रात के दस बजने वाले हैं।सूर्य अभी थोड़ी देर पहले अस्त हुआ है। पर उजाला अब भी है।गाड़ी एक सौ बीस की रफ़्तार से चल रही है।बैटलफोर्ट से केलगिरी पहुँचने में डेढ़ घंटा लगेगा। वह ऑफिस से घर पहुँची ही थी कि बिंदा का फ़ोन आ गया था। “दारजी की तबीयत एकाएक बिगड़ गई है , वह अस्पताल में हैं और आपसे मिलना चाहते हैं, जल्दी से पहुँच जाओ।” उसने फोन करके मिंक को बता दिया है। उसके दिल में घबराहट हो रही थी। दारजी ने उसे ऐसे कभी नहीं बुलाया। बीमार तो वह कई बार हुए हैं ।अस्पताल भी जाते रहते हैं। कहीं वो—उसने अपनी सोच को ब्रेक लगा दिया। नहीं, दारजी उसे छोड़कर नहीं जा सकते।गाड़ी आगे जा रही है और उसका मन दारजी में अटका है।
जब वह अस्पताल पहुँची तो अँधेरा हो गया था, खिड़कियों से रोशनी झाँक रही थी।बिंदा को उसने फ़ोन करके बता दिया था कि वह पहुँच गई है। वह उसे रिसेप्शन पर लेने आया हुआ था। दारजी आई.सी.यू. में थे।अंदर जाना माना था ,उसने झांककर देखा, वह आँखें मूँदें लेटे हैं और वेंटिलेटर के सहारे साँस ले रहे हैं। मॉनिटर पर बी.पी और हार्ट बीट ऊपर नीचे जा रही थी।सारे शरीर पर तारों के जाल ने उन्हें जकड़ रखा है। कितने विवश, कितने निःसहाय से पड़े हैं।उसकी आँखें भर आईं। मन कर रहा था ,वह अंदर जाकर उनकी गोद में सिर रखकर जी भरकर रो ले।कई तरह के विचार आ जा रहे थे।वह उनको इस तरह असहाय अवस्था में पड़े हुए नहीं देख पा रही थी। दरवाज़े से हटकर वह सामने रखे बेंच पर बैठकर सुबकने लगी।बिन्दा जो थोड़ी देर के लिए चला गया था, वापस आकर उसके पास बैठ गया।वह आँसुओं पर क़ाबू पाकर स्थिर हो गई।
“इन्दर मामा भी आए हैं।”बिन्दा ने उसे बताया तो वह चौंककर उसे देखने लगी।
“उसे कैसे पता चला?”
“बीजी ने अपनी सौगंध देकर मुझसे फ़ोन करने को कहा था।पर मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह आएँगे।”
“दारजी से मिला क्या?”
जब वह आए थे, तो वह थोड़ा होश में थे, पर दारजी ने उनको देखकर मुँह दूसरी ओर कर लिया था और उसके थोड़ी देर बाद ही उनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ने लगी थी, लेकिन उससे पहले उन्होंने आपको बुलाने के लिए मुझसे कहा था।”
“और कुछ कहा”
“नहीं कुछ अस्पष्ट शब्द मुँह से निकले थे, पर मैं समझ नहीं पाया।”
उसने देखा इन्दर कॉरिडोर के छोर पर रखे बेंच पर अकेला बैठा है और बाहर की ओर कुछ देख रहा है। उसने उसकी ओर से नज़र हटा ली।पाँच वर्ष के अंतराल के बाद वह उसे देख रही है।लम्बे समय तक उसका नाम उसके साथ जुड़ा रहा है, लेकिन उसके लिये वह अब केवल अजनबी है। दारजी ने खुद उसको इन्दर के बंधनों से मुक्त करवा दिया था।उसकी स्थिति जाल में फँसी उस मछली की तरह थी, जिसे मछुवारे ने जाल में तो फाँस लिया था लेकिन वह न जाल को बाहर निकाल रहा था और न ही उसे मुक्त कर रहा था।वह जाल में फँसी छटपटाती रही थी और इन्दर उसकी इस
