गृहस्थी

 

घर बनाने के लिए

बहुत कुछ मिलाना पड़ता है

इंट,गारा,सीमेंट के

कच्चे तत्वों को एक कर

बनानी पड़ती है

एक मजबूत छत

 

आँसू,हास,त्याग

सुख-दुख

न जाने और भी

बहुत कुछ मिलाकर

बनता है घर

 

रंगबिरंगी,आसमानी छवी

झलकती है गृहस्थी में

धुपछाँहीं खेल में

कभी छिपना और कभी

बाहर आना पड़ता है।

 

कैमरा मुँह बाए

खड़ा रहता है

घर-घर की

चहारदीवारी में

छलनामयी बनती है

माहिर अदाकारा

 

घर बनाना एक

मुश्किल काम है

उससे भी मुश्किल है

घर बसाना

 

झूठ और सच के

शहतीरों को जोड़कर

कड़ियों का सहारा लेकर

दोनों की समझदारी से

घर चलाना पड़ता है।

 

नमक

 

बड़ी मामूली सी

चीज है वह

नमी को सहने की

सलाहियत उसमें

न के बराबर है

 

पानी में पड़ जाये

तो उसका अस्तित्व

न के बराबर रह जाता है

फिर भी बना रहता है

उसी का बोलबाला

बगैर उसके

दुनिया फीकी है

खाना नहीं उतरता गले से

और इंद्रधनुष में

रंग नहीं चढ़ता

 

उसके लेप से

आदमी नमकीन लगता है

उसके वर्चस्व को

मानना पड़ता है

किसी के यहाँ उसे

एक वक्त खा लो तो

नमक हरामी करने से पहले

सौ बार सोचना पड़ता है

मगर चालीस चोर के

सर्दार अलीबाबा जैसे

कितने होते है

नौजवान नमक हलाली को

धुएँ के छल्लों में

उड़ा देता है या

गुटखे का पैकेट

समझकर फेंक देता है।

 

नमक आंदोलन के नाम पर

गाँधीजी ने थमायी

स्वाभिमान की पोटली

चिंगारी सुलगकर दौड़ा

नसों में लावा बनकर

 

नमक का स्वाद भूलकर

महज सोने के हार की खातिर

पहरेदार ने किया

मालकिन का कत्ल

अखबार ने दिखायी

निस्पंद एक माँ की तस्वीर

चंद रूपये न मिलने पर

बेटे ने उसके गले पर

किया कुलहाड़ी से वार

 

बुजुर्गों ने रटाया

नमक और माँ के दूध की कीमत

चुकायी नहीं जा सकती

इंसान का जेहन मगर

कमजोर होने लगा है।

 

अंजुमन आरा - दो कविताएं 3

Dr.Anjuman Ara, Associate Professor, Department of Hindi, Ravenshaw University, Cuttack-753003, Odisha, Email ID: anjuman786ara@gmail.com

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