Wednesday, February 11, 2026
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कहानी – तंदूर (मूल : फ़व्वाद तीरकली, अनुवाद : नासिरा शर्मा)

यह कहानी आधुनिक होते इराक़ के उन पिछड़ी सोंच और मर्द समाज की अपराधी मानसिकता को सामने लाती है जो किसी  न किसी रूप में आज भी मौजूद है। ऐसी घटनाएँ हमारे यहाँ भी होती हैं जिस में बेबस औरत पर आरोप लगा कर पुरुष अपने अपराध पर पर्दा डाल देते हैं।इस तरह की असंख्य कहानियों को हम हिंदी में लिख पढ़ चुके हैं।

-तेजेन्द्र शर्मा, संपादक, पुरवाई-
“मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने आरंभ में सच नहीं बोला, जबकि मैं हिरासत में था। मगर मैंने एक माह से ज़्यादा उसे छुपाए रखा। इस संसार में इज़्ज़त से बढ़कर और कुछ नहीं होता और कोई नहीं जानता कि सच को ज़ाहिर करने का सबसे उपयुक्त समय भी कौन-सा होता है।
“महाशय, मैं बेगुनाह हूँ। मैंने अपने भाई अब्दुल हमज़ा की पत्नी फ़रहा को क़त्ल कर दिया, क्योंकि वह एक बदचलन औरत थी। मैंने उसे रंगे हाथों पकड़ा था और फिर मैं अपने अरब संस्कार से प्रभावित होकर अपने होशो-हवास खो बैठा था। पवित्रता बहुत मूल्यवान चीज़ होती है। उसके धब्बे को खून से ही धोने का रिवाज है। इसलिए मैंने अपनी शिकारी बंदूक़ भरी, जिसका मुआयना आप कर चुके हैं और उसे फ़ौरन गोली मार दी। अगर आप उसके प्रेमी के बारे में जानना चाहते हैं तो मुझे शुरू से इस कहानी को बयान करने की इजाज़त दी जाए।
“जैसा कि आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। मैंने उनको इकट्ठा नहीं देखा। दरअसल वह सुबह सुर्ख व सफ़ेद रंग का चोग़ा पहने हुए हम सबके लिए नाश्ता पकाने के लिए कमरे से निकलकर तंदूर के पास पहुँची थी, ताकि उसे रौशन कर हमारे लिए रोटियाँ सेंक सके। उसने स्वयं यह बात मुझसे कही थी कि चूँकि उसने गुनाह किया है। इसलिए वह खुद को मार डालना चाहती है। उसने तंदूर में आग जलाई और उसमें चंद गोलियाँ फेंकने की तैयारी की। यह देखकर मेरा ख़ून मेरी रगों में जोश मारने लगा और मैंने राइफल उठाई, निशाना बाँधा और उसे मार दिया। इज़्ज़त अनमोल होती है। हम अरब हैं। अपने ऊपर बेहयाई का दाग़ नहीं लगने देते हैं और बदचलनों को ज़्यादातर ख़त्म कर दिया जाता है। क्योंकि पानी एक गंदगी की तरह होता है और गंदगी की सफ़ाई होना बहुत ज़रूरी काम है। फ़रहा ने ख़ुद तस्लीम कर लिया था कि उसने अपने शौहर की गिरफ्तारी के बाद, उसकी गै़र हाज़िरी का फ़ायदा उठाते हुए, रात के अंधेरे में अपने यार को अपने साथ सोने को कहा था। मैंने तो सिर्फ़ अपने ख़ानदान की इज़्ज़त पर बट्टा न लगने की वजह से ऐसा क़दम उठाया था। मैं मजबूर था आख़िर इसका शौहर मेरा भाई है और यह मेरी भाभी है। इसने इस बुरे काम के लिए अपने आशना को समय देकर अपनी जवानी और ख़ूबसूरती का नाजायज़ इस्तेमाल किया था। इसलिए कि वह शहद की रंगतवाली आँखों और आकर्षक चेहरेवाली केवल उन्नीस वर्ष की औरत थी। इस तरह हर चीज़ ख़त्म हो गई।
