1 – माँ
वटसावित्री की पूजा करके बेटा– बहु आशीर्वाद लेने पापा जी के पास आए तो नन्हा अखिल बाबा के पास बैठ गया।
अखिल–बाबा,माँ आज इतना सज कर पेड़ के पास क्यूँ गयी??
बाबा–बेटा आपके पापा की लंबी उम्र के लिए।
अखिल–दादी भी करती थीं?
बाबा–हाँजी। तभी तो मेरी उम्र इतनी है।आपके पापा की उम्र भी भगवान बढ़ा देंगे।
अखिल कुछ सोचते हुए–बाबा आपने पूजा क्यूँ नहीं की? दादी भी होतीं आज।
फिर अचानक पापा की ओर मुड़ कर बोला,
“आप भी पूजा करो पापा। मुझे माँ हमेशा चाहिए।“
2 – आधुनिका
फोन पर ही दहाड़ मार कर रोने की आवाज सुन कर सीधे उसके फ्लैट पर ही आ गयी,
“क्या हुआ है? इतनी दुखी क्यूँ है?तू तो आराम से लिव इन में थी न।क्या झगड़ा हो गया?”
“क्या कहूँ और किस मुँह से कहूँ कि आज वो किसी और के फ्लैट में चला गया।उसे अब मेरे साथ कोई फीलिंग नहीं महसूस होती ये कह रहा था।जो पिछले साल भर तक जीने–मरने की कसम खाता रहा।मुझे सब्ज़ बाग दिखाता रहा।अब उसका मन भर गया।ऐसा भी होता है क्या?”
“सच्ची–सच्ची बात बता दिल पर हाथ रख कर।तुझे अधिक पैकेज वाला ,इससे भी हैंडसम लड़का मिलता तो भी तू इसके साथ रहती???”
“………….”
3 – बिगड़ रहे हो
चिड़ा – ”कितनी दुबली हो गई हो।पिछले माह ही तो हमारे घोसले में जब आईं तो कितनी हृष्ट पुष्ट थीं।”
चिड़ी –”हां, मां जी कहती हैं नजर लग जाएगी।बाहर न निकल। बाहर फुदके बिना भूख ही नहीं लगती तो दाना नहीं चुगती।मुफ्त में डायटिंग हो रही जी।स्लिम–ट्रिम अच्छी नहीं लग रही तुमको?”
चिड़ा – ”अच्छी तो लग रहीं हो पर कमजोर हो जाओगी।मैं नया घोसला बनाता हूं आज।शाम से खूब फुदकना।”
चिड़ी–” भक्क ! जरा–जरा सी बात पर मनुष्यों की तरह मां –बाप को छोड़ दोगे?बिगड़ रहे हो..”
4 – पहले आप
“माझी जो नांव डुबोए उसे कौन बचाए…”
“क्या भैया सुबह से ही ये क्या मनहूस गाना गाए जा रहे हो?”
उत्तर देने की जगह भैया गीली आंँखों से बहन को ही देखने लगे।
“क्या भाई! किसी गोपी ने दगा दे दिया क्या? चिंता काहे की? तुम तो कृष्ण कन्हैया हो।“
तभी कमरे से अम्मा निकल आयीं,
”तुम्हारे चरित्तर पता चल गए बबुआ को।चिट्ठी तुम्हारी किताब से जो गिरी वो बबुआ को मिली।अब का मुंह दिखाएंगे घर के मर्द।“
”वही मुँह दिखाएंगे अम्मा जो दस–दस घर की लड़कियों से प्रेम की पींग बढ़ाते हुए दिखाते रहे।हम तो सच्चा प्यार करते हैं। हाँ, नहीं तो..हमारा मुंँह न खुलवाओ। पहिले अपने गिरेबान में झाँके तुम्हारे घर के मर्द।“

निवेदिता श्रीवास्तव
संपर्क – [email protected]

बहुत सुन्दर लघुकथाऐं.
सारी लघुकथा बहुत अच्छी , सार्थक विषय चुन।
निवेदिता जी, आपकी सभी लघुकथाएं अच्छी लगीं । विशेष रूप से “माँ” बहुत अच्छी लगी।
अच्छी लघुकथाएं, माँ बहुत अच्छी लगी
निवेदिता जी!
आपकी सारी लघुकथाएंँ पढ़ीं। सभी अच्छी और प्रेरणास्पद लगीं।
माँ
यह सबसे अच्छी लगी । आजकल के बच्चे अक्सर इस तरह के प्रश्न पूछते हैं। बच्चा जब तक छोटा रहता है तब तक वह माँ से अधिक जुड़ा रहता है। बच्चों का प्रश्न पूछना और जवाब देना, दोनों ही बहुत स्वाभाविक था।
आधुनिका-
यह लघु कथा तो बहुत संसार माइक है आजकल जो यह लिविंग में रहने का चलन नजर आ रहा है यह नहीं होना चाहिये। लड़कियों का नुकसान ज्यादा होता है।लेकिन सिवाय शारीरिक सुख और स्वार्थ के कुछ नहीं। “तू नहीं और सही और नहीं और सही” वाला मामला है।
इस पर प्रतिबंध लगना चाहिये। पर आपकी लघु कथा ने यह बताया- जहाँ मन की चीज मिली उस ओर मुड़ गए, चाहे वह रूप हो, चाहे पैसा।
बिगड़ रहे हो
यह लघु कथा प्रतीकात्मकता में है। चिड़ा और चिड़ी के माध्यम से।
जबकि बच्चों के बड़े होने के बाद तो वे उड़ ही जाते हैं यहाँ थोड़ा हम विचार में पड़े। थोड़ा दुविधा में ही हैं कि क्या यह प्रतीक सही है!
पर फिर हमें जातक कथाएँ याद आईं। संदेश गंभीर है यह मायने रखता है।
पहले आप
आजकल तो यही हो रहा है। बड़ी जगह पर तो शादियाँ हो जाती हैं लेकिन छोटी जगह पर इसे सम्मान का विषय बना लिया जाता है। पर बेटी का इस तरह से बोलना खटका। अपने ही घर के लोगों के लिए इस तरह से बोलना थोड़ा सा हमें तो नागवार गुजरा।
एक अच्छा संदेश था लघु कथा लेकिन जिस ढंग से कहा गया वह ढंग थोड़ा बुरा लगा। ऐसा भी नहीं है कि इस लड़कियाँ इतनी बदतमीज नहीं होती। इससे ज्यादा भी हो सकती हैं पर हमें ऐसा लगता है लिखते समय अपनी शैली परिमार्जित रहे।
जब भी लेखन के लिए अपन कोई ऐसा विषय चुनते हैं जो बहुत बहुत कॉमन हो या जिस पर बहुत लेखनी चल चुकी हो तो हमें अपनी शैली में प्रभावशीलता लाने की जरूरत होती है।ऐसा हमें लगता है।निर्धारित खाँचे
में सटीक बैठती संदेशप्रद लघुकथाओं के लिये आपको बधाइयाँ।