दशा पर हँसता रहा। जले पर नमक छिड़कने में भी कभी भी कोई अवसर नहीं छोड़ा।उसकी इस छटपटाहट को और कोई देखे न देखें दारजी की आँखों से कभी नहीं छुपा पाती थी।वह असहाय होकर उसकी इस स्थिति को देखते रहते थे।उन्हें हमेशा यही लगता कि उसकी इस दशा के लिए वही दोषी है।न वह उसे बीजी के कहने पर उसे यहाँ लेकर आते और न वह यह सब कुछ सहती।
बी. ए का अंतिम पेपर था और निश्चिंत होकर वह गाँव लौटी थी, दारजी बी जी के साथ बरसों बाद अपने गाँव लौटे थे, तब दूर के मौसेरे भाई यानी बाऊजी से मिलने उसके गाँव भी आए थे। वह बी.ए के पेपर देकर कुछ दिन पहले ही गाँव लौटी थी, बीजी ने उसे देखा और फिर दारजी से उसे साथ ले जाने की बात कही थी। कई मंत्रणाओं के बाद वे उसे अपने साथ कैनेडा लेकर आए थे।बहाना तो यही बनाया था कि वह आगे की पढ़ाई वहाँ करेगी। खुश थी वह। यह उसका भी सपना था।
नया देश, नई जगह, नए लोग। शुरू-शुरू में थोड़ा कठिन लगा पर उसके साथ नई उमंग भी थी। पढ़ने का, कुछ करने का वो जज़्बा भी था, जो वह अपने मन में संजो कर आई थी।थोड़े दिन असहज रहने के बाद वह वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार ढलने लगी थी।घर में ज़्यादा लोग नहीं थे। दारजी की दोनों बेटियों के विवाह हो गए थे पर, बड़ी बेटी का बेटा गगनदीप यानी बिंदा उनके साथ ही रहता था। दारजी सुबह अपने काम पर निकल जाते, बिंदा स्कूल और घर पर रह जातीं बी जी और वह। कई दिन के बाद भी उसकी पढ़ाई, एडमिशन की कोई बात नहीं चली। वह प्रतिदिन यह आशा करती कि आज उसके बारे में कोई बात करेगा, पर हर दिन ऐसे ही निकल जाता।
वह सुबह जल्दी उठ जाती थी, बीजी के साथ काम करवाती।पहले तो हाथ बँटाती थी, लेकिन बाद में बहाने-बहाने से बीजी ने सारे काम उसके सिर पर थोप दिए। सबसे पहले जगती और सबसे अंत में सोती।सप्ताहांत तो ढेरों काम और बढ़ जाते जब दोनों बहनें परिवार के साथ आतीं ।काम करते-करते वह इतना थक जाती कि अपने बारे में कुछ सोच ही नहीं पाती थी। धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा था कि क्यों बीजी इतने प्यार से उसे अपने साथ लेकर आई थीं।रहने की जगह और खाने के बदले उन्हें फ़ुल टाइम मेड चाहिए थी।
इन्दर उन दिनों बाहर ही रहता था।कभी-कभी घर आता था। उसके आने से घर का वातावरण ख़ुशनुमा होने की अपेक्षा तनाव युक्त हो जाता था। उसका एडमिशन अभी भी कहीं नहीं हुआ था।समय मिले तो वह कोशिश करे।फिर बी जी उसे बाहर भी तो नहीं जाने देती थीं। वह पढ़ी- लिखी थी, कहीं नौकरी भी तो कर सकती थी।कभी-कभी उसे अपने पर रोष भी आता कि क्यों बिना अधिक सोचे-समझे, सबकी बातों में आ गई थी।
