विनीत खिड़की के पास खड़ा होकर नीचे बाजार की चहल पहल देखने लगा।
मीटिंग बहुत लंबी खिंच गई थी। दोनों दलों में वाद विवाद समाप्त होने को नहीं आ रहा था। एक तरफ ग्राहक कंपनी की तरफ से आए अधिकारी थे और दूसरी तरफ सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी की टीम थी जिसकी अगुआई विनीत कर रहा था।
आज छठी मीटिंग थी। ग्राहक कंपनी का दल हर मीटिंग में कुछ नई मांगें रख देता था जिसके कारण सूचना प्रौद्योगिकी टीम को अपनी कार्य योजना पुनः पुनः बदलनी पड़ती थी। आज की मीटिंग में तनाव उत्पन्न होने का कारण यह था कि पहली टीम की मांगें केवल बढ़ी ही नहीं थी अपितु परिवर्तित भी हो गई थीं। विनीत की टीम को कहना पड़ा कि अब तो उन्हें पूरा सिस्टम ही बदलना पड़ेगा जिसके लिए सारी की सारी प्रक्रिया दोहरानी पड़ेगी। फलस्वरूप, जैसा कि अपेक्षित ही था, दोनों टीमों में बहुत गरमा गरमी हो गई और विनीत को यह मीटिंग वहीं पर समाप्त करनी पड़ी। यह तय किया गया कि पहले दोनों टीमों के उच्चाधिकारी मिलेंगे, उसके बाद ही दोनों टीमों की बातचीत संभव हो पाएगी।
दोनों टीमों के रवाना हो जाने पर विनीत खिड़की पर आकर खड़ा हो गया था और बाहर की गतिविधियां देखकर स्वयं को संतुलित करने का प्रयास कर रहा था। इस तरह की मीटिंग में उसका आंतरिक तापमान बहुत बढ़ जाता था, जो कि स्वाभाविक भी था।
उनका कार्यालय पहले तल पर था। खिड़की से नीचे की चहल पहल देखी जा सकती थी। उसी भीड़ में उसे अचानक वह दिखी। वह उसे पहचानता नहीं था। परंतु बरबस ही विनीत का ध्यान उसकी ओर खिंच गया। उसकी जोश भरी चाल से उसके बाल हर कदम के साथ उछलते थे और उसकी आंखें जैसे किसी अपनी ही दुनिया को देख रही थीं जो सामने दिख रही दुनिया से सर्वथा भिन्न थी। उसके सर के ऊपर से होता हुआ एक हैडफोन उसके कानों पर लगा था जिससे आता संगीत उसकी आंखों में एक चमक पैदा कर रहा था। विनीत को ऐसा ही आभास हुआ। वास्तव में वह क्या सुन रही थी यह सुन पाना तो असंभव था पर विनीत को निश्चित था कि वह कोई बहुत जोशीला संगीत ही सुन रही थी जिसकी धुन उसके शरीर में वह थिरकन पैदा कर रही थी जो विनीत उसकी चाल में स्पष्ट ही देख पा रहा था।
वह लड़की विनीत की दायीं ओर से आ रही थी। चलते चलते उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खेलने लगी। फिर धीरे धीरे उसकी आँखें बंद हो गईं और वह आठ दस कदम ऐसे ही चलती रही। वह अपने चारों ओर के संसार से सर्वथा अनभिज्ञ थी। वह उस संगीत में गुम हो चुकी थी। फिर धीरे धीरे उसने आंखें खोलीं और पूर्ववत चलने लगी। उसके चेहरे को देख कर लग रहा था कि उसे किसी अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही है।
विनीत को अनुभव हुआ कि वे सारी अनुभूतियां जो वह अनजान लड़की अनुभव कर रही थी उनको वह स्वयं भी अनुभव कर पा रहा था। उसे यह भय हुआ कि वह इन्हें कहीं खो न दे। इसके लिए आवश्यक था कि वह लड़की उसके समक्ष ही रहती। वह तेजी से गया और सीढ़ियों से नीचे उतर गया। जब तक वह नीचे उतरा वह लड़की कुछ आगे निकल चुकी थी। परंतु यह भी अच्छी बात थी कि विनीत अभी उसे देख पा रहा था। वह उसका पीछा करते करते चला जा रहा था। वह उस अनुभूति को खोना नहीं चाहता था जो उस लड़की को देख कर उसे हुई थी। उसे वे दिन याद आ गए जब वह भी जीवन को ऐसी ही जीवंतता से जीता था और जीना उसके लिए कितना सुंदर अनुभव था। उस लड़की को देखते हुए विनीत एक दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया था। उसके पीछे चलते वह अभी कुछ ही दूर चला था कि उसने देखा कि वह लड़की सामने वाली सड़क पार कर रही है। विनीत सड़क के इस ओर ही खड़ा रहा और उस लड़की को तब तक देखता रहा जब तक वह भीड़ में गुम नहीं हो गई।
विनीत एक ओर को मुड़ गया। कुछ आगे जाकर एक कॉफी हाऊस था जहाँ वह कभी कभार आया करता था। विनीत को वह पसंद था क्योंकि वहां उसे एक शांत वातावरण मिल जाया करता था। आज भी वह वहीं पहुंचा और एक कॉफी का ऑर्डर कर एक खाली मेज के साथ लगी एक कुर्सी पर बैठ गया।लड़की के साथ हुए अपने अनुभव और उससे जुड़ी अनुभूतियों को वह अब भी अनुभव कर पा रहा था।
