मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी - डॉ. आमिर रियाज़ 9मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी या कलामए-ग़ालिब की विशेषताएं

 

  • – डॉ. आमिर रियाज़

 

 

 

होगा कोई ऐसा भी के ग़ालिब को ना जाने

शायर तो वह अच्छा है पे बदनाम बहुत है.

ये कलाम उसी मिर्ज़ा ग़ालिब का है जिसको अपनी ज़िन्दगी में ही अपनी अज़मत का अंदाज़ा हो गया था और वह कहा करते थे कि भले ही आज लोग मुझे और मेरे कलाम को न समझते हो लेकिन आने वाले सौ सालों के बाद ज़रूर समझेंगे. मिर्ज़ा असदुल्लाह खान बेग जो की उनका असली नाम था, का जन्म २७ दिसम्बर १७९७ को आगरा के कला महल में हुआ लेकिन उन्होंने अपने जीवन का ज्यादा वक़्त या कह सकते हैं के लगभग पूरा जीवन दिल्ली में गुज़ारा. और यहीं पर ग़ालिब ने अपने जीवन की अंतिम साँसें ली और यहीं पर उनका देहांत १५ फरवरी १८६९ में ७१ साल की उम्र में हुआ.

यह सच है की ग़ालिब की ज़िन्दगी में भी उनकी कला की बहुत इज्ज़त हुई लेकिन वह जिस इज्ज़त का हक़दार अपने आप को समझते थे उससे वंचित रहे जिसकी अभिव्यक्ति वह अपने एक पत्र में करते है;

“खुदा (ईश्वर) के इलावा कोई नहीं जानता की इन ५२ वर्षों में उसने किस  तरह मानी के दरवाज़े मुझ पर खोले हैं और मेरी सोच को किस तरह बलंदी बख्शी है, लेकिन अफ़सोस की लोगों ने मेरे कलाम की खूबी को नहीं समझा.”

ग़ालिब की लोकप्रियता के बारे में, डॉ. बिजनौरी लिखते है;

“दुनिया में अगर किसी शायर से ग़ालिब की तुलना हो सकती है तो वोह जर्मनी का सरताज गोएथे है. उन्होंने ग़ालिब के कलाम को वही (रहस्योद्घाटन या इल्हाम) घोषित किया है.”

प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी लिखते हैं;

“मुग़ल सल्तनत ने हिंदुस्तान को तीन चीज़ें दी, ग़ालिब, उर्दू और ताज महल. ग़ालिब ने ग़ज़ल को तहज़ीब का दर्जा दिया. यह ग़ालिब का ही कमाल था की जिसने ग़ज़ल को हमारा कल्चर (सभ्यता) और हमारे कल्चर (सभ्यता) को ग़ज़ल बना दिया.”

प्रोफेसर सय्यद शौकत सब्ज़वारी ग़ालिब की शायरी के बारे में अपनी किताब ‘फलसफा कलाम-ए-ग़ालिब’ में कुछ इस तरह लिखते है;

“शायरी के प्याले में जो शराब भरी गयी है वह शायर का दर्शन (फलसफा) है और उसमें जो नशा है वह शायर का आर्ट (कला) है. ग़ालिब की शायरी कला और दर्शन के संयोजन का एक चमत्कारिक रूप है. यह बात कम से कम  उर्दू शायरों में ग़ालिब के अलावा किसी और को हासिल नहीं है. ग़ालिब की सफलता का राज़ यही है. और यही वो सच्चाई है जो शेर (कलाम, कविता) और दर्शन के आपसी संबंध को स्पष्ट करता है. और ग़ालिब के यहाँ इस आपसी संबंध से जो कैफियत (स्थिति) पैदा हुई वह न तो आर्ट (कला) है न दर्शन बल्कि इनके बीच की चीज़ है जिसे ग़ालिब के शब्द में शेर (कविता) कह सकते हैं.”

अगर ग़ालिब की शायरी का गौर से अध्ययन किया जाये तो मालूम होगा की उनके कलाम में चार प्रकार के अशआर (कलाम) पाए जाते हैं.