और फिर इसी बीच पता चला कि उसके बाऊजी, माँ को साथ लेकर कैनेडा आ रहे हैं। इन्दर से उसका रिश्ता पक्का करने और फिर अच्छा लगन देखकर विवाह भी हो जाएगा। दारजी इसके लिए सहमत नहीं थे। चाहते तो वह भी यही थे, लेकिन अभी नहीं। अभी तो वह जो कहकर उसे लाए थे ,उसे पूरा करना चाहते थे, पर बीजी ने तो अपनी ही चाल चल दी। पता नहीं उन्हें क्या जल्दी थी। कहाँ तो इस घर में उसकी स्थिति एक मेड की बनकर रह गई थी और अब वह अपने बेटे के साथ उसका विवाह करना चाहती हैं। पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा था और क्यों वह झट मँगनी और पट विवाह कर देना चाहती थीं।
और तब दारजी की भी नहीं चली थी। उसे बाद में पता चला कि बीजी ने इन्दर की भी नहीं सुनी थी। उसके सपने तो बिखर गए थे, पर इसे अपनी नियति मान लिया था। माँ-बाऊ जी अपने गाँव से आए और फिर पन्द्रह दिन के अंदर सब कुछ हो गया। इन्दर के हाथों उसे सौंपकर अपने देश लौट गए थे।वे तो लौट गए, लेकिन जिन हाथों में वे उसे सौंप गए थे, उनकी गिरफ़्त इतनी कमज़ोर थी कि उसके हाथों को सम्भाल ही नहीं पाए और फिसलते-फिसलते छूट ही गए।
“चाय पिओगे?” बिंदा ने पूछा तो उसकी तन्द्रा टूटी
“नहीं अभी नहीं”
“बीज़ी नहीं आईं क्या?” उसने पूछा
आईं थीं, पर यहाँ अधिक लोग बैठ नहीं सकते, इसलिए मम्मी के साथ घर लौट गई हैं।”
“आप भी आराम कर लें, मैं आपको दारजी का हाल बताता रहूँगा।”
“ मैं यहीं ठीक हूँ।” उसने भरे मन से कहा
वह उठकर आई.सी.यू.तक आई। काँच के दरवाज़े से झांककर देखा, दारजी, अभी भी कॉमा की स्थिति में थे।
मना करने पर भी बिंदा उसके लिए चाय लेने चला गया था।
वह फिर पीछे लौट आई।
उसके मन का नहीं था पर ,जो हो गया था ,उससे वह सन्तुष्ट थी। इन्दर का व्यक्तित्व था ही ऐसा।लेकिन उसके व्यक्तित्व के वे पहलू जिससे वह अनजान थी, उसकी परतें जैसे-जैसे खुलने लगीं, वैसे-वैसे उसका मन वितृष्णा से भरता गया। बीज़ी उसके बारे में जानती थीं। शायद दारजी को भी पता हो, लेकिन जब तक उसे पता चला था , तब तक पानी सिर से ऊपर तक निकल चुका था।इन्दर लिव- इन में था। उसने यह बात उससे शादी के पहले ही दिन बता दी थी।स्मिथा के साथ वह कई सालों से रह रहा था, हालाँकि वहाँ के क़ानून के अनुसार दो वर्ष के बाद शादी ही मान ली जाती है, फिर भी वह उससे शादी करके घर लेकर आना चाहता था, लेकिन वही बात, जो हर मिडिल क्लास फ़ैमिली में होती है।लड़की कैनेडियाई मूल की है। हमारे परिवार में कैसे घुलमिल पाएगी। कैसे रहेंगे, उसके साथ। कुछ नया नहीं था। ऐसा ही होता है। देश छोड़कर यहाँ आकर बस गए लेकिन मानसिकता नहीं बदली।ना इन्दर बदला और ना ही बदलीं बीज़ी।और बली का बकरा बन गई, पंजाब के एक छोटे से गाँव से आई जसकिरण, यानी वह जिसके अपने छोटे-बड़े कई सपने थे, जिनके तिलिस्म में आकर उसका जीवन होम हो गया।
यह सब कुछ उसके साथ ही तो नहीं हुआ था, उस जैसी कई जसकिरण ऐसी ही स्थिति को झेलती हुई जीती रहती हैं। अपनी नियति मानकर उसने भी तो बहुत कुछ सहा था। नियति से भी अधिक बाऊजी, माँ ,बहन-भाइयों के बारे में सोचकर वह परिस्थितियों से समझौता करती रही; लेकिन केवल समझौतों से जीवन की गाड़ी नहीं चलती। उसके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी, जो विवाह के बाद होनी चाहिए थी । वह उखड़ी- उखड़ी – सी रहती और उसका उखड़ा हुआ रवैया दारजी से छुपा नहीं।