जब कॉफी आ गई तो वह एक एक घूंट का स्वाद लेकर उसे पीने लगा। कॉफी के स्वाद और उसकी कसैली मध्यम सुगंध बहुत सी बातों को उसके अंतर्मन की आँखों के सामने लाने लगी।
विनीत जब सूचना प्रौद्योगिकी में स्नातक कर रहा था तो स्वयं उसे और तीन मित्रों को मिला कर चार लोगों का गुट बन गया था। पढ़ाई तो वे अलग अलग किया करते थे, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया था कि एक साथ बैठ कर पढ़ाई कर पाना असम्भव था, परंतु जब उनके पास समय होता था तो इन चारों में से जो भी उपलब्ध होते थे वे एक जगह मिल जाया करते थे।
आज वे चारों ही थे – विनीत, राकेश, रघु और साहिल। आज प्रकाश की टपरी पर बैठ कर चाय पी जा रही थी। पढ़ाई करके चारों ही शरीर और मस्तिष्क से क्लांत थे। कुछ देर सभी चाय की चुस्कियां लेते रहे। बातचीत राकेश ने ही शुरु की।
‘प्रकाश की चाय भी क्या कमाल करती है। पीते ही माँ की याद दिला देती है।‘
रघु – ‘ठीक बोल रहा है भाई। मैं भी पढ़ते पढ़ते थक जाता था तो माँ अदरक वाली चाय बना कर मेरे सामने रख जाया करती थी।‘
विनीत – ‘रुलायेगा यार, बिल्कुल यही मेरी माँ भी करती हैं।‘
साहिल अभी तक चुपचाप इनकी बातें सुन रहा था। एकदम से बोल पड़ा, ‘मैं तो सोचता हूँ भाई। हम लोगों को तीन साल हो गए है घरों से निकले। क्या हम कभी वापस घर जा भी पाएंगे? या यह घर वापस लौटने का इंतजार हमारे मन में ऐसे ही बना रह जाएगा?’
उसकी यह बात सुन कर सभी लोग कुछ संजीदा हो गए।बात तो रघु सही ही कह रहा था। मालूम नहीं उन लोगों को नौकरियाँ कहां मिलेंगी? और नौकरी में कहां कहां घूमना पड़ेगा? अभी तो वे छुट्टियों में घर वापस जाने का इंतजार करते रहते हैं। परंतु सच तो यह है कि यह इंतजार शायद सबके दिलों में यूँ ही बना रह जाएगा और उन सभी को अपने अपने गंतव्यों पर आगे निकल जाना होगा।
साहिल – ‘भाई, तुम लोग भी क्या सोचने लगे? अब हम कोई बच्चे तो हैं नहीं। माँ को ऐसे क्यों याद कर रहे हो? अपने जीवन की कमान अपने हाथ में लेना सीखो।‘
विनीत बोला, ‘सो तो ठीक है, साहिल। हम बड़े भी हो गए हैं और माँ के सहारे की जरूरत भी अब नहीं रही है। लेकिन माँ बाप का स्थान तो सदा ही जीवन में रहेगा न? उनके बिना हम चाहे एक अच्छा जीवन जी भी लेंगे तो भी एक रिक्तता सदा जीवन में बनी रहेगी। इस बात को नकार नहीं सकते हम।‘
टपरी के मालिक प्रकाश ने जब वातावरण को अधिक संजीदा होते देखा तो वह माहौल को हल्का करने के लिए बोला, ‘इतना क्यों परेशान हो रहे हो तुम लोग? तुम जहाँ भी होगे अपने अपने माँ बाप को अपने पास ही बुला लेना।अभी तक तुम उनके साथ रह रहे थे, फिर वे तुम्हारे साथ रह लेंगे।यही तो जीवन है। इसमें बदलाव तो आते रहते हैं। जीवन के अनुसार अपने को ढालना और जीवन को अपने अनुसार ढालना, यही तो जीवन है। सब संभव है, अगर इंसान में इच्छा है तो। गम न करो। सब वैसे ही होगा जैसे तुम लोग चाहोगे।‘
यह सुन कर सबने ही एक राहत की सांस ली। कुछ ही देर में उन लोगों की बातचीत इस विषय पर आ गई कि वे जीवन में क्या करना चाहते हैं और क्यों। सबके अपने अपने विचार थे, अपनी अपनी सोच।
रघु का कहना था, ‘मैं चाहता हूँ कि मैं कुछ ऐसा करूँ कि समाज में मेरा मान सम्मान हो। सब मुझे एक बड़ा आदमी समझें और मुझसे सम्मान पूर्वक व्यवहार करें। जो भी मुझसे बात करे वह बहुत सोच समझ कर बात करे। ऐसा करने के लिए मुझे एक बहुत ऊंचे पद पर पहुंचना होगा, और वह मैं करूंगा।‘
यह कह कर रघु मुस्कराता हुआ सब की ओर देखने लगा।
साहिल ने कहा कि उसका भी यही विचार है।
राकेश बोला, ‘मैं इतना पैसा कमाना चाहता हूँ कि स्वयं का व्यापार स्थापित कर सकूँ। अपना व्यापार होने से मैं वैसा जीवन जी सकूँगा जो किसी के अधीन रहकर नहीं जिया जा सकता। किसी नौकरी में अधिक दिन मेरे से न कट पाएंगे भाई। हम ठहरे आजाद पंछी। खूब पैसा कमाएंगे।काम करने के लिए लोग रखेंगे और हम जीवन का आनंद लेंगे तबीयत से।‘, यह कह कर राकेश खिलखिला कर हँस पड़ा।
