रसोई का चूल्हा सब जानता है, उसके पास होता है घरवालों के सुख दुख का लेखा जोखा क्योंकि उसने देखे होते हैं घर के हर दिन को ताउम्र।
रसोईघर, चौका या पाकशाला किसी भी घर की आत्मा होती है, यूँ कहा जाए कि सांस्कृतिक पहचान होती है। जैसा अन्न वैसा तन और वैसा ही मन। दुनिया के किसी भी घर में चाहे वह बड़ा हो या कितना भी छोटा एक कमरा एक कोना तो आबाद रहता ही है जहाँ, जिंदगी की गाड़ी चलती रहे इसका ईंधन तैयार होता है। जठराग्नि की ज्वाला शांत रहे इसके लिए पाकशाला की ज्वाला को ज्वलंत रखना होता है। समय के साथ मैंने रसोई के स्वरूप को बदलते देखा है, रसोई पकाने वाले हाथों को बदलते देख युग का अनुमान किया जा सकता है। भारतीय रसोई की अनूठी पहचान, माँ, मसाले और पकवान। माँ के हाथ की रसोई याद करने का मतलब ये कतई नहीं है कि रसोई का स्तर गिरता गया है। स्तर क्यूँ गिरेगा भला? वह तो बृहदत्तर और विस्तारित होता गया है। शायद माँ के खाने को याद करना हमें उसकी यादों से जोड़ती है, अपने बचपन की गाहे बेगाहे सैर होती है इसी बहाने।
….हाँ तो आज मुझे अम्मा की रसोई की बहुत याद आ रही है। अम्मा लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाती थी, चूल्हा तो मिट्टी का बना होता था और जिसमें लंबी लंबी लकड़ियाँ डाल आग सुलगाई जाती थी। आँच धीमे करना हो तो लकड़ी बाहर की तरफ खींच लो और तेज करना हो तो लकड़ी आगे बढ़ा दो। धधकती आग पर पीतल की बटलोही में दाल पकता रहता, बीच बीच में अम्मा ढक्कन खोल उसके झाग निकालती रहती। चूल्हे दूअंछिया होते थे यानि लकड़ियों को नीचे से डालने के लिए एक ही जगह होती थी परंतु ऊपर दो मुहँ होते थें जिस पर दो चीजें एक साथ पकती रहती। अम्मा की रसोई में एक एकछियाँ चूल्हा भी था जो सिर्फ एक किसी चीज को पकाने वक्त सुलगाई जाती थी। अब सोचता हूँ तो लगता है जाने कितने जंगल तो मेरे ही परिवार ने जला डाले होंगे सिर्फ अपनी रसोई में, बाकी हीटर और गीजर के काम के लिए तब जो डिवाइस होते थे उसमें भी तो लकड़ियों का ही उपयोग होता था। बोरसी सर्दियों में आग तापने हेतु और तांबे का वो बड़ा सा ड्रमनुमा स्टैन्ड और नल लगा यंत्र जिसमें पानी गरम होता था। इन दोनों में भी तो लकड़ी का कोयला – कठकोयला ही उपयोग में आता था। छत के कोने में एक काठ कोठरी थी जिसमें छीली कटी सूखी लकड़ियों के ढेर सालों भर भरे रहते थे। अम्मा खाना बनाने के पहले मुझे ही दौड़ाती कि चुन कर ईंधन ले आऊँ छत से।
हाँ तो मुझे अम्मा की रसोई की आज बहुत याद आ रही है। लकड़ी के चूल्हे पर पके उस देसी खाने का स्वाद अब तो मानों बस स्मृतियों और जिह्वा के कोरों पर ही शेष है।
… सामने पड़ा बर्गर अभी बहुत गरम था।
मन के कोने में एक ग्लानि सर उठाने को व्याकुल हो रहा है कि पृथ्वी से हरियाली खत्म करने के गुनहगार हम भी हैं, पर अम्मा के हाथों से पके खाने का स्वाद और सोंधापन बार बार हावी हो उसे परे धकेल दे रहा है। कितना स्वाद होता था बटलोही के उस दाल का, क्या स्वर्गिक सुख था उस तरकारी में जिसे अम्मा बस सिर्फ छौंक कर बनाती थी। रसोई में ही मेरा आसन जमता, अम्मा चूल्हे की लाल लाल आँच पर गरम गरम नरम रोटी सेंकती जाती और घी चुपड़ देती जाती। सहसा वह सोआ मेथी साग सेम बैंगन डली पँचमेल सब्जी और ओल की चटपटी चटनी का स्वाद लार के रूप में टपकने को आतुर हो होंठो से बह जाने हठ करने लगा। लार घोंटते जिह्वा को होंठो पर यूँ ही फिरा शून्य की ओर ताकने लगा मैं…
