“ममु …. अब बहुत हुआ अकेले रहना… अस्सी की हो रही हो। अब तो ये भी कह रहे है। बार-बार आकर देखना मुझसे भी न हो रहा है। अब कल यह किराए का घर खाली कर तुम हमेशा के लिए मेरे पास आ जाओगी। समझी…मैंने सब व्यवस्था कर दी है …तुम्हें पूछे बिन। वरना तुम तो मानने से रही।’
“पर बेटा ये सब अचानक… और लड़की के घर? ” क्षीण प्रतिरोध स्वीकार्य की मुद्रा में निकला।
‘माँ …फिर वही राग? तुम किसी पर आश्रित नहीं हो । पेंशन आती है । चार को अपने पैसे से खिला सकती हो । उम्र के इस दौर में सहारा चाहिए,स्वतंत्रता नहीं …। समझो माँ और कौन है वहाँ भी जो तुम्हारी आजादी छीनेगा। अब और हम तीनों बहनें तुम्हारा कहा न मानेंगे । बस अब और नहीं।”
शांता ने सर कुर्सी से टिका दिया और हल्के से आँखें मूंद ली। धुंधली आँखों में वह मंजर घूम गया …धुंधली तो केवल आंखें हुई थीं …
“कौन हुआ …कौन हुआ मुझे… बोलो न…बताते क्यों नहीं”…
लेडी हार्डिंग अस्पताल का प्रसूति गृह –असहनीय दर्द -शान्ता रोती कराहती चिल्ला उठी ।
‘माई …चुप…चुप…चिल्ला मत …लड़की…. लड़की हुई है लडकी”।
‘फिर से लड़की…।” अब तो आह मिश्रित चीख निकल गई थी शान्ता की । ‘तीसरी भी लड़की? …छिः…।” पूरा दर्द गले में भर उठा । आँख अनायास बह उठी। ये आँसू प्रसव पीड़ा के थे या ‘तीसरी लड़की’ होने की खबर के … अनुमान लगाना आसान था।
‘अरे …बहुत सुंदर है … चाँद जैसी ..देख।” नर्स ने बच्ची का मुख दिखाने का प्रयास किया ।
‘नहीं देखना मुझे… किसी को दे दो …नहीं देखना …मुझे नहीं चाहिए तीसरी लड़की…”। शांता उधर देखे बिना मुँह मोड़, फफक पड़ी थी, अपनी बेबसी पर। अबकी बार बहुत आस थी लड़के की उन्हें। पूरा विश्वास भी था। यहाँ तक कि नाम भी सोच लिया था।
पर अगले कुछ ही क्षणों में न जाने क्या हुआ, नन्ही गला फाड़ कर रोने लग गई थी…चुप होने का नाम ही न ले । पूरा कमरा सिर पर उठा लिया। अब बच्चे की रुलाई से शांता अपना रोना भूल गई। शरीर पस्त था फिर भी नर्स की ओर देख पूरा बल लगाकर चीखी, “क्यों रुला रहे हो इतना मेरी बच्ची को?”
“ अच्छा !” सिस्टर भी कम कहाँ थी । तीखे स्वर में उसने भी जवाब दिया था ,‘तुम ने अभी कहा किसी को दे देने को …फिर तुमको क्यों दरद हो रहा? कहाँ से आया अभी से इतना प्रेम? हाँ? रोने दो”।
“ओफ् … तो क्या सच्ची में थोड़ी बोला। मुझे दो मेरी बच्ची को। भूख लगी होगी…भूखी है बेचारी। दूध पिलाना है… दो …।”
“माँ मैं चलती हूँ”,आवाज से शांता की विचार तंद्रा भंग हुई ।
“बेटा …पूजा की थाली में बताशे है… तेरे लिए रखे हैं… खाती जा”।
“आप खाओ माँ । दीदी भी कह रह थी कि माँ कमजोर दिख रही है।”
“चुप रह । अपना मुँह देख । गाल की हड्डी देख कैसे निकल कर बाहर आई है । तुझसे जवान तो मैं दिख रही हूँ।”
“अच्छा !ओ मेरी शीला , फिर हमेशा ये नहीं दिख रहा वो नहीं दिख रहा का राग काहे अलापती हो ?अब कैसे दिख गई मेरे गाल की हड्डी?” उसने माँ को शाल ओढ़ाकर दूध सिरहाने रख दिया ।
“चुपचाप खा ले। मुझे सब दिखता है। हाँ।”
“खा लिए माँ … अब आप दूध पीकर सो लो मैंने गर्म कर दिया है। कल आती हूँ सुबह।” आगे आकर माँ को चूम वह बाहर निकल गई ।
‘बाय’ शांता के पोपले मुँह से आवाज निकली और वे पलक झपके बिना देखती रही, जाते हुए अपने जिगर के टुकड़े को …अपनी उस ‘तीसरी’ लड़की को ।
अच्छी कहानी है पद्मावती जी की! छोटी लेकिन अर्थपूर्ण। हम यह नहीं है कि बेटे कम सिंसियर होते हैं किंतु फिर भी माता-पिता के प्रति बेटियाँ अधिक सिंसियर होती हैं।
और भाई ना हो तो और भी ज्यादा।
अच्छी कहानी मातृ दिवस पर !
बहुत-बहुत बधाइयां आपको।
Congratulations ma’am, simple and short story about mother’s dafeeling about their child.
तीसरी लड़की
बेहद प्यारी हृदयस्पर्शी रचना
तीसरी संतान बेटी को पारले की चिंता
और वही संतान माँ के लिए चिंतित
बहुत बहुत बधाई
तीसरी लड़की
बेहद प्यारी हृदयस्पर्शी रचना
तीसरी संतान बेटी को पालने की चिंता
और वही संतान माँ के लिए चिंतित
बहुत बहुत बधाई
अति सुन्दर और संक्षिप्त कहानी!