अब विनीत की बारी थी। थोड़ी देर तक वह सोचता रहा। फिर धीरे धीरे उसने कहना आरंभ किया, ‘मुझे यह तो बहुत स्पष्ट है कि मैं क्या नहीं बना चाहतासो पहले वही बता दूं। माफ करना मित्रो मैं कोई बहुत ही ताकतवर शख्सियत नहीं बनना चाहता, मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी नहीं बनना चाहता, मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे झुक कर सलाम करें, मुझ से डर कर रहें।‘, वह रघु की ओर देख कर मुस्कराया। ‘मैं कोई ऐसे सपने भी नहीं देखता कि मैं किसी बहुत ऊँचे पद पार आसीन होऊँ और मेरा बड़ा रौब दाब हो।‘, यह कहकर विनीत कुछ क्षण के लिए रुक गया। ‘ फिर मैं चाहता क्या हूँ?… हूँ…मैं तो चाहता हूँ कि मैं ऐसा जीवन जी सकूँ कि मैं वह सब कर सकूँ जो मुझे पसंद है। मैं नई जगहों में जा सकूँ, मैं बहुत सी अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ सकूँ, मैं जीवन के हर रंग और रूप को जी सकूँ, बहुत अच्छा संगीत सुन सकूँ, अच्छा सिनेमा देख सकूँ, कम से कम एक संगीत वाद्य बजा पाऊँ, अपने परिवार के साथ बहुत से खूबसूरत पल गुजार सकूँ और ऐसी बहुत सी अच्छी अच्छी यादें सहेज कर अपने मन में रख सकूँ। संक्षेप में मैं जीवन को उसके सभी रंगों के साथ भरपूर जी सकूँ और यह कहने की स्थिति में होऊँ कि हाँ! जिंदा हूँ मैं! जिंदा हूँ मैं!’, यह कहते हुए विनीत ने अपनी दोनों बाहें हवा में ऊपर उठा ली थीं। उसका चेहरा खुशी से दैदीप्यमान था।
सब लोग उसकी ओर देख रहे थे और उसकी बातों को समझने का प्रयास कर रहे थे। यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे पूर्णतः समझ ही गए पर उन्होंने समझने का प्रयास अवश्य किया। दोस्त होते ही किस लिए हैं?
‘बहुत अच्छी बात है भाई।‘, कह कर साहिल ने ताली बजा दी। उसका साथ सभी ने दिया। प्रकाश ने भी।
कॉफी पीते हुए विनीत सोच रहा था कि क्या वह वास्तव में वैसा कर पाया है?
विनीत के माता पिता अब भी उसी शहर में रह रहे थे जहाँ वे सदा से रहते आए थे। विनीत को नौकरी दूसरे शहर में मिली थी। कभी वे विनीत से मिलने आ जाते थे और कभी विनीत चला जाता था। विनीत की शादी राधा से हुए छः साल बीत चुके थे। अब उनका चार बरस का बेटा था, नोनू।
विनीत के लिए उसका संपूर्ण परिवार बहुत महत्त्वपूर्ण था। वह अपने परिवार के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह परिवार को अपने जीवन का आधार मानता था और परिवार के साथ जुड़ कर जीवन जीने में ही जीवन का सार समझता था। इस बात को उसके परिवार के सभी लोग समझते थे।
परंतु यह भी सत्य है कि अपना कार्य वह सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता से करना चाहता था। उसने सूचना प्रौद्योगिकी का क्षेत्र चुना था क्योंकि इसमें वह मानव जाति का भविष्य देखता था। यह तकनीक मानव जीवन को सरल बनाती है और असंभव को संभव। इस कार्य में वह अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का भरपूर उपयोग कर सकता था। नित नई चुनौतियाँ उसके कार्य को अत्यधिक आकर्षक बनाती थीं और उसे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने को उकसाती थीं।
इन दो धाराओं के बीच उसके जीवन की नदी बहती थी और इन दो पाटों में संतुलन बिठाते चलना एक अनवरत प्रक्रिया थी।
परंतु पिछले कुछ समय से यह चिंता विनीत को विचलित कर रही थी कि क्या वह वास्तव में संतुलन बना कर चल पा रहा है? उसे ऐसा अनुभव हो रहा था कि अनचाहे ही वह कार्य के भंवर में खिचता चला जा रहा था। उसे रोकने का कोई उपाय वह देख नहीं पाता था। इसमें कोई संदेह नहीं था कि राधा और नोनू के साथ बिताया जाने वाला समय पहले से कम हो गया था और इस अहसास ने विनीत को बहुत ही असहज कर दिया था। माता पिता से दूर रहने को तो वह नौकरी की विवशता का एक अंग पहले ही मान चुका था।
आज अपने कार्यालय के सामने उस लड़की के उमंगपूर्ण भाव को देखकर उसे यह भी बहुत तीव्रता से अहसास हुआ कि वह केवल अपने परिवार से ही दूर नहीं हुआ है, अपितु स्वयं से भी दूर हुआ है।
उसे याद आया उसका दोनों बाहें ऊपर उठाकर बोलना, ‘जिंदा हूँ मैं! जिंदा हूँ मैं!’
