Friday, April 17, 2026
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उर्मिला शिरीष की कहानी – एक पेड़ उनके नाम

गैती फावड़ा लेकर मजदूर खड़े हैं। कम से कम साठ गड्डे खुद चुके हैं। कितनी दूरी पर कौन सा पेड़ लगाया जाये यह तय हो चुका है। किस पेड़ की शाखाएँ कितनी दूर तक फैलती है और कौन सा पेड़ कितनी ऊँचाई तक जाता है यह भी पता कर लिया है। पहले तो मिट्टी की जाँच करवायी गयी फिर बनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञ पर्यावरणविद से सलाह ली गयी। पीली पथरीली मिट्टी में बड़ी मुश्किल से फलदार वृक्ष लगते हैं पानी भी नहीं ठहरता है लेकिन उनके मिशन में कोई कमी नहीं आई थी लगातार वृक्षारोपण का काम चलता रहता था बावजूद इसके कि हर साल लगाये गये दस प्रतिशत पेड़ ही बचते थे। तुम जो पेड़ों को लेकर इतने पागल थे आज तुम्हारे नाम का पेड़ लगाने के लिए मैं पागल हुई जा रही हूँ। एक ऐसा पेड़ जो आकाश की ऊँचाई तक पहुँचकर तुम्हें देख सके] अपनी हवाओं से तुम्हें चूम सके] अपनी हरीतिमा और खुशबू से तुम्हारे मन, हृदय और आत्मा को आल्हादित कर सके। ऐसा पेड़ जिस पर हजारों परिन्दे आकर बैठ सकें और अपने कलरव से तुम्हें जगा सके] तुम्हारे लिए कोई अनूठा पेड़ ही लगाना पड़ेगा। मैं तुम्हारा वृक्ष, प्रेम जानती हूँ। तुम्हारी जेबों में रूपये पैसों की जगह बीज हुआ करते थे। तुम्हारे टिफिन में उस दिन खाये फलों] आम] सीताफल] जामुन] बेर की गुठली हुआ करती थी। कोई भी बीज फेंकना मत। सारे बीज और गुठलियाँ शांता को देना है] वो अपने खेत पर लगायेगी। फिर मैं देखती जितनी भी पालीथिन की थैलियाँ होती] लिफाफे होते हरेक में कोई कोई बीज पड़े होते। कई बार तो वे बीज काले पड़ जाते थे या उनमें फफूँद लग जाती थी।
‘‘क्या घिनापन मचा रखा है।” मैं झुंझलाकर कहती।
‘‘तुम्हारे कारण मुझे बीज तक छुपाकर रखने पड़ते हैं।‘‘
‘‘यही जगह मिलती है बीज रखने के लिए।‘‘
‘‘तो कहाँ रखूँ हर जगह तो तुम्हारी कुदृष्टि पड़ जाती है।‘‘ 
‘‘जाकर देखो मेरे आफिस के आसपास कितने गेंदा के फूल] नीम] पपीता और नीबू के पेड़ लगवा दिए हैं मैंने। और आम के पेड़ तो पचासेक लगवा दिए हैं भागीरथ के खेत पर।‘‘
‘‘नर्सरी में इतने अच्छे पौधे मिलते हैं बड़ेबड़े पौधे क्या पेड़ मिलते हैं] तुम्हारे बीजों का कोई क्यों इंतजार करेगा!‘‘
‘‘तुम नहीं समझोगी। बीज को अंकुरित होते देखने का अलग ही आनंद होता है।तुम अपनी बात पर अडिग रहते।
‘‘देखो भाई मैं ठहरा जंगली आदमी। बचपन जंगल के बीच ही बीता है। मेरा संबंध पेड़ों के साथ वैसा ही है जैसा तुम्हारा अपनी बहिनों के साथ।‘‘
मैं हँसकर टाल देती। जब तुम अपने लिए मकान तलाश रहे थे तो तुम्हारी एक ही इच्छा या मांग रहती थी कि आसपास पेड़ होना चाहिए। पेड़ नहीं तो घर नहीं। मैं परेशान हो जाती कहाँ से लाऊँ तुम्हारे लिए पेड़। एक से एक खूबसूरत फ्लैट और मकान तुमने सिर्फ इसलिए छोड़ दिए थे कि वहाँ पेड़] पौधे और हरियाली नहीं थी।
‘‘तुम तो शहर के बाहर प्लाट या खेत ले लो वहीं अपना मकान बनवा लेना।‘‘