१. कुछ कलाम तो इस तरह जटिल और मुश्किल है कि उन्हें समझने के लिए बहुत ही दिमागी कसरत करनी पड़ती है. मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी - डॉ. आमिर रियाज़ 10उनका अर्थ मुश्किल से ही समझ में आता है. इन कलामों में न तो कोई शेरी रंग मिलता है और ना ही कोई अर्थ मिलता है. बस एक तरह की दिमागी कसरत मालूम होती है. यह ग़ालिब के वह कलाम हैं जो बेदिल[1] के रंग में रंगे हुए हैं. जैसा की ग़ालिब लिखते हैं;

तर्ज़े बेदिल में रेखता लिखना

असदुल्लाह खां क़यामत है

२. कुछ अशआर ऐसे हैं जिसमें ग़ालिब ने शब्दों का जादू बांधा है. ऐसे कलाम बंद के संदर्भ से बहुत बलंद लेकिन लेख के संदर्भ से नीचा है.

३. कुछ शेरों (कलामों) में मज़मून आफरीनी (ज़हन से नयी बात निकलना) भी है और अदाज़े बयां भी दिलकश है. इन कलामों में मोमिन का रंग पाया जाता है.

४. कुछ कलाम तीर व नश्तर का काम करते हैं यानि इनमें शेरियत पाई जाती है. ज़बान साफ़ है, बंद बहुत ही दिलकश है और ख़यालात की दुनिया आबाद है. इनमें ज्यादा तर मीर तकी मीर का अंदाज़ झलकता है.

शेख मोहम्मद इकराम ने ग़ालिब की शायरी के पांच दौर (चरण) बताये हैं;

पहला दौर: शुरू से १८२१ तक

दूसरा दौर: १८२१ से १८२७

तीसरा दौर: १८२७ से १८४७

चौथा दौर: १८४७ से १८५७

पांचवां दौर: १८५७ से अन्त तक

अब हम देखने की कोशिश करेंगे की ग़ालिब की विश्व्यापी चर्चा और बलंदी का राज़ क्या है और ऐसी कौनसी विशेषता है जिसने ग़ालिब को हर दिल अज़ीज़ शायर बना दिया.

१. अंदाज़-ए-बयां: स्पष्ट हो की ग़ालिब के कलाम की पहली और सबसे अहम् विशेषता उनका वह अंदाज़-ए-बयां है जिस पर उनकी शायराना महानता के महल की बुनियाद रखी गयी है और जिसकी तरफ खुद उन्होंने भी अपने कलाम में इशारे किये हैं. जैसे;

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे

कहते हैं के ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयां और

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ये मसाइले तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ग़ालिब

तुझे हम वली समझते जो न बादा ख्वार होता

ग़ालिब के सभी आलोचक इस बात पर एकमत हैं कि उनके कलाम की सबसे बड़ी विशेषता उनका अंदाज़-ए-बयां है.

ग़ालिब के कलाम और उनके आलोचकों के स्पष्टीकरण से साबित होता है कि उन्होंने जिस बात को अंदाज़-ए-बयां बताया है वह वास्तव में ग़ालिब की जिद्दत (नया पन) पसंदी है. ग़ालिब एक पत्र में लिखते हैं कि भाई मैं अपने मिज़ाज से मजबूर हूँ और उनका मिज़ाज जिद्दत पसंदी यानी रौशन-ए-आम से हट कर चलना. उनका कमाल यह है के वह आसान लेख को भी अदा करते हैं तो इसमें भी उनकी विशिष्टिता झलकती है. जैसे;

हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है

तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है

२. रमज़िया (इशारा) अंदाज़: रम्ज़ दरअसल किनाया (इशारा) की एक किस्म है. यानी रम्ज़ उस किनाये को कहते हैं जिसमें मल्जूम (वास्तविक अर्थ) तक पहुँचने के लिए बहुत सी दुश्वारियों (परेशानियों) का सामना करना पड़ता है. ऐसे कलामों में एक से ज्यादा अर्थ होते हैं. जैसे;

कोई वीरानी सी वीरानी है

दश्त को देख के घर याद आया

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दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है

आखिर इस दर्द की दवा क्या है

अगर गौर से देखा जाये तो मालूम होगा की ग़ालिब की शायरी का कमाल उनके इसी रमज़िया अंदाज़े बयां में पोशीदा (छुपा हुआ) है. पहली पंक्ति के सभी आलोचकों ने इस बात को स्वीकार किया है. डॉक्टर शौकत सब्ज़वारी अपनी किताब ‘फलसफा-ए-कलाम-ए-ग़ालिब’ में लिखते हैं;

“ग़ालिब का कलाम सर से पांव तक रम्ज़ियत के लिबास में रचा हुआ है. और यह उनके आर्ट (कला) का वह पहलू है जिसको नज़र अंदाज़ कर देने से उनकी सोच में पाई जाने वाली नवीनता (नुदरत) की तमाम खूबसूरती बर्बाद हो जाती है.”

