Friday, June 21, 2024
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संपादकीय – सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश देवता हैं!

(पुरवाई पत्रिका का यह संपादकीय किसी भी तरह से
भारत की सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने का प्रयास नहीं है।)
फ़िल्म घातक में सनी देओल का एक संवाद है – ‘कानून और इन्साफ़ ताकतवर के घर ग़ुलाम बन कर रहते हैं।’ पिछले ही वर्ष झारखंड हाई कोर्ट की बिल्डिंग के उद्घाटन पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, “कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी न्याय नहीं मिलता। कई लोगों की लिस्ट मेरे पास है।”
पिछले सप्ताह चर्चा हमने की थी हिन्दू विवाह में सात फेरों के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट की। एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट हमारे संपादकीय में घुसपैठ कर रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक विचित्र सा फ़ैसला सुनाया – एक राजनेता को चुनाव प्रचार के लिये अंतरिम ज़मानत दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पहले कभी किसी भी राजनेता को चुनाव में प्रचार के लिये ज़मानत नहीं दी गई थी। 
यहां एक ख़ास बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि राजनेता यानी कि अरविंद केजरीवाल या उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मांगी ही नहीं थी। उनका मुकद्दमा तो इस मुद्दे पर था कि उनकी गिरफ़्तारी ग़लत ढंग से हुई है। कमाल तो यह है कि जिस देश की अदालतों में लाखों केस बरसों से लटके हुए हैं उस देश की सुप्रीम कोर्ट के पास इतना ख़ाली समय है कि वह एक राजनेता को चुनाव में प्रचार के लिये अंतरिम ज़मानत देने के लिये उतावली दिखाई दे रही थी।
एक और राजनेता बिहार के लालू प्रसाद प्रसाद यादव काफ़ी अरसे से पैरोल पर चल रहे हैं। वे तो ब़ाकयदा घोषित अपराधी हैं। मगर वे भी अपनी पैरोल की शर्तों को धता बता कर चुनाव में ऐसे प्रचार कर रहे हैं जैसे उन्होंने कभी चारा घोटाला किया ही ना हो। और भारत की अदालतों को इससे कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता। 
कानून और न्यायविदों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे तमाम नागरिकों को समान रूप से देखें और उनके पद या रुतबे से अपने आपको प्रभावित न होने दें। मगर बात जब राजनीति पर आती है तो एक सवाल उठना तो स्वाभाविक है। “क्या आम नागरिकों की तरह भारत के उच्च-न्यायालयों अथवा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश चुनाव में वोट डालते हैं?” यदि वोट डालते हैं तो वे भी किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रति सद्भावना रखते होंगे। तो क्या मुकद्दमें पर निर्णय सुनाते हुए वे अपनी विचारधारा से प्रभावित होते हैं या फिर ‘पंच परमेश्वर’ बन कर पूरी तरह से न्यायसंगत फ़ैसला सुनाते हैं। 
अधिकांश फ़ैसले या तो पूरी तरह से कानूनी धाराओं पर आधारित होते हैं या फिर परम्पराओं पर। अरविंद केजरीवाल से पहले कभी किसी भी अदालत ने किसी भी कैदी को चुनाव प्रचार के लिये पैरोल या अंतरिम ज़मानत दी हो, ऐसा याद नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलीसिटर जनरल से सवाल पूछा कि अरविंद केजरीवाल को चुनावों से ठीक पहले क्यों गिरफ्तार किया गया। मगर यह तर्क नहीं माना कि केजरीवाल ने नौ बार सम्मन मिलने के बावजूद ई.डी. के साथ पूछताछ में सहयोग नहीं किया। फिर भारत में तो हर साल कई चुनाव होते रहते हैं, किस-किस नेता को कब-कब गिरफ़्तार किया जा सकता है, इसके लिये कोई दिशानिर्देश मौजूद नहीं है। 
कहने को तो भारत के प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने ब्राज़ील में जी-20 सम्मेलन में कहा था, “जज कोई राजकुमार नहीं होता है, उसका काम सेवा देना होता है। जजों के फ़ैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिये।” मगर क्या अधिकांश मामलों में ऐसा होता है?
केजरीवाल के मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संजीव खन्ना एवं जस्टिस दीपंकर दत्ता का अरविंद केजरीवाल को अंतरिम ज़मानत देने के मामले में कहना है कि, “हमने केजरीवाल को कोई विशेष छूट नहीं दी है। हमें यह न्यायसंगत लगता था। इसलिये उन्हें बेल दी।” उन्होंने यहां तक कहा कि इस फैसले के आलोचनात्मक विश्लेषण का स्वागत है। 
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपंकर दत्ता की बात को शायद हम सच मान भी लेते यदि झारखण्ड के मुख्य मंत्री हेमन्त सोरेन का मामला सामने न होता। केजरीवाल को अंतरिम ज़मानत देकर जज साहेबान ने एक नई परंपरा की शुरूआत कर दी थी। अब उसी परंपरा में जब हेमन्त सोरेन ने ज़मानत के लिये अर्ज़ी दी, तो उन्हें सीधा मना कर दिया गया। 