क्या वास्तव में?
कितना समय बिता पाता है वह उन कार्यों को करने में जिन्हें करने से उसे आंतरिक आनंद की प्राप्ति होती है? धन कमाना, दूसरे शब्दों में कहें तो, नौकरी करना जीवन का एक अनिवार्य अंग तो है पर आनुषंगिक है।यह किया जाता है ताकि जीवन अच्छे से जीया जा सके। परंतु यदि वही जीवन का मुख्य कार्य बन जाए तो यह तो कुछ वैसा ही हो जाएगा जैसे कि गाड़ी को घोड़े के आगे लगा देना, और यह अपेक्षा करना कि घोड़े को गाड़ी खींचेगी। मनुष्य में ऊर्जा आती है जीवन को जीने की लालसा से।जिसे अक्सर हम ‘खाली समय’ कहकर उसकी अवहेलना करते हैं उस खाली समय में जीया गया जीवन ही जीवन का वास्तविक आनंद दे पाता है। वह खाली समय परिवार के साथ बिताया गया समय भी हो सकता है, सिनेमा देखना भी हो सकता है, नई नई जगहें देखना भी हो सकता है, किताबें पढ़ना भी हो सकता है, पेंटिंग करना भी हो सकता है, पत्थर एकत्र करना भी हो सकता है – ऐसी असंख्य गतिविधियां हैं जिनमें मानव सार्थकता पाता है।
इस अर्थ में, विनीत ने सोचा, वह कितना जिंदा है आज?
भीतर से आवाज आई – ‘बहुत ही कम। सच में। बहुत ही कम!’
विनीत को तो यह शब्द – ‘खाली समय’ – बहुत ही अखरता है। क्या होता है यह खाली समय? जिन पलों में हम भरपूर खुशी पाते हैं, जिन पलों में हमारा सबसे अच्छा समय व्यतीत होता है, जो पल हमारे लिए इतने आनंद दायी होते हैं, जिन पलों में हम वास्तविक रूप से जीवित होते हैं, उसे खाली समय कह कर उपेक्षित क्यों कर दिया जाता है?
क्रमशः यह स्थिति इतनी शोचनीय होती जा रही है कि कोई भी कार्य जो अपने काम अथवा पेशे से ना जुड़ा हो, व्यर्थ ही लगता है। और यह केवल आसपास का माहौल ही नहीं कहता, हमारी खुद की आत्मा भी हमें यही कहती नजर आती है – ‘तुम तो अपना समय व्यर्थ कर रहे हो।‘ यदि कोई गतिविधि पैसा कमाने से जुड़ी है तो सही, बाकी सब गलत, व्यर्थ, समय की बरबादीहै।
बचपन से ही विनीत को फोटोग्राफी में बहुत रुचि थी। इस शौक को पूरा करने के लिए उसने निकोन का उच्च गुणवत्ता वाला कैमरा लिया था। उसे प्रकृति की फोटोग्राफी करने में बहुत रुचि थी। परंतु कैमरे को तो हाथ लगाए भी दो साल से ऊपर हो चुके थे। सारा समय तो ऑफिस में ही निकलता था। उसका यह शौक तो सुप्तप्राय ही हो चुका था।
अब तो थोड़ी सी खुशी उसे यदि मिल पाती थी तो केवल कुछ समय राधा और नोनू के साथ बिताने में। और जब उसके उस बहुमूल्य समय को लेकर भी कार्य की मांगों की खातिर रस्साकशी होने लगती थी तो उसे बहुत ही आंतरिक वेदना होती थी। परंतु, ऐसा हो रहा था।
विनीत ने स्वयं को वचन दिया कि वह स्थिति को सुधारेगा और जीवन को सही दिशा में मोड़ेगा। घर में कुछ अधिक समय व्यतीत करेगा और फोटोग्राफी के शौक को दोबारा से जीवित करेगा।
आज सुबह जब वह अपनी गाड़ी में नोनू को उसके विद्यालय छोड़ने जा रहा था तो नोनू हमेशा की तरह बहुत उत्तेजित था। पापा के साथ का यह छोटा सा सफर उसे बहुत भाता था। स्कूल पहुँचने तक वह कुछ न कुछ सुनाता ही रहता था। रात में तो पापा बहुत देर से घर पहुँचते थे।तब तक नोनू का सोने का समय हो जाता था। उस समय वह पापा से कुछ विशेष बातचीत नहीं कर पाता था। पापा के साथ बात करने की लालसा उसके अंदर ही रह जाती थी, जो वह सुबह स्कूल जाते समय पूरी कर लिया करता था। घर से स्कूल तक की यात्रा कुल पंद्रह मिनट की थी और इन मिनटों का भरपूर उपयोग वह कर लिया करता था।
कल स्कूल में क्या हुआ था, मैडम ने क्या कहा, उसके सहपाठियों ने और स्वयं उसने क्या क्या शरारतें कीं, घर आकर मम्मी ने खाने में क्या दिया, शाम को जब वह खेलने गया तो उसके साथियों के साथ उसने कौन सा खेल खेला, विनीत को यह सारा कच्चा चिट्ठा मालूम चल जाता था।
