त्रिनेत्री  

 

    मैंने गीली रेत पर उसका नाम लिखा ‘अमृता…’ अपने ही नाम को वह यूँ देखने लगी जैसे कोई अनोखा चित्र मैंने रेत पर बना दिया हो| जिसे देख वह विलुप्त हुई किसी प्रजाति के बारे में सोच रही हो|उसे अपने नाम पर ही यक़ीन नही हो रहा था|उसने अपने साथ की औरतों को बुलाया और ज़मीन पर लिखा अपना नाम दिखाने लगी,खूब हँसने लगी,जैसे हाथी को देख रही हो पहली बार| बाकी औरतें घूँघट में यूँ शर्मा रही थीं, जैसे मैंने नाम नही लिखा हो बल्कि कोई अतरंगी चित्र बना दिया हो,जिसे देख उन्हें कौतूहल के साथ लज्जा आ रही हो|जब मैंने बाकी औरतों से उनके नाम पूछे और उनका नाम भी लिखने को कहा तो वे सब शर्माते हुए  हँसने लगीं|कुछ तो इठलाती हुई ‘धत्त’ कहकर लंबे घूँघट में छिप गयी।अमृता बड़ी देर तक रेत पर लिखे अपने नाम की गीली लकीरों को अपनी सूखी उँगलियों से सहलाती रही| उसे देखकर लग रहा था जैसे वह किसी पुराने दर्द को सहला रही हो, मीठी आह भर रही हो, जैसे उन लकीरों से उसकी कोई तृष्णा तृप्त हो रही हो,उसकी आँखों में आंसूं थे और कांपते होठ मुस्कुरा रहे थे| मैं उसके कल्पना लोक में विघ्न नही डालना चाहती थी, बस इसीलिए बाकी सब से बात करती रही लेकिन मेरा ध्यान तो बस अमरीतिया यानि आज की उस अमृता पर था जिसे मैं कभी-कभी अमृता कहती हूँ,वही अमृता आज खोयी थी एक ऐसे कल्पना लोक में जहाँ वह थी वैसी, जैसी वह होना चाहती थी, वह खोज रही थी ख़ुद को बिलकुल वैसे,जैसे खोजना चाहती थी। मेरे संग हँसी- ठठ्ठा करती हुई लडकियाँ कब घूंघट में छिपकर गायब हुई मेरा ध्यान ही नही गया उस ओर| मैं कहीं खोयी थी| जब मैंने पायलें छनकती ध्यान से सुनी तो दूर रेत पर बनते हुए सुन्दर पदचिन्हों पर ध्यान दिया | वो पदचिन्ह रेत में घुलते जा रहे थे…गुज़रते समय की तरह…अमृता ने कंधे पर हाथ रख कर कहा,”दीदी,अभी देखना पानी की लहर आएगी और तुम्हारा लिखा ये नाम जो मेरा है, जिसे बस मैं जानती हूँ कि ये मेरा है ये भी मिट जायेगा…” इतना कहकर अमरीतिया भी घूँघट में छिप गयी और हल्की हंसी हँसने लगी|हँसते हुए उसकी आवाज़ भारी हो गयी थी,उसकी पलकें भीग गयी  थीं|उसकी हँसी का एक तिनका मेरी आँखों में गड़ गया और एक लहर ने मेरे उस ख़याल पर पानी फेर दिया जिसमें अमरीतिया पल भर के लिए ‘अमृता’ बन गयी थी | जब मैंने पीछे पलटकर रेत पर देखा तो मिट चुका था रेत पर लिखा उसका नाम ‘अमृता’|नदी की तेज़ धारा उस नाम को अपने साथ बहा ले गयी थी दूर बहुत दूर|