इन्दर पहले की तरह ही काम के बहाने निकल जाता और फिर कई-कई दिन तक वापिस नहीं आता था।वह जानती थी, इतने दिन वह स्मिथा के साथ ही रहता है। और यह सब जानते हुए वह उसे स्वीकार नहीं कर पाती थी। उस बार जब वह लौटकर आया था तो माँ और बेटे में बहुत देर तक गुप-चुप बातें होती रहीं और फिर जब वह उसके कमरे में आया तो उसका व्यवहार बदला हुआ था, उसकी बातों से वह समझ गई कि वह उसके साथ सम्बन्ध बनाना चाहता है। बीजी की मंशा क्या है ,वह यह भी समझ गई थी, पर वह उनकी इस इच्छा को कभी पूरा नहीं होने देगी।वह अब और किसी भी बँधन में नहीं बँधेगी।
वह यह भी नहीं चाहती कि उसकी तरह स्मिथा का जीवन भी कष्टों से भर जाए। वह न जाने कब से उसके साथ रह रही है।उसे प्यार करती होगी।स्त्री यदि किसी से सच में , दिल से प्यार करती है तो टूटकर करती है, शिद्दत से करती है। वह भी तो करती होगी। अपने कारण वह उसका जीवन क्यों भट्टी में झोंक दे! उसका दोष क्या है ? यही न कि इन्दर पर विश्वास करके वह उसके साथ रह रही है। यह तो इन्दर की फ़ितरत है कि स्मिथा के साथ सम्बन्ध होते हुए भी उसने शादी कर ली। बुज़दिल कहीं का।बीजी का कहना मान लिया, अपनी बात नहीं मनवा सका।और बीजी के मन की बात भी वह समझने लगी थी। विवाह का लाइसेंस देकर उन्हें एक घरेलू बहू मिल गई थी, जो बंधकों की तरह बस घर के काम करती रहे।
जिस दिन इन्दर ने उसके साथ ज़बरदस्ती करनी चाही थी, तबसे उसने एक निश्चय कर लिया था कि अब वह अपने लिए स्वयं रास्ता बनाएगी। वह अवसर की तलाश में थी और उसे यह अवसर शीघ्र ही मिल गया था। बीजी घर पर नहीं थी और दारजी काम से घर समय से पहले आ गए थे। चाय-पानी देकर वह उनके पास ही बैठ गई। हालाँकि जबसे शादी हुई थी, रिश्ता बदलते ही उसने दूरी बना ली थी।यह उसके संस्कार थे।
दारजी ने पूछा, “सब ठीक है न जसकिरण।”
उसने डरते डरते कहा,“जी दारजी, आपसे एक बात कहनी थी।”
“हाँ-हाँ कहो न पुत्तर जी, झिझक क्यों रही हो?” दारजी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
उसका डर थोड़ा कम हुआ।
“दारजी , मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ।”
“ज़रूर पुत्तर जी, ज़रूर पढ़ो। मैं इंतज़ाम कर दूँगा।”
दारजी ने तो कह दिया था; लेकिन यह सब उसके लिए आसान नहीं था। बीजी आड़े आ गईं।
क्या करना है आगे पढ़कर? नौकरी तो करनी नहीं तुम्हें। तुम घर से बाहर जाओगी तो घर कौन सम्भालेगा। यह भी तो सोचो जसकिरण।”
वह चुप रही ;लेकिन उसके निश्चय में कोई अंतर नहीं आया था।
अगली बार जब इन्दर आया तो बीज़ी ने, उससे भी शिकायत की तरह बात की। वह दनदनाता हुआ उसके पास आकर ग़ुस्से से बोला, “तुम पढ़ना क्यों चाहती हो?”
