आर्मी यूनिफॉर्म में सूरज बेहद आकर्षक लग रहा था। लंच पर घर आते ही सीधे डाइनिंग टेबल पर पहुंच कर बोला,”अरे भाई सलाद की प्लेट ही रख देनी थी!”(मानो बहुत भूख लगी हो)
“अभी लाई”कहकर दौड़ती हुई वसुधा किचन में टमाटर काटने लग गई थी और कटे प्याज जो पानी में भीगे पड़े थे, वहां से उठाकर सलाद की प्लेट में सजा कर ले आई थी। फिर लौट कर गैस जलाकर चपाती बेलने लग गई थी। आज उसने बहुत चाव से लौकी वाला मीट बनाया था।
“हरी मिर्च और नींबू मैं डालूं क्या?” वह खीझता हुआ बोला।
वह गैस के पास से ही बोली,” प्लीज डाल लो ना!”तब तक वह चपाती लेकर आ गई थी। इतने में सूरज को गुस्सा आ गया और उसने प्लेट से चपाती लेकर उसका हाथ जोर से झटक दिया। वह चुपचाप सह गई क्योंकि मैं उनके पास आई हुई थी और उसने मुझे डाइनिंग टेबल की ओर आते देख लिया था।
सूरज ने शॉर्ट कमीशन में आर्मी ज्वाइन की थी। वह किस्मत का धनी था कि बाद में उसे स्थाई जॉब मिल गई थी कप्तान की। साथ ही वसुधा से शादी भी हो गई थी। मुझे तो दोनों ही बहुत मस्त लगे थे। लेकिन मैं आज उस का गुस्सा देखकर हैरान थी। या तो ऑफिस में कोई परेशानी थी या फिर घर में नहीं ब्याही बीवी से छेड़खानी नहीं कर पा रहा था मेरी उपस्थिति में! कुछ तो कारण था तभी धुआं उठा था–मैंने सोचा!
खैर,खाना खाते हुए सूरज ने कुछ औपचारिक बातें करके मुझसे पिंड छुड़ाया और अपने बेडरूम में आराम करने चला गया क्योंकि चार बजे पुन: उसने ऑफिस जाना था। वसुधा
हर दिन की भांति उसके साथ आराम करने ना जाकर मेरे पास गैस्ट रूम में आ गई थी मूड हल्का-फुल्का करने। मेरा होना उसे संबल दे रहा था शायद! नहीं तो एकांत में अपने को सहेजना कितना दुष्कर हो जाता है! एक घुटन, एक उकताहट जो खीझ में बदल जाए ; एक दर्द जो भीतर ही भीतर पले और फिर गल जाए कि उबकाई आ जाए! लगे गले में गुठली अटक गई है जो निगलते बनती है ना थूकते। चारों ओर से आ दबोचता है– विकराल अकेलापन!
वैसे दोनों के गले सधे हुए हैं। वह किशोर कुमार के गाने गाता है तो लोग झूम उठते हैं और वसुधा का स्वर भी मिठास से भरा है। दोनों डुएट गाते हैं तो महफ़िल जवान हो जाती है। सब पर सरूर छा जाता है। दोनों के फिल्मी गीतों को सुनकर सब पर मस्ती का आलम तारी हो उठता है। इसी बात पर तो इनका रिश्ता तय हुआ था और यह जीवनसाथी बन गए थे। वैसे मैं नोट कर रही थी सूरज में धैर्य बिल्कुल नहीं है, वसुधा का संयम भी आखिर कब तक रहेगा? वसुधा को लगता है सूरज का वजूद एक अभिशप्त आत्मा सा अपने में गुम रह कर उसके आसपास मंडराता रहता है। वह होकर भी उसके लिए कभी भी नहीं होता!
