Wednesday, February 11, 2026
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मेरा मित्र (लघुकथा) – विश्व दीपक त्रिखा

लघुकथा : मेरा मित्र…

हमारे एक मित्र हैं। लंदन में रहते हैं। कहते हैं कि लन्दन की एक बड़ी हस्ती हैं। शायद चालीस साल पहले लंदन गए थे। अच्छे कलाकार थे तो छा गए लंदन में भारतीय कम्युनिटी पर। भारत से जो भी छुटभाईया या नामी नेता जाता था उनके पास जरूर हाजरी लगाता था। हरियाणा के तो तकरीबन सभी मुख्य मंत्री उसके मेहमानों की लिस्ट में थे। भले दिनों में हमने भी कई नाटक साथ किए थे। हम एक नाटक करते थे ‘जमूरा’ जिसमें वो मदारी का किरदार निभाते थे और मैं बनता था जमूरा। हम दोनों मिल कर लोगों को बेवकूफ भी बनाते थे और खूब हंसाते भी थे। मुझे बड़ा फ़ख्र था कि मेरा एक यार जिंदगी में इतना सफल व्यक्ति बन गया।

दस पंद्रह साल पुरानी बात होगी। हमारे वही करोड़पति मित्र जो कि लंदन में भारत की शान कहलाते हैं, रोहतक आए हुए थे। उन्होंने कहा की त्रिखा मैने सुना है कि तूने एक बड़ा ही शानदार नाटक तैयार किया है ‘गधे की बारात’। यार, मैं अभी कुछ दिन यही हूं… एक शो मेरे यहां रहते हुए भी कर दे किसी दिन।

मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने झट से हाल बुक करवाया और स्पेशली उनके लिए शो अरेंज किया… उन महाराज को उसमे चीफ़ गेस्ट के रूप में आमंत्रित किया। नाटक जनाब ने देखा और बहुत ही आनंदित हुए। हँस-हँस कर लोट-पोट हो गए। नाटक के बाद उन्होंने नाटक की बहुत तारीफ़ की और बोले त्रिखा यार मज़ा आ गया।

जाने से पहले हमने उन्हें चाय नाश्ता करवाया और श्रीमान जी टा टा बाय बाय करते हुए चले गए। जाते जाते मुझे एक लिफ़ाफ़ा खुश हो कर भेंट करते गए। मुझे बहुत अच्छा लगा की मेरे एक रईस मित्र ने मुझ सुदामा की गरीबी को समझा और कुछ आर्थिक सहायता की ताकि नाटक की मेरी यात्रा अनवरत चल सके… और इस आयोजन में जो भी मेरा खर्चा हुआ है वो मेरे को मिल जाए। हालांकि मैने ऐसी कोई उम्मीद तो नहीं की थी और न ही कभी मैं ऐसी कोई उम्मीद पालता हूं लेकिन अच्छा लगा कि मेरे यार ने मेरे बारे में सोचा।

घर जाकर मैंने वो लिफ़ाफ़ा बड़े ही फख़र से अपनी पत्नी को दिया और कहा की देख ऐसे प्यारे हैं मेरे मित्र। मेरी पत्नी ने लिफ़ाफ़ा खोला और उसकी हंसी छूट गई। उसमें केवल एक 500 रुपए का नोट था। वो भी इंडियन, लंदन का नहीं। लंदन के 50 भी होते तो बहुत होते पर केवल 500 रुपए और वो भी भारतीय, आज के ज़माने में कोई 500 रुपए देता है क्या। मन में आया उसे फ़ोन करके पैसे लौटा दूं… मगर मैं तो उस जैसा नहीं हूं ना…

मेरी बीवी की व्यंग्य भरी हंसी मुझे आज भी याद है। लेकिन फिर मुझे लगा कि शायद उसने मेरी औकात पहचान ली होगी। और अपनी हैसियत से नहीं बल्कि मेरी औकात देख कर दिए होंगे। मेरी औकात के हिसाब से तो बस इतने ही बनते होंगे!

 

 

विश्व दीपक त्रिखा


रोहतक (हरियाणा)

मोबाइल नंबर – +91 92544 00482

 

 

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3 टिप्पणी

  1. आपने मेरे उपन्यास “किन्नर कथा एक अंतहीन सफर” पर भी टिप्पणी दी थी लेकिन मेरे पास आपको अपना लेख भेजने के लिए फोन नंबर नहीं है कृपया अपना दे दीजिए

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