Wednesday, February 11, 2026
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प्रियंका गुप्ता की कहानी – उसकी कहानी

उस दिन पहली बार वह मेरे पास आकर बैठी थी। देखती तो मैं उसे अक्सर रहती थी, पर यह पहली बार था जब वह अपने बच्चे को लिए हुए मेरे बगल में आकर बैठ गई थी। मैंने किताब से नजर उठाई और उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी…बदले में उसके चेहरे पर भी एक चमक भरी मुस्कुराहट फैल गई।
“आप पढ़ती हैं?” उसके चेहरे पर उत्सुकता भरा प्रश्न तैर रहा था।
“अरे नहीं…” मैं हँस दी, “पढ़ाई छोड़े हुए तो जमाना हो गया। मैं लिखती हूँ…।”
“लिखती हैं? क्या लिखती हैं?” वह अब भी मेरे बारे में जानने को उत्सुक थी।
“मैं लेखिका हूँ, कहानियाँ लिखती हूँ।”
वह खामोश रह गई, जैसे कुछ सोच रही हो। उसके चेहरे को देखकर समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे उत्तर से निराश है या फिर किसी गहन विचार में डूबी हुई है।
“आप कैसे कहानियाँ लिखती हैं?”
जाने क्यों उसकी उत्सुकता देखकर मुझे अच्छा महसूस हुआ।
“कहानियाँ तो जिंदगी की ही होती हैं,” मैंने उसे अपना वही घिसा-पिटा सा जवाब दिया, “अपने आसपास के लोगों की…माहौल की…दुनिया में घट रही घटनाओं की…” 
“वैसे ही जैसे लोग समाचार लिखते हैं?”
उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें मेरे चेहरे पर टांग दी।
“अरे नहीं…समाचार तो किसी खबर को ज्यों-का-त्यों उसकी पूरी सच्चाई के साथ लिख देना होता है, पर कहानी में ऐसा नहीं होता। हम सच्ची बात पर कहानियाँ लिख तो सकते हैं, पर कहानी पूरा सच नहीं होती…।” मुझे लगा वह मेरे जवाब से संतुष्ट होकर वहाँ से चली जाएगी ताकि मैं फिर से अपनी किताब की दुनिया में खो सकूँ, पर वह तोअच्छा’ बोल कर जाने किन ख्यालों में डूबी हुई…दूर कहीं नज़रें टिकाए वहीं बैठी थी।
मैंने भी अपनी पूरी तवज्जो अपने हाथ में पकड़ी कहानियों की किताब की ओर कर दी।
अचानक झूले के पास से अपनी बच्ची की आवाज सुन वह उठ खड़ी हुई। दो कदम आगे बढ़कर सहसा मुड़ी और मुझसे बोली, “आप मेरी कहानी लिखेंगी?”
उसके अचानक पूछे गए इस सवाल से मैं हड़बड़ा गई, “हाँ-हाँ क्यों नहीं…”, कहने को तो मैंने कह दिया पर अगले ही पल लगा, शायद गलत किया।
वह चेहरे पर संतुष्टि भरी निश्चिन्तता लिए हुए वहाँ से चली गई तो मैंने भी असहजता का भाव अपने ऊपर से झटक दिया…। कह दिया तो कह दिया, क्या फर्क पड़ता है? बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनको लगता है कि उनके ऊपर भी कहानी लिखी जानी चाहिए। यह भी शायद उनमें से एक ही थी। आज कहा है, तो कल भूल भी जाएगी। नॉट अ बिग डील…।
दो-चार दिन ऐसे ही बीत गए। मौसम अचानक से ठंडा हो गया था. इसीलिए मेरा भी नीचे बगीचे में जाना बंद हो गया था। इतनी गलन पड़ रही थी कि रजाई से निकलने का मन ही नहीं करता था, ऐसे में नीचे बगीचे की ठंडक में कौन बैठता? हाँ, ठण्ड के बावजूद सोसाइटी के कई बच्चे माँओं के मना करने के बाद भी वहाँ खेलने आ ही रहे थे…। उनकी किलकारियों से बिना बाहर झाँके भी इतना तो पता चल ही जाता था।
