Wednesday, February 11, 2026
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सुदर्शन रत्नाकर की कहानी – अकेलेपन का दंश

मछलियाँ जब लायी गई थीं  तब वे गिनती में कुल बारह थीं।ऐक्वेरियम के स्वच्छ जल में तैरतीं वे रंगबिरंगी मछलियाँ एक दूसरे से टकरातीं,ऊपरनीचे,दायेंबाँयें होतीं अठखेलियाँ करतीं ,घर में सबके आकर्षण का केन्द्र बन गईं थीं ।ऐक्वेरियम के बैकग्राउंड में लगी लैंडस्केप में पहाड़, झरना ,पेड़ सब थे, जो देखने में एक सुंदर दृश्य उपस्थित करते थे; लेकिन उन मछलियों के तैरने, विचरण करने की एक सीमा थी।नदी, तालाब या सागर का अथाह जल नहीं था। जो भी था तीन बाय दो फ़ीट का ऐक्वेरियम ही उनका संसार था।सीमित जल ही उनका जीवन था।
स्वाभाविक रूप में जीवजन्तु उनका भोजन नहीं थे।हमारी कृपा से ही उनका पेट भरता था।शायद हमारी कृपा अधिक ही हो जाती थी।सुबहशाम तो उनकी डाइट डाली ही जाती थी ।बच्चे आतेजाते उन्हें देखते और साथ में में दोचार दाने ऐक्वेरियम में डाल देते।मछलियों में हलचल शुरू हो जाती ।किसी के हिस्से में में दो दाने गये और शेष रह गईं ।कोई मुटा रही थी तो कोई पहले से दुबली हो रही थी। रंगबिरंगी दस मछलियाँ बेहद सुंदर थीं; लेकिन दो एकदम काली, जो दूर से ही पहचानी जाती थीं।दूसरी मछलियों से अलग और जीवट।दूसरी मछलियों को धकेलतीं एक से दूसरे कोने में पहुँच जातीं ।वे रहती भी उन दोनों से अलग थीं।शायद वे उनसे अलग प्रजाति की होंगी।पर मैंने देखा थोड़े दिन में वे दूसरी मछलियों से हिलमिल गई थीं ।एक कोने में जा कर उनके बीच जाकर खेलने लगतीं।मछलियों के क्रियाकलापों से लगता था, बंधन में रह कर भी वे खुश हैं ।उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लिया था।न भी खुश रहतीं तो भी उन्हें रहना तो  वहीं था ।बाहर निकल नहीं सकती थीं क्योंकि वहाँ जीवन का अंत था।
         पर मानव मन की इच्छाएँ तो असीमित हैं न। बंधन उसे अस्वीकार्य हैं।पक्षियों की तरह उड़ने के लिए उसे खुला आसमान  चाहिए और तैरने के लिये विस्तृत सागर।वह उन्नति के शिखरों पर चढ़ना चाहता है।हर काम में प्रतिस्पर्धा ।आगे बढ़ने की चाहना।सुखसुविधाओं की लालसा के आगे ,अपनों से दूरी उनकी राह में बाधक नहीं बनती।मोह भी समाप्त हो जाता है।भौतिक सुखों का आकर्षण  होता ही ऐसा है, तब वह निर्मोही बन जाता है ।कोई भी बंधन उसे बाँध नहीं पाता और वह पंख फैलाकर उड़ जाता है।समीर ने लंदन जाने का फ़ैसला उसे सुना दिया था। उससे पहले उसने सारी औपचारिकताएँ पूरी भी कर ली थीं।वह उसे क्या कहती, उसके साथ तो जा नहीं सकती थी।यह समीर जानता था, इसीलिए उसने पूछने की ज़रूरत ही नहीं समझी।मन को यह बात चुभती रही कि वह उसे पहले ही बता देता तब भी वह उसे रोकती नहीं, वह यह बात भी जानता है ।मैंने अनुशासन में रखकर उसे संस्कारों के साथ स्वतंत्रता भी दी हुई थी, इसलिए उसकी इच्छा में बाधक बनने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता था!