अरविंद केजरीवाल पिछले एक दशक का सबसे बड़ा राजनीतिक अजूबा है। भारतीय संसद में उनकी पार्टी के पंद्रह सदस्य भी नहीं हैं, और वो भी  केवल राज्य सभा में, मगर वे अपने आपको प्रधानमंत्री पद का दावेदार सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। केवल पंजाब राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली में उनकी सरकार है। मगर उन्हें उत्तर प्रदेश और अन्य बड़े राज्यों में चुनाव प्रचार के लिये बुलाया जा रहा है। उनके जेल जाने को भी बढ़ा-चढ़ा कर बेचा जा रहा है। 
अरविंद केजरीवाल ने अपनी अंतरिम ज़मानत का ग़लत फ़ायदा उठाते हुए मतदाताओं से सीधे अपील करनी शुरू कर दी। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा, अगर आप चाहते हैं कि मैं वापस जेल में न जाऊं तो लोकसभा चुनाव 2024 में इंडी गठबंधन के उम्‍मीदवारों को वोट दें। अगर आप मुझे प्‍यार करते हैं तो नरेंद्र मोदी सरकार को रिजेक्‍ट कर दें। अब यह आपके हाथ में है कि मैं जेल में जाऊं या नहीं। अगर आप 25 मई को कमल के फूल पर बटन दबाएंगे तो मुझे जेल जाना पड़ेगा।’
अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, “उन्‍होंने मुझे जेल में इसलिए रखा क्‍योंकि मैंने आपके बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा दी. अच्‍छे स्‍कूल बनाए। आप लोगों को निशुल्‍क बिजली दी, फ्री दवाएं दी. यहां तक कि जब मैं तिहाड़ जेल गया तो वहां मुझे 15 दिन तक डायबिटीज की दवाएं नहीं दी गईं। जबकि मैं पिछले 10 साल से इंसुलिन ले रहा हूं। इन लोगों ने मुझे जेल के अंदर तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन बजरंगबली की कृपा से केजरीवाल टूटा नहीं।” जहां तक हमारी जानकारी है तिहाड़ जेल दिल्ली सरकार के जेल मंत्री के तहत आती है जो कि केजरीवाल की पार्टी के ही हैं और स्वयं तिहाड़ में मसाज करवाते रहे हैं। 
ई.डी. की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चुनावी रैलियों में दिए गए केजरीवाल के इन भाषणों पर विरोध जताया कि “अगर जनता आम आदमी पार्टी को वोट देती है तो उन्हें दो जून को जेल वापस नहीं जाना पड़ेगा।” तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने अपने दावों से जमानत की शर्त का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा, ‘‘वह क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं? यह संस्था पर तमाचे की तरह है।’’
थोड़ी हैरान करने वाली बात यह भी रही कि पहले जर्मनी और फिर अमरीका ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर टिप्पणी की। ज़ाहिर है कि भारत सरकार ने इस पर तल्ख़ प्रतिक्रिया दिखाई और दोनों देशों के राजदूतों को तलब करके आपत्ति दर्ज कराई और केजरीवाल की गिरफ़्तारी को भारत का घरेलू मामला बताया। अमरीका ने तो अपने राजदूत को तलब करने पर भी प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर दी।
अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा, “अमरीका निष्पक्ष, पारदर्शी और समय पर कानूनी प्रक्रियाओं को अंजाम तक पहुंचाने का समर्थन करता है और उन्हें नहीं लगता कि किसी को आपत्ति होनी चाहिये।”… हम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी सहित इन कार्रवाइयों पर बारीकी से नज़र रखेंगे।”
भारत के विदेशमंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बेबाक टिप्पणी करते हुए अमरीका को कसा और कहा, “जिन देशों को अपने चुनाव का परिणाम तय करने के लिए अदालत जाना पड़ता है, वे हमें इस बारे में व्याख्यान दे रहे हैं कि चुनाव कैसे आयोजित किया जाए।”
यह कैसे संभव है कि भारत में एक संस्था ऐसी हो जिसमें काम करने वाले अधिकारियों पर कोई टिप्पणी न की जा सके। हम आई.ए.एस. अधिकारियों पर टिप्पणी कर सकते हैं; मुख्यमंत्री, सांसदों, केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री पर टिप्पणी कर सकते हैं; तो फिर यदि हमें महसूस होने लगे कि अदालत का फ़ैसला कानून और संविधान के तहत न होकर किन्हीं अन्य कारणों से प्रभावित हो रहा है तो हम क्यों न्यायमूर्तियों से सवाल नहीं कर सकते। अब जबकि पंच परमेश्वरों ने निर्णय के आलोचनात्मक विश्लेषण की इजाज़त दे दी है, तो अपनी हदों में रहते हुए हम ऐसे सवाल खड़े कर सकते हैं। 
फ़ोटो साभार : Law Trend
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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49 टिप्पणी