डॉ. युसूफ हुसैन खां अपनी पुस्तक ‘उर्दू ग़ज़ल’ में कुछ यूँ लिखते हैं;

“ग़ालिब की ग़ज़लें किनायों (इशारों) से भरी पड़ी हैं. यह किनाये सिर्फ किनाये नहीं बल्कि लुत्फ़-ए-ग़ज़ल (कविता के आनंद) में रचे हुए हैं.”

रम्ज़-ओ-ईमां (इशारों में बातें करना) ग़ज़ल के लिए मूल रूप से अनिवार्य है, जिसके बिना ग़ज़ल एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती. अब हम ग़ालिब की ग़ज़ल से रम्ज़-ओ-ईमां के कुछ उदाहरण पेश करते हैं;

आइना देख अपना सा मुंह ले के रह गए

साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था

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पूछते हैं वह के ग़ालिब कौन है

कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या

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कहा तुमने की क्यूँ हो ग़ैर के मिलने में रुसवाई

बजा कहते हो, सच कहते हो, फिर कह्यो के हाँ क्यूँ हो

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मौत का एक दिन मोअययन है

नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

३. इजाज़ (छोटा करना): यह वह विशेषता है जो दरया (नदी) को कूज़े (प्याले) में बंद कर देने का दूसरा नाम है. ग़ालिब के बहुत से अशआर (कलाम) ऐसे हैं की दो मिसरों (बंद) में मानी (अर्थ) की एक दुनिया आबाद है. ग़ालिब को खुद भी इस विशेषता का एहसास था. वह कहते हैं;

गन्जिनाये मानी का तिलिस्म इसको समझिये

जो लफ्ज़ के ग़ालिब मेरे अशआर में आवे

नीचे इसकी कुछ मिसालें दर्ज करता हूँ;

क़फ़स में मुझसे रुदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम

गिरी है जिसपे कल बिजली वह मेरा आशियाँ क्यूँ हो

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मुझतक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम

साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में

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तुझसे तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम

मेरा सलाम कहियो अगर नामाबर मिले

४. तन्ज़ व ज़राफत (मज़ाक): ग़ालिब ने तन्ज़ व ज़राफत से खूब काम लिया है जिसकी तह में फनकार की अनानिय्यत (खुदी, घमंड) मौजूद होती है. यही वह सच्चाई है जिसने ग़ालिब को हरदिल अज़ीज़ शायर बना दिया. वह किसी का भी मज़ाक उड़ाने से नहीं बाज़ आते. इन्होने फरिश्तों, हूरों, जन्नत और खुद महबूब को भी मज़ाक का निशाना बनाया है. मज़ाह की चन्द मिसालें पेश करता हूँ;

जिसमें लाखों बरस की हूरें हो

ऐसी जन्नत का क्या करे कोई

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पकडे जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक

आदमी कोई हमारा दम-ए-तहरीर भी था

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इस सादगी पे कौन ना मर जाये ऐ खुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

ज़राफत की चन्द मिसालें पेश करता हूँ;

ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ग़ालिब

तुझे हम वली समझते जो ना बादा ख्वार होता

ग़ालिब तन्ज़ की छलनी में आंसुओं को छान देते हैं और छलनी के भीगे हुए छेदों पर बेशुमार मुस्कुराते हुए होंटों का गुमान होता है. तन्ज़ की चन्द मिसालें पेश करता हूँ;

जिसे नसीब ना हो रोज़-ए-सियाह मेरा सा

वह शख्स दिन ना कहे रात को तो क्यूँ कर हो

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क्यूँ गरदिश-ए-मदाम से घबरा न जाये दिल

इन्सां हूँ प्याला-ओ-सागर नहीं हूँ मैं

शोखी की चन्द मिसालें पेश करता हूँ;

वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं

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बोसा नहीं ना दीजिए दुश्नाम ही सही

आखिर ज़बाँ तो रखते हो तुम गर वहां नहीं

५. तह दारी: तह दारी का अर्थ है की एक शेर का कई मतलब निकलता हो. ज़ाहिर में शेर का मानी कुछ हो लेकिन ध्यान से पढने पर उसका अर्थ बदल जाता हो. तह दारी शायरी की बलंदी का सुबूत है. कलाम में यह खूबी इल्हाम की वजह से पैदा होती है. तह दारी शेर में गहराई पैदा करके शेर को अमर बना देता है. चन्द मिसालें दर्ज करता हूँ;