               एक महीने के भीतर वे सब चले गए।घर सूना हो गया। तब बरसों पहले छोड़ कर गये मिहिर की बहुत याद आई थी।उसने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया ।मछलियों के साथ समय बिताने लगी थी।उसे देखते ही उनमें हलचल मच जाती जैसे ही दाना  डालती , वे सब उछलउछल कर ऊपर की ओर जातीं।वे उसके सूनेपन की साथी हो गई थीं।ऐक्वेरियम के सामने बैठ कर घंटों उन्हें निहारती।
          हलकीहल्की ठंड पड़नी शुरू हो गयी थी।मौसम ख़ुशगवार हो गया था।गुनगुनी धूप अच्छी लगने लगी थी।लॉन में बैठने को मन करता।धूप में बैठे बैठे भी वह अंदर रखे ऐक्वेरियम में मछलियों को निहारती रहती।यह उसकी दिनचर्या बन गई थी।फिर देखते ही देखते सर्दी बढ़ गई।वर्षा के साथ ठंडी हवाएँ चलने लगीं।तापमान गिरता गया ।ऐक्वेरियम के सामान्य तापमान में रहने वाली मछलियों के लिए यह तापमान कम था।कमज़ोर मछलियाँ सह नहीं पाईं और पाँच मछलियाँ मर गईं। उनका साथ छूट गया।उसे अच्छा नहीं लगा।शेष बची मछलियाँ भी दो दिन तक सुस्त रहीं।उनके डाइट के दाने पानी के ऊपर तैरते रहे।
         यही नहीं अगले कुछ दिनों में सात मछलियों में से पाँच और चली गईं।शेष वहीं दो काली मछलियाँ बच गईं, जो सबसे अलग लगती थीं। अब पूरा ऐक्वेरियम उनका था, पर वे दोनों पानी में रखे पत्थरों के बीच छिप कर बैठ जातीं।वह दाना  डालती ,तो उछल कर ऊपर जातीं।भूख तो सब को लगती है, ईश्वर ने विधान ही ऐसा बनाया है।परिवार के साथ हो या अकेले पेट भरने के लिए यत्न तो करना पड़ता है। मछलियों को भी पानी में से भोजन तलाशना पड़ता है।उसने कई बार सोचा कुछ मछलियाँ और लाकर पानी में छोड़ दे; लेकिन ऐसा किया नहीं ,जिनके लिए किया था वे तो चले गए।उसके लिए ये दो ही बहुत हैं।जब ढेर सारी मछलियाँ थीं तो ये दोनों अपने में ही मस्त रहती थीं, पर अब जब वह इनके पास से गुजरती है तो ये सतर्क हो जाती हैं।उछल कर ऊपर जाती हैं और फिर तैरती हुई दूसरे किनारे चली जाती हैं।वह उन्हें कहती है,”तुम भाग्यशाली हो, दो तो हो।एक दूसरे का सहारा है।एक साथ रहती हो, खेलती हो, बतियाती हो, दिनरात  कब निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता होगा तुम दोनों को।मिहिर साथ होते तो उसे भी बच्चों का चले जाना शायद अखरता नहीं।
दोनों मछलियाँ उछल कर फिर ऊपर जाती हैं। वह समझ जाती है, कहती है,” अच्छा तुम हो मेरे साथ
हाँ, तुम हो, मैं अकेली कहाँ हूँ।नाराज़ क्यों होती हो, चलो दाना खा लो और फिर खेलो, मैं तुम्हारा खेल देखूँगी।
             इधर कई दिन से वह उनसे बतियाने लगी है। अपनी ही आवाज़ सुन कर वह खुश हो जाती है।कोई आवाज़ तो गूँजी घर में।नहीं तो सारा दिन सूनापन पसरा रहता है।दरवाज़े खोल कर भी रखो तो भी बाहर से कोई आवाज़ नहीं आती।हर कोठी का गेट दूसरी कोठी से दूर है।सब अपने में सीमित, अपनेअपने घर में सिमटे रहते हैं।पता ही नहीं चलता ,कब कोई बाहर गया और कब अंदर आया।सिवाय सड़क पर  आतेजाते वाहनों के कोई और आवाज़ नहीं आती।धुआँ और धूल उड़ाती गाड़ियाँ दिनरात चलती रहती हैं।उनकी आवाज़ों से डर कर आँगन में लगे पेड़ों पर कभी कभार  ही कोई  परिन्दा  आकर बैठता है, पर वाहनों  की आवाज़ में उनकी आवाज़ विलीन हो जाती है।हाँ, कभी कभी आतीजाती बाइयों की आवाज़ सुनाई दे जाती है, जो  काम से निपट कर बाहर निकलती हैं, तो एक दूसरे से मालिकों की या अपनी गाथा सुनाने खड़ी हो जाती हैं।
             वह अनुभव कर रही थी, अब उसका शरीर शिथिल होता जा रहा है।खानपान, दिनचर्या  बराबर पहले जैसी है और ऐसा भी नहीं लगता कि वह बीमार है।हाँ, कभी कभी साँस उखड़ने लगती है।मौसम बदलने पर प्रभाव अधिक पड़ता है।प्रदूषण से भी तो कोई बचाव नहीं ।उसने विशेष ध्यान नहीं दिया।लेकिन एक रात सोते हुए उसका दम घुटने लगा।साँस लेने में अत्यधिक कठिनाई हो रही थी।अवश्य ही उसे हार्ट अटैक आने वाला है ,सोच कर ही वह  सिंहर उठी।लेकिन उसने समझदारी से काम लिया।ऐम्बुलेंस बुला कर वह स्वयं उसमें जा बैठी।अस्पताल घर के पास ही था, इसलिए वहाँ पहुँचने में देर नहीं लगी
