यह कहानी बाल–श्रमिक पर लिखी बेहद संवेदनशील कहानी है। जो भारत में भदोई के क़ालीन के कारखानों में जुटे बाल श्रमिकों की याद दिलाती है। यह कहानी मन को इसलिए भी गहरे छूती है कि बाल–श्रमिक भारत की एक ऐसी समस्या है जिस पर क़ानून बना और उस पर कड़े क़दम उठए गए तो भी यह पूरी तरह से भारत एवं दुनिया के अन्य मुल्कों से पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है। उसके अनेक कारण हैं।
पाँच-छह कच्चे मिट्टी के घर, बेर और सेंदज के कुछ पेड़, एक तंदूर, उथला चश्मा , छोटी-सी तलैया यही सब-कुछ उस टेढ़े-मेढ़े मैदान में फैले बीजूम गांव को आबाद किए हुए थे। दोपहर का समय था। पूरा गाँव जलते सूरज से भाड़ के चने की तरह भुन रहा था। दीवार के साये में बैठा गाय-भेड़ों का झुंड ज़बरदस्ती जुगाली कर रहा था। हाँफते हुए और गर्मी से पगलाए पक्षी पत्तियों की ओट से दुबके बैठे थे। मैदान के एक तरफ़ एक बड़े-से पेड़ की मोटी शाख़ से खाल उतरी भेड़ टँगी हुई थी, वह पूरी की पूरी मक्खियों से अटी हुई थी। अपने हाथ में बड़ा-सा चाक़ू थामे एक बूढ़ा उकडूं बैठा बीच-बीच में हाँक भी लगाता जा रहा था, ‘गोश्त… गोश्त… भेड़ का।’
चश्मे के किनारे बैठा काला-कलूटा लड़का पत्थर से रगड़-रगड़कर हाथ का मैल छुड़ा रहा था। कुछ ही दूर पर कीचड़ में सना कुत्ता पानी में गो़ते लगा रहा था। इससे थोड़ी ही दूर पर गुल अफ़रोज़ सिर से पैर तक पसीने में नहाई हुई सामने रखे आटे के पिंडों को बेल-बेलकर तंदूर की दीवार पर चिपका रही थी और बीच-बीच में सिकी हुई रोटियों को एक तरफ़ रखती भी जा रही थी। पाँव की एड़ियाँ तंदूर की गर्मी से चटख़ रही थीं। गुल अफ़रोज़ की उम्र यही कोई आठ वर्ष के लगभग होगी उसके शरीर पर चर्बी नहीं के बराबर थी। हड्डीला चेहरा और सूरज की तपिश से जली रंगत। छोटी-छोटी चमकीली आँखें काले चेहरे पर अजीब तरह से नृत्य करती थीं। उलझे बाल, जिनमें जुएँ-ही-जुएँ थीं, सूती चादर के नीचे ढंके हुए थे। रंग उड़े कपड़े घुटनों के नीचे तक चिथड़ों से लटक रहे थे, जिनसे झाँकती दो पतली सूखी टाँगें खपच्चियों की तरह उसके शरीर को उठाए हुए लग रही थीं।
अकस्मात् दूर से आती घोड़ों की टापों से मैदान गूंज उठा। बूढ़े क़स्साब ने खाल उतारी भेड़ को तेज़ी से उतारा और कंधे पर रख सामने की पतली गली के दहाने में जा घुसा।
‘हाय! हाय सिपाही आ गए हैं भागो…!!’
गुल अफ़रोज़ घबराई-सी उसी क़स्साब के पीछे भागी। गायें और भेड़ें भी माऽऽऽ माऽऽऽ बाऽऽऽ की आवाज़ों के साथ बिखरने लगीं। क्षणभर में ही मैदान खा़ली हो गया और तीन घुड़सवार उस मैदान में पहुँच गए।
अरे अरे बुज़दिलो! मत डरो कहाँ है रोड गार्ड, अरे भाई, यह तो मैं हूँ अली मर्दान खान…आया हूँ। ताकि का़लीन बुनने वाले बच्चों को ले जाऊं। सुनकर छिपे हुए लोग अपनी जगह से सरकने लगे। जब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि वे सिपाही नहीं हैं तो बाहर निकल मैदान में जमा हो गए। अलीमर्दान ख़ान छोटे क़द लंबे हाथ और भारी गालोंवाला आदमी था। उसको आँखों में बहती घृणा और छिपी बदले की तीव्र भावना भाँप जाने के बाद भी लोग उसके हाथ और पैरों का चुंबन ले रहे थे और कह रहे थे, “पधारें मालिक!” हम तो आपके पैरों की धूल के समान हैं ज़मींदार साहब!”