आज भी जब से नोनू गाड़ी में उसकी बगल में आकर बैठा था उसकी जिह्वा अनवरत चलायमान ही थी। विनीत उसकी बाल गल्प का आनंद लेता हुआ कार चला रहा था।
‘पापा जानते हो कल क्या हुआ? कल शौनक बहुत शोर मचा रहा था तो मैडम ने उसे कुर्सी पर खड़ा कर दिया…और वो नीना है नउसने अपना सारा लंच कूड़ेदान में फेंक दिया…गरिमा कल अपना होम वर्क करके नहीं लाई थी, मैडम ने उसकी डायरी में उसकी मम्मी के लिए नोट लिख कर दे दिया…’
जब वे स्कूल पहुँचने को थे तो अपनी बातों को लगाम देकर नोनू ने एकाएक कहा, ‘पापा, याद है न आपको आज मेरा नाटक देखने आना है?’
‘हाँ, बेटा। जरूर याद है।‘
‘तो ठीक है। जब आप आओगे न, तो एकदम सामने की सीट पर बैठना ताकि मैं आपको देख सकूँ। ठीक है?’
‘ठीक है, बेटा। कोशिश करूंगा कि सामने की सीट पर ही बैठूं।‘
तब तक नोनू का स्कूल आ चुका था। उसने हाथ आगे बढ़ा कर कहा, ‘पक्का न?’
विनीत ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे चूम कर कहा, ‘बिल्कुल पक्का।‘
नोनू उत्तेजित हो स्कूल के अंदर चला गया।
विनीत को भली भांति याद था कि आज नोनू के विद्यालय का वार्षिक दिवस था। नोनू को भी एक नाटिका में भूमिका दी गई थी। पिछले दो सप्ताह से इसकी तैयारी चल रही थी। राधा ने बताया था कि नोनू घर में भी कुछ समय अपने संवाद कंठस्थ करने में लगाया करता था। कई दिनों के श्रम के पश्चात् वह अब सारे संवाद कुशलता से बोल पाता था।
सुबह घर से निकलने से पहले राधा ने विनीत को फिर से याद दिलाया था और कहा था, ‘विनीत, आज कुछ भी हो तुम्हें चार बजे तक घर पहुँचना है। तुम्हारे जो भी बॉस वगैरह हैं उन्हें जाते ही अच्छे से बता देना कि तुम्हारा आज जल्दी निकलना कितना जरूरी है।इसके लिए चाहे झूठ ही क्यों न बोलना पड़े।यह तुम्हारी सरदर्दी है कि जल्दी कैसे निकल पाते हो। नोनू बहुत दिनों से आस लगाए बैठा है कि हम उसका अभिनय देखने आएंगे। और यह तो तुम जानते ही हो कि पापा की शाबाशी उसके लिए कितना महत्व रखती है। तुम्हारे द्वारा बोला गया प्रशंसा का एक शब्द मेरे दस शब्दों के बराबर होता है। तुम्हारा एक एक शब्द वह अपनी स्मृति में सहेज कर रखता है और बाद में भी याद करता रहता है। सोचो, आज जब वह पहली बार स्टेज पर आकर अभिनय करेगा और उसके मम्मी पापा उसे देखेंगे और सराहेंगे तो उसके लिए कितनी खुशी के क्षण होंगे। हमारे लिए तो ये यादगार होंगे ही। मैं तो उसकी एक वीडियो फिल्म बनाऊँगी। जब वह बड़ा हो जाएगा तो उसे दिखाया करूंगी। खैर, अब तुम्हें भी देर हो रही होगी।इतना सब मैंने इसलिए बोला ताकि तुम याद रखो और शाम को समय से घर पहुंचो। अब जाओ।‘
विनीत हामी में सर हिलाता हुआ मुस्करा कर घर से चल दिया था।
विनीत को यह सब याद था। आज उसने आते ही सुबह अपने प्रमुख कालरा जी को बता दिया था कि वह शाम को कुछ जल्दी ही निकल जाएगा क्योंकि उसे अपने बेटे के स्कूल जाना है। कालरा जी ने हामी भी भर दी थी।
विनीत ने कॉफी का आखिरी घूंट भरा और अपने कार्यालय की ओर चल दिया।
कार्यालय पहुंचते ही उसकी टीम के सदस्य अनुभव ने उसे बताया कि उसके प्रमुख कालरा जी उससे मिलना चाहते हैं और उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनते ही विनीत उनके केबिन की ओर चल दिया। वह समझ रहा था कि सुबह की मीटिंग की खबर उन तक पहुंच चुकी होगी और वे उसी के बारे में उससे कुछ बात करना चाह रहे होंगे। क्या बात करना चाह रहे होंगे यह भी वह समझ पा रहा था। फिर मन ही मन यह सोच कर किउनके सब प्रश्नों का उत्तर मेरे पास हैवह उनके समक्ष जाकर बैठ गया।
कालरा जी छूटते ही बोले, ‘विनीत, मीटिंग में क्या हुआमुझे संक्षेप में बताओ।‘
विनीत ने उन्हें सब बताया।
काल्ररा जी – ‘इससे कुछ समस्या आ सकती है?’