“मेरी बहन हलीमा ने कुछ नहीं देखा। मैं पवित्र कुरआन पर हाथ रखकर कहता हूँ…कि वह मेरे साथ थी, मगर इस जुर्म में शामिल नहीं थी। वह घर के एक दूसरे हिस्से में थी। मैं अदालत को अपनी ख़ानदानी स्थिति से अवगत करना चाहता हूँ।
“हम ग़रीब लोग हैं। कई कमरों वाले कच्चे घर में हम सब इकट्ठा रहते हैं। मेरे भाई अब्दुल हमज़ा का कमरा पूर्व दिशा में है। उससे सटा मेरी वालिदा का कमरा है। फिर सिलसिलेवार दूसरे लोगों के कमरे हैं। मेरी शादी को दस साल हो चुके हैं और मैं चार बच्चों का बाप हूँ। मैं फ़ौज में था, जहाँ मैंने सार्जेंट के ओहदे से तरक़्क़ी पाई। मेरे ख़िलाफ़ कभी कोई मुक़दमा दायर नहीं हुआ। तंदूर मेरी बहन हलीमा के कच्चे कमरे के बिलकुल साथ आँगन के बीचोबीच में बना हुआ है। मैं अदालत को यह बताना भूल गया था।
“घटना के दिन सुबह के समय मेरी बहन ने मुझे जगाया। मैं उस वक़्त तक उठ गया था। और मुझे इस बात पर भी यक़ीन है कि मेरी ख़ाला नूरिया ने जो मेरे भाई की पत्नी के साथ थी, गोलियाँ चलने की वजह जाननी चाही थी। मैं मालूम करने गया तो मैंने फ़रहा को तंदूर के पास गिरे हुए पाया और गोलियाँ आतिशदान में धमाके से फट रही थीं। जनाब वाला ! यह मेरे शहादती बयान की संक्षिप्त कहानी है, जो आप ख़ुद महसूस कर रहे हैं कि यह सच्चाई से बहुत दूर है। मैंने ऐसा भूले से कहा है। जनाब मेहरबानी करके मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने अपना होश खो दिया था। इसलिए हर तरफ़ से आँखें बंद रखीं। दुर्भाग्य से सच्चाई को छुपाया या दबाया नहीं जा सकता है। उस रात जब मैं सोया हुआ था तो चार-पाँच बजे के क़रीब जब सुबह होनेवाली थी, मेरी बहन ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए मुझे पूरी तरह बेदार कर दिया कि उसने आँगन में किसी को गुज़रते हुए देखा है। मैं उठ बैठा और अपने माँ-बाप के कमरे की तरफ़ गया। वह अभी सो रहे थे। फिर मैं फ़रहा के कमरे की तरफ़ गया। मैंने उसे अकेला पाया। यह बात बाद में सामने आई कि हलीमा जो सत्रह साल की बेहद संवेदनशील लड़की है, ने आपके सामने क़सम खाते हुए कहा था कि उसने फ़रहा को एक अजनबी के साथ रंग-रलियाँ मनाते हुए देखा था। इसलिए वह मुझे जगाने आई थी और मैं मामले की छानबीन के लिए चल पड़ा था। उस समय मैंने फ़रहा को तंदूर जलाते पाया था। यही सच है। उस समय पौ फट रही थी और तंदूर लाल लपटों से भरा हुआ था। फ़रहा ने मेरी तरफ़ मुड़े बिना मुझे संबोधित करते हुए पाप, मर्यादा और आत्महत्या के बारे में कहा था। मैं उलझन में पड़ गया और क्रोधित हो उठा। तेज़ी से मैंने राइफल हलीमा के हाथ से छीनी और उसका रुख़ फ़रहा की तरफ़ किया और ट्रिगर दबा दिया।”