 “दीदी,जब तुम मुझे ‘अमृता’ कहती हो तो बहुत अच्छा लगता है,लगता है जैसे कोई सिर्फ़ मुझे बुला रहा हो, लेकिन जब कोई ‘अमरितिया’ कहता है तो लगता है कि बस चंदनवा की मेहरारू को कोई आवाज़ दे रहा है या गनेसा – राजबाला की पतोहू को|पहले जब अम्मा कभी प्यार से ‘अमृत’ कहती थी, तब भी बहुत अच्छा लगता था|उसके बाद तुम्हारा ‘अमृता’ कहकर मुझे बुलाना सबसे अच्छा लगता है” कहते-कहते अमृता चुप हो गयी उसकी चुप्पी में भी अथाह सागर की लहरों शोर था| “अच्छा ! तुमको मुझसे अपना नाम सुनना इतना अच्छा लगता है…?” “हाँ दीदी! बहुत अच्छा लगता है…” अमृता फूल की तरह खिल गयी|“तो ठीक है, मैं तुमको एक ऐसी जगह पर लेकर जाउंगी,जहाँ पर चारों दिशायें,ये धरती ये आसमान सब मेरे साथ तुमको ‘अमृता’ कहकर पुकारेंगे |”मैंने कहा| “बाप रे बाप, ए दीदी! ऐसी कौन सी जगह है…?” कहते हुए अमृता का मुंह खुला ही रह गया| “है एक जगह पहले चल जल्दी से जीप में बैठ,नहीं तो हम टाइम पर नहीं पहुच पाएंगे होटल, देख तो सारी लड़कियाँ जाकर जीप में बैठ भी गयी|”अमरीतिया यानी अमृता इतना सुन मेरे आगे-आगे चल दी.आदतन उसका घूँघट फिर से उसके माथे तक आ गया था| “अरे! यहाँ किससे मुंह छिपा रही है? यहाँ कौन तुझे पहचानता है?”मैंने कहा|

    मेरी बात सुन अमरितिया दांतों तले जीभ दबाकर हल्का सा मुस्कुरा दी| बिल्कुल वैसे जैसे वह अपनी किसी खोयी चीज़ को कहीं और खोजती हुई उसके सही स्थान के याद आ जाने पर अपनी जीभ को दांतों तले दबाकर मुस्कुरा देती है|उसने घूँघट को सिर से हटा दिया|सीधे पल्ले की साड़ी का उसका धानी घूँघट उसके माथे से हट गया था और कमर पर जाकर लटक गया|उसकी पीठ पीछे से दिखाई दे रही थी, जिसे अमूमन वह छिपाती रहती है|ब्लाउज की नई डिजाईन दिखने लगी थी, जिसे उसने खुद बनाया था, इस बार एनजीओ में आये कपड़े से बचे हुए टुकड़े से|सुंदर डिजाईन और कढ़ाई वाला ब्लाउज पहनकर उस रात अमरितिया ने खीर बनाई थी,चंदनवा के लिए, सोचा था उसे अपने ब्लाउज की डिजाईन दिखाएगी,अपनी कला दिखायेगी| यही सब सोच वह देर रात तक बाट जोहती रही थी चंदनवा की,लेकिन चंदनवा आधी रात आया, नशे में धुत, ताड़ी उसके सिर पर सवार थी और वह अमरितिया के बदन पर आते ही सवार हो गया था|ब्लाउज तो चंदनवा ने भोर में देखा था वो भी तब जब उसके पैर में ब्लाउज की डोरी फस गयी थी|

    उसी ब्लाउज की सुंदर डिजाईन की खूब तारीफ करती हुई जब औरतें एनजीओ में डिजाईन के बारे में पूछ रहीं थीं तो अमरीतिया जले दूध सा मुंह बनाते हुए बीती रात की सारी बात फूलो और सुशीला को बता रही थी| इस बात को सुनकर सब हंस रही थीं| उन सबके तन-मन में कोई रोमांच दौड़ गया था| जैसे इस बात में उनको अपनी जिंदगी का कुछ याद हो आया हो| कुछ असहज नहीं लगा किसी को| लेकिन अमरितिया के लिए चंदनवा की हरकत सहज कतई नहीं थी|मैं जानती हूँ अमृता पर क्या बीती होगी? लेकिन उस बीते हुये की सही परिभाषा शायद अमरितिया के पास नहीं है इसलिए वह अभी किसी भंवर में खोयी है|मैंने अमरीतिया को आवाज़ दी और उसे नया डिजाईन दिखाते हुए, नये कपड़े के कुछ पीस पकड़ा दिए अमरितिया से चुहल करती सभी लडकियाँ चुप होकर अपने काम में लग गयीं थी और चुहल पर विराम लग गया था|