वसुधा भाव प्रवण, कल्पनाओं में उड़ान भरने वाली सीधी-सादी युवती है और वहीं सूरज व्यवहारिकता से परिपूर्ण है। गाने की कला देख कर मां बाप से ग़लत फ़ैसला हो गया लगता है! घर- गृहस्थी में गीत या फिल्मी डुएट गाकर तो जीवन नहीं जिया सा सकता ना! सीधे शब्दों में कहें -तो वसुधा प्रेम दीवानी और वहीं सूरज पुस्तक दीवाना! जरा भी समय मिला नहीं कि उसने शैल्फ से किताब उठाई और पढ़ने बैठ गया। जिस शैल्फ पर ढेरों नई किताबें जगह बनाती ही रहती हैं उससे वसुधा का दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था। बचपन से ही केवल कक्षा में पास हो जाना उसका ध्येय होता था। हां नृत्य व गाने में कभी पीछे नहीं थी। फिल्म देखने के बाद गेट पर बिकती गाने की पतली सी पुस्तक खरीदने के लिए वह मुट्ठी में पैसे पकड़े- पकड़े सारी फिल्म देख लेती थी। फिर घर पहुंच कर गाने को याद करना और लय से गाना उसका काम होता था। उधर सूरज अपने रेडियो सिस्टम के साथ स्पीकर्स लगाता और उनकी फाइन ट्यूनिंग करता रहता था। साठ-सत्तर के दशक की बातें हैं। वह अपना म्यूजिक सिस्टम बढ़िया करता रहता था। किस्सा कोताह यह था कि दोनों अलग-अलग राग अलापते रहते थे। कहीं कोई मेल नहीं था उन दोनों में। हर रात जिंदगी हाथ से फिसलती जान पड़ती थी उसे और वह मुट्ठियों में उस अनिश्चितता को बंद करके सो जाती थी। फिर सुबह देख पाएगी कि नहीं? लेकिन अगली सुबह वह जिंदा होती और फिर जिंदगी दौड़ पड़ती थी खुली हथेली से बाहर…!
वह एक छोटे से कस्बे से थी, जहां बच्चे मोहल्ले में पलते हैं। जहां घर के संस्कारों के अलावा मोहल्ले भर के संस्कार बच्चों में उम्र भर बोलते हैं। जिससे वह हर ढांचे में फिट हो जाते हैं। पर किताबें न पढ़ने के कारण सूरज उसे मूर्ख एवम् बुद्धिहीन आंकने लगा था। उसके अहम् को चोटिल करके वह संतुष्टि पाता था। वहीं रात को बिस्तर पर संतुष्टि पाना उसकी फितरत थी। वसुधा कई बार ऐसे समय में ठंडी पड़ जाती थी और खामोशियां बयां कर देती थीं सारे जज़्बात, जबकि शब्दों के तो अपने दायरे होते हैं।
घर के काम निपटा कर वह कमरे में जाकर बैठ जाती थी। टकटकी लगा उन्हीं कमरों की दीवारों से टकराकर दृष्टि का लौटना फिर फर्श पर किसी मोटी काली चींटी को चलते देखना जो नितांत अकेलेपन में बढ़ती, ठहरती फिर दीवार से टकराकर ना जाने किस ओर जाकर गुम हो जाती थी उसे अकेला छोड़कर! पुनः खालीपन ऐसा कि नस-नस में पसर जाता था। सूरज के ऑफिस जाने और उसके लौट के आने तक की घर में छोड़ी हुई चुप्पी बस चुप्पी ही तो चारों ओर व्याप्त होती थी। इस जाने और फिर लौट के आने के बाद यदि एक स्मित मुस्कान की प्यासी उसकी आंखें तरस रही होती थीं तो क्या मांग लेती थी वह? घर आते ही एक मीठा आलिंगन ही तो मांगती थी वह, फिर चाहे वह नज़रों का हो या बाहों का! और जब कभी ऐसा हो जाता तो उसके चेहरे पर बहार आ जाती और वह गुनगुना उठती थी।
