सुबह हो चुकी थी। शीतल, सुगन्धित समीर उसके भीतर एक नई ऊर्जा भर रही थी। मम्मी ने उसे स्नेह से सहलाया तो उसके होंठों पर मुस्कान बिखर गई। उसने माँ के हाथ के इर्द गिर्द अपनी बाहें लपेट लीं। मम्मी ने उसके मस्तक पर स्नेह चिन्ह अंकित कर, उसे दुलराया। अलस भाव से वह उठ खड़ा हुआ। थोड़ी देर बाद स्कूल के लिए तैयार होकर निकला तो उसका चेहरा दमक रहा था। तभी उसके बेस्ट फ्रेंड राहुल ने उसे आवाज़ लगाई। वह दौड़ता हुआ बाहर निकला। स्कूल बस आ चुकी थी। दोस्तों के साथ चहकता, कूदता, वह बस में सवार हो गया। सब अपनी- अपनी बातें, अपने अनुभव बता रहे थे। स्कूल आया तो उसने अपने दोस्तों के साथ, एक दूसरे को मजाक में हाथ मारते हुए क्लास की ओर दौड़ लगा दी। वह अंधाधुंध दौड़ा जा रहा था, कि अचानक उसकी क्लास टीचर ने उसे पकड़कर झिंझोड़ डाला।
” अथर्व बेटा उठ जा, लोकेशन आ गई। ” मम्मी ने कहा तो वह स्वप्न से जाग गया। एक मीठा स्वप्न टूट गया था। उसने दृष्टि दौड़ाई तो पाया, कि उनकी कार, आर. आर. स्टूडियो के सामने खड़ी है। आसपास का जायजा लेते हुए, उसका खिला हुआ चेहरा मुरझा सा गया। उसके भीतर एक तीखी उदासी भरती चली गई।
” चल बेटा,गाड़ी से उतर ” मम्मी ने उसे लाड़ से कहा, पर वह न जाने किस सोच में पड़ा था। उसका जी चाह रहा था कि वह कहीं गायब हो जाए, जहाँ उसके खूब सारे दोस्त हों। वह उनके साथ स्कूल जाए, टिफ़िन शेयर करे। क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन खेले। उनके साथ साइकिलिंग करे। पार्क में जाए, खूब धींगामुश्ती करे। उसकी आँखों में मायूसी थी।
” अथर्व बेटा, क्या सोच रहे हो ? देर हो रही है, अंदर चलो। ” मम्मी ने उसका हाथ पकड़कर बाहर की ओर खींचा, तो न चाहते हुए भी, वह बाहर आ गया। फ़िर मम्मी उसका हाथ पकड़े हुए उसे लेकर स्टूडियो के अंदर चल दीं। नायक के साथ फिल्माए जाने वाले दृश्य की शूटिंग चल रही थी। वह यन्त्रचलित सा मम्मी के साथ चलता हुआ अपनी कुर्सी पर बैठ गया। एक असिस्टेंट उसे दृश्य समझा रहा था, परन्तु अथर्व का ध्यान न जाने कहाँ था।
” क्या बात है बेटा ? कोई परेशानी है ?” मम्मी ने पूछा तो उसने इनकार में सर हिला दिया।
” मेरा राजा बेटा आइस्क्रीम खाएगा ?”