           सभी टेस्ट करने के बाद पता चला कि उसके फेफड़ों में संक्रमण हो गया है।इलाज शुरू हो गया।पाँच  दिन वह अकेली  अस्पताल में रही। उसने किसी को बताया ही नहीं ।वैसे भी कौन ख़ाली बैठा है।पर अकेले समय काटना उसके लिए भारी हो गया  था। डॉक्टर या सिस्टर आती तो कमरे का सूनापन थोड़ी देर के लिए कम हो जाता।दो दिन के बाद सुबह शाम कॉरिडोर में चक्कर लगाने लगी ।वार्ड में भी चली जाती।देखती सभी मरीज़ों के पास कोई कोई सगा सम्बंधी बैठा होता। अस्पताल में मिलने के समय में भी सम्बंधी या परिचित मिलने जाते हैं।उस समय मरीज़ के चेहरे पर कितना आत्मसंतोष झलकता है।कोई है, जो अपना है।कितना कठिन होता है दुख की घड़ी में अकेलेपन के दंश को सहना।लेकिन सहना पड़ता है।उसने        
कुछ मरीज़ ऐसे भी देखे जिनके पास, उसकी तरह  मिलने के समय में भी कोई नहीं आता था।
घर में ऐक्वेरियम में मछलियाँ भी तो अकेलेपन को सह रही हैं।आती बार वह दाना ड़ालना नहीं भूली थी पर अब तक तो वे ख़त्म कर चुकीं होगी।
        पाँच दिन बाद वह घर लौट आई।कोई सहारा देकर अंदर ले जाने वाला तो था नहीं ।थोड़े दिन के लिए एक नर्स का प्रबंध वह अस्पताल से ही करके आई थी।जो एक सप्ताह तक आती रही।फिर  मेड को सुबह से शाम तक रोकने लगी।अब ऐक्वेरियम उसने कमरे में रखवा लिया था।एक शाम उसने देखा एक मछली सुस्त हो रही है।उसने खाना भी नहीं खाया और पत्थर के बीच दुबकी रही।शरीर में कोई हरकत नहीं थी।वह मर गई थी।उदासी और निराशा उसे सारा दिन घेरे रही।
अब ऐक्वेरियम में एक ही मछली रह गई थी ,अकेली उसकी तरह। दो दिन तक वह भी शिथिल रही।साथी के जाने का दुख था शायद।संवेदनाएँ तो जीवजन्तुओं में भी होती हैं, पर मनुष्य ही उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाता।
         अब धीरेधीरे वह स्वस्थ हो रही थी ।मछली की आँखों में अकेलेपन का दर्द उसे दिखाई देने लगा था।वह उसकी ओर देखती मानो कह रही हो, याचना कर रही हो ,जो वह समझ नहीं पा रही थी पर एक दिन उसने मछली की आँखों की भाषा पढ़ ही ली थी।तब उसने एक निश्चय कर लिया था।वह ऐक्वेरियम के पास आकर उससे बोली,”अरी, घबराती क्यों हो, अब तुम अकेली नहीं रहोगीसमझी।
सोने से पहले उसने सोचा–  वह और मछलियाँ लाकर ऐक्वेरियम में छोड़ कर देगी विशेष रूप से काली मछलियाँ ज़रूर लाएगी ताकि वह अकेली रह जाए।उनके साथ बतियाते हुए उसका समय कट जाएगा ;लेकिन अगले दिन सुबह जगने पर उसने अपना निर्णय बदल लिया था।एक बड़े डिब्बे में पानी भरा, ऐक्वेरियम को खोल कर उस काली मछली को उसमें डाल दिया। घर के पास ही एक छोटे से पौंड में उसे छोड़ते हुए कहा, “जाओ अपने साथियों के साथ मिलकर आज़ादी से रहो, अकेलेपनकी पीड़ा क्या होती है, मैं जानती हूँ।और हाँ, सुनो ,मैं भी अब अकेली नहीं रहूँगी अस्पताल जाया करूँगी, उनके साथ रहूँगी, जिनका कोई नहीं, जो अकेले हैं।
मछली ने कुछ सुना या समझा, पता नहीं; लेकिन पौंड में जाते ही वह स्फूर्ति से तैरने लगी।
   
सुदर्शन रत्नाकर
-29,नेहरू ग्राउंड, फरीदाबाद 121001
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1 टिप्पणी

  1. बहुत सामयिक सी कहानी लगी आपकी सुदर्शन जी! आजकल सबको विदेश जाकर कमाना और बसना ज्यादा लुभा रहा है। रिश्तों में संवेदनाएँ भी नहीं रहीं।
    लेकिन अकेलेपन से दूर होने का सही रास्ता तलाशा। कहानी प्रेरणास्पद है ।अकेलेपन का दंश बहुत तकलीफ देता है। लोग डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। इसको दूर करने के लिये बहुत से रास्ते हैं।
    हर समस्या का समाधान है। बस! तलाशना पड़ता है।
    बेहतरीन कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई ।

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