वह हर दिन चाव से तैयार होती लेकिन सूरज नजर भर कर उसे कब देखता था? हां, शनिवार रात को आर्मी क्लब में जाना होता था। वहां की जीवंतता उसे जीवित रखे हुए थी। गाने की फर्माइश होने पर जब माइक लेकर वह एक गीत सुनाती–तो गाने पर दाद व तारीफ़ पाकर उस पर सरूर छा जाता। हफ्ते के छै दिन पुनः: इसी आस में गुज़र जाते थे।
तभी नन्हा पुनीत उनके जीवन में आ गया और वह पुनः एक बार बचपन में खेलने लग गई थी। छै महीने मायके में रहने के बाद सूरज जब उसे लेने आया तो गोल- मटोल अपनी छवि देखकर वह अचंभित था। वसुधा की दुनिया नन्हे पुनीत के साथ खिल रही थी। सूरज का अर्दली सुबह आकर साहब के बक्कल ब्रासो से चमकाता ,बूट पॉलिश व ड्रेस तैयार करके फिर नन्हे पुन्नू को प्रैम में सैर कराने के लिए ले जाता था। पुन्नू भी उसे पहचाने लग गया था वह शाम को भी उसे घुमाने ले जाता था। समय के पंख उड़े जा रहे थे साथ ही पुनीत भी ।
आर्मी पोस्टिंग जगह-जगह होने से पुनीत को केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाना आरंभ किया गया। सूरज अब मेजर था। उसने कुछ दोस्तों को आर्मी के फ्लैट बुक करते सुना तो उसने भी एक फ्लैट के लिए आवेदन पत्र भरना चाहा। इस पर कैप्टन राव ने छूटते ही कहा,
“ओ मेजर साहब, बेवकूफ लोग फ्लैट बुक करवा कर किश्तें भरते रहते हैं मर -मर कर और अकलमंद किसी का फ्लैट किराए पर लेकर फिर कभी छोड़ते ही नहीं। समझे कुछ..? हमारे देश का कानून कितना बेकार है ना!”लेकिन फिर भी सूरज ने फ्लैट के लिए आवेदन पत्र भर ही दिया। अब घर के खर्चे में कटौती आरंभ हो गई थी। वसु को वह रसोई खर्च के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देता था। वसु अपने दहेज की सिलाई मशीन से अपने ब्लाउज पेटीकोट सिलती रहती थी। आर्मी ऑफीसर्स की बीवियों ने उससे कपड़े सिलवाने शुरू कर दिए। वह फ्रॉक भी बहुत सुंदर बनाती थी। उसका काम खूब चल गया था लेकिन सूरज इस सबसे बेपरवाह था। उसे केवल अपनी शारीरिक क्षुधा बुझाने से मतलब होता था, जबकि वसु को बिना प्रेम के शारीरिक उपभोग से उबकाई आती थी।
उसने ओशो को सुना था”प्रेम का अर्थ है— दो व्यक्तियों के बीच असंभव घट जाना।”कुछ असंभव तो उसके जीवन में कभी घटा ही नहीं। अर्थात प्रेम तो उसे कभी हुआ ही नहीं। न जाने वह कौन सी रात होती है जो किसी सपने का मस्तक चूम लेती है। जिससे फिर ख्यालों के पैरों में एक पाजेब सी बजने लगती है। वही फिर पैरों की जंजीर बनने लग जाती है… ऐसे ख्याल आकर उसके समक्ष मुस्कुराने लग जाते थे! उसे लगता था उसका प्रियतम बादलों की ओट में छिपा है, जहां पहुंचने के लिए कोई सीढ़ी नहीं है। देखने को कोई खिड़की भी नहीं है…!