उन्होंने पुनः पूछा। उसने अस्वीकृति में सर हिला दिया।
” चॉकलेट खाएगा ?” उसने फिर से इनकार कर दिया। मम्मी ने उसे स्पर्श करके देखा, तो देह का तापमान भी सामान्य निकला । उन्हें लगा कि शायद वह कहीं घूमने जाने को बेचैन है।
” बेटा अभी शूटिंग निबटा लो, फिर हम आपको घुमाने चलेंगे। ” उसने जवाब न दिया। बस सूनी नज़रों से उन्हें ताकता रहा।
शॉट रेडी होने पर अथर्व को बुलाया गया। वह अन्यमनस्क सा मम्मी के साथ चल दिया। फ़िल्म में वह नायक का पुत्र बना था। दृश्य में उसके पिता उसके लिए, उसका मनपसंद रिमोट वाला हेलीकॉप्टर लेकर आते हैं और वह प्रसन्नता से उछल पड़ता है। फ्लैप के बाद शॉट शुरू हुआ, परन्तु अथर्व के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव न आ सके। वह निरुत्साहित सा अपना पात्र अभिनीत कर रहा था। एक के बाद एक रीटेक हो रहे थे। हर रीटेक के बाद उसकी ऊर्जा समाप्त सी होती लग रही थी। सब आश्चर्य से उसे देख रहे थे। जो बच्चा बड़े उत्साह से दो तीन बार में अपना शॉट ओके करवा लेता था, आज एकदम भावशून्य लग रहा था। वहाँ उपस्थित पूरी यूनिट हैरान थी, अथर्व को आज क्या हो गया ? इतना मायूस और निरुत्साहित क्यों हो रहा है ? उसकी मम्मी से पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर कर दी। एक बार पुनः दृश्य प्रारम्भ किया गया। नायक समीर खान जैसे ही हेलीकॉप्टर लेकर आता है और बेटे की ओर बढ़ाता है, अथर्व की आँखों से अश्रु टपक पड़े। यह देखकर समीर ने उसे हृदय से लगा लिया
” क्या बात है दोस्त, आज इतने उदास क्यों हो ?” वह फूट फूटकर रो पड़ा। समीर ने उसे गोद में उठा लिया। जितना उसे चुप कराने का प्रयास किया, वह उतना ही बिलखने लगा। अंत में उस दिन का शॉट अगले दिन फिल्माने का निर्णय लिया गया। अथर्व की माँ स्मिता उसे लेकर चिंतित सी गाड़ी में आकर बैठ गई। अथर्व उदास सा माँ से चिपका बैठा था। गाड़ी दौड़ी जा रही थी।
स्मिता हैरान परेशान सी बैठी थी। उसके नेत्रों में कुछ वर्ष पूर्व के दृश्य घूम रहे थे। पाँच वर्ष का अथर्व, टीवी और फिल्मों में जो देखता, उसे हूबहू दोहरा देता था। उसकी इस अदा पर सभी रीझ जाते थे। जहाँ जाता, सब उसे अभिनेता,अभिनेत्री की, नकल उतारने को कहते। वह भी खुश होकर तुरन्त नकल उतारने लगता। लोगों के द्वारा की गई, तीव्र करतल ध्वनि, उसे उछाह से भर देती थी। माता पिता को अपनी इस विलक्षण सन्तान पर बहुत गर्व था। ऐसे में टेलीविजन पर अन्य रियलिटी शो की तरह, बच्चों के लिए, एक रियलिटी शो शुरू होने वाला था, ” कौन बनेगा कलाकार ” । जिसके लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन व उसके बाद ऑडिशन होना था। स्मिता व उसके पति के मन में भी अपने बेटे को कलाकार बनाने का सपना पलने लगा। क्यों न हम भी एक बार भाग्य आजमाकर देखें ! पति पत्नी दोनों ने एक दूसरे को सपनीली दृष्टि से देखा। शायद उनके स्वप्न सच हो जाएं ! अथर्व के भाग्य के सितारे कुछ ज्यादा ही प्रबल थे। उसका रजिस्ट्रेशन भी आसानी से हो गया और फिर ऑडिशन में भी चुन लिया गया।