  1. सर्वप्रथम.. आपको सादर नमस्कार सर .. आपका.संपादकीय पृष्ठ न तो केवल रोचक होता है.. नहीं केवल तथ्यपरक.. यह तो अत्यंत प्रभावी होता है जो सम्पूर्ण पाठक वर्गों को नव चिंतन एवं मंथन की दिशा में ले जाता है…

    आजका संपादकीय अति अतिष्ठ कर दिया.. इस राजनैतिक खेल में केवल जनसाधारण ही पीड़ित होते हैं… इस समय सारी सीमाएँ लांघते हुए मोदी के विरुद्ध खड़े हैं..सबकेसब वाचाल हो चुके हैं… टीवी पर इनके आरोप प्रत्यारोप देखकर लगता है कि इतने झगड़े तो गली महल्लो में भी नहीं होते होंगे…

    यह स्तिथि दुःखद भी है शोचनीय भी..न्यायाधीश भी शामिल हो सकते हैं… यह विश्वास भी नहीं होता… पर सत्य भी यही है….

    धन्यवाद सर.. एक महत्वपूर्ण विश्लेषण किया है आपने साधुवाद..

  2. समीचीन ज्वलंत विषय पर इस बार का संपादकीय देश और विदेश में बसे भारतवासियों के प्रश्नों को बड़ी ही सकारात्मकता से उठाता है।सुप्रीम कोर्ट को भी विनय पूर्वक प्रारंभ में ही बता देता है कि अवमानना का प्रयास कतई नहीं है।
    भारतीय न्यायालयों की कार्य क्षमता,कार्य करने के तरीके और सियासत का खौफनाक और वीभत्स चेहरे ने अब न्याय व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।
    इस मुद्दे पर मीडिया ने भी कोई स्पष्ट रुख नहीं दिखाया है अब मीडिया भी व्यापारिक समीकरण का गुच्छ हो गया है और डांस of democracy का ऊंट किस करवट बैठेगा उसके नाप तौल में व्यस्त है।
    पुरवाई पत्रिका परिवार को हृदय से बधाई इस शानदार और बेबाक संपादकीय हेतु।

    • भाई सूर्यकांत जी इस संपादकीय में कुछ सवाल उठाने का प्रयास किया है। आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  3. सर्वोच्च न्यायालय को भी किसी न्यायालय में मुल्जिम बना कर पेश करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। नरेन्द्र मोदी पर तानाशाह होने के आरोप लगाए जाते हैं। जबकि न्यायालय तानाशाही कर रही है और जनता सहित संसद ये नंगा नाच देखने को बाध्य है। अत्यन्त शर्मनाक स्थिति है। भारत के भविष्य का राम ही मालिक है। खेद सहित…
    भारत की एक शर्मिंदा नागरिक
    #शैली

  4. बिल्कुल सटीक टिप्पणी।
    शानदार और बेबाक टिप्पणी हेतु हार्दिक बधाई

  5. समसामयिक मुद्दों पर आपके लेख बिलकुल अलग और तार्किक होते हैं… बहुत शानदार टिप्पड़ी.. शायद कोलोजीयम सिस्टम के कारण ही ऐसी हिटलरशाही चल रही… अब समय आ गया है कोलोजीयम सिस्टम पर भी बात हो और इनके व्यूह को तोड़ा जा सके