इन्हीं दिनों कैप्टन आशुतोष आया जो इनकी पुणे की पोस्टिंग में भी था। लेकिन वसुधा से कभी मिलना नहीं हो सका था उसका। एक दिन गाड़ी लेकर अचानक बॉस को लेने वह घर आया, तो वसुधा को देखकर उस पर मुग्ध हो गया। कितनी भोली- भाली, हंसमुख, सरस और सुंदर! उसके मुंह से निकला,”मैम आप बहुत सुंदर हैं!”वह अचानक कह तो गया पर झेंप गया। यह सुनते ही वसुधा के प्यासे हृदय की इच्छा फलीभूत हो गई। वह खाना भी बहुत स्वाद बनाती थी। कपड़े बहुत बढ़िया सिलती थी। तैयार बहुत सलीके से होती थी और गाती बहुत मधुर थी। सूरज ने उसके किसी भी गुण की कभी तारीफ नहीं करी थी। इस मामले में वह महाकंजूस था।
आशुतोष को वसुधा बहुत प्यारी लगने लगी थी। वह घर आने के बहाने ढूंढता रहता था और बार-बार आने से वह सर के साथ बैठकर कभी-कभी खाना भी खा लेता था। जिससे उसके मुंह से खाने की तारीफ ही नहीं बंद होती थी। इससे वसुधा को उसका आना भाने लगा था । सो उसे भी उसके आने का इंतजार रहता था। शायद वसु इसी तारीफ की भूखी थी अब तक।
शनिवार को क्लबनाईट हर आर्मी स्टेशन पर होती है। वसुधा जैसे ही क्लब पहुंचती, आशुतोष उसका इंतजार कर रहा होता था और छूटते ही कहता था,
“मैम आप कमाल की लग रही हैं!”
यह सुनते ही वसुधा का चेहरा प्रसन्नता से रक्तिम हो उठता था। सूरज तो क्लब पहुंचते ही पैग के बाद पैग चढ़ाता रहता था व्हिस्की के। लेकिन वसुधा को भी जूस में थोड़ी व्हिस्की डालकर देना नहीं भूलता था। जिसके सरूर में वह माइक हाथ में लेकर कोई फिल्मी गीत छेड़ देती थी और महफिल लूट लेती थी। शनिवार को पुनीत के पास घर में अर्दली रहता था क्योंकि उसे पढ़ना होता था। वसुधा के जीवन में क्लब आना और गीत गाना– बस यही जीवन, उसे जीने का सबब देता था।
वसुधा आशुतोष को ‘आशु’ बुलाती थी और कभी- कभी बोल देती थी कि अपने बॉस को भी कुछ सिखाए। तब वह जवाब देता,” उस काम के लिए मैं हूं ना! उन्हें क्यों तकलीफ दूं?
आशुतोष इतवार को आ जाता और पुनीत के साथ सांप- सीढ़ी खेलता। या फिर उसे लेकर ग्राउंड में बैडमिंटन खेलता। उसे भी आशु अंकल बहुत पसंद थे। सूरज भी उससे बातें करता था। जिससे घर भरा- पूरा लगता था! वसुधा भी कुछ ना कुछ स्नैक्स बनाती रहती थी। लेकिन आर्मी वालों की तकदीर में फिर पोस्टिंग आ जाती है। आशुतोष भी घर चला गया था क्योंकि उसकी शादी की बातचीत हो रही थी। यह लोग बहुत दूर जा चुके थे इसलिए शादी में शामिल नहीं हो सके। आशुतोष कहां रुकने वाला था? वह बीवी को उनसे मिलाने वहीं ले आया था। उसने इला से कहा,