माता पिता के सपनों को पंख लग गए और नन्हा अथर्व अचानक ही सेलिब्रिटी बन गया। शो की, एक के बाद एक पायदान, को अपने नन्हें कदमों से नापते हुए, वह अंतिम चरण तक पहुँच गया और शो का खिताब हासिल कर लिया। रातोंरात वह शहर का सबसे चर्चित और चहेता बच्चा बन गया , जिसके हुनर व भोले चेहरे को देखकर हर कोई मोहित हो उठता। बस फिर अथर्व को अवसर मिल गया, सबके चहेते स्टार, अजय कुमार के साथ काम करने का। अथर्व के अभिनय ने सबका ध्यान खींचा और उसे एक के बाद एक फ़िल्म, और ढेर सारे विज्ञापनों के प्रस्ताव मिलते चले गए।
कुछ ही समय में वह सबका दुलारा, बाल कलाकार बन गया। कई हिट फिल्में खाते में आ जाने से , अच्छी कमाई भी होने लगी और स्मिता व उसके पति के सपने, बच्चे के माध्यम से पूरे होने लगे। ढेर सारा पैसा, लोगों के मध्य महत्वपूर्ण हो जाना, यह सब उनदोनों को अति महत्वाकांक्षी बना रहा था। अब धन के सिवा बाकी सभी चीजों का महत्व उनकी दृष्टि में गौण हो गया था। शुरू में तो अथर्व के स्कूल का इतना नुकसान नहीं होता था। परन्तु जैसे जैसे काम बढ़ता गया , उसका स्कूल छूटता सा चला गया। एक ट्यूटर लगा दिया गया। जिससे उसकी पढ़ाई तो सुचारू रूप से चल रही थी, पर उसे खेलने या दोस्तों से मिलने का समय नहीं मिलता था। अथर्व अक्सर स्कूल के दिनों को याद करके उदास हो जाता। अब उसे दोस्तों के साथ खेलने का समय भी नहीं मिलता। जब समय मिलता, तो फ़िल्म के सेट पर ,वह अपना होमवर्क व पढ़ाई करता।
उसका मन बहलाने के लिये मम्मी पापा ने उसे महँगा वाला टैबलेट दिला दिया था। जिसमें कई गेम पड़े हुए थे। शुरू में तो वह टैबलेट पाकर निहाल हो गया था। उसमें पड़े गेम खेलने में बहुत मजा आता था। जब गेम से ऊब जाता, तो यूट्यूब पर कार्टून देख लेता। पर गुज़रते समय के साथ वह ऊबने लगा था। उसके भीतर गहरी उकताहट व खीज भरने लगी थी। अब उसे अपने दोस्तों की याद आने लगी थी। उसका मन उनके साथ भागने – दौड़ने को करने लगा था। वह उनके साथ आसमान में बहुत ऊँची पतंग उड़ाना चाहता था। रेस लगाना चाहता था। तितली पकड़ना चाहता था। वह हरे सुकोमल पत्तों पर थमी ओस की बूँद इकट्ठी करना चाहता था। पंछियों की अठखेलियाँ देखना चाहता था।
पापा ने उसे बैटरी वाली कीमती बाइक दिला दी थी। पर उसे चलाने में वह मजा कहाँ, जो दोस्तों के साथ साइकिल चलाने में आता। अब उसके चेहरे की मुस्कान गायब होने लगी थी। उसका बचपन, उसकी शरारतें, न जाने कहाँ गुम हो गई थीं। अब अचानक ही वह वयस्क हो गया था। घर का सबसे ज्यादा कमाने वाला सदस्य। सबके सपने पूरे करने वाला, उनकी ख्वाहिशों को ऊँची परवाज़ देने वाला। उसके भीतर का बच्चा, धीरे धीरे मुरझा रहा था, दम तोड़ रहा था। उसके अभिभावक सब कुछ भूलकर दोनों हाथों से धन व प्रसिद्धि बटोर रहे थे। एक अंधी दौड़ थी, जिसमें वह अंधाधुंध भागे जा रहे थे। उन्हें दम लेने की फुर्सत न थी। वे जानते थे कि बाल कलाकार की अभिनय यात्रा, बस कुछ ही समय की होती है। अथर्व दस वर्ष का हो चुका था। इसलिए जितना हाथ बढ़ाकर हासिल कर सकते हो, कर लो। बाद में कोई पूछने वाला नहीं होगा। इतिहास गवाह है कि कोई भी बाल कलाकार, बड़ा होकर सफ़लता का मुकाम नहीं हासिल कर सका है। इसलिए बस यही थोड़ा समय है। जिसे वह कसकर अपनी मुट्ठी में बांध लेना चाहते थे। अथर्व उनका मनपसंद खिलौना था। जो उनकी मर्जी से सब कुछ करता था।