कोई वीरानी सी वीरानी है

दश्त को देख के घर याद आया

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इशरते कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

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दाम हर मौज में है हलकए सद काम नहंग

जाने क्या गुजरी है कतरे पे गुहर होने तक

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी - डॉ. आमिर रियाज़ 11६. फ़िकरी (सोच) पहलू: ग़ालिब शायर फलसफी नहीं थे बल्कि फलसफी शायर थे यानि इन्होने बेदिल और इकबाल[2] की तरह दुनिया को अपनी शायरी के माधयम से कोई दार्शनिक प्रणाली नहीं दी बल्कि दर्शन के कई पहलू इनकी शायरी में झलकते हैं. और इसकी वजह यह है की कुदरत ने इन्हें दार्शनिक दिमाग दिया था. ग़ालिब ने जीवन की व्याख्या ही नहीं की बल्कि उसकी आलोचना भी की है. और उसी की वजह से उनके कलाम में दार्शनिक रंग पैदा हो गया. डॉ. इबादत बरैलवी अपनी पुस्तक ‘ग़ज़ल और मुताला ग़ज़ल’ में लिखते है;

“ग़ालिब उर्दू के पहले फलसफी शायर हैं.”

प्रोफ. आल अहमद सुरूर अपनी पुस्तक ‘नए और पुराने चराग’ में लिखते हैं;

“ग़ालिब ना फलसफी थे, ना सूफी. उनका सारा फलसफा और तसव्वुफ़ उनकी फिकरे रौशन की करिश्मा साज़ी है.”

प्रोफ. अहमद कादरी कुछ इस तरह लिखते हैं;

“ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी में जज़्बात (भावना) थे, एहसासात थे, ज़बान व बयान के करिश्मे थे लेकिन वह हसीन व जमील (सुन्दर) सोच नहीं थी जो की लफ़्ज़ों में आत्मां फूँक देती है. यह मिर्ज़ा ग़ालिब का ही करिश्मा है और उर्दू ज़बान इसपर जितना रश्क (घमंड) करे कम है. इन्होने इसे नए नए ख्यालात (विचार) दिए और उनको प्रस्तुत करने का नया तरीका दिया और सोचने के लिए हकीमाना (दार्शनिक) अंदाज़ और जांचने के लिए तन्कीदी (आलोचनात्मक) शुऊर (तरीका, दिमाग).”

ग़ालिब खुदा (ईश्वर) के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए लिखते है;

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता

ग़म (दुःख) ज़िन्दगी की बुनयादी सच्चाई है बल्कि अस्तित्व या जीवन और दुःख एक ही वस्तु के दो रूप हैं. डॉ. युसूफ हुसैन खां इसी दृष्टिकोण को अपनी पुस्तक ‘उर्दू ग़ज़ल’ लिखते हैं;

“ग़ालिब ने ज़िन्दगी और ग़म (दुःख) को एक ही चीज़ करार दिया है.”

मिर्ज़ा ग़ालिब लिखते हैं;

कैद-ए-हयात-ओ-बन्दे ग़म असल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ

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ग़म गर चे जाँ गुसल है पे कहाँ बचे के दिल है

ग़म-ए-इश्क गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता

७. हकाएक निगारी (तथ्यात्मक तस्वीर): ग़ालिब ने इंसानी फितरत का बहुत ही गौर-ओ-फ़िक्र के साथ अध्ययन किया और अक्सर इन घटनाओं और हालातों का नक्शा बहुत ही खूबसूरती के साथ अपने कलाम में पेश किया जो लोगों को आम तौर पर पेश आते रहते हैं. और यही वजह है की इन अशआरों को हर शख्श अपने हालात और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए इस्तेमाल करता है. और इसमें कोई शक नहीं है की लिखने और बोलने में लोगों ने जिस क़दर ग़ालिब के अशआरों का इस्तेमाल किया है उतना किसी और शायर का नहीं किया है. नीचे इसकी कुछ मिसालें पेश करता हूँ;

वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं

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उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक

वह समझते हैं की बीमार का हाल अच्छा है

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इश्क पर ज़ोर नहीं है ये वह आतिश ग़ालिब

के लगाये न लगे और बुझाये ना बने

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बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब

