भी नहीं सकता, तुम बोल भी कैसे सकती हो?” उनका स्वर कठोर हो आया था।
“आप बोलने की बात करते हैं, मुझे तो सहना है…” हिचकियों का गझिन गुबार उठ गया था उधर, उससे उनकी सांसें भारी हो गईं। शब्द शब्द बेबसी में बिंधा था आकांक्षा का। उन्हें लगा, जैसे किसी ने उन्हें ही जंजीरों में जकड़ दिया है। उनका स्वयं पर से नियंत्रण जाता रहा –
“अगर 27 लाख मैं तुम्हें दे दूँ तो?”
और दो दिन के भीतर, वे उसे सताईस लाख की मोटी रकम भेज चुके थे। उनकी आकांक्षा उनके रहते किसी ‘और’ की कैसे हो सकती थी?
यहीं वे चूके थे—एक मनोचिकित्सक होकर भी।उन्होंने मदद इसलिए नहीं की थी कि वे मूर्ख थे, बल्कि इसलिए कि वे अकेले थे। और अकेलापन अक्सर विवेक से तेज़ चलता है।
अब आकांक्षा के व्यवहर में पहले से भी अधिक नरमी आ गई थी। महीने में दो तीन बार, वह 318 किमी का सफर तय करके देहारादून, उनके निवास पर आती, जहां दोनों जीवन के बेहतरीन पलों को साथ गुजारते। उन्होंने आकांक्षा का अदेखा घर हर सुख सुविधा से भर दिया था। आकांक्षा के परिवार का खर्च ऐसे उठाते थे, जैसे वे उनकी जिम्मेदारियाँ हों। देखते-देखते साल गुजर गया। आकांक्षा की अभिलाषाओं और मांगों की लिस्ट दिन ब दिन लंबी होती जा रही थी और उनका बैंक बैलेंस शून्य पर पहुँच चुका था। उस पर वे अस्सी लाख रुपये से ऊपर खर्च कर चुके थे। पेंशन पर भी वे उसकी बिटिया के भविष्य में इन्वेस्ट के लिए लोन उठा चुके थे।
“मुझे इस बार दीपावली पर छोटा ही सही, एक डायमंड सेट चाहिए, दोगे ना…” बिस्तर पर उनकी बाहों में सिमटती आकांक्षा ने कहा तो उन्होंने प्रेम से उसकी लटों को उसके माथे से हटाते हुए कहना चाहा, ‘मेरे पास अब कुछ नहीं है अक्की, सब तुम्हें दे चुका हूँ। पेंशन भी अगले महीने से कटकर मिलेगी इतना मैंने सोचा ही नहीं कि अब क्या होगा बस सब करता चला गया…’ पर चुप रह गए। आकांक्षा ने दोबारा कहा तो बस इतना बोले – “अभी ये सब संभव नहीं। पेंशन भी कटकर मिलेगी अब। सोचता हूँ, प्रैक्टिस शुरू कर दूँ, अभी तक जरूरत न लगी थी पर अब तुम्हारे लिए… सोचता हूँ करूँ।”
“आप, नोयडा ही शिफ़्ट हो जाइए न, यह घर सुंदर है, पर अब मैं आपके साथ हर पल रहना चाहती हूँ। यह घर बेचकर… “
“यह घर पूरा मेरा नहीं। इसमें आधे से ज्यादा की हिस्सेदार मेरी एक्स वाइफ सुहासिनी है। उसने ये बच्चों के नाम कर दिया है। अब तो यह सब बच्चों का। उनको ही जब जरूरत होगी, तभी बिक सकेगा।”
“हम्म, कोई बात नहीं। आप ठीक रहें, मेरे लिए तो यही बहुत है” कहती हुई वह फोन लेकर बिस्तर से उतरी और बाथरूम में चली गई – कुछ देर बाद बाहर निकली तो उसकी आँखों में आँसू थे।
“क्या हुआ अक्की?” मिलन के लिए हुलसे, कब से उसका इंतजार कर रहे थे – वे। मगर उसकी आँखों में आँसू देखकर अकबका गए।
“वो, पा पापा…”
“क्या हुआ पापा को?”