विनीत – ‘सर, समस्या हमें तो नहीं आएगी। परंतु प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाएगी और जो बजट वे लेकर चल रहे हैं उससे कहीं ऊपर की कीमत उन्हें चुकानी पड़ जाएगी।‘
कालरा जी ने कहा, ‘हूँ।‘, फिर ऊपर की ओर सर से इशारा करते हुए बोले, ‘ऊपर से बॉस को फोन आया था कि आपकी टीम को कुछ परेशानी हो रही है तो हम दूसरी टीम को यह प्रोजेक्ट सौंप सकते हैं। तुम्हारा क्या खयाल है?‘
‘सर, हमारी टीम को कोई भी परेशानी नहीं है। ऐसा वे कैसे बोल सकते हैं?’
‘शायद तुमने या तुम्हारी टीम ने कुछ ऐसा कहा होगा?’
विनीत को उनकी बात सुनकर बहुत क्रोध भी आया परंतु वह स्वयं पर काबू कर बोला, ‘सर, हमने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। हमने केवल यह कहा था कि उनके प्रोजेक्ट में इतना बदलाव आ गया है कि हमें अपनी योजना को आमूल ही बदलना पड़ जाएगा। जिसकी वजह से समय भी अधिक लगेगा, टीम में लोग भी अधिक लगाने पड़ेंगे और प्रोजेक्ट की कीमत भी बढ़ जाएगी। इसी बात को वे बड़े ही गलत अंदाज से बॉस के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। बात तो केवल इतनी सी ही है। उन्हें सब बातों से अवगत कराना भी हमारा कर्तव्य है। आगे आप की इच्छा है यदि आप यह काम दूसरी टीम को देना चाहते हैं तो दे सकते हैं।‘
काल्ररा जी ने कहा, ‘नहीं, नहीं। बॉस कुछ भी कहें यह फैसला तो मुझे ही करना है। परंतु बॉस तो बॉस हैं न। हमें उन्हें सब कुछ विस्तार से बताना होगा। अभी वे कहीं और हैं। तीन बजे के बाद ही यहां पहुंचेंगे। तुम्हें इस लिए बता रहा हूँ क्योंकि तुम आज जल्दी जाने को कह रहे थे।‘
विनीत के चेहरे पर हताशा की रेखाएं खिच आईं। वह कुछ नाराजगी भरे स्वर में बोला, ‘सर, मैंने आपको बताया ही था कि मुझे आज जल्दी निकलना है। आज बच्चे का पहला वार्षिक उत्सव है और वह एक नाटक में अभिनय भी कर रहा है। आप समझ सकते हैं कि आज मेरा वहां होना कितना आवश्यक है।‘
‘विनीत मैं तो समझ रहा हूँ। लेकिन बॉस समझने के मूड में नहीं लग रहे थे। मैं यह भी कहूंगा कि मैं तुम्हें वचन दे चुका हूँ, तुम जल्दी जाना चाहो तो जा सकते हो। बॉस से मैं ही बात कर लूंगा। मैं फैसला तुम पर छोड़ता हूँ।‘
‘ठीक है, सर। सोच कर बताता हूँ।‘, यह कह कर विनीत वहां से उठ कर आ गया।
विनीत आकर अपने क्यूबिकल में बैठ गया।
ऐसा संकट खड़ा हो जाएगा उसने सोचा भी नहीं था। आज की मीटिंग में उसका होना आवश्यक था इसलिए वह आ गया था। ऐसी मीटिंगें तो होती ही रहती हैं। उनकी कंपने का काम ही यह है। परंतु किसी किसी मीटिंग में बात बिगड़ भी जाती है। कौन सी मीटिंग में ऐसा होगा कहा नहीं जा सकता। आज की मीटिंग वैसी ही साबित हुई। अवश्य ही आज की मीटिंग को लेकर दूसरी कंपनी के किसी उच्चाधिकारी से हमारे बॉस को फोन आया होगा।
लेकिन अब क्या किया जाए? कालरा जी ने तो कह दिया है कि मैं जा सकता हूँ, परंतु यदि वे हमारा पक्ष ठीक से न रख पाए तो? उसका परिणाम यह होगा कि उस कंपनी द्वारा लगाया जा रहा आरोप सच साबित हो जाएगा और बॉस की नजर में हमारी टीम की छवि ही खराब हो जाएगी। ऐसा होने से हमारी अब तक की गई मेहनत बेकार हो जाएगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। जब वह अपना काम ईमानदारी से करता है तो एक छोटी सी गलतफहमी के कारण उसकी, और उसके साथ उसकी टीम की, छवि खराब नहीं होनी चाहिए।
यदि वह बॉस से बात करने के लिए रुकता है तो नोनू के विद्यालय के कार्यक्रम में वह नहीं पहुंच पाएगा। बॉस को बताने के लिए सारी जानकारी एकत्र करनी पड़ेगी, उन्हें विस्तार से समझाना पड़ेगा और हो सकता है कि एक प्रेजेंटेशन भी तैयार करनी पड़े। इन सब कामों में समय लगेगा। वह शायद छः-सात बजे से पहले कार्यालय से नहीं निकल पाएगा। नोनू का दिल टूट जाएगा। वह राधा और नोनू दोनों को क्या जवाब देगा और किस मुँह से उनके सामने जाएगा?