लगभग पाँच दिनों की शीत-लहरी के बाद धूप निकली तो फटाफट घर के सारे कामों से फुर्सत पाकर अपना अकड़ा बदन सीधा करने के लिए मैं फिर बगीचे में बैठने जा पहुँची। हमेशा की तरह हाथ में एक किताब थी। इधर तीन-चार दिन की ठंड में किताब भी पढ़ने का मन नहीं किया था। बस काम खत्म करके रजाई ओढ़ के सो जाती थी।
उस अधूरे पढ़े नॉवेल की घटनाओं में डूबे हुए कितना वक्त बीत गया, पता नहीं चला। सहसा उसकी आवाज से चौककर मैंने सिर उठाया तो देखा गोद वाले बच्चे को लिए हुए वह मेरे सामने खड़ी थी, “आपने कहानी लिखी?” उसके चेहरे पर एक मासूम-सी उत्सुकता थी।
पल भर मुझे समझ ही नहीं आया वह किस कहानी की बात कर रही है, फिर अचानक उस दिन हुई हमारी बातों का ध्यान आया।
“इतना आसान नहीं है कहानी लिखना…और वैसे भी हर किसी पर कहानी लिखी भी नहीं जाती। कुछ खास होना चाहिए ना कहानी लिखने के लिए…।”
उसका चेहरा बुझ गया। मुझे अच्छा नहीं लगा…क्या जरूरत थी इतना साफगोई से बोलने की? मैं यह भी तो कह सकती थी कि अभी वक्त नहीं मिला, जल्दी ही लिखूँगी…पर अब क्या हो सकता था? बात का तीर तो अपनी कमान से निकल चुका था…। अब चाहे वह उस तीर से घायल होती या फिर मेरा निशाना चूकता, दोनों पर ही जैसे मेरा वश नहीं था।
कुछ पल अपनी फीकी नजरों से मुझे ताक कर वह वहाँ से धीरे कदमों से वापस अपने बच्चे की ओर मुड़ गई। मैंने उसे आवाज़ देना चाहा तो, पर पता नहीं क्या सोचकर खुद को रोक लिया। पर मेरी निगाहें उसी पर लगी रही। नॉवेल पढने में दिल ही नहीं लगा। कुछ ही देर में जैसे सब कुछ भूलभाल कर वह अपनी बच्ची के झूले को ऊँची पींग भरते देख बच्ची के साथ ही किलकारी-सी भरने लगी।
मुझे संतोष हुआ, गिल्ट भी थोड़ा कम हो गया। जितना सोच रही थी, उतना असर शायद उस पर हुआ ही नहीं था। मैं ही शायद हर बात पर फालतू में अधिक सोचती हूँ। यहाँ तो वह बिलकुल सामान्य थी।
बात मानो आई-गई हो गई थी । अब भी वह लगभग रोज ही मुझे अपने बच्चो के साथ बगीचे में दिखती…। अधिकतर तो वह दूर से ही मुझे देख कर मुस्करा देती, बदले में मैं भी एक-आध मुस्कराहटें उसकी तरफ उछाल देती। हम दोनों बस इतने से आपसी परिचय से मानो संतुष्ट थे।
जाड़ा भी अब उतार पर था, सो बगीचे में मेरे जाने का क्रम भी अब गड़बड़ाने लगा था। कभी-कभी तो दो-तीन दिन बीत जाते और मैं अपने नर्म-गुदगुदे बिस्तर में ही घुसकर कुछ-कुछ लिखती-पढ़ती। जब मन उकता जाता तो फिर से खुलेपन की चाहत में नीचे उतर कर किसी पेड़ के नीचे बैठी धूप-छाँव संग मैं भी वक़्त बिता लेती।
धूप के बढ़ते तीखेपन की वजह से शायद वह भी इधर कम ही आ रही थी। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि कोई घनिष्ठता न होने के बावजूद उसके न दिखने को मैं अक्सर ‘मिस’ करने लगी थी…और एक दिन शायद दिल को दिल की राह मिली। मुझे नीचे आकर बैठे मुश्किल से दस ही मिनट बीते थे कि अचानक उसकी धीमी आवाज़ से मैं चौंक पड़ी, “मैं आपके पास बैठ जाऊँ…आपको कोई दिक्कत तो नहीं होगी?”