“उसकी लाश के पास पाई गई राइ‌फल से केवल एक फायर किया गया था। राइफल में सिर्फ एक ही गोली भरी थी। यही एक वजह है कि वह इकलौती गोली उसके  सर में जा घुसी थी। मुझसे यह हरकत केवल ख़ानदान की इज़्ज़त बचाने उसके रस हुई थी। जनाब वाला! आपसे मेरा निवेदन है कि मेरी स्थिति को समझते कुए मेरे ख़ानदान पर रहम किया जाए। मैं एक कम पढ़ा-लिखा बेचारा इंसान हूँ और सार्जेंट रह चुका हूँ। मैंने उसे सिर्फ़ इसलिए क़त्ल किया कि वह वफ़ादार नहीं रह गई थी। आपने जान लिया है कि उसने अपने गुनाह को मेरे सामने कुबूल कर लिया था। वह तंदूर के सामने खड़ी इस बात का ऐलान कर रही थी। और हम सबकी इज़्ज़त पर धब्बा लगा रही थी। नूरिया का यह बयान कि वह सारी रात फ़रहा के कमरे में रही कोई महत्त्व नहीं रखता है। वह असंतुलित व्यवहार वाली औरत है, फिर सबसे बड़ी बात यह कि मरनेवाली ने ख़ुद अपने गुनाह को मेरे सामने मान लिया था। एक और बात कि मेरी बहन हलीमा ने उसे ऐसी शर्मनाक हालत में देख लिया था, जो क़ानूनी और नैतिक रूप से ग़लत थी। उसने अपने शौहर के न रहने पर, स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए यह हरकत अपने आशना के साथ की, जबकि हम सब उस रात भाई की गिरफ़्तारी को लेकर बेहद चिंतित थे। उसने उस अपराधी के साथ मुलाक़ात करने की हिम्मत की। मैं कोई सभ्य व्यक्ति नहीं हूँ बल्कि अपने व्यवहार में काफ़ी खुरदरा व्यक्ति हूँ। मैं अपनी हैसियत को जानता हूँ। हालाँकि मैं सिर्फ़ तीस साल का हूँ, फिर भी मैंने फ़रहा को यह अच्छी तरह समझा दिया था कि इस तरह की हरकत हमारे ख़ानदान में माफ़ी के क़ाबिल नहीं है। हम सम्मानित और पुराने विचारों वाले बददू हैं। जो इस तरह की जगहँसाई सहन नहीं कर पाएँगे।
 “मैंने हर तरह से उसे यक़ीन दिलाने की कोशिश की थी कि इस तरह के आरोपों से दूर रहे, लेकिन वह एक दीवाने इंसान की तरह बेहिस हो चुकी थी। मैंने उसे इसलिए कमरे में जाने दिया ताकि वह अपने स्वभाव में नर्मी ले आएगी। जो कुछ हुआ मैंने उसके बारे में हलीमा को बता दिया था। इस घटना को मैंने अपने दिमाग़ से मिटा दिया। मैंने अभी अपनी बात ख़त्म भी न की थी कि गोली की आवाज़ सुनाई पड़ी। मैं फीकी रौशनी में नहाए आँगन की तरफ़ गया। जहाँ तंदूर के शोले बुलंद हो रहे थे। नूरिया ने मुझ से गोली चलने के और फ़रहा के बारे में पूछा और मैं उसे धक्का देकर भाग कर अपने भाई के कमरे की तरफ़ गया। जहाँ मैंने उन दोनों को एक साथ देखा। वह या तो क़त्ल कर दी गई थी या फिर उसने आत्महत्या कर ली थी।