“मैं पढ़ने के लिए ही तो आई थी, मुझे क्या पता था कि आप लोगों को एक नौकरानी चाहिए थी और मुझसे नाम की शादी करके मेरी नौकरी पक्की कर दोगे।”
तुम मेरी पत्नी हो और तुम्हें मेरी बात माननी पड़ेगी, सुन लिया तुमने।जैसा बीजी चाहेंगी, तुम्हें वैसा ही करना पड़ेगा।
“कैसी पत्नी, तुमने मुझे कौन से पत्नी वाले अधिकार दे रखे हैं। वो अधिकार तो तुमने स्मिथा को दिए हुए हैं, जिसके साथ तुम रहते हो।”
“तुम ऐसे नहीं मानोगी, तुम्हें समझाना पड़ेगा कि मैं क्या चीज़ हूँ और क्या कर सकता हूँ ?” कहते हुए उसने अपना हाथ उठाया ही था कि दारजी ने उसका हाथ पकड़ लिया ,जो उस समय उनके कमरे के खुले दरवाज़े से सब सुन और देख रहे थे।
जिस बात को घर में बीजी और वह ही जानती थी, उसे दारजी भी जान गए थे। वैसे भी कहीं न कभी इसका पता सबको चलना ही था। ऐसी बातें कब तक छिपी रह सकती हैं। प्याज़ का छिलका उतरे और दुर्गंध न फैले, यह भला कैसे सम्भव हो सकता है।दारजी इस कांड की तह तक गए और बीजी से सब उगलवा लिया था। उसे यहाँ लाने और शादी रचाने के पीछे के मक़सद को जानकर उन्हें बहुत दुख हुआ था।कमान से निकला तीर वापिस तो नहीं आ सकता था; लेकिन उसके स्थान पर दूसरा तीर निकाल कर उद्देश्य तो पूरा किया जा सकता है।
इस घटना के बाद दारजी उसे लेकर सतर्क हो गए थे।वह उसे स्वयं ले जाकर एम. बी.ए में दाख़िला दिलवा आए थे। इतना आसान तो नहीं था, कई औपचारिकाएँ थी, जिन्हें पूरा करना था । समय तो लगा; लेकिन वह यूनिवर्सिटी जाने लगी थी। बीजी, दार जी के डर से अब कहती तो कुछ नहीं थी; लेकिन उनकी त्योरियाँ चढ़ीं रहतीं।वह यूनिवर्सिटी जाने से पहले अधिकतर काम करके जाती । वापिस आने में कई बार विलंब हो जाता तो दारजी उसका सुरक्षा कवच बनकर खड़े हो जाते। इन्दर का घर में आना कम हो गया था। पर जब भी आता , बीजी का हौंसला बढ़ जाता। उसकी आड़ में वह उस पर अपना ग़ुस्सा निकालतीं। उसने इन्दर के कमरे में जाना बंद कर दिया था। इस बात का भी बीजी को ग़ुस्सा था। दारजी ने इन्दर से बात करनी बंद कर दी थी।
कोर्स का एक वर्ष पूरा हो गया था और इस एक वर्ष में उसके जीवन में कई परिवर्तन आ गए थे। अब वह गाँव की सीधी-साधी लड़की नहीं रही थी। एक्सपोज़र मिलने पर उसके विचारों, रहन-सहन में बदलाव दिखाई देने लगे थे। इसी बीच क्लासमेट् मिंक से उसकी फ़्रेंडशिप हो गई थी, जो उससे दो वर्ष छोटा है। वह विवाहिता है, यह बात वह कभी नहीं भूली पर मिंक उसकी ओर कब आकर्षित हो गया, इस बात का उसे एहसास ही नहीं हुआ।। वह अपनी सीमाएँ जानती थी।संस्कारों से बँधी थी।इसलिए दोस्ती से ऊपर उसने कुछ सोचा ही नहीं कभी। हाँ, मिंक का साथ उसे भाता था, यह उसके प्रति आकर्षण था या मन के ख़ालीपन को भरने का एक साधन ।वह जब से आई थी, अकेलापन ही तो मिला था।बी जी को काम से मतलब था। इन्दर उसका अपना होकर भी अपना नहीं था। दारजी से रिश्ते और परम्पराओं की दूरी थी। कभी कोई बात कर लेती थी तो बस बिंदा से