    अब अमरितिया अपने ब्लाउज को सीधे पल्ले की साड़ी के घूँघट को माथे से हटा चुकी थी|आज वही ब्लाउज मुझे बिल्कुल करीब से दिखाई दे रहा था, उसका वो नया डिजाईन भी,खुली पीठ पर उभरे हुए मार-पीट के निशान भी| वह आगे- आगे चल रही थी इस बात से बेखबर कि मैं उसकी पीठ पर उसकी जिंदगी की कहानी पढ़ रही थी|हम जीप के पास आ चुके थे| उसने पलटकर मुझे देखा | मेरी आँखों की पुतलियों में उसने शायद अपनी पीठ के निशान देख लिए थे जो मेरे मन और आँखों दोनों पर छप गये थे| झट से उसने कंधे पर साड़ी का पल्लू चढ़ा लिया और लपक कर जीप में बैठ गयी.मैं भी बैठ गयी | रामेश्वर ने जीप चला दी | हरे रंग की ये खुली जीप जिसमे आगे मैं थी ड्राईवर सीट पर रामेश्वर बैठा था और पीछे की सीट पर फूलो,गीता,पारो,सुशीला और अमरितिया| हम एक सप्ताह के लिए नेपाल जा रहे थे हैंडी-क्राफ्ट मेला में अपना स्टाल लगाने| इस मेले में इन लड़कियों को ले जाने के लिए मुझे बहुत पापड़ बेलने पड़े थे |तरह-तरह से इन सबके घरवालों को समझाना पड़ा था| आख़िरकार यहाँ तक आकर मैंने किला फतह कर लिया था|मुझसे भी ज्यादा खुश थीं ये लडकियाँ और सबसे ज्यादा खुश थी अमरितिया उसे इतना खुश मैंने पहले कभी नहीं देखा था, अपना पहला मासिक वेतन लेते समय भी नहीं|मुझे उसमे कोई सोया हुआ आक्रोश दिखाई देता,उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखे मुझे बहुत रहस्यमयी लगती हैं ,उसके माथे पर पड़ते तीन बल मुझे त्रिलोकीनाथ के माथे की छाया प्रतीत होते,और कभी कभी मुझे इन तीन रेखाओ के बीच एक ‘तीसरी आँख’ दिखाई देती है,जो अभी बंद है |