“मैंने पिस्तौल ली और हलीमा के साथ उसके कमरे में वापस आया। मैं एक बार फिर सच्चाई से हट रहा हूँ। जनाब यह हमारी फ़ितरत है। ऐसी फ़ितरत जिसके आप आदी नहीं हैं और आप उसे सहन नहीं कर सकते हैं। हम किसी एक बिंदु पर टिके लोग नहीं हैं। हम एक विषय शुरू करते हैं कि उसे बीच में छोड़कर किसी और दिलचस्प और जोशीले मौज़ूँ की तरफ़ मुड़ जाते हैं। फिर किसी तीसरे की  तरफ,ऐसा विषय जो हमारे दिल को  भाता हो । हम ऐसे खुरदुरे लोग है जो अमन के साथ रहना पसंद करते हैं। हमारी इच्छा शांति से रहने की है लोग है,  हमारे बारे में बयान की जानेवाली ज़्यादातर कहानियाँ बेबुनियाद होती हैं। आगे एक बात और कहना चाहता हूँ जो पहले भी कई बार दोहरा चुका हूँ कि मैं एक बेगुना आदमी हूँ और जिसने अपने सम्मान की ख़ातिर एक इज़्ज़तदार आदमी की तरह अपने ख़ानदान की आबरू बचाई है। ख़ासकर तब जब उसके चार बच्चे हों और एक बड़े  ख़ानदान का बोझ हो। प्रतिष्ठा बाँटने वाली  चीज़ नहीं है, चाहे वह बदलचनी हो या फिर कोई घटना। अपनी पाकदामनी को सुरक्षित रखना ही हमारा लक्ष्य है और हम इसकी रक्षा अपने ख़ून देकर भी करने के आदी हैं। मैंने ऐसा ही किया। आपके सामने ऐसी पेचीदा स्थिति का ख़ुलासा देना बहुत कठिन काम है, क्योंकि मैं एक अनपढ़ बद्दू हूँ।
“हमारा एक ख़ानदान है। मेरा भाई अब्दुल हमज़ा और उसकी स्वर्गवासी पत्नी घर के एक हिस्से में रहते थे। उसके अगले हिस्से में मेरे माँ-बाप और मैं रहता हूँ। मेरे साथ मेरे बीवी और चार बच्चे भी रहते हैं। और फिर कुएँ के साथ वाले कमरे में मेरी बहन हलीमा रहती है। तंदूर आँगन के बीचोबीच है। घटना वाली रात को मेरा भाई गिरफ्तार हुआ था। उसने मेरे समझाने के बावजूद खेती सुधार क़ानून मामले में कुछ हेराफेरी की थी। जिसकी वजह से वह गिरफ़्तार हो गया था। ख़ाला नूरिया मेरी भाभी के साथ सोने आई। ये सच्चे और साफ़ सबूत हैं। फिर मरनेवाली के जान-पहचान का आदमी घर में चोरी-छुपे दाखिल हुआ। सही वक़्त का हमें पता नहीं। शायद आधी रात या फिर उसके बाद। बहरहाल खानदान की प्रतिष्ठा दाँव पर लगा दी गई। सुबह नाश्ते तक, रोटी पकाते वक़्त तह हालात ठीक थे। फिर वह शर्मनाक रहस्य सामने खुल गया। फ़रहा ने रात को शौहर के साथ धोखा किया था। सुबह उठने पर उसने दूसरों के सामने मुस्कुराते हुए अपने आपको यूँ पेश किया जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन वह अपने अपराध को छुपा न सकी। अपनी पथराई हुई आँखों और बिखरे हुए बालों ने सच उगल दिया कि वह इस घर की इज़्ज़त को बचाने के लिए अपने आपको ख़त्म कर लेगी। हलीमा ने हाजिरजवाबी का सबूत दिया और फ़ौरन कहा कि उसने किसी गैरआदमी के साथ उसे बिना कपड़ों के देखा था। कड़वी सच्चाई को खुलते देख वह घबरा गई और अपने मुँह को हाथों से छुपाती हुई कमरे से बाहर की तरफ़ भागी। मेरे सामने कोई उपाय न था, सिवाय उसके खून से इस कलंक को धोने के।