“हार्टअटैक… प्रिया का मैसेज है, उनको अस्पताल लेकर जा रहे हैं। मेरे लिए तुम कैब कर दोगे ना? ओह गॉड… देखो फ़्लाइट है क्या दिल्ली की?” आकांक्षा लगातार रोये जा रही थी और अपना सारा सामान समेटे जा रही थी। उन्होंने साथ चलना चाहा तो मना कर दिया। आनन फानन में उन्होंने फ़्लाइट से उसके दिल्ली पहुँचने की व्यवस्था की। रोते-पीटते वह दिल्ली के लिए निकल गई। और वे… भौंचक खड़े देखते रह गये।
कई दिन बीत गए, वे जब भी आकांक्षा को फोन लगाते नॉट रिचेबल मिलता। सप्ताह बीतते न बीतते वे बदहवास हो गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। वे प्रार्थना कर रहे थे कि सब ठीक हो। आकांक्षा की खोज ख़बर के लिए उनके पास एकमात्र चारा केवल फेसबुक बचा। उस पर गए तो अकाउंट उन्हें डी एक्टिवेट मिला। वे हैरान रह गए। ऐसे कैसे? आकांक्षा एकदम से गायब हो गई थी। स्वयं को बहुत अकेला महसूस कर रहे थे। उन्होंने आकांक्षा के घर नोएडा जाने का फैसला किया।
नोएडा पहुँचकर उन्हें पता चला, वहाँ ऐसी कोई कोठी ही नहीं थी, जिसका पता आकांक्षा ने उन्हें दिया था। उनका दिमाग चकरा गया। बैंक डिटेल्स से भी कुछ पता नहीं चला। अकाउंट तो बहुत पहले ही बंद कर दिए गए थे। उन पर जैसे वज्राघात हुआ था।
क्या उनसे कोई गलती हो गई? बड़ी गलती… जिसमें वे अपना सर्वस्व फूँक बैठे? क्या आकांक्षा कोई बुरी स्त्री थी? इतनी भोली और मासूम दिखने वाली औरत क्या छल, कपट कर सकती है?
सब धीरे-धीरे हुआ। कोई एक क्षण नहीं था – जहाँ चेतावनी की घंटी साफ़ बजी हो। कई बार उन्हें लगा था कि उसकी बातें पूरी तरह मेल नहीं खा रहीं। खर्चों का विवरण बदल जाता था, घटनाओं के क्रम में हल्का-सा फर्क आ जाता था। लेकिन वे टोकते नहीं थे। विवेक टोकता तो अकेलापन उस पर हावी हो जाता। उन्होंने खुद को समझाया – हर इंसान एक-सा नहीं होता।
दो चार दिन इधर-उधर धूल फाँकने और सिर खपाने के बाद, वे हताश और निराश देहरादून वापस लौट आए।
पर शायद आकांक्षा उन पर नज़र रखे हुए थी। या ये उसका अनुभव था कि ऐसी परिस्थिति में पीड़ित क्या -क्या करेगा? उनकी हर संभावना पर प्रहार करते हुए चेतावनी के रूप में एक संदेश उसने उनके मोबाइल पर प्रेषित किया –
“मुझे तलाशना बंद कीजिए।और एक बात ध्यान रखिये, मेरे खिलाफ़ कोई क़दम उठाने या रिपोर्ट दर्ज़ करने की कोशिश भी की तो आपके सारे वीडियो और चैट सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए जाएंगे। फिर क्या होगा, सोच लीजिए डॉ साहब, बाद में मुझे दोष मत दीजिएगा। इतना ही बहुत है कि मैं आपको और पैसों के लिए ब्लैकमेल नहीं कर रही।”
“ओ गॉड! मैसेज पढ़कर, वे चक्कर खाकर गिर पड़े। जब उठे तो महसूस हुआ, वे ख़त्म हो चुके हैं। उनके लिए जीवन अचानक महत्वहीन हो उठा।
ब्लैकमेल वाला संदेश उन्होंने दोबारा पढ़ा। बार बार पढ़ा। हर बार शब्द वही रहते, पर अर्थ बदल जाता। पहले ग़ुस्सा, फिर शर्म, फिर एक गहरा शून्य।
पैसे से अधिक खुद के छले जाने से उनको गहरा मानसिक आघात पहुंचा था। उनको भी कोई छल सकता था? जो व्यक्ति का चेहरा देखकर उसके मन की बात जानने में सिद्धहस्त थे, जो लोगों की बातों से उनका रोग पहचान लेते थे, कोई उनको भी छल सकता था? वे एक मनोचिकित्सक थे, मनोचिकित्सक! कोई उनको भी… सारी पढाई… जीवन भर का अनुभव मिट्टी हो गया।
एक बार को मनोचिकित्सक भी नहीं होते तो भी ऐसी उम्र, जिसके अनुभव से लोग लाभ उठाते हैं, उस उम्र उन्होंने घाटा खाया!