मैं फिर हड़बड़ा गई। इतने मामूली से सवालों पर भी मैं क्यों हड़बड़ा जाती हूँ, कोशिश करने पर भी समझ नहीं पाती। बिना कुछ बोले मैंने हल्का-सा खिसककर उसके लिए जगह बना दी। थकी-सी वह वहीं बैठ गई। बेटे को भी उसने घास पर बैठा दिया, जो अगले ही पल तिनकों से खेलने में व्यस्त हो गया। 
आज कई दिनों बाद मैंने उसे फिर करीब से देखा था, चेहरा थोड़ा निस्तेज़ लग रहा था। गौर से देखा तो कुछ कमज़ोर भी लगी। दुबली-पतली तो पहले से ही थी, पर आज जैसे बीमारी वाला दुबलापन था।
“तबियत ठीक नहीं क्या? बड़ी कमज़ोर लग रही…” मैंने एक सोसाइटी में रहने के कारण अपना पड़ोसी-धर्म निभाने की फॉर्मेलिटी में पूछ भी लिया।  
“मुझे कैंसर है…अभी हाल में ही पता चला है…।” उसने एक नज़र मेरी तरफ देखकर कहा और फिर से अपना ध्यान दूर खेलती अपनी बच्ची की तरफ घुमा लिया।
“कैसे?” पूछते ही मुझे अपने सवाल के बेतुकेपन का अहसास हो गया, “मेरा मतलब किस तरह का कैंसर…कौन-सी स्टेज…?”
“कैंसर तो कैंसर होता है, किस तरह का या किस जगह का…इससे क्या फ़र्क पड़ता है ? मेरा वाला यूटेरस का है…आखिरी स्टेज…।” मेरी तरफ देखे बिना उसने जवाब दिया और फिर वहीं पास पड़ी एक डंडी से बेवजह पैरों के पास की घास खुरचने लगी।
अचानक से मेरे पास शब्दों का टोटा पड़ गया। अक्सर मेरी कहानियों की तारीफ़ में रंजन जब भी कहते, “वाह! कहाँ-कहाँ से गढ़ती हो ये सब…तुम तो भई वाकई में शब्दों की जादूगर हो…” तो मुझे अपनी काबिलियत पर हल्का-सा गर्व होता, पर इस समय मेरी जादूगरी का झोला तो जैसे पूरा खाली था। मैंने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रख दिया।
कहते हैं, हर स्पर्श की भी एक भाषा होती है…। उस समय शायद वह भाषा अपने पूरे अर्थ के साथ उसको समझ आ गई थी, तभी उसने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमा लिया, “मुझे नहीं मालूम मेरे शरीर में ये कैंसर कब और कहाँ से आया, पर इसका जो दर्द है न, वो मेरे लिए कोई नया नहीं होगा। उससे भी कई गुना ज्यादा दर्द तो मैंने बरसों-बरस झेला…। इसके लिए तो डॉक्टर दवा से तकलीफ कम करने की कोशिश कर सकते हैं, पर मेरे दर्द के लिए तो कोई डॉक्टर भी नहीं था मेरे पास…।” अपनी डबडबाई आँखे उसने फिर से नीचे की घास पर टिका ली।
उसकी बातें मुझे पहेली-सी लग रही थी। ये क्या अजीब-सा बोल रही है?
“मतलब…? साफ़-साफ़ बोलो क्या कहना चाह रही, मेरे पल्ले तो कुछ नहीं पड़ रहा। कैंसर के अलावा कोई और बीमारी भी है क्या तुम्हें? बताओ…शायद मैं कोई डॉक्टर सजेस्ट कर सकूँ…।” मैंने इस बार सप्रयास उसका चेहरा अपनी ओर घुमा लिया। नज़रे मिलाकर बात करने से सामने वाले की बात ज्यादा अच्छे से समझ आती है।
“मैं जिनके साथ रहती हूँ, वो मेरे पति नहीं हैं…और न मेरे बच्चों के पिता…” इतना बड़ा बम फोड़ते समय न तो उसने पलकें झपकी और न ही नज़रें चुराई। मैं ही अचकचा गई और बेध्यानी में उससे दो इंच परे भी खिसक गई।