कुछ तो है जिसकी पर्दा दारी है

८. मज़मून अफरीनी: इस का अर्थ है कि नयी बात पैदा करना या बात से बात निकालना. ये वस्फ़ (विशेषता) अक्सर ग़ालिब की शायरी में लुत्फ़ (आनन्द) दे जाती है. उनको ये दिखाना मक़सूद (मुद्दा) था कि अल्लाह ने कोहे तूर को अपनी तजल्ली (गुस्सा) के लिए गायब किया जो की सही ना था इसके लिए इन्सान का दिल ज्यादा मुनासिब था. ग़ालिब लिखते हैं;

गिरनी थी हमपे बर्के तजल्ली, ना तूर पर

देते हैं बादह, तर्फे क़दह ख्वार देखकर

जैसे कि इन्सान की उम्र गुज़रती जाती है और इस पर किसी को काबू नहीं और दूसरी जगह इंसानी ज़िन्दगी की जो कि टिकाऊ नहीं है उसकी तस्वीर कुछ इस तरह खींचते हैं;

मेरी तामीर में मुजमर है एक सूरत खराबी का

हैवला बर्क-ए-खिरमन का है खून-ए-गर्म दहकाँ का

ग़ालिब को इस बात का एहसास था के ज़माने ने इनके साथ अच्छा सुलूक नहीं किया. वह उम्र भर परेशानी और दर्द में मुब्तिला (घिरे) रहे. इन परिस्थितियों ने इनकी शायरी में एक अहम् किरदार अदा किया और बात को सोचने और समझने का नया अंदाज़ दिया. नयी बात पैदा करना, बात से बात निकलना इन्ही कमियों और परेशानियों की एक झलक मालूम होती है. और शायद यही वजह थी कि उन्होंने लिखा;

गुन्चई मानी का तिलिस्म इसे समझिये

जो लफ्ज़ के ग़ालिब मेरे अशआर में आये

९. मौसीकियत (गाना बजाना): यह कलाम-ए-ग़ालिब की बहुत ही ख़ास विशेषता है. ग़ालिब को मौसीकी से बहुत दिलचस्पी थी. शब्दों का वह जिस हुनरमंदी के साथ चुनाव करते हैं और जिस सलीके से वह उन्हें क्रम्बद्द करते है उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उन्हें इसपर महारत (निपुड़ता) हासिल है. इसीलिए उनकी ज्यादातर ग़ज़लें इस खूबी को लिए हुए हैं और जिससे उसको एक तरन्नुम (गाना) में गाया जा सकता है. डॉ. इबादत बरैलवी लिखते हैं;

“ग़ालिब के यहाँ गज़ब का तरन्नुम, मौसीकियत, और नगमगी है और इसका सबब यह है कि ग़ालिब की फ़िक्र ही मोतरन्नुम है.”

ग़ालिब के कलाम से चन्द मिसाल पेश करता हूँ;

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

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बाज़ीचए इत्फाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे

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कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती

१०. तस्वीर कशी: तस्वीर कशी पर ग़ालिब को बहुत महारत (कौशल) हासिल है. वह लफ़्ज़ों से ऐसी तस्वीर बनाते हैं कि मुसव्विर(तस्वीर बनाने वाला) रंगों से ऐसी तस्वीर ना बना सके. दीवान-ए-ग़ालिब का पहला शेर पढ़ें तो ईरान दरबार का पूरा नक्शा और फर्यादी की जगह भी आँखों के सामने आ जाती है;

नक्श फर्यादी है किसकी शोखी-ए-तहरीर का

काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

ग़ालिब की एक ग़ज़ल ऐसी है जिसका हर शेर जिन्दा तस्वीर और पूरी ग़ज़ल एक दिलकश एल्बम है. उस ग़ज़ल का एक शेर पेश करता हूँ;

मांगे है फिर किसी को लैब-ए-बाम पर हवस

ज़ुल्फ़-ए-सियाह, रुख पे परेशां किये हुए

इस शेर में महबूब के नज़रें झुका लेने की तस्वीर इस तरह खींची है जैसे के मॉडर्न आर्ट का कोई नमूना हो.