कई बार वह नींद में होता पर मम्मी पापा उसे लाड़ से कहते कि बेटा अपना एक्ट करो , और वह नींद भूलकर कठपुतली की तरह उनके आदेश का पालन करने लगता। उसके आसपास के बच्चे, यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल जाते, पार्क में खेलते- कूदते, मस्ती करते, और अथर्व उन्हें ललचाई नज़रों से देखता रहता। उसे वह सब बच्चे बहुत खुशकिस्मत लगते। उसे यह भी हैरानी होती कि वे बच्चे कमाते नहीं हैं, बल्कि बेफिक्र होकर मस्ती करते हैं और काम पर उनके ‘ पिता ‘ जाते हैं।
अभी उस दिन की ही तो बात है। शूट पर जाते हुए बारिश हो रही थी। एक जगह झुग्गी झोपड़ी के इलाके में थोड़ा पानी जमा हो गया था। मैले, जीर्ण वस्त्रों में कुछ बच्चे, उस पानी में धमाचौकड़ी मचा रहे थे, एक दूसरे पर पानी उछाल रहे थे। अथर्व का मन एकदम से उन बच्चों के साथ पानी मे छपाक छपाक करने को मचलने लगा, पर यह किसी भी कीमत पर सम्भव नहीं था। अगर वह अपनी यह ख्वाहिश मम्मी पर जता भी देता तो वह उसे झिड़क देतीं। वह कहतीं की वो सब गंदे बच्चे हैं, वह उनके साथ खेलने की सोच भी कैसे सकता है ! उसने दृढ़ता से अपने होंठ भींच लिये। मम्मी ने उसे अपने आप से चिपका रखा था। उसने स्वयं को उनकी पकड़ से छुड़ाया और अलग होकर बैठ गया।
मम्मी ने एक बार उसे हैरानी से देखा, कुछ कहने को हुईं, फिर मौन रह गईं। घर पहुंचा तो सीधा अपने कमरे में चला गया। वहाँ जाकर उसने न कपड़े बदले और न जूते उतारे, ऐसे ही बिस्तर पर पड़ गया। उसे पुराने दिन याद आ रहे थे। वे दिन जब वह फिल्मों में काम नहीं करता था। तब कितना मजा आता था दोस्तों के साथ। एक बार सनी खूब सारे टैटू लेकर आया था, फिर उन सबने अपने हाथों पर टैटू बनाए थे। वह सभी टैटू सुपर हीरोज़ के थे। अथर्व ने आयरनमैन का टैटू लगाया था। उस समय वह स्वयं को वास्तव में आयरनमैन ही समझ रहा था। पापा का हेलमेट लगाकर वह बात करता हुआ, झूठमूठ की लड़ाई कर रहा था और दुश्मनों को धूल चटा रहा था।
बारिश होती थी, तो भीगने में कितना मजा आता था। वह बारिश के पानी में नहाता था। अब तो कभी भीगना चाहता है, तो मम्मी मना कर देती हैं। वह कहती हैं, कि भीगकर वह बीमार पड़ जाएगा, फिर शूटिंग पर नहीं जा पाएगा। इससे खूब सारे पैसों का नुकसान होगा। मम्मी-पापा को तो अब पैसे के सिवा कुछ सूझता ही नहीं। ये तो है, कि अब उसके पास महँगे- महँगे ढेरों खिलौने हैं, पर उन्हें अकेले खेलने में कोई मजा नहीं। अब वह मनपसंद चीज़ नहीं खा सकता। हर वक़्त बीमार होने का डर। गला खराब होने की चिंता। मम्मी पापा को अब उसकी नहीं,बस पैसे की चिंता ही रहती है। उसे कुछ नहीं चाहिए , बस अपना स्कूल, अपने दोस्त चाहिए। दूसरे बच्चों की तरह उसे खेलना, पढ़ना, उछलकूद करना है। पतंग उड़ानी है, बारिश के पानी में नहाना है। अगर कहीं वह चुपके से गायब हो जाए, और मजे से खेले कूदे, तो मम्मी पापा को कैसा लगेगा ? उसने स्वयं से प्रश्न किया। तभी मम्मी के आने की आहट हुई । उसका उनसे बात करने का मन नहीं था, इसलिए उसने आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक करने लगा। मम्मी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
” लगता है बहुत थक गया है , आज जूते भी नहीं उतारे। ” वह बुदबुदाई और उसके जूते खोलकर यथास्थान रख दिये। फिर वह वहाँ से निकल गईं। अथर्व ने फिर से अपनी दृष्टि छत की ओर गड़ा दी। फिर मम्मी पापा के, बातें करने के स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई। मम्मी कह रही थीं कि