तभी उसने देखा कालरा जी उसकी बगल में आकर बैठ गए थे। वे बोले, ‘विनीत, मैं देख रहा हूँ तुम परेशान हो। क्या फैसला लिया तुमने?’
विनीत ने एक गहरी साँस छोड़ कर कहा, ‘सर, मैं आपके साथ बॉस के पास चलूंगा। उसके लिए हमें एक प्रेजेंटेशन बनानी होगी। मैं अभी अपनी टीम के साथ बैठ कर यह काम आरम्भ करता हूँ।‘
कालरा जी उसके कंधे पर हाथ रख चले गए।
विनीत ने बहुत भारी दिल से फोन उठाया और राधा का नंबर डायल करने लगा। उसे मालूम था किस तरह की बातचीत होगी। और वह उसके लिए जरा भी तैयार नहीं था।
कुछ ही देर में जब विनीत क्यूबिकल से निकल कर आया तो उसका चेहरा एकदम तमतमाया हुआ था, उसे अपने शरीर का तापमान बढ़ा हुआ लग रहा था, आत्मा ग्लानि से भरी हुई थी, और आंखें डबडबाने को हो रही थीं। परंतु उसे यह भी मालूम था कि इसके अलावा वह कोई और निर्णय ले भी नहीं सकता था। उसने अपने आपसे वादा किया कि वह नोनू के विद्यालय के अगले कार्यक्रम में अवश्य जाकर उसका उत्साह वर्धन करेगा।
अपनी टीम के पास जाते हुए उसकी आंखों में फिर से वह लड़की और उसका उमंग से भरा चेहरा घूम गया। जब वह अपनी टीम के साथ बैठा तो उसके मन में वही शब्द गूंज रहे थे, परंतु अब की बार वे कुछ कहने के बजाय कुछ पूछ रहे थे।
‘जिंदा हूँ मैं?’
प्रवीण ‘बनजारा’
सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी.
सम्प्रति स्वतंत्र लेखन. एक कहानी संग्रह ‘मोरपंख’ 2025 में प्रकाशित्.
कहानियां और कविताएं ‘जानकीपुल’, ‘पाखी’ और ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित. एक कहानी ‘वर्तमान साहित्य’ द्वारा स्वीकृत.
सम्पर्क – एच- 0012, विंडसर कोर्ट, सेक्टर 78, नोएडा, उत्तर प्रदेश 201305
विनीत भविष्य में वह सब करना चाहता था जो उसे पसंद था।नई -नई जगहों पर जाना, पसंदीदा किताबें पढ़ना, जीवन के हर रंग और रूप को जीना, अच्छा संगीत सुनना,सिनेमा देखना, कोई एक वाद्य बजाना सीखना और परिवार के साथ सुखमय जीवन गुजारना,ताकि उसे महसूस हो कि वह जिंदा है और वह कह सके कि ‘जिंदा हूँ मैं’।
सूचना प्रौद्योगिकी का विषय उसने स्वेच्छा से चुना था।कहानी विनीत के आत्म मंथन की है। क्या वैसा सब हो पाया जैसा उसने सोचा था?
जब पहली बार उसका बेटा स्कूल में फंक्शन में पार्टिसिपेट करने वाला था उसने बच्चे से और घर में सभी से प्रॉमिस किया था कि वह जरूर आएगा और समय पर आएगा। वह ऑफिस से समय पर छुट्टी लेकर जाने की परमिशन भी ले चुका होता है,लेकिन….. इस लेकिन में सारे काम प्रायः बिगड़ जाते हैं। ऑफिस में कुछ ऐसी स्थिति बन जाती है कि वह नहीं जा पाता।
कहानी का प्रारंभ जिस लड़की के माध्यम से हुआ वह उमंग और उत्साह के प्रतीकात्मकता में है।
किंतु बाद में निराशा की स्थिति में वह इस लड़की को याद कर और यह सोच कर कि बेटे के अगले फंक्शन में जरूर जाउँगा। अपने काम में उमंग से जुट जाता है।
पर वह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या,” ज़िंदा हूँ मैं?”