अम्मा पिताजी अचानक बहुत याद आने लगे, वैसे भी भूलता भला कौन है बस विस्मृतियों के वृत्त की परिधि में ही होते हैं। कभी कोई शब्द, कोई दृश्य या कभी कोई गंध खींच कर ले जाती है स्मृतियों के गलियारों में, जहाँ जीवंत हो वे टहलते घूमते दिख जाते हैं। परंतु स्मृतियों के इस भ्रमजाल में अम्मा मुझे हमेशा अपनी वो कच्ची मिट्टी की चूल्हे के पास ही दिखती है। कभी भोजन निपटाने के पश्चात चूल्हे को मिट्टी से लीपती हुई तो कभी सिल-बट्टे पर कुछ पीसते हुए। अब जाहिर सी बात है अम्मा के चर्चा के बाद, बर्गर की तरफ देखने की भी इच्छा नहीं हो रही।
… सामने टेबल पर बर्गर अपने रैपर में ही लिपटा पड़ा था।
मैं तब इंजीनियरिंग कॉलेज के फाइनल ईयर में था जब हमारे कस्बे में गैस के चूल्हे बिकने शुरू हुए थे। लकड़ी के चूल्हों पर सदियों से पकाने वालों के लिए ये एक अचंभित करने वाली बात थी, लोग सिरे से नकार रहे थें।
“गैस पर यदि रोटी सेंकी जाए तो उससे पेट में गैस की समस्या हो जाएगी”
“सब्जियों में वह स्वाद नहीं होगा”
“गैस के सिलिन्डर फट जाएं तो आग लग जाएगी घर में”
… यानि जितने मुहँ उतनी बातें, उतने ही संशय। उस दौरान तक प्रेशर कुकर का भी पदार्पण हो चुका था और बेचारा वह भी बहुत विरोध झेल चुका था।
“कूकर का दाल कुक्कुर की तरह होते हैं”
“सब्जियां तो इसमें पकानी ही नहीं चाहिए गल कर हलवा हो जाती हैं”
“ढक्कन पर रबर लगा होता है, छी अब रबर में खाना बनाएंगे”
“सेफ्टी वाल्व उड़ जाए तो चेहरा जला जाए”
वही जितने मुँह उतनी बातें उतने संशय, परंतु प्रेशर कुकर को गैस चूल्हे की तरह ज्यादा विरोध नहीं झेलना पड़ा। अम्मा की रसोई में ये नया गैजेट प्रवेश ले चुका था, पर बंदिशे बेचारे पर तब भी बहुत थी। मसलन दाल तो बटलोही में ही बनेगी, तरकारी भला कुकर में क्यूँ पके, बहरहाल आलू वैगरह उबालने में सुविधा हो गई। वैसे ही एक छुट्टी में घर आया हुआ था तो प्रेशर कुकर के साथ पकाने का मिला बुकलेट पढ़ने में बड़ा मज़ा आ रहा था, कि एक दोपहरी गली से एक भोंपू से आवाज आती सुनी मैंने,
“रात बारह बजे कोई मेहमान आ जाए तब भी उसे खाना बना कर खिलाएं”
“न धुआँ न आँसू साफ-सुथरी रसोई में हँसते-मुस्कुराते खाना बनाए”
“वृक्ष बचाओ जीवन की रक्षा करों”…
जी बिलकुल! शुरुआत में इसी तरह गली गली में घूम कर गैस से जलने वाले स्टोव का प्रचार होते मैंने देखी है। अम्मा बिलकुल मूड में नहीं थी इस बदलाव के लिए। मैं खुद भी तो अधिक नहीं जानता था कि ये कैसे काम करता है और लकड़ी पर खाना पकाने से ये कैसे बेहतर होगा।
घर में गैस से जलने वाला चूल्हा आया तो पर कुछ महीनों के बाद, जब मुझे पहली सैलरी मिली थी और मैं दिल्ली से घर आया हुआ था। दिल्ली में मैं अपने एक दोस्त के घर के ठहरा था जब नौकरी जॉइन करने गया था, तो पहली बार मुझे गैस चूल्हे के दर्शन हुए, उसके फायदे समझ में आए। उन्हीं छुट्टियों में मेरी शादी भी होनी थी। जब गैस चूल्हा आया तो अम्मा सिलिन्डर देख ठिठक गईं और अपने चौका में उसको प्रवेश नहीं होने दिया। वही दरवाजे पर मैंने एक टेबल रख उस पर चूल्हे को आसन दे दिया। मैं उस पर चाय बनाता तो कभी कुछ और पका कर अम्मा को आकर्षित करने की कोशिश करता। पर अम्मा,
“अरे बिटवा अब खड़े खड़े तो हमरा से काम न हो पाई। बेकारे तू पैसवा बर्बाद कर देलअ”