      मैंने एक बार उससे कहा था, ‘अमृता! तू मुझे गुस्से में बिल्कुल भोले नाथ सी लगती है और तेरे माथे पर मुझे एक ‘तीसरी आंख’ दिखाई देती है|’ उस दिन भी अमृता ऐसे ही हंस दी थी जैसे आज रेत पर अपना नाम लिखा देखकर हंसी थी|जीप चल रही थी मैं इन लड़कियों के बारे में सोच रही थी|लड़कियाँ, हाँ ये सब लड़कियाँ ही तो थीं जो पन्द्रह –सोलह  साल की उम्र में ब्याह दी जाने के बाद अब औरत बना दी गयी थीं| मेरा मन इन्हें औरत मानने को कभी तैयार नही होता, मैं इन्हें नाम से ही बुलाती हूँ और जब किसी और से इनकी बात करती हूँ तो औरत की जगह इन्हें लड़की की संज्ञा देना ज्यादा पसंद करती हूँ|लड़कियाँ एक सूती साड़ी नदी से धोकर उसका पानी खूब निचोड़ कर लायी थी जिसे उन्होंने तीन परत करके खुली जीप के मोटे डंडों में बांध दिया था,उससे छनकर ठंडी हवा आ रही थी| रामेश्वर इस सूती साड़ी के महीन धागों से छनकर आती ठंडी हवा में मस्त हो कोई गीत गुनगुनाने लगा था जिसे सब लड़कियाँ बड़े ध्यान से सुन रही थीं और उससे अठखेलियाँ करने लगी थीं |सफर हँसते गाते बीत गया था हम काठमांडू के उस होटल पहुँच चुके थे जहाँ हमें ठहरना था| अगले दिन से मेले में हमारा स्टाल लगना था| हमारा सामान भी दूसरी गाड़ी से आ चुका था| सबने आराम किया और शाम को अगले दिन क्राफ्ट मेले में स्टाल पर लगाने के लिए सामान को तैयार कर लिया|अगले दिन बाज़ार सज चुका था हमारे एनजीओ के स्टाल पर मैं सब लड़कियों के साथ सामान लगवा रही थी| सारी लड़कियां अपने-अपने डिजाईन स्टाल पर सजाते हुए आत्मविश्वास से लबरेज़ थी|मैंने सब लड़कियों को कह दिया था कि अपने काम और डिजाईन को कस्टमर के सामने उन्हें स्वयं ही बताना है| जब कस्टमर की भाषा अंग्रेजी होगी तब मैं उनकी भाषाई मदद करुँगी, बस | ऐसा मैंने इसलिए कहा था क्योंकि मैं जानती थी कि अपने काम से जुड़े अहसास बताते हुए उन सब लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और उनकी बनाई चीज़ के बारे मे उनसे बेहतर कोई और नहीं बता पायेगा|इन बातों,अहसासों और अपने काम को बताते दिखाते हुए अमृता बहुत जल्द मेले में अपने स्टाल के अलावा बाकी लोगों में भी चर्चित हो गयी | लोग अमृता की बातों और उसके काम के दीवाने हो गये | अमृता बाकी लड़कियों की भी मदद करती, उन्हें बताती कि ऐसे बताओ, वैसे बताओ, अपना काम इस तरह दिखाओ| लड़कियाँ भी अमरीतिया का सहयोग पाकर अपने काम को और अच्छे से बता समझा पा रही थीं |

      मैंने देखा सब लड़कियां बाकी दूसरे स्टाल की लड़कियों को सजा संवरा देख, स्वयं भी खूब बन संवर कर तैयार होकर अपने स्टाल पर आतीं|अमृता भी सज संवर कर रहती|हमारा स्टाल मेले में रौशनी बिखेर रहा था| गाँव की अनपढ़ लड़कियों के बनाये खूबसूरत परिधान और कलाकृतियाँ देशी-विदेशी सबको खूब पसंद आ रहे थे जिनमें अमृता के बनाये डिजाईन अपनी अलग ही छाप छोड़ रहे थे|लोग सामान लेने के साथ ही हमारे संग तस्वीरें भी लेते|कुछ अख़बार और न्यूज़ चैनल हमारे स्टाल की विडियो और फोटो शेयर करते| होटल के कमरों में अख़बार और न्यूज़ चैनल पर खुद को देख सब लड़कियाँ बेहद खुश थीं|अब तो उन्हें कुछ अंग्रेजी के शब्द भी याद हो गये थे जैसे, वेलकम मैडम!, वेलकम सर!,प्लीज! कम हेअर मैडम/सर, सी दिस…,थैंक यू फॉर कमिंग हेअर|लड़कियों की अंग्रेजी की गलती पर, हाई स्कूल पास रामेश्वर खूब मुंह छिपाकर हँसता था,हंसी की चोरी पकड़ी जाने पर ‘अमृता एंड गैंग’ उसकी खूब धुनाई करती और मुझसे उसकी शिकायत लगाई जाती| लेकिन धुनाई और शिकायत के समय सबको ये ध्यान रहता कि ये रामेश्वर ही उनके वाहन का सारथि भी है,और यहाँ नेपाल में उनका ख़िदमतगार भी,क्योंकि वह नेपाल का ही रहने वाला है | बीच- बीच में कभी-कभी वह अपने घर के एक आध चक्कर भी लगा आता|उसने सबसे वादा किया है कि मेला खत्म होने के बाद एक दिन के लिए सबको घुमाने ले जाएगा|वहीं मैं अमृता को वो खास जगह दिखाने वाली हूँ जहाँ आवाज़ की गूंज चारों दिशाओं में एक साथ सुनाई देती है| शायद तब मुझे अमृता के माथे पर उभर आने वाली तीसरी आंख की वो छाया भी बिलकुल साफ़ दिखाई दे,जिसके होने या न होने की पहेलियों में मेरा मन लगभग हर दिन अमृता के चेहरे से सवाल जवाब करता है|