  6. वाजिब सवाल उठाए आपने।न्यायमूर्तियों से उनके निर्णयों पर प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

  7. सर्वोच्च न्यायालय जैसी स्वतंत्र संस्था के निर्णय भी राजनीति से प्रभावित होने लगे हैं ।भारतीय संविधान का महत्व ही समाप्त होता नज़र आ रहा है । इस संपादकीय में बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाये गये हैं ।साधुवाद …

  8. न्याय पर भरोसा बचाना है तो इन दोनो जजो को बर्खास्त करना चाहिए इन्होंने सुप्रीप कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुँचाई है

  9. तेजेंद्र जी नमस्कार
    इस बार के संपादकीय में वर्तनी और शब्दों की अनेक अशुद्धियां मुझे मिलीं, पढ़ने में परवाह नहीं बन पाया तो विषय के गंभीरता इन्हीं गलियारों में उलझ कर कहीं गुम हो गई ।ऐसा क्यों?बहुत उद्विग्न मानसिक अवस्था में लिखा या प्रूफ रीडिंग की समस्या है?

    • मुझे तो नहीं दिखी। और आप खुद प्रवाह को परवाह लिख रही हैं। क्या प्रूफ देखने का आपकी यही पैमाना है?

  10. आपने बड़े मार्के की बात कही है कि अरविंद केजरीवाल इस दशक के एक अजूबे हैं। बहुत विचारणीय और उचित विश्लेषण किया है आपने। मगर माई लार्ड को क्या कहा जाय। मन की मौज। मुझे लगता है कि तिबारा आये मोदी कोलेजियम प्रणाली को विदा कर देंगे। और यही सर्वोच्च गलियारे के अभिजात्य को खत्म कर सकेगा।

  11. हमारे देश की न्याय व्यवस्था नचनियों की ठुमकन है। जिधर देखा कि धनी दर्शक बैठे हैं, उधर कमर मटका देती हैं।
    विपक्ष के 100% प्रतिशत नेता देशद्रोही हैं। लल्लू- पंजू भी प्रधानमन्त्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।
    विपक्ष के सभी नेताओं को सबसे सख्त सजा देने के लिए सबूतों की भरमार है।
    चाणक्य ने देशद्रोहियों के लिए मृत्य दंड देने का प्रावधान किया है।
    न्यायपालिका वामपंथियों और कांग्रेसियों की मुट्ठी में है। कम से कम 10 वर्षों तक न्यायपालिका को भंग कर देना चाहिए। केवल कार्यपालिका काम करे और संसद में पारित अधिनियमों के प्रावधानों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यात अध्यादेशों को पूरे देश में सेना और पुलिस द्वारा प्रवर्तित किया जाए। अन्यथा क्रूर इस्लामिक तंत्र और हदीस और शरियत कानून खूनी नंगनाच शुरू करने वाले हैं। जम्मू कश्मीर में 19 जनवरी 1990 की हिंसक और बलात्कारी कृत्यों की पुनरावृति हम फिर से देखने वाले हैं।

    • न्यायपालिका को भंग करना तो शायद संभव ना हो पाएगा मनोज जी। मगर आपका आक्रोश बाक़ायदा समझ आ रहा है।

  12. हमारे देश की न्याय व्यवस्था नचनियों की ठुमकन है। जिधर देखा कि धनी दर्शक बैठे हैं, उधर कमर मटका देती हैं।
    विपक्ष के 100 प्रतिशत नेता देशद्रोही हैं। लल्लू- पंजू भी प्रधानमन्त्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।
    विपक्ष के सभी नेताओं को सबसे सख्त सजा देने के लिए सबूतों की भरमार है।
    चाणक्य ने देशद्रोहियों के लिए मृत्य दंड देने का प्रावधान किया है।
    न्यायपालिका वामपंथियों और कांग्रेसियों की मुट्ठी में है। कम से कम 10 वर्षों तक न्यायपालिका को भंग कर देना चाहिए। केवल कार्यपालिका काम करे और संसद में पारित अधिनियमों के प्रावधानों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों को पूरे देश में सेना और पुलिस द्वारा प्रवर्तित किया जाए। अन्यथा क्रूर इस्लामिक तंत्र और हदीस और शरियत कानून खूनी नंगनाच शुरू करने वाले हैं। जम्मू कश्मीर में 19 जनवरी 1990 की हिंसक और बलात्कारी कृत्यों की पुनरावृति हम फिर से देखने वाले हैं।