फिर तुम्हारी तलाश ठहर जाती। तुम घण्टों तक शांता के फार्महाऊस पर जाकर पत्थर पर तकिया लगाकर किसी पेड़ के नीचे लेटे रहते। पेड़ों की घनी छांव में सो जाते। वहीं खाना खाते।
‘‘ये आदमी सचमुच जंगली है।‘‘
‘‘तुम क्यों चिढ़ती हो।शांता मुझे टोकती।
‘‘चिढ़ने की बात नहीं है। हम लोग अपना एक मकान तक नहीं ले पा रहे हैं।  कम से कम पचास मकान देख चुके हैं कोई पसंद ही नहीं आता है।‘‘
‘‘एकाद खेत ले लो वहीं दो कमरे का मकान बनवा लेना। आसपास पेड़ लगा लेना।‘‘
‘‘क्यों शांता तुम्हें याद है। सात आठ साल पहले हम यहाँ आते थे। कितना घना जंगल हुआ करता था। आज तो आधा जंगल बचा है लोगो ने प्लाट काट लिए हैं। पेड़ों की कटाई कर ली चोरी छुपे।
‘‘रात में तेंदुआ घूमता है। एक बार तो पेड़ पर चढ़कर छत पर गया था। मकान के चारों तरफ बामियों में सांप रहते हैं। बिच्छुओं की तो लाईन लगी रहती है। लोग शहर से बाहर जंगल की तरफ रहे पर जंगल को खतम करके। किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। कितनी बार शिकायतें की हैं। सबकी मिलीभगत रहती है।
‘‘अपना ग्रुप बनाते हैं।‘‘
‘‘उससे क्या होगा?‘‘
‘‘निगरानी रखेंगे।‘‘
‘‘सरकारी लोगों का तुम विरोध कर पाओगे।‘‘
‘‘तुम्हारी दीदी कितनी डरपोक है। कोई कदम उठाओं इससे पहले ही सौ खतरे नजर आने लगते हैं उन्हें।‘‘
‘‘चलो घूमकर आते हैं! आज वीडियों बनायेंगे और फोटो भी लेंगे।‘‘
‘‘इस समय जानवर पानी पीकर वापस जाते हैं। अंधेरे में कुछ पता नहीं चलेगा।‘‘
‘‘मैं तो जब भी लौटता हूँ मेरा सामना कितने जानवरों से होता है तेंदुआ] लकड़बग्घा] नीलगाय] हिरन।‘‘
‘‘आपको डर नहीं लगता?‘‘
‘‘डर काहे का। गाड़ी रोकर उन्हें सड़क पार करने देता हूँ। बेचारे पानी की तलाश में सड़कों पर भटकते हैं।‘‘
मैं जानती थी तुम्हारी सहानुभूति हमेशा जंगल] जानवरों और वहाँ रहने वाले लोगों के प्रति रही है।
तुम अपनी गाड़ी उठाते और जंगल की तरफ निकल जाते। डूबती शाम का आसमान सघन अंधकार में डूब जाता। वृक्षों के पत्तों घास और झाड़ियों से उठती सरसराहट भय से भर देती। जंगल से लकड़ी बीनकर लौटते लोग तेज कदमों से रहे होते।
‘‘और आगे मत जाओ।‘‘
‘‘रातभर यहीं रुकते हैं। वो बरामदा सा दिख रहा है] वहीं चलते हैं।‘‘
‘‘नहीं। वहाँ खतरा है। कोई भी जानवर हमला कर सकता है।‘‘
‘‘जानवरों के घर और उनकी स्वतंत्रता हमने छीन ली है।‘‘
‘‘वहीं रटीरटायी बातें।‘‘
‘‘रटीरटायी बातें क्या? उनके आसपास कोई नदी] तालाब और पोखर नहीं बचा है। सत्य को स्वीकरना सीखो। हम जो क्रूरता कर रहे है उसको स्वीकारो। मुझे तकलीफ होती है। मेरा दिल फट जाता है। क्योंकि मैं इन सबके बीच रहा हूँ मेरा लगाव इन सबसे है।‘‘
‘‘तो नौकरी छोड़कर इसी काम में क्यों नहीं लग जाते हो।‘‘ मैंने कटाक्ष किया था।
‘‘वही करूँगा।‘‘
अब समझ में आया कि तुम रातरातभर प्लानेट] डिस्कवरी और ऐसे ही अन्य चैनल क्यों देखते थे।
‘‘अच्छा ये बताओ जब तुम्हें जंगलों से इतना प्यार है] इतनी चिंता है तो वहीं क्यों नहीं रहते। शहर में क्यों गये।‘‘
‘‘जीविका के लिए। घर की जिम्मेदारियाँ कौन पूरी करेगा। मैंने ऐसीऐसी जगह पोस्टिंग ली जहाँ कोई जाना पसंद नहीं करता था।‘‘
‘‘हाँ ये तो मानना पड़ेगा।‘‘