“तुम मैम से तैयार होना और खाना बनाना सीख लो यार,मजा आ जाएगा।”आशु हर बात में वसुधा की इतनी तारीफ कर रहा था कि इला हैरान होकर वसुधा से चिढ़ सी गई थी। उसे तो वसु एकदम अपनी सौत की तरह लगी। वह दोबारा उनसे कभी मिलने नहीं गई। हां, आशू की दीवानगी सारी उम्र कायम रही। वह उनकी हर पोस्टिंग पर उनके पास कुछ दिनों के लिए अवश्य जाता रहा।
पुनीत बैचलर डिग्री कर के हॉस्टल से घर आ गया था और अब अमेरिका जा रहा था मास्टर्स करने। उसका एडमिशन हो गया था और उसे वीज़ा मिल गया था। पुनीत को वह प्यार से पुन्नू बुलाते थे। उसके जाने से वसुधा बहुत उदास हो गई थी। सूरज अब कर्नल बन चुका था। पुन्नू ने उनको अपने पास बुलाया तो उन्होंने प्री मैच्योर रिटायरमेंट ले लिया आर्मी से और दोनों अमेरिका जाने लगे तो आशु आ गया मिलने के लिए। बाकी दोस्त शुभकामनाएं दे रहे थे लेकिन आशु एक मुर्दे की तरह बोला,
“मेरी जिंदगी तो अब खत्म ही समझो मैं किसके लिए जिऊंगा? आप दोनों ने सलाह भी नहीं करी और फ़ैसला सुना दिया! बहुत जुल्म किया है सर! अच्छा है, जाइए सलामत रहें आप।”
कोई साल भर बाद अपने फ्लैट के चक्कर में सूरज वसुधा को साथ लेकर भारत आया तो मालूम हुआ कि आशुतोष बीमार रहता है। दोनों उसे देखने चले गए। आशु की कातर दृष्टि मानो पूछ रही थी,” मुझे क्यों छोड़ गये अकेला?”
वसुधा के हृदय को उसकी दयनीय दशा भीतर तक घायल कर गई थी। लेकिन वह उसका हाथ थाम कर बैठी रही। हालांकि आशु की पत्नी इला से यह सब सहन नहीं हो रहा था। जब वह वापस अमेरिका चले गए, तो आशू पूरी तरह शराब में डूब गया। मानो जीवन से हताश अब जीना नहीं चाहता हो। बीवी और बेटे की भी नहीं सुनता था। वह देवदास बन गया था अपनी पारो के विछोह में। किसी का कहना नहीं सुनता था।
कुछ महीनों पश्चात् वसुधा बेटे पुनीत का रिश्ता करने भारत आई और उसे मिली तो वह बोला,
“मैम, मैं तो उसी दिन मर गया था जब आपने अमेरिका जाने का फ़ैंसला लिया था। तब से इस लाश को ढो रहा हूं । देखो और कितने दिन इसे ढोना लिखा है किस्मत में!”
तब इला ने बताया ,” यह आपको बहुत मिस करते हैं! दिन रात शराब पी- पीकर अपने को आपके बिरह की आग में जला रहे हैं। मैं इनकी अर्धांगिनी हूं, सब समझती हूं। थक- हार कर आपको बता रही हूं! अब यह हमारे बस में नहीं रह गए हैं।” सुनकर वसु ग़मगीन हो गई और उसकी आंखें अविरल बहती रहीं। यह कैसा रूह से रूह का रिश्ता था? क्या बादलों की ओट से आशु ही झांक रहा था?
