इस कहानी ने स्तब्ध कर दिया उर्मिला जी!।समझ ही नहीं आ रहा की कहानी के लिए क्या लिखा जाए। जब किसी इंसान में कोई रुचि शौक बनकर जकड़ जाती है तो उससे बाहर निकलना बड़ा मुश्किल होता है,पर इस तरह खतरों से खेलने निश्चित रूप से साहस का काम है। जंगलों के जानवरों का डर उतना नहीं रहता जितना आजकल इंसानों का है। जानवरों का हमला अपनी भूख के लिए होता है पर इंसानों का हमला!!! अपने हित के लिए इंसान किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है। ऐसी शख्सियत के लिए पेड़ लगवाना ही सही श्रद्धांजलि होती है। बहुत ही अच्छी कहानी है और प्रेरणास्पद भी। बहुत-बहुत बधाई आपको।
इस कहानी ने स्तब्ध कर दिया उर्मिला जी!।समझ ही नहीं आ रहा की कहानी के लिए क्या लिखा जाए। जब किसी इंसान में कोई रुचि शौक बनकर जकड़ जाती है तो उससे बाहर निकलना बड़ा मुश्किल होता है,पर इस तरह खतरों से खेलने निश्चित रूप से साहस का काम है। जंगलों के जानवरों का डर उतना नहीं रहता जितना आजकल इंसानों का है। जानवरों का हमला अपनी भूख के लिए होता है पर इंसानों का हमला!!! अपने हित के लिए इंसान किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है। ऐसी शख्सियत के लिए पेड़ लगवाना ही सही श्रद्धांजलि होती है। बहुत ही अच्छी कहानी है और प्रेरणास्पद भी। बहुत-बहुत बधाई आपको।