ऐसा घाटा जिसमें सबकुछ चला गया, सबकुछ। सिर्फ़ बैंक बैलेंस ही नहीं गया, आत्मसम्मान भी चला गया। वर्षों की पढ़ाई, अनुभव, पहचान—सब जैसे सवालों के घेरे में आ गए। उनके अब तक के करियर को लेकर लोग उन पर संदेह करेंगे उफ़!
हाय! अकेलापन… इसको भरने की कोशिश में छले गए वे। और कितना… और कितना… छलेगा यह?
कई दिनों तक आत्मग्लानि में घिरे रहे। एक बूढ़ा साइकेट्रिस्ट… धोखे का शिकार! उन पर हताशा हावी हो गई। बहुत कोशिश की कि इस छल को विस्मृत कर सकें। पर करें कैसे?
बच्चों को पता चला तो, नहीं, नहीं, उनकी आँखों में वे अपने लिए घृणा नहीं देख पाएंगे। पूर्व पत्नी को पता चला तो… नहीं, नहीं। इससे बेहतर है, मर जाना।
उनकी आँखों में आँसू तैर आए।
मेरे बच्चे… मेरे बच्चे…करते हुए, उनकी तस्वीरों को वे देखते जाते, और रोते जाते। फिर भी कितना देखते? उन्हें कितना देखते, जो उन्हें देखने, उनसे मिलने को कभी उत्सुक ही न होते थे, न ही ऐसी कोई इच्छा जताते थे।वे…वे होते तो ऐसा होता ही क्यूँ? क्यों उन्हें इस प्रकार मजबूर होना पड़ता? क्यों?
उन्होंने मोबाईल बंद करके एक तरफ रखा। एक लंबी निःश्वास भरी और थके कदमों से उठकर स्टूल पर चढ़ गए। मानो सबकुछ अपने आप हो रहा था।किसी अज्ञात भय में घिरे वे गले में फंदा डालकर कस ही रहे थे कि उनकी डोरबेल ज़ोर से चिंघाड़ी। उन्होंने उसे अनसुना किया। वह फिर ज़ोरों से बजी। फिर बजी। और फिर बजती चली गई, चीं ई ई ई ई ई…
उनकी चेतना को एक झटका – सा लगा, फंदा उनके हाथ से छूट गया। वे लड़खड़ाकर नीचे गिर गए।
आह! उनकी चीख निकल गई। लड़खड़ाकर गिरने से उनके घुटने और पीठ में चोट लगी थी।शुक्र था कि चोट ज्यादा बड़ी नहीं थी। जैसे तैसे उठकर वे मेनगेट पर पहुँचे।
मेनगेट खोलकर वे किसी पर झल्लाते, क्रोध करते पर यह क्या, दूर तक कोई नहीं।
विचित्र बात थी… हैरान परेशान वे देर तक अंधेरे में खड़े रह गए। शायद उनके पड़ोस का वह शैतान बच्चा, आज भी दरवाज़े की घंटी बजाकर भाग गया था, जो अक्सर घंटी बजा कर भाग जाता था।
दूसरे दिन, थाने में आकांक्षा के धोखे की रिपोर्ट दर्ज़ कराने के बाद, डॉ प्रमोद सोच रहे थे –
समय पर घंटी बजाना कितना ज़रूरी है, यह तो वे पहले से जानते थे, मनोचिकित्सक जो थे। पर अकेलापन जो दुनिया को लील रहा है, उससे कैसे निबटा जाए ताकि आकांक्षा जैसे लोगों की आवश्यकता किसी को हो ही नहीं। क्या इनके लिए कुछ शैतान बच्चे नहीं होने चाहियें?