११. नुदरत (अनोखापन) बयानी: इससे यह ज़ाहिर होता है कि ख्याल अनोखा हो या ना हो लेकिन इज़हार (अभिव्यक्त) करने का तरीका ज़रूर अनोखा होना चाहिए. यह सच है की शुरू में ग़ालिब ने बेदिल के रास्ते पर चलने की कोशिश की थी लेकिन बहुत जल्द इसे छोड़कर अपनी फ़िकरी सोच को अपना राहनुमां बनाया. ग़ालिब ने वफ़ा (साथ देना) जैसे नाज़ुक विषय पर शेर कहे लेकिन अपने ख़ास अन्दाज़ में. ग़ालिब लिखते हैं;

की वफ़ा हमसे तो ग़ैर इसको जफा कहते हैं

होती आई है के अच्छों को बुरा कहते हैं

ग़ालिब का कहना है कि लोग मेरे कलाम से मुझको जाने. बात सीधी है लेकिन तर्ज़-ए-बयान ने दिलकशी पैदा कर दी है. इश्क जैसे घिसे पिटे विषय को इस खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करते हैं की उसमें एक अजीब सी दिलकशी पैदा हो जाती है. लिखते हैं;

इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

दर्द की दवा पाई, दर्द लादवा पाया

नुदरत बयान की चन्द और मिसालें पेश करता हूँ;

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गयी

खाक में क्या सूरतें होंगी के पिन्हाँ हो गयी

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फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया

दिल जिगर तिश्न-ए-फरियाद आया

१२. अनानियत (खुदी, घमण्ड): ग़ालिब के वहां बे पनाह अनानियत है. वह अपने सिवा किसी को खातिर (ध्यान, ख्याल) में नहीं लाते. हर बड़े शायर को अपनी अज़मत (बलन्दी) का एहसास होता है. वह दुनिया को अपनी पसंद के सांचे में ढाला हुआ देखना चाहते हैं और ऐसा हो नहीं सकता जिसकी वजह से उसके कलाम में तलखी (कड़वाहट) पैदा हो जाती है और यह तलखी उनकी शायरी में झलकने लगती है. उसको बार बार बरतरी (बेहतरी, बड़ाई) का एहसास होता है. ग़ालिब को अपनी नस्र (पद्य) और नज़्म (गद्य) दोनों पर नाज़ था और वह किसी को भी अपना मकाबिल (बराबर) नहीं समझते थे. वह लिखते है;

पूछते हैं वह के ग़ालिब कौन है

कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?

१३. इस्तिफहामिया (पूछना, सवाल करना) अन्दाज़: मंज़र अब्बास के अनुसार;

“इस्तिफहामिया अंदाज़ कलाम-ए-ग़ालिब की सबसे अहम् विशेषता मान सकते हैं जिससे उर्दू शायरी अबतक अछूती थी. ग़ालिब की शायरी में लगभग एक तिहाई अशआर ऐसे है जिसमें शायर ने कब, कहाँ, क्यूँ, कैसे, और क्यूँकर जैसे इस्तिफहामिया अल्फाज़ इस्तेमाल किये हैं. कई ग़ज़लें ऐसी हैं जिसमें रदीफ़ ही इस्तिफहमिया है.”

ग़ालिब के कलाम में इस्तिफहामिया अशआर की बहुलता से उनकी शख्सियत को समझने में बड़ी मदद मिलती है. इन्सान का लबोलहजा उसकी ज़हनी और फलसफी (दर्शन) स्थिति का आइना होता है. जब हम ग़ालिब के इस अन्दाज़ पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि ये अशआर शायर के दिल और दिमाग की पूरी तरह व्याख्या करते हैं. इस्तिफहामिया अंदाज़ की चन्द मिसालें पेश करता हूँ;

 

 

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

आखिर इस दर्द की दवा क्या है

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दिल ही तो है ना संग-ओ-खिश्त दर्द से भर ना आये क्यूँ

रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों

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गई वो बात के हो गुफ्तगू तो क्यूँ कर हो

कहे से कुछ न हुआ फिर कहो तो क्यूँ कर हो

 

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी - डॉ. आमिर रियाज़ 12डॉ. आमिर रियाज़, असिस्टेंट प्रोफेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली.

ई.मेल: aamirriyaz27@gmail.com

 

[1] अब्दुल कादिर बेदिल (१६४२-१७२०), जो कि बेदिल देह्लीवी के नाम से भी जाने जाते है, उनका जन्म अजीमाबाद (पटना) में हुआ था, जिन्होंने लगभग १६ पुस्तकों की रचना की जो की कविता के रूप में है. वह सफविद मुग़ल साम्राज्य के सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण शायर (कवी) जाने जाते हैं. वह फारसी कविता के मास्टर के रूप में जाने जाते हैं.

[2] सर मोहम्मद इकबाल (९ नवम्बर १८७७- २१ अप्रैल १९३८) महान शायर, दार्शनिक, राजनेता के साथ साथ शिक्षाविद, वकील और महान विद्वान थे.

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