बिंदा चाय लेकर आ गया था।
“मामी, चाय पी लो।”
उसके पुकारने पर वह वर्तमान में लौट आई।मन न होने पर भी उसके बार -बार कहने पर उसने थोड़ी चाय पी ली। कुछ ताज़गी महसूस हुई।
शीशेमेंझाँककरदेखा।दारजीउसीस्थितिमेंचित्तलेटेथे।अंतिमयात्राकीतैयारीमें।डाक्टरनेकहदियाथा।
पर जो दारजी ने कहा था, उसे वह कभी नहीं भूल सकती। तब इन्दर अंतिम बार घर आया था। ऊँची-ऊँची आवाज़ में बीजी से उसकी शिकायत कर रहा था। मिंक और उसके साथ को लेकर।उस दिन भी दारजी अचानक घर आ गए थे।उन्होंने सब कुछ सुन लिया। उसी समय उन्होंने इन्दर को घर से जाने के लिए कह दिया था।बीजी रोई-चिल्लाईं। उसे भला-बुरा सुनाया कि उसके कारण ही यह सब कुछ हो रहा है, पर दारजी ने किसी की कोई बात नहीं सुनी।
दारजी ने इन्दर को ,उसके कारण घर से निरस्त तो कर दिया था; लेकिन वह तो अभी भी झूठे बंधनों में इन्दर के नाम के साथ जुड़ी हुई थी। अपना कोई नाम, कोई अस्तित्व ही नहीं था। लेकिन दारजी ने उसे स्वतंत्र अस्तित्व दिया।वह उसके कोर्स पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, ताकि वह अपने पाँवों पर खड़ी हो सके। तब तक वह उसकी ढाल बनकर खड़े रहे। इन्दर का घर आना बंद हो गया था और बीजी के तानों की वह आदी हो चुकी थी।
एम.बी.ए. की डिग्री मिलते ही दारजी के आशीर्वाद से उसे नौकरी भी मिल गई थी पर इन्दर के नाम के साथ उसका नाम अभी भी जुड़ा था, जिसे स्वयं दारजी ने उस बंधन से उसे मुक्त करवा दिया था। वह उस बंधन से तो मुक्त हो गई थी; लेकिन दारजी ने एक पिता बनकर जो ज़िम्मेदारी निभाई थी, उस एहसास से वह कभी भी मुक्त नहीं हो पायी। वह कैसे भूल सकती है कि अपने बेटे से उसका तलाक़ करवाकर मिंक के हाथ में उसका हाथ सौंप दिया था। उसे बेटी केवल कहा ही नहीं, पिता के सारे फ़र्ज़ पूरे किए उन्होंने। ऐसा करके उन्होंने उसके जीवन को एक नई दिशा दी थी। जहाँ वह आज सम्मान के साथ खड़ी है। अपने पिता के पास वह लौटकर नहीं गई लेकिन दारजी ने उसे यह कमी कभी महसूस नहीं होने दी। मिंक और उनके सिवाय उसका और यहाँ है ही कौन? उनके बिना—-आगे वह सोच भी नहीं सकती। आँसुओं के कारण धुँधलायी आँखों के कारण वह देख ही नहीं पाई कि बिंदा उसे इशारे से बुला रहा है।
बिंदा ने पास आकर उसे झकझोरते हुए कहा,”चलो मामी, दारजी आपका नाम लेकर बुला रहे हैं। वह हड़बड़ाकर भागती हुई अंदर गई। दारजी की आँखें थोड़ी-सी खुली थीं। उसने उनका हाथ पकड़कर अपने सिर पर रख लिया। मुँह से तो शब्द नहीं निकल रहे थे पर आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी।दारजी के मुँह से अस्पष्ट शब्द सुनाई दिये, मुक्ति अस्थियाँ —गंगा में तुम।”आगे वह बोल नहीं पाए। उनका हाथ उसके हाथ से फिसलकर उनके निर्जीव शरीर पर आ गिरा। दारजी के पाँवों पर सिर रखकर वह फफक पड़ी।अपने आँसुओं की श्रद्धांजलि देते हुए बोली,” दारजी -मैं आपकी यह अंतिम इच्छा ज़रूर पूरी करूँगी।जानती हूँ अड़चनें तो आएँगी पर आपने ही तो जीवन- युद्ध से लड़ना सिखाया है।मैं लड़ूँगी दारजी।”