“ख़ुदा हमारे ऊपर मालिक का साया बनाए रखे।”
“ये हड्डियाँ ये गोश्त तो कहने भर को हमारा है, मगर संपूर्ण वजूद आप ‘ही के दम से है!”
हर कोई अपनी औलादों को अलीमर्दान ख़ान के सामने लाता और घिघियाता- सा ख़ुशामद करता हाथ-पैर जोड़ रहा था।
अलीमर्दान खान ने गुलअफ़रोज़ के अंग-अंग का यूँ निरीक्षण किया, जैसे क़स्साब बकरे को ख़रीदने से पहले देखता है। और फिर उसके पिता से बोला, ‘कितने दिनों के लिए दोगे?’
‘जितने दिन के लिए अन्नदाता चाहेंगे।’ वह दोनों हाथ जोड़कर बोला, “बहुत बढ़िया… बहुत अच्छा… शाबाश! रोज़ का तुमको पाँच रियाल (पैसा) मिलेगा और ऊपर से इसको रोटी-पानी। अब बोलो, इससे ज़्यादा क्या चाहिए।”
“कुछ नहीं मालिक… कुछ नहीं! हमारे लिये वही बहुत है।”
“इसे ले जाऊँगा ‘मुद’ आबादी की ओर। वह जगह अच्छी है। यह मत भूलना कि पाँच साल के पहले बिना मेरी मर्ज़ी के तुम इसे वापस नहीं बुला सकते। मेरे पास कोई मुफ़्त की रोटियाँ तो हैं नहीं, जो लंगर लुटाऊँ? इसके पेट को भरने के लिए पाँच साल तक पैसा ख़र्च करूंगा और बाद में नतीजा क्या निकलेगा, यही न कि मुफ़्त और सस्ते में इसे गवाँ बैठूंगा।”
अलीमर्दान खान ने दोनों हट्टे-कट्टे मर्दों की तरफ़ इशारा किया और गु़र्राया “ कौन है, जो इस लड़की को घोड़े पर बिठाएगा! “वह जो क़द में लंबा और अधिक तगड़ा था, आगे बढ़ा। गुलअफ़रोज़ उक़ाब के पंजों में फँसी एक चिड़िया की तरह उसके हाथों में आई और उसने उसे एक हाथ से उठाकर ऊँचे घोड़े की पीठ पर बिठा दिया। अलीमर्दान ख़ान उचककर घोड़े पर सवार हुआ और पलक झपकते ही तीनों घोड़े पहाड़ियों के पीछे ग़ायब हो गए।
गुलअफ़रोज़ कारखाने के कोने में बैठी घुटनों पर सर रखे ख़ामोशी से चाँदनी के चकत्ते को ट्कट्की लगाए देख रही थी, थकी झुंझलाई-सी। नींद का कोसों पता न था। माँ की गर्म गोद की याद उसे दुःख पहुंचा रही थी। उसी के सामने एक- दूसरे से लिपटी मासूमा व असमत बेख़बर ख़र्राटे भर रही थीं।
पौ फटने ही वाली थी कि कारख़ाने का दरवाज़ा चर्र की आवाज़ के साथ खुला और एक लंबी-चौड़ी छाया दरवाज़े पर दिखी। यह बड़ा ‘उस्ताद’ था। भयभीत असमत और मासूमा डरकर सोते से उठ गईं। उन पर बड़े उस्ताद की फटकार पड़ी “मुर्दा लाशों उठो, जाकर पानी भरो ! झाडू का काम गुलअफ़रोज़ का है पहले मालिक का घर बुहारना है, बाद में कारखाना।”