‘‘चलिए। हम वापस लौट रहे थे। लौटते हुए अजीब सी दुर्गन्ध से गुजरना पड़ा।
‘‘कोई जानवर मर गया है।‘‘
‘‘गाँव वाले गायों को खुला छोड़ देते हैं। जंगली जानवर उनका शिकार कर लेते है। दिन में चील कौअे मॅडरा रहे थे।‘‘
‘‘अक्सर बूढ़ी और दूध देने वाली गायों को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं।‘‘
‘‘हर चीज का एक सिस्टम होना चाहिए। बिना सिस्टम के इंसान हो या प्रकृति सभी अराजक हो जाते हैं।‘‘
तुम हर समस्या पर विषय पर बहस करते थे। अपना मत रखते थे। तुम्हारी बातों को लोग बहुत गौर से सुनते थे।
उस दिन तुम बरामदें में लेटे थे, हालांकि चारों तरफ जाली लगी थी पर तेंदुआ तो पेड़ से लेकर दीवारों तक को फांदकर अंदर जाता है।
‘‘अंदर जाओ। तेदुंआ का डर है।‘‘
‘‘यहाँ ठण्डी हवा रही है। मुझे आज रात जागकर उस गिरोह को पकड़ना है जो रात में पेड़ों की कटाई करता है।‘‘
‘‘देखो ज्यादा वीर बहादुर बनने की जरूरत नहीं है। वे सब तुम्हारे ऊपर हमला करके जंगल में गायब हो जायेंगे। बहुत खूंखार होते हैं। उनको किसी के प्राणों की परवाह नहीं होती।‘‘
‘‘देखते हैं। मैं जानती थी कि तुमने एक बार जो बात ठान ली है वो करके ही रहोंगे। मैं भी बाहर बैठी ठण्डी हवा का आनंद लेती रही। अंधेरी रात्रि में चमकते सितारे मुझे बचपन में लौटाकर गाँव की सैर करवा रहे थे। चाँदनी में सारी चीजें पेड़पौधे] शाखें] फूल पत्ते खूबसूरत स्पंदित और मादक लग रहे थे। चारों तरफ चाँदनी का सम्मोहन सम्मोहित कर रहा था।
‘‘मैं सोने जा रही हूँ।‘‘
‘‘मैं भी आता हूँ।‘‘
पर सुबह जब मेरी नींद खुली तो तुम वहाँ नहीं थे। बिस्तर तह किया हुआ रखा था। मोटर चलाकर पानी भर दिया था।
‘‘कहाँ हो?‘‘ मैं फोन लगाया।
‘‘घूमने निकल गया था। शांता की बाई डाली महुआ के नशे में थी। गिरगिर पड़ रही थी। कभी हंसती तो, कभी जिद करती] साहब आप भी पी लो।‘‘
‘‘अरे, अब कहाँ है डाली।‘‘
‘‘घर चली गयी।‘‘
‘‘उसे छोड़ो मेरा सपना सुनो। आज मैंने बड़ा अजीब सा सपना देखा।‘‘
‘‘कैसा सपना?‘‘
मेरे सपने में भविष्य का रूप दिखाई दे रहा हैं। भविष्यवाणी मान सकती हो।‘‘
‘‘पहले सपना बताओ।‘‘
‘‘मैंने देखा कि सारी पृथ्वी पानी में डूब गयी है। सब कुछ खतम हो गया है। मैं तुम लोगों को ढूँड़ता हुआ इधरउधर भाग रहा हूँ पर पानी के कारण कहीं नहीं जा पा रहा हूँ] पानी से बाहर निकलकर सूखी जगह तलाशता हूँ। चारों तरफ मरे हुए लोग, जानवर और कीड़े मकोड़े पड़े है। सारे पेड़ उखड़ गये हैं। मकान] बड़ेबड़े किले ढह गये हैं। मुझे समय का पता नहीं है। मैं महीनों तक यूं ही भटकता रहता हूँ। एक जगह जाकर देखता हूँ कि मिट्टी] कीचड़ और पत्थरों के बीच एक छोटा सा पौधा उग रहा है। बस तभी मुझे एहसास होता है कि सब कुछ खतम हो जायेगा लेकिन बीज खतम नहीं होगा। वह धरती के जिस छोर पर गिरेगा वहीं अंकुरित हो उठेगा। यही है जीवन का पुनर्जन्म] सृष्टि की पुनर्संरचना।
‘‘तुम रात दिन बाढ़ के दृश्य देखते रहते हो वही तुम्हारे अचेतन मन में रहता है। इसलिए सपने भी वैसे ही आते हैं। और मुझे तो लगता है तुम कामायनी की कहानी सुना रहे हो। अपने आपको मनु तो नहीं समझ रहे हो। मैं ठहाका लगाकर हंस रही थी और तुम मेरा चेहरा देखकर मुस्करा रहे थे। उड़ाओ मजा़क] मेरा मज़ाक उड़ाने से हकीकत नहीं बदलेगी।‘‘