पुन्नू का विवाह हुआ। सब आए लेकिन आशू नहीं आ सका। अगले दिन अमेरिका जाने की फ्लाइट से पहले जब यह लोग उसे बाय करने गए तो उसे आईसीयू में ले जाया गया था। सूरज और वसुधा उसके सिर पर अंतिम बार हाथ फेर कर आईसीयू से बाहर निकले तो वसुधा फफक -फफककर रो रही थी। वो उसे अंतिम विदाई दे आई थी। वे लोग अमेरिका पहुंचे तो पहली खबर आशुतोष की मिली। वह देह के बंधन तोड़कर आजाद हो गया था। आशुतोष जाते-जाते वसु को यूं बांध गया था स्वयं से कि वह उसकी अंतिम दृष्टि से अपने को दूर ही नहीं कर पा रही थी।
वह बैठी- बैठी कहीं खो जाती! फिर अचानक वर्तमान में लौटती और चौंक जाती थी। टीवी पर गाने चलते तो उठकर हीरोइन के साथ नृत्य करने लग जाती और फिर नाचती ही जाती, बाद में थक- हार कर वहीं कार्पेट पर पड़ी रहती थी। कार उठा कर शॉपिंग चली जाती तो ढेरों चीजें ले आती, कि भारत जाकर सबको गिफ्ट देनी हैं। उसका व्यवहार नॉर्मल नहीं था। पुनीत ने ले जाकर डॉक्टर को दिखाया तो बोली,
“मैं बिल्कुल ठीक हूं स्वस्थ हूं। मुझे कोई बीमारी नहीं है।”
डॉक्टर ने स्ट्रेस घटाने के लिए दवाई दी, तो उसे खाने के बदले डस्टबिन में फेंक देती थी और पुनीत समझता था मां दवाई नियम से खा रही है। किचन में कोई सब्जी बनने रखती तो भूल जाती। रोज ही खाना जला होता था। सूरज अपने बेडरूम में अलग से शांति से जीता था। आज भी उसकी वही हॉबीज़ थीं। किताबें पढ़ते रहना और म्यूजिक सिस्टम के साउंडट्रेक फाईन करते रहना।
पुनीत और सानिया अलग से अपने घर में रहते थे। दोनों बहुत व्यस्त रहते थे अपने काम में। मम्मी कभी फोन करती तो उन्हें गुस्सा आ जाता। कोई बात भी नहीं करने को होती थी। घर में किसी को मालूम नहीं हुआ ,वसुधा कब डिमेंशिया की गिरिफ्त से घिर गई थी। सूरज ने तो कभी परवाह की ही नहीं थी, तो अब क्या करता?
अकेलापन… काली चींटी जैसे खाली कमरे में ठोकरे खाना और फिर न जाने कहां चले जाना। हां,अब यही तो हो रहा था उसके साथ। वह बहुत कुछ भूलने लग गई थी। किसी को भी फोन करती और कहती कि मेरा हस्बैंड मेरी बिल्कुल परवाह नहीं करता है। मैं कल से भूखी हूं। मैंने कुछ भी नहीं खाया है। उसने चूल्हा बंद कर दिया है।”सब हैरान होते और एक दूसरे से इस विषय में बातें करते। बच्चे भी कितने- कितने औरदिन पूछने नहीं आते थे। सूरज ढूंढ -ढांढकर कुछ खा लेता था। यह नहीं देखता था कि उसने कुछ खाया है कि नहीं। फ्रीजर वह भूल चुकी थी।
अमेरिका में अकेलापन—सबसे बड़ी बदनसीबी है। कार चलाना मना था। आस- पड़ोस में अपना कोई नहीं था! किसी से एक बात करने को तरस जाती थी! वहां तो कोई काम वाली बाई भी नहीं आती है ना। बस बेसुध हुई पड़ी रहती थी। सूखती जा रही थी! बेटा बहुत व्यस्त रहता था, उतनी ही व्यस्त बहू रहती थी। आजकल के बच्चों के पास बहुत कुछ है लेकिन समय नहीं है किसी को देने को। जब मां का फोन आना बंद हो गया तो पुनीत हैरान हुआ और एक दिन वह मां से मिलने आया। मां की हालत देखकर वह उन्हें डॉक्टर के ले गया। डॉक्टर ने सारे टेस्ट करवाए और बताया कि अब बहुत देर हो चुकी है। इनकी याददाश्त पूरी तरह से चली गई है। इन्हें “मेमोरी लास्ट होम” में रखना पड़ेगा। पुनीत ने देखा कि मां की हालत बहुत बुरी है। तो वह रो पड़ा। वह हैरान था कि दवाइयों से आराम क्यों नहीं आया? उसने डस्टबिन देखा तो वहां सारी दवाइयां पड़ी हुई थीं। उसने एक दिन भी अपने हाथ से मां को दवाई नहीं खिलाई थी। घर में खाने को भी कुछ नहीं था। वह पापा से झगड़ा। अब वह अपना सिर धुन रहा था। तीर कमान से निकल चुका था। सुधार कैसे होता? वसु मौन बैठी सबको निहारती रहती थी। उसके मौन की गूंज घर भर में समाई थी।