कह कर टाल देती और अपने पुराने चौकाघर में ही रम जाती। गैस चूल्हे के साथ आई सावधानियों के लिस्ट से ही वे घबरा जाती। फिर ब्याह की गहमा गहमी शुरू हो गई और अम्मा व्यस्त होती गई। अम्मा की बहुरिया कलकत्ते से थी सो वह गैस पर खाना पकाना जानती थी और कभी-कभार अपनी पाक कला कौशल को आजमाने की कोशिश करती थी। मेरी पत्नी ने कभी लकड़ी के चूल्हे पर काम ही नहीं किया था सो उसने वहाँ सींग भी नहीं घुसाना चाहा, अम्मा का चौके के अंदर निर्बाध शासन चलते रहा पूर्ववत। मुझे तो नहीं पर पिताजी यदाकदा अम्मा को कहते कि खाना अंदरवाली रसोई की अधिक स्वाद होती है। सो अम्मा काम ओढ़ी रहती दिन भर और बहुरिया जब तक रही ऊपर के काम ही करती रही। कुछ महीनों के बाद मुझे दिल्ली में खाने की दिक्कत होने लगी तो मैं प्रीति को ले आया। अब यहाँ फ्लैट में चमचमाता किचन था, जिसके स्लैब पर गैस का चूल्हा था, मुझे गरमा गरम रोटियाँ मिलती रही वो भी घी चुपड़ कर।
….सामने पड़े बर्गर को मैंने हिकारत भरी नजरों से देखा।
…..शुरू के कई साल किराये के दो बेडरूम फ्लैट में जिंदगी चलती रही बाद में दो बेडरूम फ्लैट किश्तों में खरीदा, जिंदगी किश्त चुकाने में चलने लगी। अम्मा-पिताजी कभी कभार आते पर पदार्पण के साथ ही वापस जाने की गुहार लगाने लगते। अब फ्लैट में मैं कहाँ से छत, दालान, ढेर सारे कमरे और खुलापन उपलब्ध कर पाता? फिर यहाँ आ कर अम्मा वैसे ही हमारे रसोई के बाहर ही चक्करघिन्नी सी घूमती जैसे प्रीति उनके चौके के लक्ष्मणरेखा को पार करने में असमर्थ रहती थी। उन्हें जरूर डाइनिंग टेबल चेयर पर भी बैठ खाने में परेशानी होती थी, इस बात का एहसास मुझे अभी हाल में हुआ है, पर अब तक तो टेम्स में काफी पानी बह चुका है। प्रीति ढेरों मसाले तो कभी दही तो कभी दूध इत्यादि डाल कर होटल जैसी स्पेशल सब्जी बनाती तो हम उँगलियाँ चाट चाट खाते, पर अम्मा-पिताजी को उस खास ग्रैवी से उंगली डाल सब्जियों को खींच कर निकाल कर खाते देखता तो आश्चर्य होता। खाने के दौरान उंगलियों का ये अलग अलग इस्तेमाल ही शायद पीढ़ियों का अंतर है। सबसे ज्यादा मुश्किल उन्हें उस दिन होती जिस दिन पनीर की कोई लज्जतदार डिश बनती, बिचारे बार बार कहते,
“अच्छा छेने की तरकारी भी बनती है, हम ने तो आजतक सब्जियों की ही तरकारी खाई थी। हो जाएगी आदत धीरे धीरे…”
प्रीति उन्हें बताती,
“यहाँ दिल्ली में खूब बनते हैं पनीर के व्यंजन, मशरूम की सब्जी”
“बहू, वो सांप के छाते की सब्जी मत बनाना”,
पिताजी सिहर जाते।
अब मुझे एहसास हो रहा कि आदतों को बदलना कितना मुश्किल है। बात होती तो छोटी सी है पर यही छोटी छोटी बातें पीढ़ियों का अंतर तय करने लगती है।
… मैंने बर्गर को उसके रैपर से निकाल बाहर कर लिया, पर खाने की इच्छा नहीं हो रही थी।
… बेटा जब तक छोटा रहा हर तीज-त्योहार में हम अम्मा के पास जाते रहें। वह अब भी लकड़ी पर ही खाना पकाने की कोशिश करती थी पर उम्र के साथ घुटने जवाब देने लगे थे। यही है उम्र का करिश्मा इंसान के चुप होने में ज्यादा भलाई है जब घुटने या कमर जैसे अंग जवाब देने लगे। उन दिनों अम्मा या पिताजी के चेहरे पर संतुष्टि का उभरता भाव मुझे प्रफुल्लित कर देता। हालाकिं अब वहाँ भी घर घर गैस आ चुका था पर अम्मा लकीर की फकीर बनी रहीं। प्रीति हर बार साथ चलने का जिक्र करती,
“पिताजी अब आप दोनों वहीं चल कर साथ रहें, अंकुर की पढ़ाई का हर्ज होता है यहाँ आने पर, फिर आपलोग क्यूँ अकेले यहाँ रहेंगे?”