” आजकल अथर्व बहुत उदास हो जाता है। वह अपने स्कूल, अपने दोस्तों को बहुत मिस करता है। कई बार तरस आता है उसपर। ” मम्मी का वाक्य सुनकर वह आगे की बात सुनने को उत्सुक हो गया।
” ऐसा चांस किस्मत वालों को ही मिलता है। सोचो हमारा अथर्व कितना किस्मत वाला है। हर जगह उसे रास्ता मिलता गया और वह आगे बढ़ता गया। ” पापा ने जवाब दिया।
” पर वह नॉर्मल बच्चों जैसी लाइफ तो नहीं जी पा रहा। “
” तो ज़रूरत भी क्या है ? वो नॉर्मल बच्चा नहीं है। गिफ्टेड चाइल्ड है। नाम और पैसा उसके हाथ की रेखाओं में है। “
” जिसकी कीमत वह अपना बचपन खो कर चुका रहा है। ” मम्मी ने दार्शनिक स्वर में कहा।
” तुम ओवररियेक्ट कर रही हो स्मिता। अब किया भी क्या जाए। काम तो उसे करना ही पड़ेगा। उसके चक्कर में, अब मेरी नौकरी भी चली गई। अगर वह काम करना छोड़ देगा तो हमारा घर कैसे चलेगा ?” पापा ने कठोर स्वर में कहा। यह सुनकर अथर्व सोच में पड़ गया।
” अब तो हमारी छुटकी भी पाँच साल की हो गई है। क्यों न हम उसे भी अब चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर लॉंच कर दें। अपने भाई की तरह वह भी मशहूर हो जाएगी और घर में डबल पैसा आने लगेगा।” मम्मी ने सुझाव दिया।
” हाँ, कह तो तुम ठीक ही रही हो। वैसे भी अथर्व को मुश्किल से दो साल तक काम और मिल जाएगा। उसके बाद क्या होगा ? “
सुनते हुए थोड़ी देर में वह गहरी नींद में गुम हो गया।
सुबह नाश्ते के समय मम्मी छुटकी को कह रही थीं,
” अब मेरी गुड़िया भी भैया की तरह काम करेगी, और टीवी पर आएगी, है न ?” उन्होंने गोद मे बैठी गुड़िया उर्फ छुटकी उर्फ सान्या से कहा। उत्तर में सान्या ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।
यह सुनते ही नाश्ता करते हुए अथर्व का हाथ रुक गया। उसने एक नज़र मम्मी, पापा और फिर सान्या पर डाली।
” गुड़िया, बस स्कूल जाएगी, अपने दोस्तों के साथ खेलेगी … म… मैं तो अब बड़ा हो गया हूँ। ” यह कहकर उसने जैसे स्वयं को सांत्वना दी और नाश्ता छोड़कर उठ गया। मम्मी ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा, तो उन्हें महसूस हुआ जैसे उसके चेहरे पर अचानक एक नया बुर्जुआ चेहरा उग आया है और उसके नाजुक कंधे फौलाद में तब्दील होते जा रहे हैं। उधर अथर्व सर उठाए हुए दृढ़ कदमों से चला जा रहा था। सचमुच एक रात में ही वह बहुत बड़ा हो गया था।


आपकी कहानी एक चिंता का विषय है।बाल कलाकार होना बुरा नहीं पर अपनी जरूरत की दृष्टि से इस्तेमाल करना बुरा है। जहाँ बचपन मजबूरी में अपने को काम में जोतता है वहाँ अपन मदद कर सकते हैं। परंतु समर्थ होकर बच्चे की इच्छा को मारकर उसके भविष्य को दाँवपर लगाना तो इंसानियत नहीं है।
जिस दुख को बेटा भोग रहा था, अपनी बहन के लिये उसने उस पीड़ा को महसूस किया।
बहन के संबंध में निर्णय लेते ही वह मानो बड़ा और समझदार हो गया।
अच्छी कहानी है। प्रेरणास्पद भी।बधाई आपको।
आपका आत्मीय आभार नीलिमा जी, आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया का इंतज़ार था। आपने पढ़ा, मुझे लगा कि मेरा लिखना सार्थक गया। आपका पुनः बहुत बहुत आभार
इस कहानी को पढ़ते हुए कई बाल कलाकारों का चेहरा जेहन में घूम गया।सचमुच अपना बहुमूल्य बचपन गवां कर इंसान कटी पतंग सा ही हो जाता है।
थोड़ा बचपन ,थोड़ा काम बेहतर है।अति बुरी।एक अच्छी कहानी के लिये बधाई आपको।
आपका आत्मीय आभार निवेदिता जी, आपने कहानी को पढ़ा और सराहना की