असमत और मासूमा लाल फूली आँखें लिए घड़े कंधे पर रख चश्मे की ओर चली और गुलअफ़रोज़ दुःखी निढाल-सी झाडू थामे गली के उस पार मालिक के घर की ओर।
जब मासूमा व असमत अपना काम समाप्त करके लौटीं तो गुलअफ़रोज़ भी काम से निबटकर लौट चुकी थी। उसका दिल एक चाय के लिए तड़प रहा था और दिमाग़ बीजूम देहात में घूम रहा था। जैसे ही बड़ा उस्ताद मालिक के घर से बाहर निकला, उदास मुरझाए चेहरे से तीनों लड़कियाँ क़ालीन बुनने का चाक़ू हाथ में लिए उसके सामने बैठ गईं। बड़ा उस्ताद हाथ में क़ालीन का नमूना पकड़े उन्हें बुनना सिखाने लगा।
‘क्या मौत आ रही है या हाथों में लक़वा मार गया है…तेज़ी से हाथ चलाओ… इधर खींचो… उधर।’
लड़कियाँ लंबी काँपती उँगलियों से विभिन्न रंगों के ऊन में गाँठे लगातीं और फिर उसके सिरे को कूटतीं। बड़ा उस्ताद ध्यान से निरीक्षण करता रहा।
दोपहर को वे तीनों छोटी लड़कियाँ एक बड़े प्याले के चारों तरफ़ बैठी भूख से व्याकुल हो बड़े चाव से भोजन करने में मशगूल थीं। जब वह गाढ़ा सब्ज़ीवाला सूप खत्म हुआ तो मासूमा ने गली के नुक्कड़ को देखते हुए धीरे से कहा, “कितना कम था।”
शाम को सूरज डूबने के समय जब उन्होंने हाथों के चालू रख दिए तभी उस्ताद की आवाज़ आई “उठो, जल्दी से पानी भरो। फिर बाड़े में भी जाना है।”
गुलअफ़रोज़ ने भेड़ों का झुंड जमा कर लिया और उनकी नाँद में ताज़ी घास डालने लगी। असमत और मासूमा बड़बड़ाती हुई बाड़े की बाल्टियों को पानी से भरने लगी।
एकाएक रात में गुलअफ़रोज़ फूट-फूटकर रोने लगी। रोने की आवाज़ से मासूमा और असमत जाग उठीं और वे दोनों भी रोने लगीं। जब गुलअफ़रोज़ जी भरकर रो ली तो असमत से बोली, “ऐसा नहीं हो सकता है कि किसी तरह यहाँ से निकल चलें?”
“ऐसा नहीं हो सकता है अफरोज़ ! पिछले साल मासूमा भागी थी, कुछ दिनों बाद मालिक उसे ढूंढने पहुंचा। बाप ने इनकार कर दिया। इस पर मालिक ने मासूमा के पिता को गोली मार दी।”
असमत ख़ामोश हो गई और मासूमा ने दुखते दिल के कारण निचला होंठ कसकर दाँतों से दबा लिया! गाँव में सोता पड़ा था। कुत्ते भी एक-दूसरे के आसपास पड़े, बड़े आराम से सुस्ता रहे थे। पेड़ की पत्तियाँ तक नहीं हिल रही थीं। चाँद धीरे-धीरे डूब गया था। तीनों लड़कियाँ एक-दूसरे के गर्दन में हाथ डाले सो गईं।
