पीली दीवार

 

  • (कहानी – डॉ. सुषमा गुप्ता)
दीवार के पीछे झाँकता वो कंधा क्यों
याद रह गया ?
साथ में याद रहा
एक लैंड लाइन नम्बर, एक घर का पता , एक प्लास्टर ऑफ पैरिस से बना बुत , गूफ़ी कार्टून की एक वाॅल हैंगिग और सोलह की गिनती …
एक पीली टीशर्ट और नीली जींस भी।
उसके बाद सब स्याह था ।
लड़की ने उस धोखे के बाद चीख-चीख कर रोना चाहा पर उसके पास ऐसी कोई जगह न थी जहाँ वो ऐसा कर सके । उसे मालूम न था ,जो दर्द छुपा लिए जाते हैं वो गला कर सड़ाने की अद्भुत क्षमता रखते हैं ।
बैठे-बैठे चेहरा आँसुओं से कभी भी तर हो जाता । बात उसके हाथ से निकलने लगी। झूठ बोलने में निपुण तो थी नहीं, सो सवालों के जवाब भी न दे पाती थी ।
उसे मर जाना ज़्यादा आसान लगा। ज़िंदगी ज़हर से ज्यादा कड़वी होती है ये सच उसने बहुत छोटी उम्र में जान लिया । पर अभी उसकी शारीरिक मौत का समय नहीं आया था सो उसे बचा लिया गया ।
ये उसके लिए अच्छी बात रही या बुरी ये उस वक्त उसकी समझ से परे था।
——-
कुछ साल बाद जब पत्ते कुछ-कुछ हरी करवट लेने लगे । एक ग्रे रंग का स्कूटर , नज़दीक का चश्मा, हाथ में बेतरतीब से पकड़ी एक नोटबुक और मुस्कान भरी छोटी-छोटी जिद आस-पास फिर से साँस लेने लगे ।
खुशियाँ कबूतर का पंख हैं ।
हवा में तैरता कब ,कैसे , कहाँ और क्यों है, ये ठीक-ठीक कुछ पता नही होता।
उन दिनों सूरज चमकने लगा था । रोशनी चुभनी बंद हो गई  ।
छत पर बावलों सा पड़े,
चाँद को तकिया बना कर,
सितारों को एक दूजे पर उछालने के खेल भाने लगे थे।
आसमां पर लकीर खींच दी जाती थी जो नज़र से होती हुई सीधी महबूब के घर के आँगन में उतरती।
चिलचिलाती धूप में नीम के पेड़ तले दुपट्टे के कोने में बंधे प्रेम को, हथेली पर परोसा जाता , फिर साँस यूँ आती कि पूरे जन्म की तृप्ति हो गई ।
एक रोज़ लड़के ने कहा
“सुनो मुझे समंदर पीना है । क्या तुम ला सकती हो ?”
लड़की मुस्कुराई
बैग से टिफिन निकाला । टिफिन से चम्मच ।
मंदिर की सीढ़ी के पास बने प्याऊ से चम्मच में पानी लिया । हथेली पर चम्मच टिकाया और सधे कदमों से लौट कर लड़के के पास आई।
लड़का उठा
उसने मुस्कुरा कर लड़की की पलकों पर टंगे आँसू अपने होंठों में बंद कर लिए ।
फिर धूप सच में तेज़ होती गई
चम्मच का पानी भाप बन उड़ता गया।
जाने प्रेम का क्या हुआ होगा।
——-
आधा दशक बीत जाने के बाद
एक ऑफिस की बड़ी टेबल के आमने-सामने बैठे दो जरूरतमंद लोग ।
“मैं तुमसे शादी नही कर सकती ।”
“न सही , पर..”
“पर ?”
“मैं कभी किसी के साथ सोया नही हूँ और मैं ऐसे ही नही मरना चाहता ।”
“तुमने मेरा बुरे समय में बहुत साथ दिया है । हाँ,  इतना तो मैं तुम्हारे लिए कर सकती हूँ ।”
“हाँ ,पर ये कीमत नही है । मैं तुम्हें दिलों जाँ से चाहता हूँ । सच ,कसम से।”
लड़की के चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आई
लड़के ने कहा
“तुम्हारी मुस्कान कितनी मीठी है न ।”
कुछ बरस बाद  उसी टेबल के आमने-सामने उसने फिर पूछा
“मेरी बीवी माँ नही बन सकती । मुझे एक बच्चा दे सकती हो? मैंने बस तुम्हीं से तो हमेशा प्यार किया है ।”
लड़की ने फिर से मुस्कुरा कर सहमति दे दी।
सुंदर बात ये थी लड़के ने उस बेटे को वो नाम दिया जो लड़की ने चाहा।
निक नेम
स्कूल में तो निक नेम चल नही सकते न। स्कूल में बच्चे की उस माँ का दिया नाम था ,जो जानती भी न थी कि बच्चा गोद में आया कहाँ से।
मई के महीने में उस साल मानसून जल्दी आ गया । तेज़ अंधड़ में लड़की की याददाश फड़फड़ाई , भीगी , गल गई ।
उसे कोई बेटा है..ये भूल गया।
—-
समय रूकने के लिए नहीं बना , वो चलता रहा ।‌ समय ने अपनी सुराही से पाँच साल और लुढ़का दिए ।
एक शराब का गिलास, दो कश् सिगरेट ,
शमशान से चुप जेब में सरकाई एक चुटकी विश्वास की राख और न जल पाई  ज़िंदगी का नाखून ।
महानगर की चकाचौंध में अंडरपास से गुज़रती कार में दो साए ।
“झूठ और सच के अस्तित्व होते हैं क्या ?”