जिंदगी हमारे चाहने से और अपनी इच्छाओं पर नहीं चलती है।
नौकरी करने की स्थिति में तो यह और भी ज्यादा संदिग्ध है।
कब ,कौन सा काम, कौन सा रुख बदल ले कोई नहीं जान सकता।
एक कहावत है *अपने मन कछु और है, कर्ता(भगवान ) के कछु और।*
पर जिंदा तो फिर भी रहना पड़ता है।
कहानी एक परिस्थिति को दर्शाती है जहाँ चाहत और उद्देश्य के टकराव में “ज़िंदा होना” प्रश्न चिन्ह बन जाता है!
कहानी कोई उद्देश्य विशेष को लेकर नहीं चलती लेकिन यह समझाती जरूर है कि ,”जिंदगी वास्तव में समझौता है।
कहानी के लिये आपको बधाई।
नीलिमा जी, आपने जिस गहराई और संवेदना से कहानी के मर्म को व्यक्त किया है उसके लिए आपका धन्यवाद। आपने सही कहा कि यह कथा जीवन में पेश आनी वाली उन परिस्थितियों के विषय में है जिनमें हम अपने अंतर में विभिन्न भावनाओं में टकराव का अनुभव करते हैं। इच्छाओं, आकंक्षाओं और परिस्थितियों में ताल मेल बिठा कर चलना ही जीवन है। कभी सुख, कभी दुख। और कभी समझौता!
प्रवीण जी!
आप की कहानी ‘ज़िंदा हूँ मैं’ पढ़ी।
विनीत भविष्य में वह सब करना चाहता था जो उसे पसंद था।नई -नई जगहों पर जाना, पसंदीदा किताबें पढ़ना, जीवन के हर रंग और रूप को जीना, अच्छा संगीत सुनना,सिनेमा देखना, कोई एक वाद्य बजाना सीखना और परिवार के साथ सुखमय जीवन गुजारना,ताकि उसे महसूस हो कि वह जिंदा है और वह कह सके कि ‘जिंदा हूँ मैं’।
सूचना प्रौद्योगिकी का विषय उसने स्वेच्छा से चुना था।कहानी विनीत के आत्म मंथन की है। क्या वैसा सब हो पाया जैसा उसने सोचा था?
जब पहली बार उसका बेटा स्कूल में फंक्शन में पार्टिसिपेट करने वाला था उसने बच्चे से और घर में सभी से प्रॉमिस किया था कि वह जरूर आएगा और समय पर आएगा। वह ऑफिस से समय पर छुट्टी लेकर जाने की परमिशन भी ले चुका होता है,लेकिन….. इस लेकिन में सारे काम प्रायः बिगड़ जाते हैं। ऑफिस में कुछ ऐसी स्थिति बन जाती है कि वह नहीं जा पाता।
कहानी का प्रारंभ जिस लड़की के माध्यम से हुआ वह उमंग और उत्साह के प्रतीकात्मकता में है।
किंतु बाद में निराशा की स्थिति में वह इस लड़की को याद कर और यह सोच कर कि बेटे के अगले फंक्शन में जरूर जाउँगा। अपने काम में उमंग से जुट जाता है।
पर वह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या,” ज़िंदा हूँ मैं?”
जिंदगी हमारे चाहने से और अपनी इच्छाओं पर नहीं चलती है।
नौकरी करने की स्थिति में तो यह और भी ज्यादा संदिग्ध है।
कब ,कौन सा काम, कौन सा रुख बदल ले कोई नहीं जान सकता।
एक कहावत है *अपने मन कछु और है, कर्ता(भगवान ) के कछु और।*
पर जिंदा तो फिर भी रहना पड़ता है।
कहानी एक परिस्थिति को दर्शाती है जहाँ चाहत और उद्देश्य के टकराव में “ज़िंदा होना” प्रश्न चिन्ह बन जाता है!
कहानी कोई उद्देश्य विशेष को लेकर नहीं चलती लेकिन यह समझाती जरूर है कि ,”जिंदगी वास्तव में समझौता है।
कहानी के लिये आपको बधाई।
नीलिमा जी, आपने जिस गहराई और संवेदना से कहानी के मर्म को व्यक्त किया है उसके लिए आपका धन्यवाद। आपने सही कहा कि यह कथा जीवन में पेश आनी वाली उन परिस्थितियों के विषय में है जिनमें हम अपने अंतर में विभिन्न भावनाओं में टकराव का अनुभव करते हैं। इच्छाओं, आकंक्षाओं और परिस्थितियों में ताल मेल बिठा कर चलना ही जीवन है। कभी सुख, कभी दुख। और कभी समझौता!