बड़ा उस्ताद क्रोधित-सा खड़ा था। क़ालीन बुननेवाले लड़की के चाक़ू को गुलअफ़रोज़ के मुँह पर दे मारा, “नसीबोंजली, कहाँ हैं तेरे होशोहवास लाल की जगह पिस्तई रंग लगा रही है? मुफ़्त की रोटी तोड़ती है, काम नहीं करती? बेवकूफ़ है…बेवकूफ़!” गुलअफ़रोज़ ने पिस्तई रंग की गाँठ को तेज़ी से खोला और उसकी जगह दूसरा रंग लगाया। मगर बड़ा उस्ताद उसी तरह बड़बड़ाता रहा।
एक हरे रंग की लंबी चमचमाती कार कारखा़ने के समीप आकर रुकी। दो मर्द, एक औरत नीचे उतरे। दोनों मर्द लंबे क़द के थे। होंठों में सिगरेट दबी थी और सफ़ेद नाज़ुक कपड़े की चादर ओढ़े हुए थे, लेकिन बदन से चिपकी जींस साफ़ नज़र आ रही थी।
मालिक ने मोटर की आवाज़ जैसे ही सुनी, कमरे से बाहर निकल आया। उटंगी काली शलवार पहने था, कपड़े मैले कुचैले। जमाही लेता, गुद्दी खुजाता हुआ आया और बड़ी मक्कारी से बोला, “वाह… वाह, स्वागतम् हमारी यह बस्ती क़ालीनों से भरी थी, अब आपके आने से तो इसका रंग ही बदल गया है। लगता है, पिछली क़ालीनें आपको पसंद आई हैं।”
गले के बटन बंद करती हुई औरत बोली, “खैर, इतनी अच्छी भी न थी, भाई ने ख़रीदा था दाम भी न बताया।”
“ख़ैर, दाम-वाम में तो. कोई अधिक फ़र्क़ नहीं हुआ है। उसी का जोड़ा बन रहा है एकदम कमबख़्त मख़मल की तरह है। नमूना वही ‘सादियाँ’ का है। आइए कारख़ाने के अंदर तशरीफ़ लाइए।” आगे औरत पीछे दोनों मर्द अंदर घुसे। उनमें से एक ने दाम पूछा-
“बस सौ रुपए।”
“सौ तूमान ज़्यादा हैं।”
“अगर पहलेवाला दाम रखो तो समझो हमने ख़रीद ली।”
“नहीं जनाब, हमें पड़ता नहीं पड़ेगा। रंग महंगे हो गए हैं।”
दूसरा आदमी जो दलाल था, बोला, “आधा रख लेते हैं, पचास तूमान, खुदा बरकत देगा।” एक रज़ामंदी की मुस्कान सभी के होंठों पर खेल गई। औरत ने लड़कियों से कहा, “लड़कियों अगर का़लीन जल्दी ख़त्म की
तो तुम्हारे लिए में फूलदार स्कार्फ़ लाऊँगी।” पहला आदमी नोटों को आगे बढ़ाता हुआ बोला, “यह रहा आठ हजार नक्क़द, बाक़ी का़लीन मिलने पर।”
“कोई बात नहीं, यह भी न देते तो कोई बात न थी।”
कहते हुए उसने रुपए मोड़कर नेफ़े में रख लिये।
गुस्से से भरी मालिक की आवाज़ गूंज रही थी।
“दो महीना ही तो हुआ है यहाँ काम करते हुए, उसमें भी दो दिन उँगली के कट जाने से काम नहीं किया, तीन दिन रंग न था। इस तरह से पाँच दिन हुए।” फिर मालिक ने आवाज़ थोड़ी और तेज़ की, “और कमबख़्त काम भी तो नहीं जानती हैं,बार-बार ख़राब करती हैं ” एक कश और लेकर बोला, ‘अब बचे पचास दिन, उसकी मज़दूरी पचीस तुमान (रुपया) ठीक है न?”