अम्मा झट से कोई दलील पेश कर इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज़ कर देती। हम ही आते रहते भले अंतराल हर बार बढ़ते जाता। हर बार अम्मा एक नई बीमारी के सँग मुझे दिखती पर दिल्ली जाना टालती रही।
पर पिताजी नहीं टाल पाए, जब अम्मा को एक दिन उनकी रसोई में ही दिल का दौरा पड़ा और वे आनन-फानन में चल बसी।
“अब तो मैं आपको बिल्कुल ही नहीं छोड़ कर जाऊँगा, चलना है तो बस चलना है हमारे साथ”
अम्मा के क्रियाकर्म के खत्म होते मैंने रट लगा ली। प्रीति ने ही पिताजी के कपड़े, जूते, दवाइयाँ समेट एक बक्से में बांध लिया। अम्मा के चौकाघर सहित हर कमरे को तालों के सुपुर्द किया। पिताजी एकटक मूक बने बस रसोई के बंद होते दरवाजे को ही देखते रहें। अम्मा के प्राण यही बसते थे, पिताजी की प्राणप्रिया ‘माँ’ की कर्मस्थली। अम्मा और उनकी रसोईघर का अध्याय साथ ही पूर्ण हुए।
एक बार दिल्ली क्या जाना हुआ, अम्मा और उसकी रसोई नेपथ्य में चलते चले गयें। पर शायद मेरे लिए, पिताजी तो वहीं अटके रहे, भले तन कहीं रहा पर मन आत्मा उसी लकड़ी के चूल्हे के पास ही छूट गया। शायद तन भी मन के साथ, तना बन उसी धरती में रोपित रह गया।
दिल्ली में वे अंकुर के साथ कमरे में शायद ही कभी सेट हो पाए। किसी किसी दिन उन्हें परकटे पंछी की तरह फ्लैट में इधर उधर होते देखता तो मन ग्लानि भाव से भर जाता। पेट को पापी बना, इंसान अपनी जड़ों से दूर होता जाता है। कहने को बस यही बहाना है कि दो जून की रोटी की तलाश में घर से निकलना जरूरी है, शायद इसी का नाम तथाकथित ‘तरक्की’ है। पर किस कीमत पर ये तरक्की हासिल होती है? हमारे अपनों की ही कीमत पर। पर ये बात भी बस अभी अभी ही समझ आई है, उस वक्त तो यही लगता था कि पिताजी को साथ रख रहें हैं, प्रीति उनकी इज्जत करती है और उन्हें मैं क्या दे सकता हूँ। वाकई मैं और क्या ही दे सकता था उन्हें? घड़ी की सुइयाँ पीछे तो नहीं की जा सकती हैं?
पर पिताजी पर तेजी से उम्र हावी हो रही थी। उन्हें चुपचाप गर्दन झुकाए खाते देखता तो मैं समझ जाता कि उन्हें क्या खल रही है, पर मैं क्या करता? दिनों दिन उनकी भूख कम होती जा रही थी, शारीरिक कमजोरी हावी होती दिख रही थी मानों रोटियों में अब वो ताकत ही नहीं बची थी उनके लिए जो उनकी भूख मिटा देती। पर वे जीते रहें, अम्मा के जाने के वर्षों बाद भी। उनका पोता अंकुर लंबा-तगड़ा होते जा रहा था, जो भी देखता उसका हिया जुड़ा जाता पर पिताजी दिनों दिन कमजोर और कमर से झुकने के कारण सिमटते से मालूम होते। ऐसा लगता है पिछली पीढ़ी अपनी जवानी और स्वास्थ्य अगली पीढ़ी को सौंपता जाता है, एक दिन विलीन हो जाने की मानों ये तैयारी हो।
अंकुर पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार था, देश की उच्चतम संस्थानों से उसने पढ़ाई की। फिर एक दिन वह सागर और देश गागर हो गया। ऐसा कुशल ऐसा सफल कि अब देश में कुछ बचा ही नहीं था, बस विदेश जाने से ही उसकी तरक्की संभव थी। दुनिया में तरक्की की राह विनाश के बाद ही बनती है। जंगल के जंगल कट जाते हैं मानव बस्तियां बसाने में। हरे भरे विशाल वृक्षों का कटना उनकी नियति बन जाती है जब उनसे किसी राह को निकल आगे बढ़ना होता है। पिताजी उस पुराने बरगद की तरह थे, जिसका मुख्य तना तो वहीं उस मिट्टी के चूल्हे वाले घर में था। हवा में लटकती उनकी शाखाओं से जड़ें किसी और ही धरती पर बढ़ कर पनपने को अग्रसर थीं। अब ये नई जड़ कहाँ की धरती को धन्य करती हैं ये तना कहाँ जानता है। उसका तो काम है तन कर रहना बाहें फैला कर रखना ताकि नई जड़ किसी और बेहतर स्थान पर पल्लवित हो जम जाएं। इसी को तो तरक्की कहा गया है शायद।
पिताजी का ये रूममेट भी उनका साथ छोड़ उड़ने की तैयारी में मगन था कि एक दिन उन्होंने अचानक से कहा,
“अंकुर विदेश जाने के पहले चल कुछ दिन अपने पुराने घर में रहा जाए। तुम्हारे पापा-मम्मी भी चलेंगे। चलोगे न?”