लड़की ने उस अजनबी से पूछा
“तुम्हें क्या पंसद है?”
लड़के ने पलट कर सवाल किया ।
“मुझे …मुझे मुस्कुराना पंसद हैं । “
“तुम अच्छी हो तुम्हें सब प्यार करते हैं ।”
“हाँ सब प्यार करते हैं क्योंकि मैं बहुत हँसती हूँ । पर मुझे मुस्कुराना है । मैं कभी मुस्कुराई नही हूँ ।” वो हँसते हुए बोली।
आगे अंधेरा था , वो लम्बे कद का साया , छोटे कद के साए को निगलने लगा।
—-
“मैडम रेप विक्टम का मैडिकल होना जरूरी है ।  मैडम … आप समझ रही हैं न जो मैं कह रहा हूँ? ” कॉन्स्टेबल लड़की को झकझोरते हुए बोला ।
“सर लगता है अभी भी शाॅक में है ।”
“डैड बाॅडी भेज दी पोस्टमार्टम के लिए?”
“जी सर , पर सर ये कुछ बोल नही रही , नाम को कपड़े बचे हैं शरीर पर फटे । भयंकर घाव है शरीर पर  । रेप तो हुआ है सर ।”
“मैडम देखिए ….”
आफिसर की बात पूरी होती इससे पहले ही वो एकदम से बोली
“वो दीवार के पीछे खड़ा है।”
“जी!!!  कौन ? ” पुलिसवाले ने हैरानी से पलट कर देखते हुए पूछा ।
“वो … देखिए उसका कंधा दिख रहा है । वहीं पीली दीवार के साइड से।”
“मैडम जी ये हाई-वे है और खेत में हैं आप । मेरे को तो किलोमीटर तक भी कोई दीवार न दिख रही ।
“अरे कमाल कर रहे हैं आप । सामने तो खड़ा है दीवार के साथ । मुझसे मिलने आया है । माफी मांग कर गले लगाने । आप उसे यहाँ ले आइए प्लीज़ । मेरे पैरों में जाने क्यों बहुत दर्द हो रहा है। उठ नही पा रही । वरना खुद चली जाती उसके पास ।”
उसने अपने पैरों के बीच बहते खून को देख बेबसी से कहा।
दोनों पुलिसवालों ने एक दूसरे को देखा ।
पहला बोला
“बिठा भई जीप में इसे ।”
“सर जी ले जाना कहाँ हैं ?”
अफ़सर ने घूर के देखा
“अरे सर जी, दिमाग चल गया सै छोरी का सो मैं तो बस ये पूछ रहा था कि अब पहले कहाँ ले जाना है ,
पागलखाने ,थाने , या…”
उसने हैवानियत की एक आँख दबाते हुए पूछा।
लड़की की नज़र अब भी दीवार से झाँकते सोलह साल के कंधे पर टिकी थी ।
~~~~~
पीली दीवार  (कहानी) - डॉ सुषमा गुप्ता 3

 

 

नाम : डाॅ सुषमा गुप्ता
जन्म : 21 जुलाई 1976
शिक्षा : एम काॅम (दिल्ली युनिवर्सिटी )
एम.बी.ए
(आई.एम.टी गाजियाबाद)
एल.एल.बी , पी-एच.डी
(मेरठ यूनिवर्सिटी)
पता: 327/सेक्टर 16A
फरीदाबाद
पिन 121002
हरियाणा
ई मेल : 327suumi@gmail.com
फोन न• 9899916431

2 टिप्पणी

  1. बहुत अच्छी कहानी। अलग शैली में लड़की की ज़िन्दगी खाका उतारती हुई। शब्दों को चिन्हों की तरह प्रयोग करना आसान नहीं होता। आप ने किए, आपको बधाई!

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.