“गुलअफ़रोज़ के पिता हैदरअली ने सर नीचा करके आहिस्ता से कहा, “ठीक है मालिक।”
“मेरे हिसाब में एक कौड़ी का भी हेर-फेर नहीं पाओगे। लोगों का एक पैसा भी खाना मैं हराम समझता हूँ।”
“ख़ुदा आपको बड़ी उम्र दे, आपके दस्तरख़ान से बचे टुकड़े हमें नसीब करे, हम इस नेकी का क्या बदला दे सकते हैं।”
“ठीक है, मगर एक बात याद रखना, जाड़े तक इधर मत आना। जब भी आओगे, गुलअफ़रोज़ का मन घर जाने के लिए बेचैन होगा।”
“आपका हुक्म सर आँखों पर।” तभी बदहवास-सी असमत गिरती-पड़ती वहाँ आ पहुँची।
“मालिक सिपाही आए हैं, आपको पूछ रहे हैं।”
ज़मींदार वहीं लेटा-लेटा चिंघाड़ा, ‘इन कमबख़्तों को फिर मौक़ा मिल गया। जब तक इनके आगे हड्डी न डालो, ये टलेंगे नहीं। यह दारोगा़ ख़लील तो पूरा बिज्जू है। एक मील से लाश जैसी गंध मारता है’। गली पार करके वह कारखाने पहुँचा, “सलाम सरकार! यहाँ कहाँ खड़े हैं आप, अंदर तशरीफ़ लाएँ बातचीत करते हैं, तिरयाक पीते हैं।”
“फिर कभी! अभी तो वक़्त कम है, अभी सम्सोलाबाद भी जाना है। ख़बर मिली है, लाठियों से वहाँ आपस में सर फुटव्वल हुआ है।”
“कहीं पानी और ज़मीन को लेकर झगड़ा तो नहीं उठा?”
“नहीं एक शादी थी, दुल्हन किसी और से शादी करना चाहती थी, पहले से कहीं उसका चक्कर चल रहा था।”
ख़लील दारोगा ने मुँह में जमा हो गए थूक की एक पिचकारी ज़मीन पर मारी और गंभीर होकर बोला, “ये जो तुम्हारे यहाँ काम करनेवाले हैं, बारह साल से कम के हैं। क़ानून तो जानते हो तुम! उसमें यह जुर्म है और इसे रोकना हमारा काम है।”
ज़मींदार ने सुनी अनसुनी करते हुए कहा, “बड़ा अच्छा हुआ, जो आप इधर से गुज़रे वह भी जाड़े की शुरुआत और भेड़ों को हलाल करने का मौसम आप जानते ही हो। बिना आपके हमारे गले से एक कौर भी उतरे। कल ही अपनी पत्नी से कह रहा था कि एक पूरी भेड़ आपको भेंट कर दूँ अब आप जो कहें।”
दारोगा़ नर्म पड़ गया और बोला, “तुम हमेशा मुझे शर्मिंदा करते हो, खै़र भेड़ ज़िबह कर गोश्त भेज देना।”
ख़लील दारोग़ा ने सिपाहियों की तरफ़ मुँह मोड़ा और कहा, “चलो चलें, वरना वहाँ एक भी नहीं बचेगा।”
रात अँधेरी और ख़ामोश थी। आसमान पर बादल घिरे हुए थे। कारखाने के फ़र्श पर तीनों लड़कियाँ कड़कते जाड़े में काँपती ठिठुरती एक फटे लिहाफ़ में सिकुड़ी पड़ी थीं। अलाव भी राख हो गया था। एकाएक गुलअफ़रोज़ बोली, “असमत जाग रही हो?”
“हाँ बहुत ठंड है। मुझे नींद नहीं आ रही है। मगर शायद मासूमा सो गई है।” असमत ने मासूमा के शरीर को छुआ-ठंडी पड़ी थी…।
सुबह होते ही बड़ा उस्ताद लंबा गर्म चेस्टर पहने, सर पर गर्म मफ़लर बाँध कमरे में दाखि़ल हुआ।
“अभी तक पड़ी सो रही हो?” असमत और गुलअफ़रोज़ के भरे गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी, “उस्ताद… उस्ताद मासूमा उठ नहीं रही।”