         मेला खत्म हो गया| बाज़ार में पहली बार लड़कियों ने अच्छी कमाई की थी और नाम भी खूब हुआ था| मुझे यकीन है एनजीओ को इससे बहुत फायदा होगा | सभी का आत्मविश्वास बढ़ गया था | अब मुझे यहाँ से लौटकर एक और क्राफ्ट मेले की तैयारियां करनी थी और बहुत सारा काम करना था|उससे पहले इन लड़कियों को घर, काम और स्वयं में ऐसा तालमेल बिठाना था जिससे वे सब काम सजहता से बिना हिचक कर सकें जो अब इनके लिए चुनौती था| मैं जानती हूँ ये सब आसान नहीं था उनके लिए|अमृता और बाकी लड़कियों को मैं वहाँ उस जगह पर लायी थी,जहाँ आकाश बिल्कुल साफ़ दिखाई देता है और बहते पानी में तैरती मछलियों का रंग भी| यहाँ बहुत ऊँचे और बहुत ठंडे पहाड़ थे| कई छोटे बड़े बादल सामने से आते जाते साफ़ दिखाई दे जाते|हम चलते -चलते पहाड़ की चोटी पर आ गये थे और थक भी गये थे| हमने चश्मे का पानी पिया हम शांत और शीतल हुए| पहाड़ चढ़ते हुए हमें पसीना आ गया था जबकि पहाड़ों पर काफ़ी ठण्ड थी| अमृता और बाकी लड़कियाँ चश्मे के पानी से अपना मुंह धो रही थीं,उन्हें देख यूँ लगता था जैसे अपने भीतर की किसी तृष्णा को इस अमृत से तृप्त कर लेना चाहती हों|उनके चेहरे पर सुकून था |मैंने पहाड़ की उस एक चोटी,जिस पर हम थे वहाँ से दूसरी चोटी की ओर देखते हुए तेज़ आवाज़ में उसका नाम लिया ‘अमृता’| मेरी आवाज़ सामने वाली चोटी से टकराकर वापस मेरी ओर आई| मैंने फिर नाम लिया ‘अमृता…’ चारो दिशाओं, धरती और आकाश से टकराकर ये नाम ‘अमृता’ गूंज रहा था|अमृता प्रतिध्वनियों में छिपे इस आवाहन को सुनकर गोल- गोल घूम रही थी| उसका मन केंद्र में था और वह अपने मन की परिक्रमा कर रही थी| उसके मन में अपने ही नाम की गूंज गहरी और गहरी होती गयी|मैंने अमृता के चेहरे को बहुत ध्यान से देखा | मुझे उसमें समुद्र मंथन जैसा कुछ प्रतीत हो रहा था, उसकी आँखों से अमृत की बूंदे बरस रही थीं|मैंने देखा,उसकी आँखों के बिल्कुल बीचो बीच माथे पर  ‘तीसरी आँख’ की छाया थी|इस पल उसका चेहरा नीला था|और ऐसा लग रहा था मानो उसके अंतस से कुछ वाष्पित हो रहा था|अमृता नीलकंठ लग रही थी| धीरे -धीरे वह छोटे बड़े बादलों से ढक गयी थी| मैंने फूलो और सुशीला का नाम पुकारकर ध्वनि बदल दी|बाकी सब ने भी अपने अपने नाम पुकारे| शायद अमृता ने अपने नाम का अमृत पा लिया था और मैंने उसके नाम का अर्थ|