उन्होंने प्रीति और मुझसे मुखातिब हो कर पूछा।
“हाँ पिताजी बहुत अच्छा लगेगा, मैं छुट्टी के लिए अप्लाई कर देता हूँ”
हमने तुरंत ही हामी भर दी।
एक ओर अंकुर विदेश जाने की तैयारियों में मगन था तो दूसरी तरफ पिताजी घर जाने के दिन खुशी खुशी गिन रहे थें। बीच में मैं दोनों की खुशियों में भींग रहा था। पिताजी का उत्साह देखने लायक था, उनका उत्साह अंकुर के विदेशी कॉलेज में हुए दाखिले की खुशी से रत्ती भर भी कम नहीं था। जब वे बंद घर के ताले को खोल रहे थें तो न तो कमर झुकी थी और न ही हाथों में कोई कंपन था। इतने वर्षों में भी पिताजी ने दिल्ली वाले फ्लैट को घर शायद नहीं माना था। घर खुलते ही अम्मा की रसोई फिर से प्रत्यक्ष थी, ऐसा लगा मानों वे वहीं बैठी हुई हैं कुछ खटर-पटर करती हुई। हम सब ठिठके हुए घर का मुआयना कर ही रहें थे कि जोरों से कुछ गिरने की आवाज आई, आवाज की दिशा में हमने सर घुमाया तो पाया पिताजी फिसल कर गिरे हुए हैं। कभी कभी कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्हें घटते देख महसूस होता है कि सब कुछ शायद पूर्वनिर्धारित होता है। पिताजी चौकाघर की चौखट पर अर्धबेहोशी वाली स्थिति में थे। हमारे उठाते-संभालते वे हिचकियाँ लेने लगे। मैंने उनका सर अपनी गोद में रख चोट की जगह देखने की कोशिश करने लगा, अंकुर डॉक्टर डॉक्टर बोल बाहर की तरफ दौड़ा। प्रीति पानी लाने दौड़ी और इसी बीच पिताजी ने मेरी गोद में ही आखिरी बार आँखे बंद की बिन किसी आवाज के। मैं सर सहलाता रह गया चोट की जगह खोजता रह गया और उनके हाथ पैरों का ठंडापन मुझे सिहराने लगा। ऐसा लगा मानों उन्होंने कुछ साजिश कर रखी हो नियति संग। बरगद का वह मुख्य तना जिसकी जड़ें इस आँगन में जमी थी उस दिन सूख गया- मानों गायब हो गया। माँ पिताजी ने हमेशा आधे कप झगड़ों में अदरकी गुस्से को कूट कर डेढ़ कप प्यार मिला चाय पी थी, एक पीढ़ी का अवसान था एक युग का गुजरना हुआ।
मैं आँखे बंद कर आज भी पिताजी के देह का वह ठंडापन महसूस करता हूँ।
… सामने पड़ा बर्गर भी सचमुच ठंडा हो चुका है।
बरगद का मूल तना भले ही गायब हो चुका हो, पर नई जड़ें काफी गहरी हो चुकी थी मजबूत हो चुकी थी। पुराने वृक्षों को यूँ ही कटना होगा, अपने अस्तित्व को मिटाना ही होगा तभी तो सभ्यतायें विस्तार पायेंगी।
अंकुर विदेश जा चुका था, विदेशी नागरिकता के साथ ही उसने एक विदेशी लड़की का पति बन नए देश में अपनी जड़ें बखूबी जमा चुका था। नई मिट्टी नई खाद नई संगत में वृक्ष पर नई रंगत के कोंपल फूट रहे थें। तरक्की ने नई ऊंचाइयों को छू लिया था। संस्कृतियों के वर्णसंकर ने एक नई ही सांस्कृतिक प्रजाति की तैयारी में थे। अंकुर बार बार बुलाने लगा था,
“पापा आप और मम्मी आइए यहाँ, कुछ महीने रहिए हमारे साथ, अच्छा लगे तो हमेशा ही यहीं रहिए। हम दोनों ही नौकरी करते हैं। कितनी बार और कितने दिन वहाँ दिल्ली में रुक सकेंगे?”