उसने भी मेरी इस हरकत को लक्ष्य कर लिया था, तभी उसके चेहरे पर मुस्कान की एक हलकी रेखा खिंच गई, “इतना भर सुनकर ही आप मुझसे दूर सरक गईं। मेरी पूरी बात सुनकर तो शायद आपके नीचे से ये ज़मीन भी सरक सकती है…।”
जाने क्यों अपनी ही बात पर उसे क्या मज़ेदार लगा कि कहते-कहते वह खिलखिला पड़ी। उसके पास खेलते बच्चे को लगा, माँ शायद उससे हँस रही, इसलिए वह भी बहुत जोर से खिलखिलाया। मुझे कोफ़्त हुई। दो पल पहले की मेरी सारी सहानुभूति हवा हो चुकी थी। 
मैं तो लेखिका हूँ, फिर भी कभी अपने लेखन में भी मैंने मर्यादा और संस्कार की कोई सीमा नहीं लाँघी…और एक यह है…निर्लज्ज…अपने ही गिरे कारनामों को याद करके कैसे बेशर्मों की तरह हँस रही।
मैं जल्द-से-जल्द उससे दूर हो जाना चाहती थी, इसलिए बिना कुछ बोले वहाँ से तुरंत उठने का उपक्रम करने लगी, पर बड़ी तेज़ी से मेरा हाथ पकड़ उसने मुझे वापस अपने पास बैठा लिया, “आधी बात हमेशा पूरे सच से भी ज़्यादा ख़तरनाक और तकलीफ़देह होती है, इसलिए मेरा पूरा सच सुन कर ही जाइए…। हो सके तो इसे एक अजनबी की आखिरी इच्छा ही मान लीजिए…।”
मैं चाहूँ भी तो कभी किसी के साथ भी ज़्यादा कठोर नहीं हो पाती, सो बेमन से ही मैं बैठ गई…पर अच्छी-खासी दूरी बना कर…। आज के बाद ऐसी लड़की से मुझे कोई ताल्लुक नहीं रखना, जो दो बच्चों की माँ होकर भी अपनी निर्लज्जता की गुलाम हो।
“मेरी भी शादी हुई थी…आज से पाँच साल पहले…”
“अच्छा…” रोकते-रोकते भी मेरे मुँह से व्यंग्यात्मक रूप से ‘अच्छा’ कुछ ऐसे निकला जिसका साफ़ अर्थ था, तुम्हारी जैसी लड़की को भी बच्चों के नाजायज़ कहलाए जाने की परवाह है क्या? 
मेरे व्यंग्य को समझकर भी उसने अनसुना कर दिया, “सभी लड़कियों की तरह अपनी शादी से मैं भी बहुत खुश थी। ग़रीब घर की थी, पर इतनी भी ग़रीबी नहीं थी कि माँ-बाप अपने बच्चों को दो वक़्त की रोटी नमक के साथ भी न दे पाएँ। लेकिन मैं खुश इसलिए थी कि मेरी शादी में मेरे माता-पिता को एक धेला भी नहीं खर्च करना पड़ा था। बारात में भी गिनती के चार लोग आए थे…जो मेहमान थे, सब मेरी तरफ के ही थे…नाते-रिश्तेदार…मोहल्ले के…मेरी कुछ सहेलियाँ…बस…। मेरे पति ने बोला था कि वो अनाथालय में पला-बढ़ा है तो उसके कोई रिश्तेदार हैं भी या नहीं, उसे नहीं पता। लेकिन पढ़-लिख कर शहर में अच्छा कमा-खा रहा, इसलिए चार दोस्त-यार ज़रूर बन गए। वही उसके बाराती भी थे। मेरी माँ बहुत खुश थी कि मैं अपने घर की रानी बन कर रहूँगी…अपने पति के साथ अकेली…। न सास-ससुर का झंझट, न ननद-देवर-जेठ की खिट-खिट…।” 
जाने बीमारी की थकान थी या फिर कुछ और, पर बोलते-बोलते वो थोड़ा सुस्ताने को रुकी। मेरे ऊपर ऊब तारी होने लगी। अरे भाड़ में जाए तुम्हारी रामकहानी…मुझे क्या लेना-देना…? पर उसकी आखिरी इच्छा वाली बात ने मानों मेरे पैर बाँध दिए थे। 