      हम अगले दिन वापस बिहार, अपने गाँव आ गये थे|अपनी मेहनत की कमाई और सुनहरी यादे मन में लिए जब अमृता अपने घर पहुंची थी तो वहाँ उसने कुछ भी नया नहीं पाया था|सब पहले जैसा ही था | एक दिन आराम करने के बाद लड़कियाँ काम पर लौट आई थीं|एक दिन एनजीओ में एक कुरियर आया था जिसमें कुछ तस्वीरें थी जो क्राफ्ट मेले के आर्गेनाइजर ने भेजी थीं,जिसे वहाँ आये किसी विदेशी ने अपने कैमरे से खींचीं थी|एक तस्वीर में अमृता सबसे आगे खड़ी थी उसके पीछे बाकी सब औरतें|ये तस्वीर बहुत मोहक और प्रेरक थी| ऐसी ही कई अन्य तस्वीरें भी थीं फोटोग्राफर ने अपना पता और मोबाइल नंबर भेजा था| मैंने उसे कॉल करके धन्यवाद कहा था,उन सुन्दर तस्वीरों के लिए|मैंने सबको एक-एक तस्वीर दे दी थी घर में लगाने के लिए, लेकिन, मैं जानती थी कि शायद क में इतनी हिम्मत न हो कि वे इसे फ्रेम करके घर की दीवार पर टांग सके | फिर भी मैं ये जानती थी कि वे सब घर का कोई एक ऐसा कोना तो खोज ही लेंगी जिसमें यह तस्वीर छुपाकर ही सही, रखेंगी ज़रूर | अमृता ने भी बाकी सब की तरह एक छिपा हुआ कोना खोज लिया था जिसमें  उसने वह तस्वीर रखी थी|एक बक्सा उस प्यारी तस्वीर का घर हो गया था|और फिर उस दिन अमृता मेरे पास उस गहरी काली रात में भागी हुई आई थी|उसके बाल बिखरे थे, आंखें लाल और सांसों में भयंकर तूफ़ान था जैसे वह कोई तांडव करके आई हो| मैं बहुत घबरा गयी थी| मैंने रात अमृता से कुछ नही पूछा वह बहुत थकीहुई लग रही थी,आते ही सो गयी थी,चैन की नींद…जैसे बरसों बाद इतने चैन से सोयी हो|सुबह फूलो और सुशीला जब काम पर आई तो कहने लगीं,“मैडम गाँव में अफवाह है,अमरितिया पर देवी माँ आई थी रात, और उसने अपने मरद को एक हाथ से गर्दन पकड़कर ज़मीन से फुट भर ऊपर उठा दिया…पूरा घर पूजा पाठ में लगा है| चंदनवा तो देवी माँ की कसम खा- खा के गाँव भर को बता रहा है कि अब कभी ताड़ी- नशा नहीं करेगा|”मुझे ये सुन ठीक से कुछ भी समझ में नहीं आया|फूलो की बात सुन बाकी सब चंदनवा और उसके माँ बाप की हँसी भी उड़ा रही थीं और देवी माँ को धन्यवाद भी कह रही थीं जिनकी कृपा से अब अमरितिया का नशेड़ी पति सुधरने को तैयार था| अमरतिया भीतर मेरे कमरे से सबकी बातें सुन रही थी|वह कुछ डरी सहमी थी, मुझे सामने देख उठकर बैठ गयी|चाय के दो कप लिए मै अमृता के पास बैठ गयी|मैंने पूछा,“क्या हुआ था…?”उसने कहाँ,“दीदी, कल रात मुझसे सहा नहीं गया…और ‘तीसरी आँख’ खुल गयी…”  

 

त्रिनेत्री.______कहानी लक्ष्मी यादव 3

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