यदि भगवान एक है तो बार-बार अलग-अलग क्षेत्रों में उसका आविष्कार क्यों होता रहा है? सच तो यह है कि एक ही धर्म के अलग-अलग फ़िरकों में भगवान के अस्तित्व पर अलग-अलग धारणाएं हैं। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख – तमाम धर्मों में अलग-अलग फ़िरके हैं। आख़िर इतनी विभ्रांतियां क्यों फैली हुई हैं? इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि भगवान का आविष्कार इन्सान ने किया है और भगवान कोई दिव्य शक्ति नहीं है।
मैं ना तो नास्तिक हूं और ना ही आस्तिक। भगवान के अस्तित्व को लेकर मेरे मन में हमेशा संशय बना रहता है। अंग्रेज़ी में एक शब्द है ‘एग्नॉस्टिक’ जिसका हिन्दी अर्थ है ‘संशयवादी’… मुझे लगता है कि मैं संशयवादी हूं। सवाल करता हूं… आमतौर पर जवाब नहीं मिलते। कुछ मज़हब ऐसे भी हैं जिनमें सवाल करने तक की अनुमति नहीं है। उनके बारे में और शिद्दत से मन में सवाल उठते हैं।
मैं यह समझता हूं कि इस विषय पर अपनी बात कहने से मैं अपने बहुत से पाठकों को नाराज़ कर सकता हूं। मगर मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मुझे अपने मित्रों की श्रद्धा और आस्था पर कोई आपत्ति नहीं। हम सब को अपने-अपने धर्म में विश्वास रखने का पूरा हक़ है। बस केवल इतनी सावधानी रखनी होगी, कि कहां विश्वास ख़त्म होता है और अंधविश्वास शुरू हो जाता है। विश्वास किसी ठोस आधार पर टिका होता है और अंधविश्वास हवा में लटका हुआ होता है।
भगवान ने इन्सान को बनाया या नहीं, मैं इसका कोई सुबूत जुटा नहीं पाता। उसके ठीक विपरीत यह बात साबित करना आसान महसूस करता हूं कि इन्सान ने भगवान का आविष्कार किया है। जब कोरोना काल में विश्व के तमाम भगवानों के घरों पर ताले लग गये उस समय भी मन में प्रश्न यही उठ रहे थे कि क्या तमाम पुजारी, पादरी, मौलवी, पाठी अपने-अपने भगवान को कोरोना से बचाने का प्रयास कर रहे हैं या भगवान इतने शक्ति-विहीन हो चुके हैं कि अपने भक्तों की सुरक्षा ना कर पाने की मजबूरी में अपने घरों पर ही ताला लगा लिया है।
मेरी माँ एक आस्थावान महिला हैं जो बचपन से भगवान शिव की भक्त हैं। उनकी भक्ति में कोई दिखावा नहीं। उन्हें कोई मंत्र याद नहीं और ना ही मैंने कभी उन्हें पूजा करते देखा है। हमारे घर में हवन अनुष्ठान भी किसी ना किसी विशेष अवसर पर ही होते थे। माँ की श्रद्धा के चलते मैं भी एक तरह से शिव भक्त हो गया। मगर मेरी आस्था भी बस उतनी ही रही है जितनी माँ ने परवरिश की घुट्टी में पिला दी। मैं स्वयं बहुत कम मंदिर जाता हूं। मगर रास्ते में यात्रा करते हुए किसी मंदिर के सामने से गुज़रूं तो मेरे हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद जुड़ जाते हैं।
बस यही आस्था मुझे कभी-कभी उन स्थलों तक ले जाती है जिन्हें ज्योतिर्लिंग या धाम कहा जाता है। भीतर बैठा अपनी माँ का पुत्र अभी तक अपने आप को उस श्रद्धा से मुक्त नहीं करवा सका है। मगर जब-जब ऐसी महा-पवित्र स्थलों पर जाता हूं, मेरी थोड़ी सी श्रद्धा कम हो जाती है।
मुझे एक बात कभी समझ नहीं आती कि हरिद्वार से लेकर हर धाम और ज्योतिर्लिंग के बाहर मंदिर एजेंट के तौर पर बाहर खड़े पंडे लुटेरों के समूह का सा व्यवहार क्यों करते हैं। ये लोग तो अपने रेट कार्ड में भी मोल-भाव ऐसे करते हैं जैसे सब्ज़ी बेचने वाले करते हैं।
उस पर ये जो वी.आई.पी. दर्शनों का चक्कर है यह मुझे बहुत परेशान करता है। जहां तक मेरी जानकारी है गुरुद्वारों, मस्जिदों और चर्च में कोई वीआईवी दर्शन नहीं होते। हर आदमी भगवान के दरबार में बराबर होता है। फिर भगवान के दर्शनों में ऐसी मानसिकता का प्रदर्शन क्यों?