उसने दो-तीन लम्बी साँस खींची और आगे बताने लगी, “विदा होकर उसके साथ शहर आई तो आम शादी-शुदा लड़कियों की तरह मेरे भी शुरुआती दो-तीन दिन उसी की बाँहों में बीते। मेरे मन में भी भविष्य के सपने सजने लगे। दो छोटे-छोटे कमरों वाला मकान था, पर मेरे लिए वो ही किसी स्वर्ग जैसे घर की कल्पना में बिलकुल फिट था। पर चौथा दिन आते-आते मेरे स्वर्ग में जैसे नरक के दूत घुस आए। मेरा हरेक सपना पल भर में छिन्न-भिन्न हो गया…।”
उसका बच्चा उसके पैरों के सहारे खड़ा हो गया था, उसे अपनी गोद में बिठाने के लिए वह फिर से कुछ पल को रुकी। अब तक मेरा मन भी थोड़ा चौकन्ना हो गया था। जिसे निर्लज्ज समझ के दुत्कार रही हूँ, कहीं वह बेचारी सद्य-ब्याहता विधवा तो नहीं? पर अगले ही क्षण मेरे तार्किक दिमाग ने सिरे से इस संभावना को नकार दिया। तीन दिन की ब्याहता का अपने पति से एक बच्चा तो माना जा सकता है, पर यह दूसरा…? और फिर अभी थोड़ी देर पहले ही तो इसने स्वयं स्वीकारा था कि इस समय इसके साथ रहने वाला आदमी न तो इसका पति है, न इसके बच्चों का बाप…। मेरे मन फिर वितृष्णा से भर उठा।
“चौथे दिन मेरा पति जब शाम को घर आया तो उसके साथ एक और आदमी था…” उसने आगे बोलना शुरू कर दिया, “मुझे लगा, पति का कोई दोस्त होगा जो शादी में नहीं आया तो घर आया है मुझसे मिलने…। अपने पति के कहे अनुसार मैं भी अच्छे से तैयार होकर चाय-नाश्ता लेकर उसके सामने गई। पर दस मिनट बीतते-बीतते मेरा भ्रम भी मेरे सारे सपनों की तरह टूट गया, जब पता चला वो उसका कोई दोस्त नहीं, बल्कि मेरा पहला ग्राहक था…।”
मैं अचानक चिंहुक पड़ी। ये अभी क्या बोला इसने…? 
“सच जानकर मैं गुस्से से फट पड़ी,” मेरे चिहुंकने की तरफ ध्यान दिए बिना वह अपनी रौ में बोलती जा रही थी, “ग्राहक शब्द तो मैं बोल रही। मेरे पति ने बोला तो यही कि वह उसका बॉस था, जिसके हाथ में उसकी तरक्की फँसी थी। एक बार मैं उसे खुश कर देती तो वह अगले ही दिन उसके तरक्की के कागज़ पर साइन कर देता…। उस एक पल में वो मेरे पति से मेरा दलाल बन गया था। मैं उसी समय वहाँ से निकलने लगी, पर उसने मेरे पाँव पकड़ लिए। हमारे भविष्य की दुहाई दी…मेरे सिन्दूर की कसम दी कि उसका सब कुछ बस मेरे हाथ में था। याद नहीं, पर शायद मैंने उसे एक थप्पड़ भी मारा था। लेकिन बदले में उसने मुझे कलेजे से लगाकर कहा…तुझे किस बात का डर है पगली…? मैं तेरा पति हूँ…मैं तेरी पवित्रता पर कभी ऊँगली नहीं उठाऊँगा, बल्कि आज तो तुम मेरे लिए एक देवी हो, जो अपने पति के लिए, उसकी इच्छा से इतना बड़ा त्याग करने जा रही। ये सब कहते हुए वो भी मेरे साथ रोने लगा। जाने मेरे दिमाग़ पर कौन सा पर्दा पड़ा कि थोड़ी-देर रो-धोकर मैं भी मान गई।”