  13. माननीय सम्पादक महोदय
    उपरोक्त सम्पादकीय दिए गए शीर्षक से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता की न्यायाधीश देवता हैं । ये निष्पक्ष भी नहीं है!
    ऐसा प्रतीत होता की गोदी मीडिया की तरह एक विशेष राजनीतिक दल के समर्थन में एक विरोधी व्यक्ति विशेष को निशाना बना कर चरित्र हनन और छवि धूमिल करने की कोशिश की गई है। सम्पादकीय कोई किसी राजनीतिक दल के प्रचार प्रसार के लिए नहीं होता। पुरवाई कोई राजनीतिक दल की मुख पत्रिका नहीं है।

  14. डॉ तेजेंद्र शर्मा संपादक भाई साहब आपकी पुरवाई पत्रिका का उत्तम और श्रेष्ठ संपादकीय अंक पढ़ने के लिए मिला।आपके लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

    मैं इस पक्ष से सहमत हूं कि हमें देश और दुनियां में प्रजातंत्र को शक्ति संपन्न और बल प्रदान करने के लिए अथवा स्थापना करने के लिए अपने और पराए, पक्ष और विपक्ष के भेद से ऊपर उठकर निर्णय देने होंगे।भारत दुनिया का एक देश अवश्य है किंतु भौगोलिक दृष्टि से भारत में अनेक भाषाओं, संस्कृतियों, ज्ञान और भक्ति की विविध परंपराओं की निर्मल धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है। इस ज्ञानयोग के वेग को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए लघु और अधम मानसिकता से ऊपर उठकर उत्तम और श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करने के बाद ही भारत को विश्वगुरु माना जा सकता है। मुझे अमेरिका की पुलिस का निर्णय करने का उदाहरण श्रेष्ठ और अभूतपूर्ण प्रतीत हुआ जब वहां की पुलिस ने अमरीका की जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था। भारत की ज्ञान परंपरा के ज्ञाता एवं मनीषी दुनियां के सामने विश्व गुरु होने का दावा करते रहे हैं। हमें इस बात को पुष्ट करने लिए अपने देश की न्याय व्यवस्था में अगर कहीं त्रुटि परिलक्षित होती है। तब उस पर विद्वानों,ज्ञानियों और जनता द्वारा उस पर सवाल उठना/प्रश्न करना अतिआवश्यक प्रतीत हो जाता है।
    भारत में पूर्वकाल से न्यायविदो को पंच परमेश्वर मानते रहे है। आज भी मानते हैं। भारत के तंत्र को समृद्ध करने वाले सभी सरकारी लोगों से भारत की जनता की अपेक्षाएं होना उचित प्रतीत होता है कि उन्हें पहले वाला भारत लौटा दें जिसमें गंगा जमुनी तहजीब पुष्पित और पल्लवित होती थी। जब एक सुई स्वर्ग में नहीं ले जाई जा सकती है फिर यह सब मारामारी और आपाधापी किस लिए और किस राज्य के उत्तम विकल्प के लिए है। हमारे सामने दुनियां के उत्तम और श्रेष्ठ राज्यों के विकल्प …….खुले हुए हैं। इन विकल्पों को चुनने का अधिकार, जीवन जीने वाले लोगों के हाथों में होता है। दुनियां से दास प्रथा उठ गई किंतु दुनियां से लालच और पक्षपात, अपना और पराया जाने कब उठेगा। अपनी लेखनी को विराम देता हूं।

    • भाई उमेश जी, अंततः आपकी टिप्पणी पटल पर दिखाई दे गई। आपने उल्लेखनीय प्रश्न उठाए हैं। हार्दिक आभार।