मैं समझ नहीं पाता हूं कि गर्भ-गृह या परम पवित्र स्थल इतना छोटा और तंग क्यों होता है कि उसमें बिना धक्का-मुक्की के प्रवेश किया ही ना जा सके? यदि वो स्थल बड़ा हो और रौशन हो तो भक्त गण आसानी से दर्शन कर लेंगे। जगन्नाथ पुरी में तो मूर्तियां इतनी दूर लगी हुई हैं कि लगता है जैसे किसी सामने वाली बिल्डिंग में रखी गई हों।
मैं जब से संशयवादी बना हूं, मुझे अपने बहुत से प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले। मेरा पहला प्रश्न है कि यदि भगवान सर्वशक्तिमान है और कण-कण में मौजूद है तो फिर बुरी शक्तियां दुनिया में क्यों और कैसे विद्यमान हैं? ठीक इसी तरह भगवान को अपनी तारीफ़ और पूजा क्यों प्रिय है? जब भगवान हर तरह से संपूर्ण है तो हम जैसे कमज़ोर इन्सानों से अपनी बढ़ाई क्यों सुनना चाहता है? विश्व में इतने सारे धर्म और मज़हब क्यों हैं? हर मज़हब अपनी-अपनी दुकान के माल की तारीफ़ क्यों करता है और क्यों दावा करता है कि उसी का माल सबसे बेहतर है।
मैं कैसे मान लूं कि मेरा ही धर्म सबसे बेहतर है? सब धर्मों का मूल आस्था और विश्वास है तो फिर तर्क की कसौटी पर किसी भी धर्म को कैसे कसा जा सकता है? सारी भाषाएं मनुष्य द्वारा विकसित की गई हैं। भगवान, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरू सभी इन्सान द्वारा बनाई गई भाषाओं में लिखी किताबों के माध्यम से बात करते हैं। भगवान की अपनी ज़बान कौन सी है? हमें हज़ारों साल पुरानी लिखी किताबों को सच मानने को क्यों मजबूर किया जाता है।
जब इन्सान के पास ज्ञान की कमी थी, उस काल में भगवान का आविष्कार किया गया। जो बात इन्सान को समझ नहीं आती थी, कह दिया जाता है कि भगवान कर रहा है। जब से विज्ञान अस्तित्व में आई है तो सैंकड़ों सवालों के जवाब तर्कपूर्ण ढंग से मिलने लगे हैं। भगवान से जुड़े सवालों के जवाब तर्कपूर्ण ढंग से क्यों नहीं मिल सकते? हम धरती के उद्गम का सिद्धांत आदम और हव्वा के हिसाब से कैसे मान लें? जैसे-जैसे इन्सान का ज्ञान बढ़ा है वैसे-वैसे भगवान के प्रति विश्वास कम क्यों हो रहा है?
भगवान के लिये यह आवश्यक क्यों है कि हम उसमें विश्वास रखें? भगवान यह क्यों नहीं कहता कि मानव मात्र के लिये भले का काम करो। चाहे हम अच्छे काम करें, फिर भी हमें नरक की आग में जलना होगा क्योंकि हम किसी ख़ास भगवान में विश्वास नहीं रखते। फिर भी हम कहते हैं कि भगवान सब को प्यार करते हैं!
जितने भी धार्मिक ग्रन्थ हैं उनमें हिंसा, स्त्री जाति के प्रति द्वेष, और दमन के किस्से भरे पड़े हैं। इन ग्रन्थों में अपने समय के वैर और वैमनस्य साफ़ दिखाई देते हैं। एक ख़ास धर्म को ना मानने वालों की हत्या को जायज़ ठहराया जाता है। इन सब को सार्वकालिक कैसे माना जा सकता है?
हम जब किसी मुसीबत में होते हैं तो भगवान को याद करते हैं। कुछ मामलों में हम उस मुसीबत से बच निकलते हैं और कुछ में हमें बुरी तरह नुकसान होता है। यदि भगवान में त्रासदी को रोकने की शक्ति है तो वह हमारी हर मुसीबत में हमारे साथ क्यों खड़ा नहीं होता। वह अपनी मर्ज़ी के हिसाब से क्यों चुनता है कि कब हमारी सहायता करनी है और कब नहीं करनी है? क्या वह भी हमारा अनिष्ट चाह रहा होता है जब वह सहायता करने से इन्कार कर देता है?
हम अपने साधारण जीवन में हर चीज़ के लिये सुबूत मांगते हैं। क्या हम पानी को दूध कह सकते हैं? क्या हम दस रुपये के नोट को दस डॉलर का नोट मान लेंगे? क्या हम मिर्ची खाते हुए महसूस कर सकते हैं कि हम बरफ़ी खा रहे हैं? जब हर चीज़ के लिये हमें सुबूत चाहिये तो फिर भगवान के लिये केवल और केवल विश्वास क्यों?