सूरज के पुकारने पर वह उसे ऐसे देखती मानो कोई अजनबी हो। बेटे को भी नहीं पहचान रही थी।
“मेमोरी लास्ट होम”में कोई भी किसी को नहीं पहचानता था। सबको डाइनिंग टेबल पता था बस। जहां पर खाना मिलता था। अच्छे भले इंसान को वहां जाकर डिप्रेशन हो जाता था। नहलाने- धुलाने के लिए वहां नर्स थी।
बीच-बीच में सब हालात मुझे पता चल रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया और उसे देखने मैं पहुंच गई । तो वहां थीं रिक्त आंखें और गुम नज़रें! किसे पहचानना था? उसके लिए सब अंजान थे। मेरी आंखों से आंसू ढुलके जा रहे थे। कमरे के भीतर कोई पलंग पर लेटी थी सबसे अलग, सबसे दूर, छत को निहारती,प्यार की प्यासी एक अभिशप्त आत्मा-
जिसकी सूनी आंखें इस संसार से रिक्त हो गई थीं। लगता था उसे कोई खुली खिड़की मिल गई थी , जहां से कुछ मौन कड़ियां जुड़ गई थीं जिन से बादलों को सीढ़ी लगाकर उनकी ओट में झांक कर वह प्रेम प्यासी अपने प्रियतम को तलाश रही थी…!


मर्मस्पर्शी कहानी। जन्मपत्री का मिलान न करके स्वभाव और रुचियाँ मिलाकर विवाह होना चाहिए। वसुधा जैसी हज़ारों महिलाएँ ऐसा ही जीवन जीने को विवश हो जाती हैं।मेरी एक मित्र के साथ ऐसा ही हुआ था, लेकिन उसका मेजर पति शक्की भी था इसलिए रोमिला के जीवन में कोई आशुतोष दस्तक भी नहीं दे पाया। कुंठा के कारण उसने आत्मदाह कह लिया।
वीणा जी!
आप की कहानी मौन की गूँज पढ़ी।
भूल न जाएँ इसलिए इस बात को हम पहले लिख देते हैं इस कहानी को पढ़ते हुए हमें नीलिमा शर्मा जी की कहानी- *कोई खुशबू उदास करती है* याद आ गई। कथानक दोनों के बिल्कुल अलग हैं। पर पीड़ा एक ही सी।
यह कहानी एक प्रेम त्रिकोण की है। कहानी पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को पुष्ट करती है।
वैवाहिक संबंधों में परस्पर प्रेम और सामंजस्य का होना बहुत अधिक आवश्यक है।न ही जीवन पत्नी के लिये पति के प्रति सिर्फ मशीन होता है और न ही पति का पत्नी के लिए सिर्फ देह होना। प्रेम का माधुर्य परस्पर संबंध की नींव होती है।
प्रेम वैवाहिक जीवन का आधार है।जब किसी को प्रेम घर में नहीं मिलता तो उसे वह बाहर तलाश करता है,और बिना तलाश किये ही प्रेम अगर घर आ पहुँचे तो आकर्षण कभी-कभी स्वाभाविक हो जाता है।
आशू का आना वसुधा के लिये सुखद रहा। अपने पति से प्रशंसा की चाहत में उसका इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ लेकिन वही प्रशंसा जब आशु से मिली तो उसके प्रेम की प्रतीक्षित चाह तृप्त हुई। किंतु खामोशी में।
अंत तो बेहद मार्मिक रहा। तकलीफ दे गया।
आशु की चाहत का जब तक वसुधा को पता चलता है आशु इस संसार को छोड़कर जा चुका होता है ।
वसुधा पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।
वह फिर अकेली पड़ जाती है और डिमेंशिया का शिकार हो जाती है।
कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।