उसने दो-तीन लम्बी साँसे लेकर बोलना ज़ारी रखा, “उसके बाद के दो-तीन दिन बिलकुल सामान्य बीते, जैसे आम घरों में बीतते हैं। मैं भी उस एक रात को किसी बुरे सपने की तरह भुलाने के लिए सहज रहने की कोशिश कर रही थी कि उसी शाम मेरे पति के साथ फिर कोई नया आदमी आया। इस बार उसने बोला, यह उसके बॉस का भी बॉस था…उस दिन वाले बॉस का अनुभव सुनकर उसे भी वैसा ही आनंद चाहिए। मैं बुरी तरह बिफ़र गई तो मेरे पति ने उस दिन जैसा ही दर्द-भरा डायलॉग मारा और मैं जड़-बुद्धि…एक बार फिर उस पर भरोसा करके नरक के रास्ते एक सीढ़ी और उतर गई। उसके बाद तो जैसे यह अक्सर की बात हो गई। जब कोई न होता तो वो अपना पति-धर्म निभाता…फिर किसी नए के आने पर अब मुझे मारपीट कर अपना काम निकलवाने लगा था। मैंने बहुत कोशिश की कि उसे उसका फ़र्ज़ याद दिलाऊँ, उसे फेरों के वक़्त ली गई अपनी रक्षा के वचन को निभाने पर मजबूर करूँ…पर कुछ नहीं हुआ। अब तो वो अक्सर गन्दी-गन्दी गालियाँ देता था, मना करने पर लात-घूँसे-थप्पड़ों से मारता था…अन्दर वाले कमरे में बंद करके मेरा खाना-पीना सब रोक देता था, जब तक कि मैं उसका कहा न मानूँ…।”
“तुमने अपने घर पर ख़बर पहुँचाने की कोशिश नहीं की?” मुझसे पूछे बिना रहा नहीं गया।
“पहुँचाई थी ख़बर…खुद एक दिन मौका पाकर मैंने मायके के पास रहने वाले बनवारी काका के यहाँ फोन करके अपने पिता से बात की थी…। रोते-बिलखते हुए उनके दामाद की सारी हरकते बताई…वहाँ से ले जाने की मिन्नतें की, पर मेरा बाप तो मेरे पति से भी बड़ा दलाल निकला। शादी के नाम पर एक लाख रुपये में उसने मुझे बेच खाया था…और अब मुझे अपने पति के साथ ही हर हाल में सुखी रहने की आदर्श शिक्षा दे रहा था। उस दिन मैं समझ गई, अपने मायके से मैं अपने माँ-बाप का तर्पण करके ही आई हूँ।”
“तुम्हारे साथ इतना कुछ हो रहा था तो उस जगह के आसपास के लोग…मोहल्ले वाले…अडोस-पड़ोस वाले…किसी ने भी कुछ नहीं कहा? तुम किसी की मदद ले सकती थी…।” जाने क्यों उसे दी जाने वाली ये सलाह मुझे खुद ही बहुत खोखली लगी।
“कौन बोलता…? दूसरे के फटे में कौन टांग फँसाता…और वो भी पति-पत्नी का मामला…? इस मामले में हमारा समाज ही नहीं, क़ानून भी तो अक्सर ‘घरेलू मामला’ कह कर आपस में ही सुलटाने की सलाह देते हैं न। बड़े शहरों में वैसे भी किसको किसकी पड़ी है? लेकिन मेरे मामले में तो मेरा पति बड़ा घुटा हुआ था। उसे पता था, रात के अँधेरे में किसी का काला कारनामा अधिक चमक के साथ लोगों की आँखें चौंधियाता है, इसलिए वो ग्राहकों को अक्सर शाम के झुटपुटे या कभी-कभी दिन के उजाले में लाता था। यही नहीं, बल्कि जिस समय अन्दर के कमरे में कोई भेड़िया मेरे शिकार में लगा होता, वो घर के मालिक की तरह आराम से बाहर के कमरे में बैठकर न सिर्फ सिगरेट के छल्ले उड़ाता हुआ टीवी देखता, बल्कि अक्सर दरवाजे के बाहर निकल कर एक-दो लोगों से दुआ सलाम करता उन्हें अपनी मौजूदगी का अहसास भी करा देता था। जब पति खुद घर में हो तो किस माई के लाल में हिम्मत होगी कि वो आकर उसकी बीवी की रक्षा करे? एक सुहागन का पट्टा अपने गले में बाँधकर, अपने पति की छत्रछाया में दुनिया की निगाह में तो मैं वैसे ही सुरक्षित थी।”
“तो ये आदमी…जो तुम्हारे साथ है…और ये बच्चे…?”