  15. ‘सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश देवता हैं’ संपादकीय में आपने बेहतरीन प्रश्न उठाये हैं। यह प्रश्न सिर्फ मेरे ही नहीं, कैसे अन्य लोगों के दिलों में भी उठ रहे होंगे।
    वास्तव में केजरीवाल एक अजूबा ही है। नाम आदमी पार्टी और रुतबा चाहते हैं खास का। यह और इनकी पार्टी सिर्फ अराजकता फैलाना चाहती है। कोरोना काल में ऑक्सीजन को लेकर हाय तौबा से लेकर शराब कांड के बाद अब स्वाति मालीवाल के साथ घटना… अब एक नया शिगुफा कि भारतीय जनता पार्टी उन पर हमला करवा सकती है। इसके तार इतने लम्बे जुड़े हैं कि अमेरिका और जर्मनी ने ने इसकी गिरफ्तारी के विरुद्ध आवाज़ उठाई। ख़ालिस्तानियों से जिसे फंड मिल रहा हो, C J I, के मित्र जिनके वकील हों, उन्हें भला अंतरिम बेल क्यों नहीं मिलती?
    वैसे भी क़ानून अंधा है। उन्हें जमानत देने से पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जजों ने E D के वकीलों कि दलीलों पर भी ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। आज तो सुप्रीम कोर्ट के पास V I P लोगों के केसेस सुनने के लिए समय है जबकि अन्य लोगों के लिए नहीं…।

    मन में बहुत अफ़सोस होता है किन्तु विवश हैं। यह कैसे नियम हैं कि विधायिका, कार्य पालिका का विरोध कर सकते हैं किन्तु न्याय पालिका का नहीं चाहे वह किसी को भी दोषी बना दे या किसी को भी छोड़ दे। उस पर यह आग्रह कि आप सभी के निर्णय पर विश्लेषण का स्वागत है।

    अगर ऐसी ही पार्टियां सत्ता में आईं तो न जाने देश की दशा और दिशा क्या होगी।

  16. बहुत बेबाक व सटीक संपादकीय तेजेन्द्र जी ।बहुत सही प्रश्न उठाया है आपने और पहले ही स्पष्टीकरण भी कर दिया है।
    बहुत बहुत बधाई व अभिनंदन आपको ।

  17. तेजेन्द्र भाई: आज के सम्पादकीय का निचोड़ तो आपने शुरू में ही सनी देओल और आदरणीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के ब्यानों से दे दिया। केजरीवाल को ज़मानत देकर न्यायधीश संजीव खन्ना और न्यायधीश दीपंकर दत्ता ने जिस ग़ल्त परंपरा को जन्म दिया है उसका ख़म्याज़ा अब आगे आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा और वो सिर पकड़कर बार बार यही कहेगी कि “लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई”। १९४७ के बाद तो सुप्रीम कोर्ट काँग्रैस की ग़ुलाम रही है। सरकार ने अपने मन की चलाई। हज़ारौं लाख़ों केस सालों से अटके पड़े हैं जिन पर कोई सुनवाई नहीं। कहावत है कि जब ज़ुल्म की हद होती है तो एक मसीहा पैदा होता है। अब वो मसीहा आगया है।
    सदा की भांति, सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद।

  18. समाज के प्रत्येक आधारों को संपादकीय का विषय बनाते हुए, इस बार भी आपने अत्यंत गंभीर विषय को सभी के समक्ष प्रस्तुत किया है, कानून और न्याय को संविधान के अनुसार ही निष्पक्ष, पारदर्शी होने के साथ ही साथ विशेष तौर पर राजनीतिक संदर्भ में पक्षपात पूर्ण रवैये से पूर्णत: मुक्त होना चाहिए, जो किसी भी समाज की सुव्यवस्थित स्थिति का मानक सिद्ध होगा। आपका अति गंभीर संपादकीय देश के लिए चिंतन का विषय है की न्याय व्यवस्था को भी कटघरे में लाना आवश्यक है, क्योंकि उन्हें न्याय का महत्व और निहितार्थ का प्रत्यास्मरण करना आवश्यक है। सुविचारणीय,अर्थपूर्ण संपादकीय के लिए आपको साधुवाद।