“डैड, अंकुर आपका इकलौता बेटा है। हम चाहते हैं आप सदा के लिए यहाँ आ कर रहे, सिटिज़नशिप के लिए हम कोशिश करेंगे”
आधी-देसी आधी विदेशी माता-पिता की संतान हमारी बहू ऐलिजा सचमुच एक आदर्श बहू ही थी जो ऐसी भावना रखती थी वरना यहाँ पड़ोस के खन्ना जी की खाँटी देसी सजातीय बहू तो एक दिन अपने घर में टिकने नहीं देती थी अपनी सास-ससुर को। परंतु बर्गर हमारे रसोई में प्रवेश कर चुका था।
… सामने पड़े बर्गर में मुझे अपने घर में हो रही संस्कृतियों का घालमेल ही प्रलक्षित हो रहा था।
याद आने लगा मुझे अंकुर और उसके परिवार का दिल्ली आना। प्रीति नित तथाकथित नए अनूठे भारतीय व्यंजन पकाती पर पोते बहू के साथ साथ अब अंकुर को भी हजम नहीं होते तेल-मसालों वाले भोजन। ऐलिजा बिचारी रसोई में जा ही नहीं पाती, छींकती खाँसती रह जाती क्यूंकि रसोईघर में मैंने चिमनियाँ नहीं लगवाई थी। इग्ज़ॉस्ट पंखे, भोजन की खुशबू जो उड़ा देते थे। पकने के दौरान से ही जो रस नासिका के रास्ते मन में उतरते वह भोजन के स्वाद को द्विगुणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। प्रीति वाकई खाना बहुत अच्छा पकाती थी सभी रसों से परिपूर्ण। भले वह माँ की तरह लकड़ी के अंगारों पर बैंगन-टमाटर नहीं भूनती थी पर गैस और माइक्रोवेव में भी पका कर उस तक स्वाद पहुँचा ही लेती थी। बनाने का तरीका भले भिन्न हुआ था पर उन व्यंजनों का मैं आनंद उठा ही लेता था जो बचपन में खा चुका था, विधि बदले हो पर नाम तो वही पूराने थे।
………कोई दो महीने हो चुके थे मुझे विदेश में, अंकुर के घर आए। बेटा-बहू बहुत खुश भी हुए हमारे आने से। शुरुआत के कुछ दिन उसने छुट्टी ले कर हमें खूब घुमाया। वाकई विकसित देशों की बात ही कुछ और होती है। साफ-सुथरी चमकती हुई सड़कें, पानी और आकाश, कहाँ देखी थी हमने ऐसी सफाई, ऐसी ईमानदारी और भीड़ रहित जगह। सैर-सपाटा घूमना, बाहर खाना – कुछ दिनों तक तो ये बदली हुई दिनचर्या बहुत भाई। फिर जब बेटे-बहू अपने रूटीन में ऑफिस-दफ्तर जाने लगे तो हम दोनों को भी अपनी दैनिक दिनचर्या का भान हुआ। प्रीति भी कुछ घरेलू बनाना चाहती थी और मुझे भी अब रोज रोज के हॉट डॉग, बर्गर, पिज्जा, सलाद या ब्रेड से इतर कुछ खाने की इच्छा हो रही थी। पर प्रीति एक बार फिर यहाँ के रसोई में खुद को नाकाबिल समझने लगी थी। बमुश्किल उसने उस मॉर्डन किचन में आँच जलाना सीखा था, पर रसोई में आधे से अधिक समान उसके काम के नहीं थे। अपनी पारंपरिक भोजन के आवश्यक सामग्री भी नहीं थे। विदेशी बहू से क्या और कितना पूछती कि,
“आलिव ऑइल में आलू की भुजिया बना लूँ? या दाल कैसे गलाऊँ, कुकर तो दिख ही नहीं रहा…”
दो तीन बार तो फायर अलार्म बज चुके थे।
अंकुर कहता,
“मम्मी सारी जिंदगी तो तुमने खाना बनाया है। अब मत परेशान हो, देखो यहाँ बाहर भी बिल्कुल हेल्दी भोजन मिलता है वो भी कई प्रकार के। तुम और पापा दिन भर बाहर घूमो और जहाँ जो मन हो खा लिया करो। वीकेंड पर मैं इंडियन रेस्टोरेंट ले चलूँगा”
