Tuesday, March 10, 2026
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इंदिरा बत्रा की कविता – आध्यात्मिक चश्मा

वह कण-कण में है बस रहा,
वह कण-कण में है रम रहा।
कर्मानुसार,
सहस्त्रों योनियों में पिरोया उसने जीव को,
बुद्धि दी सबको जीवन जीने की,
चींटी से लेकर हाथी तक,
मात्र कला दी पेट भरने की,
और न जाने क्या-क्या,
वर्णनातीत है उसका ब्रह्मांड…
ऐ बंदे !
तू जाग! तू संभल!
तूने पहचाना ही नहीं कि वह
अपना प्यार तेरे अस्तित्व में गढ़ गया,
यहीं तो पक्षपात कर गया वह,
‘बुद्धि’ संग ‘विवेक’ भी दिया तुझको,
“फ्रेम” बना ‘बुद्धि’ का,
“लेंस” लगा विवेक का,
उतर जा मन के अथाह सागर में,
असंख्य विकारों से भरे मन सागर में,
और
वही है भंडार सद्गुणों का भी,
डुबकी लगा और ढूंढ,
कर्म,अकर्म,विकर्मको,
दूर भगा मन के अंधेरे को।
भौतिक सुख का भी आनंद ले ओ बंदे!
कुछ क्षण तो निकाल उससे एकाकार होने को,
उस क्षण में समर्पित हो जा।
अगर चूक भी जाए तो मलाल ना कर,
सतत अभ्यास कर ऐ बंदे!
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार
सब निकल पड़ेंगे अपनी राह को,
आनंद का प्रवेश होगा तेरे मन सागर में,
आनंद से परमानंद की खोज कर उसी राह में चलता चल बंदे!
“परम शांति निवास” में प्रवेश कर जाएगा…
इन्दिरा बत्रा – Manchester, U.K.
मोबाइल – +44 7950 595842
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2 टिप्पणी

  1. इन्दिरा जी!
    आपकी कविता ‘आध्यात्मिक चश्मा’ पढ़ी।
    अच्छी कविता है!
    ईश्वर प्रदत्त मानव जीवन एक उपहार की तरह है।हम इसके महत्व को समझें। आनन्द से परमानंद की खोज कर, उस राह पर चलने के लिये सचेत करती बेहतरीन कविता है आपकी। बधाई आपको।

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