  19. आदरणीय तेजेंद्र जी
    आज पुनः सुप्रीम कोर्ट आपके संपादकीय की ज़द में है।
    सच कहें तो इस तरह की सूचनाएँ तकलीफ ही देती हैं।
    इंसान कहाँ जाए न्याय के लिये?कानून और इन्साफ़ ताकतवर के घर ग़ुलाम बन कर रहते हैं।’
    झारखंड हाई कोर्ट की बिल्डिंग के उद्घाटन पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के द्वारा , “कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी न्याय नहीं मिलता। कई लोगों की लिस्ट मेरे पास है।” यह कहा जाना बहुत मायने रखता है। क्या उनके पास से वह लिस्ट मांगी गई ?क्या उस लिस्ट पर कोई कार्यवाही हुई ?यह भी जानने की उत्सुकता रही।
    अगर कोई एक्शन नहीं लिया गया तो क्यों? क्या वास्तव में राष्ट्रपति सिर्फ नाम का ही होता है?
    पारदर्शिता तो है ही नहीं।
    इस बार के संपादकीय को पढ़कर इतना अधिक मन खराब हुआ था, और क्रोध भी आया था बहुत। इसीलिए हमने तत्काल कोई प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं समझा।जब तक मन स्थिर न हो तब तक किसी भी प्रश्न का जवाब लिखते समय न्याय नहीं किया जा सकता लेकिन फिर भी यहाँ तो सब कुछ अन्याय कि नींव पर ही खड़ा हुआ है।
    नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार के सिवा कुछ नहीं है। हर विभाग, हर व्यक्ति ,हर नेता, अपनी मर्जी का मालिक है।
    न्यायालय के लिए तो क्या ही कहा जाए! यहाँ तो चिराग तले ही अंधेरा है।
    हम तो अक्सर सोचते हैं कि क्या कभी हम वहाँ वापस लौट सकते हैं जहाँ से हम आगे बढ़े थे? जहाँ ईमानदारी थी इंसानियत थी न्याय था!
    आज मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर बहुत याद आई।
    अभी कुछ दिन पहले ही हमने एक प्रसंग पढ़ा था पर उसे यहाँ लिखेंगे तो काफी लंबा हो जाएगा इसलिए उसे हम अलग से समूह में डालेंगे और चाहेंगे कि आप भी उसे पढ़ें।
    अब हर बात ऐसी सच्चाइयों से रूबरू करवाते हैं जो बड़ी ही कड़वी होती हैं। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ एक धुंध में खोया हुआ है सब निकलना चाहते हैं लेकिन रास्ता किसी को भी नजर नहीं आ रहा।
    शुक्रिया तेजेंद्र जी पत्रिका पाक्षिक हो जाने के बाद भी संपादकीय हर शनिवार को याद आएगा।
    आपका संपादकीय श्रम बेहद प्रशंसनीय है। संपादकीय की प्रस्तुति के लिये नीलिमा शर्मा जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।
    पुरवाई का तो बहुत- बहुत आभार बनता ही है।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने संपादकीय के मर्म को समझ कर पंच परमेश्वर से तुलना करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।

  20. समाज को सही दिशा देने का कार्य न्यायपालिका का है वही जब अपराध को बढ़ावा देने का मार्ग सुगम करे तो समाज की रक्षा कौन करे?।अपराध सिद्ध हो जाने के बाद भी बेल देकर छोड़ना समाज में विकृति को बढ़ावा देना ही है।किंतु हम सभी बात ही करते हैं।न्यायाधीश के विरुद्ध अपनी असहमति जताते हुए न्यायिक कार्यवाही नहीं करते अतः राजकुमार बने हुए हैं जज।जनता को विरोध मुखर करना ही होगा।
    आपका सम्पादकीय सदैव ही निष्पक्ष,संतुलित गागर में सागर के समान होता है।बधाई एक अच्छे सम्पादकीय के लिए।
    निवेदिता श्री

  21. अरविंद केजरीवाल पर अपराध सिद्ध नही हुआ है। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी में क्या दुर्भावनाओं की बू नही आती ? यह अभिप्राय नही है कि कोई भी पाक साफ होगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उन्ही निर्णयों पर लोगों की उंगली उठती है जो अपनी विचारधारा के पक्ष में नही होते।एक छोटा सा पत्रकार जो फेक न्यूज़ चला कर दंगा करवाता है (
    मनीष कश्यप) वह एक पार्टी विशेष जॉइन कर पाक साफ हो जाता है। ब्रज भूषण सिंह को न सही बेटे को टिकट मिल ही गया। सेंगर पर इतनी देरी और केजरीवाल तथा सोरेन जैसे जनप्रिय नेता जिन पर आरोप सिद्ध भी नही उनके मूल अधिकारों के सम्मान में अदालत ने छूट दे दी तो उनके बाहर हो चुनाव प्रचार करने पर इतनी घबराहट कि सर्वोच्च न्यायालय पर ही प्रश्न। शेष निर्णय जो एक पक्ष विशेष के फ़ेवर में आये उन पर वाह- वाह और जो अपने खिलाफ हुआ उस पर थू -थू ये कुछ जमा नही

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