अंकुर हर तरह से लायक बच्चा है, वह हमारे पर्स में डॉलर भर कर रख देता कि आप यहाँ अपना खर्च न करें। आधे पके खानों से तो फ्रीज़ भरा रहता, जिसे जब मन हो माइक्रोवेव में गरम कर खा ले।
“देखिए यहाँ बुजुर्ग कितनी शान से और खुश हो कर जीते हैं। हम सब यंग लोग तो नौकरी के पीछे भागते हैं, पर दिन-दोपहरी में हर रेस्टोरेंट में ये बूढ़े लोग कितना सजधज कर समूह में यहाँ हँसते मुसकुराते, खाते-पीते रहते हैं। मुझे मन है आप और मम्मी भी बस ऐसे ही खुश रहे”
अंकुर हमें खूब समझाता।
पर हम दोनों तो रेस्टोरेंट में अकेले जाते तो बर्गर छोड़ कुछ समझ ही नहीं पाते, विदेशों में यूँ भी शाकाहारियों के लिए मनपसंद भोजन चुनना दुष्कर है। दो महीने बीतते न बीतते अपनी देश, अपनी जगह और सबसे ज्यादा अपनी रसोई की याद आने लगी। कोई कितने दिनों साफ-सफाई और सुंदरता देख कर ही जिये? अपना दिल्ली वाला फ्लैट और भीड़ भाड़ वाली गली मुहल्ले की कमी खलनी ही थी। इंसान तरक्की करता है और जगह पीछे छूटती जाती है, यही है पीढ़ियों की दास्तान। तरक्की का ये मुकाम तो अंकुर का है न कि मेरा, मैं कस्बे से महानगर आया और मेरा बेटा देश से विदेश। पीढ़ियों की इस तथाकथित तरक्की में मुझे तो अपनी ही जगह पर टिकना पड़ेगा वरना इस तेज दौड़ में मुँह के बल गिरूँगा। मैं इन्ही ख्यालों में खोया था और मेरी अर्धांगिनी रसोईघर के बदलते स्वरूप से लोहा ले रही थी। रसोई- यही तो प्रतीक है घर में रहने वालों की प्रकृति की।
आज सुबह प्रीति ने कुछ कोशिश तो की थी पकाने की और मनलायक न बना पाने की हताशा से जूझ रही थी। सारा दिन काटना अभी बाकी ही था तो मैं जबरदस्ती उसे ले कर पास के एक रेस्टोरेंट में आया था। बड़े से टेबल पर बुजुर्गों की टोली ठहाके लगाते हुए खा पी रही थी और प्रीति अपनी मुड़ी तुड़ी सूट में उलझी सी चुप की दोहर में लिपटी बैठी थी। मैं उसकी चुप्पी पढ़ रहा था, वही भाव था जो मेरे मन में भी डूब उतरा रहा था।
टेबल पर सामने हमेशा की तरह पड़ा,
बर्गर हमें मुँह चिढ़ाने में मशगूल था और हम उससे बचने की फिराक में।
वह हमारी भूख पर भारी पड़ता कि प्रीति ने उससे पहले कहा,
“देख लिया बच्चे की घर गृहस्थी और देश-विदेश भी, अब मुझे वापस लौटना है। सच तो ये है कि जब अपनी रसोईघर में तुम चुपके से आ कर मेरी कलाई पकड़ते थे तो तवा पर चढ़ा आलू पराठा हमें साथ देख जल जाता था। फिर हम हँसते हुए उन जले पराठों को खाते और कहते दुनिया जलती है हमें देख कर। यहाँ तो मुआ, पहले फायर अलार्म ही बज जाते है, ये मॉर्डन कुकिंग टेबल देख मैं वैसे ही घबरा जाती हूँ जैसे अम्मा के मिट्टी के चूल्हे को देख डर जाती थी।
सच कहूँ मुझे अपनी रसोईघर की याद आ रही है। सास और बहू दोनों की ही रसोई में मैं मिसफिट रही, पर क्या करूँ?”
