1 – पलटवार
करोना आने के बाद, किट्टी– पार्टी तो बंद हो गयी, किन्तु उसके सदस्यों की ‘ऑनलाइन मीटिंग’, हर महीने, सुबह 11 बजे से, होने लगी. फोन पर ही, घर– परिवार की बातें, हो जातीं और औरतों वाली ‘गॉसिप’ भी! निवेदिता उन दिनों, देर से, सोने लगी थी. चाहकर भी, नींद ना आती. यूँ ही कुछ, लिखती– पढ़ती रहती. किट्टी वाली मीटिंग के दिन, जब वह ऑनलाइन हुई; किट्टी– समूह की संचालिका, तारिका को, उसकी सूजी हुई आँखें और निस्तेज सा मुखड़ा, नजर आया. उसने पूछा, “निवेदिता…यू लुक टायर्ड”
“हाँ…रात देर से सोई थी…शायद इसीलिये…”
अगली सभा में, फिर किसी ने पूछा, “थकी हुई, लग रही हो” तो उसने हंसकर टाल दिया. उसके बाद वाली, मीटिंग के लिए, वह पहले ही, सतर्क हो गयी. मीटिंग के पहले वाली रात, जल्दी- जल्दी काम निपटाकर; बिस्तर पर, पड़ रही. सभा में, वह ‘थकी हुई’, नहीं लगना चाहती थी. संयोग से उसे, अच्छी नींद आ गयी. उसने सुबह उठकर, आईने में, अपने चेहरे का, निरीक्षण किया. थकान के चिन्ह, कहीं नहीं थे. वह आश्वस्त हुई और घर के कामों में, लग गयी. नियत समय पर, उसने मुँह धोया और बाल संवारकर; किट्टी वाले, आयोजन से जुड़ गयी. चैताली ने उसे देखा और छूटते ही बोली, “ ओह निवेदिता… यू आर लूकिंग टायर्ड…कुछ दिक्कत है?”
निवेदिता पहले ही त्रस्त थी. उससे जब्त ना हुआ. व्यंग्य से हंसकर बोली, “मुझे लगता है, मेरा चेहरा ही, कुछ ऐसा बना है.” उसके कटाक्ष से, चैताली का, मुँह उतर गया. इसके बाद, किसी ने भी, निवेदिता की ‘थकान’ पर, कोई टिप्पणी नहीं की!
2 – शो मस्ट गो ऑन
देवराज जी, आज कुछ देर से, ऑफिस पहुँचे. आज उनका ‘सही वाला’ जन्मदिन था. रात को बारह बजे, केक काटकर, शुभ दिन का, श्रीगणेश हुआ. ऑफिस के रिकॉर्ड में तो उनके ‘अवतरण दिवस’ की, कोई और ही तारीख दर्ज थी. इसी से अपने हर जन्मदिन पर, केक का कुछ हिस्सा, सहकर्मियों के लिए सुरक्षित रखते.
कार्यस्थल पर, अजब सा सन्नाटा था. उनका सहायक, गैलरी में, किसी से बतिया रहा था. चौधरी जी उसे डपटकर, अपना मिजाज़, बिगाड़ना नहीं चाहते थे; सो चुप रहे. अपनी सीट पर आकर, उन्होंने चपरासी रौनक को, बुलाने के लिए, बज़र दबाया; किन्तु कोई प्रतिक्रिया नहीं! चौधरी जी कुछ हैरान हुए. केक बांटने के लिए, रौनक का होना, जरूरी था. वही तो हर साल, उनकी तरफ से, सबका मुँह, मीठा करवाता रहा. चौधरी साब कमरे से बाहर निकले. गैलरी के छोर पर, फाइल- स्टोर था. वहीं स्टूल पर, रौनक बैठा रहता. फिलहाल वह नदारद था. रिकार्ड्स- अफसर और अटेंडेंट, दिखाई पड़े. उनके चेहरों पर, मुर्दनी छाई थी. वहाँ कोई पुलिस- इन्क्वायरी चल रही थी.
पता चला कि रौनक, हमेशा की तरह जल्दी आया था. की- होल्डर से, कार्यालय की चाभियाँ लीं. सब कमरों के ताले खोले. फिर स्टोर में आकर, फांसी लगा ली!! देवराज को गहरा धक्का लगा था. घर लौटकर, केक वाला डब्बा, जस का तस, पत्नी को थमा दिया. श्रीमती जी ने, उन्हें अस्तव्यस्त पाकर; प्रश्नवाचक दृष्टि, उन पर गड़ा दी.
चौधरी जी अकबकाकर, दूसरी तरफ देखने लगे. पत्नी को क्या बताते कि कोई बन्दा, जानबूझकर; ऑफिस में, फंदा लगाकर, मर गया…क्योंकि वह कार्यालय वालों की, सहानुभूति चाहता था. लोग चंदा जमा करके, उसके घरवालों को, कुछ न कुछ पैसे, अवश्य देंगे. जिनसे उसने उधार लिया था, वे भी अपने पैसे वापस मांगकर, उसके परिवार को सताने से डरेंगे… सरकारी मुलाजिम को प्रताड़ित करके, आत्महत्या की कगार तक,पहुँचाने का इलज़ाम, कौन अपने सर लेगा?! उसका नाकारा बेटा,खुद पर शर्मिंदा होगा.सम्भवतः,पिता के स्थान पर,कृपा- नियुक्ति भी पा जाए!
देवराज ने पाया, श्रीमती जी अब भी, उन्हें घूर रही थीं. मन कह रहा था- ‘ यह कैसी दुनिया- जहाँ पारिवारिक- कर्तव्यों के नाम पर… इन्सान की बलि चढ़ जाती है !!’ उन्होंने स्वयं को सहेजा. वे भी तो तो सदा… कुटुंब की खुशियाँ, बनाये रखना चाहते थे; उनको रंग में भंग, नहीं करना था! चौधरी जी पत्नी से बोले, “थोडा थक गया हूँ…ऑफिस में कुछ इशू था…बट लेट अस सेलिब्रेट…शो मस्ट गो ऑन!”