“मेरे बच्चे मेरे हैं, ये तो जानती हूँ, पर और किसके हैं, इसका पता मुझे भी नहीं। हाँ, जिस आदमी के बारे में आप पूछ रही, दुनिया और समाज के सामने इन बच्चों को उसने ही अपने बच्चों का नाम दिया है। ये भी आया था मेरा ग्राहक बनकर, लेकिन जाने कैसे अपने आप मेरा दर्द जान भी गया और समझ भी गया। इतने लोगों में सिर्फ यही एक अकेला था, जिसने मेरी बेबसी को समझा और मेरे पति को पूरा पैसा देने के बावजूद मेरी एक ऊँगली तक नहीं छुई।”
“इसीलिए तुम इसके साथ चली आई?” मुझे खुद पर आश्चर्य हुआ, कहाँ तो अभी कुछ देर पहले इसकी बातों के लिए वितृष्णा हो रही थी, कहाँ अब मैं खुद ही खोद-खोदकर उससे हर बात पूछ रही थी।
“इसे अपना हमदर्द पाकर ही मैं खुश थी। अपने जीवन का बोझ क्यों बेवजह किसी पर डालती। मेरी बेटी पैदा हो गई थी…उसे खेलते, बड़े होते देख कर मैंने अपने जीवन से खुद समझौता कर लिया था। जितनी देर मैं अपने पति का मनचाहा करती, उतनी देर वह मेरी बेटी का ध्यान दिए रहता। उसके लिए कपड़े-खिलौने, उसकी मनपसंद की खाने-पीने की सब चीज़ें लाता। बेटी के सहारे मेरे मन के किसी कोने में आशा की एक पतली सी रोशनी उगने लगी थी…शायद अपनी बड़ी होती बेटी की वजह से ही वो एक दिन ये सब छोड़कर सुधर जाए…। एक बेटी का बाप होने का अहसास शायद उसे इस गलीज़ रास्ते से बाहर आने का मकसद दे दे और हम सब पिछला सब भुलाकर एक परिवार बन कर रहें…। इसी आशा में मैं दिन काट रही थी कि एक बार फिर पता नहीं कैसे मैं प्रेग्नेंट हो गई। पहले तो कुछ महीनों के लिए अपनी आमदनी कम होने की बात सोच कर वो बहुत बौखलाया, फिर शांत हो गया। फिर एक दिन वो पीकर आया…कुछ ज़्यादा ही…। उसी नशे में उसने ज़िद पकड़ ली, मेरी सोनोग्राफी की…। मैं भी अड़ गई…मैं बच्चा नहीं गिराऊँगी…बेटी हुई तो भी नहीं। वो पति का फ़र्ज़ नहीं निभाता तो क्या, मैं माँ होने का फ़र्ज़ कैसे भूलूँ…? अपने जीते-जी मैं अपने बच्चे का खून कैसे होने दे सकती हूँ?”
पल भर रुककर वो आगे बोलने लगी, “उस दिन शायद वो अपने पूरे होशो-हवास में नहीं था, इसलिए लड़खड़ाते हुए उसने मुझे बिलकुल वैसे ही समझया, जैसे घर में पहला आदमी लाने पर समझाया था…अरे पगली, कौन कहता है कि लड़की होगी तो गिराएँगे…? इस बार दुनिया के सामने एक्ज़ाम्पिल सेट करते हैं…एक नया आदर्श…अगर बेटा होगा तो उसे गिरा देंगे…। अपना भविष्य बेटा नहीं, बेटी सुरक्षित करेगी…।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई, “उस एक पल में लगा, मेरी पूरी दुनिया ही उलट गई और मैं काले-विशाल अंतरिक्ष में बिना किसी सहारे के बस गिरती ही जा रही…। कहाँ जाकर रुकूँगी, कुछ पता नहीं…। थोड़ी देर में मेरा पति तो नशे में बेसुध होकर लुढ़क गया, पर मैं सम्हल चुकी थी। मेरे इस हमदर्द के घर का पता सिर्फ मुझे मालूम था, कई बार आने के बावजूद धंधे के नियमानुसार मेरे पति को उसके बारे में कुछ जानकारी नहीं थी। मैंने बिना एक पल गँवाए अपनी बच्ची को उठाया, जितना पैसा और ज़रूरी सामान मैं ले सकती थी, सबको एक सूटकेस में रखा और कुछ भी सोचे-समझे बिना इसके पास आ गई। उस समय तो ये भी नहीं जानती थी कि इसके पास सचमुच मुझे सहारा मिलेगा भी…या एक दलदल से निकल कर दूसरे में जा गिरूँगी। पर कहते हैं न, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं…। इस आदमी ने न केवल मुझे और मेरे बच्चों को सहारा दिया, बल्कि अपना नाम भी दिया। एक झटके में अपना सब कुछ त्यागकर सिर्फ हमारे लिए इसने वो शहर भी छोड़ दिया। जो कुछ मैं सोच भी नहीं सकती थी, मुझे और मेरे बच्चों को इसने वो सब कुछ दिया। सच कहूँ तो मुझे अब किसी बात का डर नहीं…कोई चिंता भी नहीं…। अच्छा चलती हूँ…आपका बहुत समय ले लिया…।”
सहसा उसने खड़े होते हुए अपने बच्चे को गोद में उठाया तो एकदम लड़खड़ा गई। मेरे पूरे बदन पर अभी तक रोंगटे खड़े हुए थे। जाने कब मैं उसकी कहानी सुनते हुए उससे एकदम सटकर बैठ गई थी, इसीलिए तुरंत मैंने लपक कर उसे थाम लिया, “थैंक यू,” उसके चेहरे पर एक कृतज्ञता-भरी, कुछ गीली-सी मुस्कान थी, “एक बात और…क्या अब आप मेरी कहानी लिखेंगी?”