अधेड़ होती प्रीति की मजबूरी मैं समझ रहा था, मुश्किल होती है नई मिट्टी में जड़ों का जमना।
कुछ रुक कर मैंने फिर कहा,
“हर पीढ़ी की अपनी अपनी रसोई, अपनी ढपली अपनी राग की तरह है। इस बार अपनी रसोई में मुझे अपना शिष्य बना लेना। मैं मदद कर दिया करूंगा पर मुझे खाना बनाना जरूर सीखनी है ताकि जरूरत पर हमदोनों की भूख मिटा सकूँ”
अपनी जड़ों की तरफ लौटने की बेताबी मुझे बेसब्र करने लगी। मैं नहीं विलग रहूँगा अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी में ही मजबूती से खड़ा रहूँगा। मेरा फल किसी और जगह अपना वंश बेल छितराते रहेगा और मैं अपनी जगह छाँव घनेरी तो कर ही सकता हूँ। मैं बूढ़ा बरगद बन डटा रहूँगा, न कटूँगा न हटूँगा न ही कमजोर पड़ूँगा कि सूख जाऊँ।
“आज इस बर्गर को यहीं छोड़ चलो किसी इंडियन रेस्टोरेंट में खाते हैं, कुछ तुम जैसा पका हमनाम डिश तो मिल ही जाएगा वहाँ”
मैं और प्रीति प्रफुल्लित हो बढ़ चले और प्लेट में पड़े बर्गर की तरफ देखने की मजबूरी अब खत्म होने को थी।
रसोई और भोजन हमारी जीवनशैली का एक हिस्सा हैं। अपना परिवेश अपना तरीका शरीर को ही नहीं आत्मा को भी तृप्त करता है। एक भोजन शरीर का होता है एक मन का। विकास अपने बीज नई पीढ़ी के रूप में छितराता है और पुरानी पीढ़ी अपनी शैली में ही सुकून पाती है। इस कहानी में बिना किसी टकराव के पीढ़ियों का अंतराल तो दिखाई देता है पर इतने सहज और सटल तरीके से की मन भावुक हो जाता है । कई बार कोई खलनायक नहीं होता परिस्थितियाँ खलनायक की भूमिका अदा करती है। भोजन, रसोई और बर्गर का बिम्ब लेकर जिस तरह से आपने कहानी को बुना है उससे कथ्य और भी विशेष हो गया है। एक अच्छी कहानी के लिए बहुत बधाई और स्नेह रीता जी
कहते हैं ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड।
रसोई के माध्यम से आपने पीढ़ीगत अंतर को , कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। वास्तव में कुछ अच्छा बुरा सही या गलत नहीं होता, हमारी सहूलियतें, उन्हें स्वीकार्य अथवा अस्वीकार्य बनाती हैं। माँ प्रीति की रसोई में कभी सहज न हो सकीं, उसी तरह प्रीति अपनी बहू की रसोई में।
अपने कंफर्ट जोन से निकलना वाकई कष्टप्रद होता है।
इस सुंदर कहानी के लिए बधाई रीता जी..
बहुत अच्छी कहानी, रसोई के माध्यम से पीढ़ियों का अंतर और तरक्की का अर्थ कस्बे से दिल्ली और दिल्ली से विदेश, को आपकी लेखनी ने बहुत ही खूबसूरती से दिखाया है, बहुत बधाई!
बहुत अच्छी कहानी
जी शुक्रिया
रसोई और भोजन हमारी जीवनशैली का एक हिस्सा हैं। अपना परिवेश अपना तरीका शरीर को ही नहीं आत्मा को भी तृप्त करता है। एक भोजन शरीर का होता है एक मन का। विकास अपने बीज नई पीढ़ी के रूप में छितराता है और पुरानी पीढ़ी अपनी शैली में ही सुकून पाती है। इस कहानी में बिना किसी टकराव के पीढ़ियों का अंतराल तो दिखाई देता है पर इतने सहज और सटल तरीके से की मन भावुक हो जाता है । कई बार कोई खलनायक नहीं होता परिस्थितियाँ खलनायक की भूमिका अदा करती है। भोजन, रसोई और बर्गर का बिम्ब लेकर जिस तरह से आपने कहानी को बुना है उससे कथ्य और भी विशेष हो गया है। एक अच्छी कहानी के लिए बहुत बधाई और स्नेह रीता जी
वंदना जी आप ने कहानी के मर्म को समझा और अपने सार्थक विचार व्यक्त किए।
धन्यवाद आपका
कहते हैं ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड।
रसोई के माध्यम से आपने पीढ़ीगत अंतर को , कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। वास्तव में कुछ अच्छा बुरा सही या गलत नहीं होता, हमारी सहूलियतें, उन्हें स्वीकार्य अथवा अस्वीकार्य बनाती हैं। माँ प्रीति की रसोई में कभी सहज न हो सकीं, उसी तरह प्रीति अपनी बहू की रसोई में।
अपने कंफर्ट जोन से निकलना वाकई कष्टप्रद होता है।
इस सुंदर कहानी के लिए बधाई रीता जी..
आप कहानी पढ़ी और इस पर इतने अच्छे अपने विचार व्यक्त किए, धन्यवाद सरस जी
बहुत अच्छी कहानी, रसोई के माध्यम से पीढ़ियों का अंतर और तरक्की का अर्थ कस्बे से दिल्ली और दिल्ली से विदेश, को आपकी लेखनी ने बहुत ही खूबसूरती से दिखाया है, बहुत बधाई!
शेफालिका जी, धन्यवाद।
आप ने बिलकुल उस सोच को पकड़ा है जिसके तहत मैंने इस कहानी को लिखा था। आप की प्रतिक्रिया प्राप्त कर ख़ुशी हुई।