“गू खाती है ससुरी, पूरा ख़ानदान इसका नाश हो!” बड़े उस्ताद ने लिहाफ़ के ऊपर से ही एक ज़ोरदार लात मासूमा के जमायी और लिहाफ़ को उसके ऊपर से खींचा तो फ़ौरन उसके माथे पर सलवटें पड़ गईं और गले में कुछ ऊपर-नीचे होने लगा। हकलाते हुए वह बोला, “ऐ…ऐ… यह कैसे हो सकता है।” फिर ख़ुद ही जवाब दिया। हाँ, तो इसका काम तमाम हो गया। फिर तेज़ी से ज़मींदार के घर की तरफ़ भागा और वहाँ जाकर बोला ‘मालिक… मालिक… मासूमा ऐंठ गई है।”
“मर गई है…? कुत्ते की औलाद यह कौन-सी ज़रूरी बात थी कि जो मुझे जगाने आ गया? मैंने सोचा भेड़िया भेड़ों के बाड़े में घुस आया? घबराने की बात नहीं है। बहा दो बस ध्यान रहे कहीं अटके न।”
मासूमा की लाश को ठिकाने लगाकर जैसे ही वह कारख़ाने लौटा, आराम से बैठकर उनसे पूछा, “अगर किसी ने पूछा कि मासूमा कहाँ गई है तो क्या जवाब दोगी।” गुलअफ़रोज़ ने कहा, “कहेंगे, सुबह जगाया तो उठी ही नहीं, और आपने उसे…” सुनते ही उस्ताद ने उसके मुँह पर एक हाथ मारा।
“कमबख़्तो! अगर यह बात कहीं कही तो खाल खींच लूँगा। तुम दोनों एक ही बात कहना कि माँ के पास गई है।”
“ठीक है उस्ताद” वे बोलीं।
वह ठंडी रौशन रात थी। बहार का प्रारंभ जंगली फूलों की ख़ुशबू हवा में बसी हुई थी। भेड़े चर रही थीं और कहीं से बाँसुरी की आवाज़ वातावरण में गूँज रही थी। गुलअफ़रोज़ ख़ुशी से बेहाल बैठी थी। तय है कि कल बाप ख़ुद आएगा और उसे बीजम ले जाएगा। आज पाँच साल के बाद पहली बार उसके मुँह पर हँसी खेल रही थी। कड़वे दिन उसे एक-एक करके याद आ रहे थे। पिछले जाड़ों में एक रात असमत भागी मगर रास्ते में बर्फीले तूफ़ान में फँस गई, फिर उसकी कोई ख़बर न मिली।
आगे की यादें मालिक के कुत्ते के भौंकने में गुम हो गईं। मालिक लँगड़ाता हुआ कारख़ाने का दरवाज़ा खोलकर अंदर पहुँचा और दरवाज़ा बंद कर लिया। “कहाँ है मेरी कबूतरी? तुम कल जाना चाह रही हो, मुझे अभागा बनाकर बेमुरव्वत ! कितना ख़र्च किया है तुझ पर मैंने! यह बदन मेरे ही दया, धर्म से तो बड़ा हुआ है।”
गुलअफ़रोज़ भय से अधमरी हो गई। उसकी ज़बान तालू से चिपक गई। छोटे उभारोंवाला उसका सीना धौंकनी की तह चलने लगा। तभी मालिक बेताब-सा उसकी तरफ़ बढ़ा। भूखे भेड़िये की तरह हू-हा करती उसकी आवाज़ कामवासना को बढ़ा रही थी। एकाएक उसने गुलअफ़रोज़ को दबोचा। गुलअफ़रोज़ ने पूरे ज़ोर से उसका मुँह नोचा और भागी। फुर्ती से मालिक ने हमला किया और गुलअफ़रोज का गला अपने भारी हाथों में दबोच लिया।
गुलअफ़रोज़ बिना किसी आवाज़ के ढीली पड़ गई। घुटने मुड़ गए। खून और फेन् से सनी लार नाक और मुँह से बह निकली। मालिक ने वासना के दहकते शोले को शांत किया और एक विजयी पहलवान की तरह क़िले को जीत शान से बाहर निकल गया। खून की बूंदें क़ालीन बुनने के ताने-बानों पर फैल रही थीं। धागों पर फैलती बूँदें नुचे लालों की पँखुड़ियों- सी दिख रही थीं। गुलअफ़रोज़ ठंडी और शांत क़ालीन की बुनाई के चौखटे के नीचे पड़ी थी। उसकी खुली बेनूर आँखें अधबुनी क़ालीन के दहकते लाल फूलों पर जमी हुई थीं।
***
लेखक परिचय:
