Saturday, May 18, 2024
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वन्दना यादव का स्तंभ ‘मन के दस्तावेज़’ – बोझ कम से कम

यात्रियों के लिए वैश्विक स्तर पर सलाह दी जाती है कि अपने साथ कम से कम सामान रखें। ज़रूरत की हर चीज़ साथ हो मगर बगैर ज़रूरत का कुछ भी नहीं। यात्रा में गैर-जरूरी सामान ले जाना, यानी आप बेवजह का बोझ उठाए हुए है। अपने साथ या अपने शरीर पर ऐसे सामान को ना ढोएं जिसकी आवश्यकता नहीं है। सफर पर रहते हुए आवश्यक और अनावश्यक सामान के बीच का फर्क समझने की समझ पैदा करें।
युवाओं के लिए लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है। ऐसा नहीं करते हुए, वे किसी अन्य दिशा में व्यस्त हैं तब यह भटकाव है। काम तो बहुत किया मगर उस समय आवश्यक कुछ और था। यानी गहन तैयारी के वक्त आपने बोझ उठाया, जबकि बोझ कम रखना था। तैयारी सही दिशा में करनी थी।
मन में अनावश्यक विचारों को बनाए रखना मन-मस्तिष्क पर बोझ है। कड़वी बातें, कड़वा बोलने वाले लोगों के साथ बिताया समय, मन-मस्तिष्क पर बोझ है। यह बोझ पीठ पर दिखाई नहीं देता मगर इसका वजन समूचे व्यक्तित्व पर असर करता है। सोच और विचारों को प्रभावित करने वाला बोझ, जीना दुश्वार कर देता है, इससे बचना सीखें।
हर तरह के अनावश्यक बोझ को छिटक दें। शरीर पर, मन पर जितना कम से कम बोझ होगा, यात्रा उतनी ही सुखद रहेगी। कहा जाता है कि सवारी अपने सामान की स्वयं जिम्मेदार है। इसी तरह अपनी-अपनी यात्रा को सुखकर बनाने के लिए भी आप स्वयं ही जिम्मेदार हैं। जीवन एक यात्रा है। इस पर चलते हुए अपने प्रति जिम्मेदार बनें। चिंताओं, आशंकाओं और हतोत्साहित करने वाली यादों के ना-दिखाई देने वाले बोझ को समझें। इससे दूर रहने का अभ्यास बना लें। बोझ जितना कम होगा, जीवन उतना ही  सुगम हो जाएगा। दिखाई देने वाला बोझ शरीर को थकाने का काम करता है जबकि दिखाई ना देने वाला बोझ, समूचे व्यक्तित्व को पंगू बना देता है। अपने लिए तरक्की चुनें। आगे बढ़ते हुए सामान जितना कम से कम होगा, यात्रा उतनी ही सुगम होगी और दूर तक जाएगी।
वन्दना यादव
वन्दना यादव
चर्चित लेखिका. संपर्क - yvandana184@gmail.com
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