ई-29,नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001 मोबाइल 9811251135
एक अच्छी कहानी प्रिय सुदर्शन रत्नाकर जी
जहां समाज में इंदर और बी जी जैसे स्वार्थी एवं नेगेटिव किरदार समाज में है वही दार जी जैसे निष्पक्ष सकारात्मक और सत्य सही का साथ।देने वाले इंसान भी हैं
यहां दार जी ने जसकिरण को अपने बेटे इंद्र से मुक्त करवाया जोकि पहले ही शादी शुदा था स्मिता के साथ रह भी रहा था ,,इंदर से तलाक करवाया शिक्षा दिलवाई नौकरी लगवाई तत्पश्चा उसे पसंद करने वाले मिंक के साथ उसका ब्याह कर दिया।
अपने अंतिम समय में भी मृत्यु के कुछ सेकेंड पूर्व उन्होंने जसकरण से ही कहा तुम ही मेरा अंतिम संस्कार और अस्थियो का विसर्जन गंगा में करना इसके पश्चात डर जी मृत्यु कोपरप्त हो गए,
जसकिरण ने भी प्रण किया कि मुझे चाहे जो भी करना पड़े मैं ही यह अंतिम इच्छा पूरी करूंगी।
क्योंकि दार जी ने ही उसे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया था।
सत्य का पक्ष लेने वाले हर किरदार की अंत तो गत्वा जीत होती है नाम होता है
साधुवाद
कुंती जी आपने कहानी पढ़ी और प्रतिक्रिया भी दी। बहुत अच्छा लगा। समाज में दारजी जैसे सकारात्मक सोच के लोग भी होते हैं, जिससे समाज चलता है और सकारात्मकता के भाव भी उत्पन्न होते हैं। आपका हार्दिक आभार।
अच्छी कहानी, पढ़कर आनंद आ गया। बधाई लीजिए!
पूनम जी, आपको कहानी पढ़कर आनंद आया। मेरी कहानी सफल हो गई। बहुत-बहुत धन्यवाद ।
सुदर्शन जी!
आपकी कहानी पढ़ी।
इस कहानी को पढ़ते हुए फिर एक बार दिमाग में यह बात आई कि वास्तव में स्त्रियाँ ही स्त्रियों की दुश्मन होती हैं।
दार जी की सोच,समझ और कृत्य को प्रणाम जिन्होंने अपनी बहू का साथ देते हुए उसे पढ़ाया और उसके भविष्य को संवारा। अपने बेटे से नाता तोड़, उसकी दूसरी शादी करवाई।
और अंतिम इच्छा भी उसके ही हाथों गंगा में अस्थि प्रवाह की रखी जिसे बहू ने स्वीकार किया।
वरना परिस्थिति की मारी किसी मजबूर का लाभ उठाकर उसके शोषण का पूरा इंतजाम था।
कहानी में दार जी का चरित्र बहुत उभर कर आया है और बेहद संवेदनशील।
कहानी के लिये आपको बहुत बहुत बधाई ।
नीलिमा जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर मेरा मनोबल बढ़ा। हृदय तल से आभार।
आपने सही कहा स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। पता नहीं कैसे बेजी जैसी नारियाँ इतनी संवेदनहीन हो जाती हैं, जो ऐसा शोषण करती हैं।पर समाज में दार जी जैसे अच्छे लोग भी हैं । अपवाद हर जगह हैं।