इब्राहिम मोतामद नेजाद का जन्म 1957 में बीरजद में हुआ। उनका कहानी संग्रह ‘फरियादी दर कबीर‘ (रेगिस्तान में चीख) नाम से आया जो बहुत चर्चित हुआ विशेषकर उस में शामिल कहानी, ‘खूनी– ताने बाने‘ उनका महत्वपूर्ण शोध कार्य ‘रेगिस्तान की इलाकाई जबानों का शब्दकोश’ है।
शुक्रिया नासिरा जी।
आज पुरवाई पर नासिरा आपा की कहानी खूनी ताने-बाने पढ़ी। जब भी कुछ ऐसा पढ़ती हूँ तो दुनिया में फैली क्रूरता अपने चरम पर दिखाई देती है। महसूस होता है कि मनुष्य होना अपने आप में जितना पाक, जितना ऊँचा हो सकता है उससे हजार गुना ज़्यादा दरिंदगी भरा भी। बाल श्रमिकों के ऊपर लिखी गई यह कहानी है। पर यह महज कहानी नहीं है, यह लाखों करोड़ों बच्चों की हकीकत है जो पूरी दुनिया के अलग-अलग कोनों में ऐसी ही हैवानियत का रात दिन शिकार हो रहे हैं। गरीबी में मां-बाप बेच देते हैं और बच्चे जानवरों से भी बद्तर हालत में अपनी खाल अपना गोश्त नुचवाते रहते हैं फिर एक दिन तड़प तड़पकर दम तोड़ देते हैं। बाल श्रमिक होना तो अपने आप में एक बहुत बड़ी त्रासदी है ही और तिस पर लड़की होना तो फिर बदनसीबी की इन्तिहा हो जाती है।
कहानी को पढ़कर मन बहुत भारी हो गया।
इस कहानी को लिखा है इब्राहिम मोतमद नेजाद ने, जिसका अनुवाद किया है नासिरा आपा ने। अनुवाद इतना बेहतरीन है कि एक बार भी ऐसा नहीं लगता कि मूल कहानी किसी दूसरी भाषा की है। यूँ भी नासीरा आपा की पकड़ संवेदनशील मुद्दों पर बाकमाल है।
बेहतरीन तर्जुमा है,,,मैने इसे शारजाह पुस्तक मेले में किसी किस्सागो से सुना था।अनुभवी जन इसी कहानी का आनंद ले रहे थे।पर मुझे यह अच्छे से समझ नहीं आई थी क्योंकि भाषा के बोलने का लहजा अरबी से सराबोर था।
आज पुरवाई में जब इसे पढ़ा तो समझ आया और आदरणीय नसीरा शर्मा जी ने लगा कि भाषा के अंतर को पाट कर रख दिया।
पुरवाई पत्रिका का आभार जो इतनी मशहूर लेखिका की कहानी प्रकाशित कर अपने पाठकों को खूबसूरत सौगात दी है।
नासिरा शर्यमा जी से अनुदित कहानी जो भारत में बाल श्रम की अमानवीय प्रथा पर आधारित है। भदोही के कालीन कारखानों में बच्चों के शोषण और उनके टूटे सपनों का मार्मिक चित्रण करती है। गुल अफ़रोज़, मासूमा, और असमत के संघर्ष उनकी दयनीय स्थिति को उजागर करते हैं। मासूमा की मौत और असमत का अंत पाठकों को झकझोर देता है। यह कहानी समाज की असंवेदनशीलता और भ्रष्ट तंत्र पर सवाल उठाती है, बदलाव और जागरूकता की मांग करती है।
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नासिरा शर्यमा जी से अनुदित कहानी जो फारसी में बाल श्रम की अमानवीय प्रथा पर आधारित है। भदोही के कालीन कारखानों में बच्चों के शोषण और उनके टूटे सपनों का मार्मिक चित्रण करती है। गुल अफ़रोज़, मासूमा, और असमत के संघर्ष उनकी दयनीय स्थिति को उजागर करते हैं। मासूमा की मौत और असमत का अंत पाठकों को झकझोर देता है। यह कहानी समाज की असंवेदनशीलता और भ्रष्ट तंत्र पर सवाल उठाती है, बदलाव और जागरूकता की मांग करती है।
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