और एक दिन वही अप्रत्याक्षित घटना घट गयी थी जिसकी हमने कल्पना नहीं की थी। जंगल में तुम्हारे ऊपर किसी ने हमला कर दिया था। लोग तुम्हें घायल करके भाग गये थे] तुम उनका पीछा कर रहे थे। उनकी चोरी पकड़ने जा रहे थे। तब मेरा तुमसे झगड़ा हो गया था। शांता तुम्हारी देखभाल कर रही थी। मेरे भीतर अज्ञात भय घर कर गया था।
फिर यह सिलसिला चल निकला था। हाँ अब तुमने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ हथियार रख लिए थे और तुम्हारी जिद के सामने नतमस्तक होकर हमने यहीं पर खेत ले लिया था। बंजर खेत। पीली मिट्टी वाला खेत जिसमें इक्केदुक्के पेड़ खड़े थे। उससे आगे के खेतकिनारे महुआ और चिरौजी के पेड़ लगे थे पर हमें तो अभी पत्थर निकलवाने थे। जमीन समतल करवानी थी। यह सब होता इसके पहले ही तुम हमें छोड़कर चले गये। चले गये यूँ जैसे कोई तूफान आता है और सब कुछ तहसनहस करके चला जाता है। चले गये यूँ जैसे आग की लपटें पूरे जंगल को जला देती हैं। चले गये यूँ जैसे आँधी के साथ बिजली गिरती है और किसी भी पेड़ जानवर या इंसान को जलाकर खतम कर देती है। तुम चले गये। तुम्हारा सपना था इस बंजर भूमि में पेड़ लगाना। तुम्हारा सपना था पेड़ों के बीच] पेड़ो के साथ रहना इसलिए आज तुम्हारे नाम का यह पेड़ मैं लगा रही हूँ। जैसेजैसे पेड़ बढ़ेगा उसकी शाखें फैलेंगी। उस पर परिन्दे आकर कलरव करेंगे। उनके पत्तों से सरसराहट उठेगी, उनको छूकर हवा बहेगी] उन शाखों से छनकर सूरज की रोशनी और चाँद की चाँदनी बिखरेगी\ मैं समझूँगी तुम यहीं हो इन्हीं रूपों में। धीरेधीरे तुम्हारें नाम का यह पेड़ असंख्य पेड़ों में बट जायेगा और एक दिन ऐसा आयेगा जब चारों तरफ पेड़ ही पेड़ होंगे। क्योंकि तुम्हारा फेंका बीज उड़कर किसी भी जगह गिरकर फिर एक नया पेड़ बनेगा और इन पेड़ों से आने वाली हवाओं को] हरेपीले रंगों को] खुशबू को मैं अपने गालों पर महसूस करूँगी। तब मुझे सचमुच इनका स्पर्श तुम्हारे प्यार से सराबोर कर देगा।
उर्मिला शिरीष
503] आर्चिड] रुचिलाईफस्केप] जाटखेड़ी
होशंगाबादरोड] भोपाल 462043
मोनं– 9303132118
ईमेल[email protected]
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1 टिप्पणी

  1. इस कहानी ने स्तब्ध कर दिया उर्मिला जी!।समझ ही नहीं आ रहा की कहानी के लिए क्या लिखा जाए। जब किसी इंसान में कोई रुचि शौक बनकर जकड़ जाती है तो उससे बाहर निकलना बड़ा मुश्किल होता है,पर इस तरह खतरों से खेलने निश्चित रूप से साहस का काम है। जंगलों के जानवरों का डर उतना नहीं रहता जितना आजकल इंसानों का है। जानवरों का हमला अपनी भूख के लिए होता है पर इंसानों का हमला!!! अपने हित के लिए इंसान किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है। ऐसी शख्सियत के लिए पेड़ लगवाना ही सही श्रद्धांजलि होती है। बहुत ही अच्छी कहानी है और प्रेरणास्पद भी। बहुत-बहुत बधाई आपको।

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