(प्रियंका गुप्ता)
‘प्रेमांगन’
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आवास विकास योजना संख्या-एक,
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ईमेल: [email protected]
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ब्लॉग: www.priyankakedastavez.blogspot.com
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3 टिप्पणी

  1. प्रियंका!

    बहुत मार्मिक कहानी है आपकी!पढ़कर दिल करुणा और आक्रोश; दोनों से भर उठा।
    ऐसा लगता है कि गरीबी जीवन के लिए अभिशाप की तरह है, और लड़कियों के लिए तो नरक की तरह।

    लेकिन यह दुनिया अब भी अच्छाई से खाली नहीं हुई है। कहानी को पढ़कर ऐसा लगा।

    वास्तव में कहानी तो जिंदगी की ही होती हैं। अपने आसपास के लोगों की, माहौल की, दुनिया में घट रही घटनाओं की।

    कहानी के प्रारंभ में ही एक बात पर ध्यान अटक गया। जब वह दूसरी बार मिलती है और उत्सुकता से पूछती है,”कहानी लिखी?”
    यहाँ पर प्रश्न पाठक के मन में उठता है उसने कुछ कहानी तो बताई ही नहीं थी तो लिखी कैसे जाती?

    यहाँ एक जवाब हो सकता था कि,” तुमने कहानी तो बताई ही नहीं थी।”

    एक पल के लिए ऐसा मन में ख्याल आया कि यह जिज्ञासा तो उठनी ही चाहिए थी,कि अगर वह कहानी लिखने के लिए कह रही है तो कुछ तो बात विशेष होगी! उसकी कहानी सुन ली जाए।

    बस हमें ऐसा लगा।

    जैसे ही उसने बीमारी के बारे में पूछने पर जवाब दिया,”मुझे कैंसर है।”
    हमें एक झटका सा लगा। निश्चित ही लेखक- मन को भी लगा होगा।
    पूरी कहानी पढ़ने के बाद मन बहुत ही अधिक विचलित हो गया। लेकिन अविश्वास जैसा कुछ भी नहीं लगा।
    पूरी कहानी इस तरह के फ्लो में पढ़ ली मानो वह हमें सुन रही हो,क्योंकि कई बार इस तरह की घटनाएँ सुनने और पढ़ने में आई हैं ,कि गरीबी के कारण मजबूरी में माता-पिता ने अपनी बेटी को बेच दिया। जो भी हो, बात है तो तकलीफ देह। मन तकलीफ से भर जाता है।

    उसकी पूरी कहानी सुनाने के बाद मन बहुत ही अधिक द्रवित हो गया। पढ़ तो उसी दिन ली थी, जिस दिन पत्रिका लगी थी। पर उसके बाद कुछ लिखने पढ़ने का मन बन नहीं पाया।
    कहानी का अंत सुखद भले ही न हो, लेकिन संतोषप्रद रहा। उसे मरते वक्त यह संतुष्टि तो होगी कि कि उसे एक नेक इंसान मिला है जिसने उसकी जिंदगी को थाम लिया।
    बच्चे ऐसे व्यक्ति के हवाले थे जो अपने बच्चों की तरह ही उनकी देखभाल करेगा।

    विकास की उच्चतम धुरी पर पहुँचकर भी समाज में आज भी, नारियों का सम्मान और व्यवस्थाएँ परिस्थितियों पर ही निर्भर हैं।
    बेहद करुण कहानी है आपकी। प्रभावित तो किया। अंदर तक पहुँच कर ठहर गई।
    बहुत-बहुत बधाई आपको ।

  2. संवेदनाओं को जगाती मर्मस्पर्शी कहानी। मानव ने कितनी भी उन्नति क्यों न कर ली हो, लेकिन स्त्रियों की स्थिति में अंश मात्र ही सुधार हुआ है। ग़रीबी उसके लिए अभिशाप है।
    नीलिमा जी ने जहाँ प्रश्न उठाया है—कहानी लिखी? मुझे भी कुछ ऐसा खटका था ।
    पढने में उत्सुकता बनी रही। एक अच्छी कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई प्रियंका जी ।

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