“जनाब वाला! हम बद्दू ऐसी परिस्थितियों में ऐसे क़दम उठाने पर मजबूर होते हैं। मैंने लिबास उठाया और अपनी शिकारी राइफल उठाई चला आया। जैसाकि मैंने पहले बताया था कि अभी सुबह हुई ही थी। वह तंदूर सुलगा रही थी। वहाँ हम अकेले थे। उसने साफ़ शब्दों में अपने को खत्म करने का इरादा ज़ाहिर किया था। क्योंकि वह अपनी बदचलनी की वजह से बच नहीं सकती थी। मुझे उसकी हत्या करने के अलावा कोई और रास्ता न दिखा। बाद में हलीमा ने चतुराई से कुछ गोलियाँ तंदूर में डाल दीं, जिनके फटने के शोर से घर के सभी लोग जाग गए। जनाब वाला! यही सच्चाई है। हलीमा के ऊपर लगाए गए सारे आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं।
“नूरिया ने फ़रहा के साथ सारी रात रहने की झूठी बात कही थी। यह भी झूठ कहा था कि उस रात घर में कोई घुसा न था। किसी ने फ़रहा के साथ मुहब्बत भरे पल नहीं गुज़ारे थे। उससे पूछा जाए कि यह फिर कैसे मुमकिन हुआ कि उसने सुबह सवेरे फ़रहा को जागते हुए और पाकदामन लोगों की तरफ़ उसे ग़ौर से देखते पाया? किसने उसे नाश्ता तैयार करने, रोटी पकाने या तंदूर गर्म करने को कहा था? या फिर उसने दरपर्दा आदमी के बगैर, शौहर की गैरहाज़िरी में, अपने आप यह सब कुछ किया था तो फिर वह हलीमा के कमरे में क्यों दाखिल हुई? जबकि हमेशा ही नाश्ता तैयार करने में वह उसकी मदद करती थी?
“नूरिया का यह इल्ज़ाम कि उसने फ़रहा को मेरी तरफ़ उँगली से इशारा करते हुए देखा था… झूठ है… और यह कि मरते वक़्त उसने न समझ में आनेवाले कुछ शब्द बोले थे… झूठ है… ये दोनों बातें झूठ हैं। यह सब मूर्खतापूर्ण बातें हैं। मैंने फ़रहा को तंदूर के पास से जहाँ उसने अपने को मार डाला था। उसे घसीटकर उसके कमरे में लाया और उसके बाद इसके साथ मैं पहली वाली जगह वापस आ गया। यह सिर्फ़ मैं जानता हूँ कि कहाँ गिरी थी और कहाँ मरी थी।
“रिपोर्ट में जो यह कहा गया है कि वह एक गोली से मरी है, वह झूठ है। मैने ट्रिगर दबाया था और उस पल अपने हाथ में पकड़े हुए हथियार से मैं पूरी तरह आगाह था। हलीमा इस दुर्घटना में शामिल नहीं है… जो कुछ उसके बारे में कहा गया है, ग़लत है। मैं निवेदन करता हूँ… अगर आप जानना चाहें तो यह मैं हूँ, जिसने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए बदकार को हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया था।
“महाशय! मैं बेगुनाह हूँ। आप अपना फ़ैसला सुनाते हुए मुझ पर रहम करें। मैंने यह जुर्म एक नेक और शानदार मक़सद के लिए किया है। इसलिए इंसाफ़ से काम लें और मेरी सज़ा को कम कर दें। कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मेरी गैरहाज़िरी पर अफ़सोस करेंगे… यक़ीन करें… यह मेरे कर्मों का फल है।
“यह सच है और सच के सिवा कुछ भी नही!”
***
लेखक परिचय
फ़व्वाद तीरकली इराक़ के  महत्वपूर्ण लेखक हैं। उनकी कहानियों में जीवन की पेचीदगी एक अलग शैली में उभर कर आती है।
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