आपकी घंटी कहानी पढ़ी।
कहानी गंभीर व चिंतनीय है। स्वयं मनोचिकित्सक को भी कभी-कभी किसी मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ सकती है। वह भी कभी-कभी हताश और निराश होकर आत्महत्या का निर्णय ले सकता है!
मन:स्थिति किस स्तर पर जाने के बाद आत्महत्या का निर्णय लेती है!!!?
निराशा के वे कौन से गहरे पल होते हैं जब इंसान अपनों को, परिवार को व इस दुनिया को छोड़ने का निर्णय लेता है!!!!?
बस वही एक अवसर ऐसा रहता है जब किसी संभालने वाले की जरूरत होती है। जीवन में देवदूत बनकर कोई आए और संभाल ले। वह पल टरक जाए। और अगर बात इस कहानी की करें, तो कहना होगा कि कोई घंटी बजा जाए। लगातार,लगातार घंटी बजती रहे। और मौत का वक्त टल जाए।
यह कहानी वास्तव में इन्हीं भावनाओं के उद्गार हैं। दुनिया सीधे सरल लोगों के लिये तो लगता है, है ही नहीं। पैसे कमाने के लिए मेहनत करना छोड़कर आजकल लोगों ने ठगने के नए-नए तरीके इज़ाद कर लिए हैं।
अपनी लाखों की मेहनत और जमा पूँजी अगर प्यार के धोखे में लुट जाए तो इसके लिये किसे दोष दिया जा सकता है?
फेसबुक से शुरू हुआ प्रेम धोखा देने में माहिर होता है।
कहानी सिखाती है कि अकेलेपन को दूर करने के लिए और भी कई रास्ते हैं।
एक जरूरी सीख देती कहानी के लिये आपको बहुत बहुत बधाई।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
बहुत अच्छा संदेश देती सुंदर कहानी ।
पूनम जी!
आपकी घंटी कहानी पढ़ी।
कहानी गंभीर व चिंतनीय है। स्वयं मनोचिकित्सक को भी कभी-कभी किसी मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ सकती है। वह भी कभी-कभी हताश और निराश होकर आत्महत्या का निर्णय ले सकता है!
मन:स्थिति किस स्तर पर जाने के बाद आत्महत्या का निर्णय लेती है!!!?
निराशा के वे कौन से गहरे पल होते हैं जब इंसान अपनों को, परिवार को व इस दुनिया को छोड़ने का निर्णय लेता है!!!!?
बस वही एक अवसर ऐसा रहता है जब किसी संभालने वाले की जरूरत होती है। जीवन में देवदूत बनकर कोई आए और संभाल ले। वह पल टरक जाए। और अगर बात इस कहानी की करें, तो कहना होगा कि कोई घंटी बजा जाए। लगातार,लगातार घंटी बजती रहे। और मौत का वक्त टल जाए।
यह कहानी वास्तव में इन्हीं भावनाओं के उद्गार हैं। दुनिया सीधे सरल लोगों के लिये तो लगता है, है ही नहीं। पैसे कमाने के लिए मेहनत करना छोड़कर आजकल लोगों ने ठगने के नए-नए तरीके इज़ाद कर लिए हैं।
अपनी लाखों की मेहनत और जमा पूँजी अगर प्यार के धोखे में लुट जाए तो इसके लिये किसे दोष दिया जा सकता है?
फेसबुक से शुरू हुआ प्रेम धोखा देने में माहिर होता है।
कहानी सिखाती है कि अकेलेपन को दूर करने के लिए और भी कई रास्ते हैं।
एक जरूरी सीख देती कहानी के लिये आपको बहुत बहुत बधाई।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।