भगवान के दयालु होने और तमाम जीवों को प्रेम करने की छवि के चलते नर्क का अस्तित्व समझ नहीं आता। नर्क की यातनाएं कोई प्रेम करने वाला भगवान कैसे किसी को दे सकता है? और यदि मैं स्वर्ग में हूं और जिन्हें मैं दिल से प्रेम करता हूं – मेरी माँ, पिता, बहन, भाई, पुत्र, पुत्री आदि – वे नर्क में हैं, तो भला मैं स्वर्ग में सुखी कैसे रह सकता हूं? क्या मेरे प्रिय जनों का दुख और यातनाएं मुझे कभी स्वर्ग के सुखों का आनंद भोगने देंगे?
इन्सान की प्रार्थनाओं और दुआओं का असर परमात्मा पर क्यों नहीं होता? कोरोना काल में लाखों लोग मर गये। ऐसे ही प्राकृतिक आपदाओं से सैंकड़ों बच्चे मारे जाते हैं जिन्होंने कोई पाप या गुनाह नहीं किया होता। सच्चे भक्तों की दुआओं का भी भगवान पर असर नहीं होता। इज़राइल के लोग अपने भगवान से जीत की दुआ मांग रहे हैं। फ़िलिस्तीनी लोग अपने भगवान से इज़राइल के विनाश की दुआ मांग रहे हैं। दोनों के भगवानों में से किसके भगवान की जीत होगी? और यदि भगवान एक ही है, तो दोनों में से किसकी दुआ कुबूल करेगा?
यदि भगवान एक है तो बार-बार अलग-अलग क्षेत्रों में उसका आविष्कार क्यों होता रहा है? सच तो यह है कि एक ही धर्म के अलग-अलग फ़िरकों में भगवान के अस्तित्व पर अलग-अलग धारणाएं हैं। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख – तमाम धर्मों में अलग-अलग फ़िरके हैं। आख़िर इतनी विभ्रांतियां क्यों फैली हुई हैं? इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि भगवान का आविष्कार इन्सान ने किया है और भगवान कोई दिव्य शक्ति नहीं है।
कुछ धर्मों में तो धर्म छोड़ने पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। भला ऐसा कोई भगवान कैसे होने दे सकते हैं? सच तो यह है कि धार्मिक लीडर नास्तिकों और संशयवादियों का सामना करने से घबराते हैं क्योंकि उनके पास किसी सवाल का तार्किक जवाब ही नहीं होता। यदि पुरवाई के पाठकों के पास भी मेरे सवालों का कोई तार्किक जवाब हो तो टिप्पणी अवश्य करियेगा…
एक सवाल मैं अपने आप से भी पूछता हूं – मैं धामों और ज्योतिर्लिंगों में दर्शन के लिए जाता हूं… वहां वीआईपी दर्शन करता हूं… भीड़ से धकियाया जाता हूं… बिना किसी श्रद्धा के तमाम पूजा की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करता हूं… फिर भी मन में सवाल उठने से रोक नहीं पाता। अपने आप से यही कहता हूं – “मैं भी तो वैसा ही हूं।”
ये प्रश्न प्रत्येक जागरुक इंसान खुद से करता रहता है। किंतु जब किसी के साथ बहुत बुरा हो जाता है तो वह कहता है कि मैंने तो सब कुछ अच्छा किया था। सबके साथ भलाई करता हूं। पर भगवान ने ऐसा क्यों किया । मेरे ही कर्मों का फल होगा और जब अच्छा होता है तो इंसान कहता है कि भगवान की बड़ी कृपा है।
दरअसल यह सब बचपन की कृपा होती है अगर किसी बच्चे को ऐसी जगह बड़ा होने दिया जाए जहां उसे पता ही ना चले कि भगवान भी कोई चीज है तो उसके अंदर यह भाव ही नहीं आएगा ।
फिर कभी-कभी मैं भी सोचती हूं कि भगवान चाहे अलग-अलग नाम से अलग-अलग धर्म में माने गए हैं पर यह सब को ही कैसे सूझा होगा कि यह कोई शक्ति है जो हमें माननी है। आपने, अपने बारे में जितना कहा है, मैं भी लगभग उतनी ही हूं बस मन की शक्ति के लिए मान लेती हूं।
सुधा हम सवाल करते हैं, मगर जवाब नहीं मिल पाते। शुरुआती इंसान के पास जब किसी बात का जवाब नहीं होता था, तो बस भगवान ने किया है! आज इंसान तथ्य मांगता है!
भाई तेजेन्द्र जी! मूलतः किसान होने के नाते मैं तो इस नतीज़े पर पहुंचा हूं कि… ईश्वर महज कायरों की दिमाग़ी उपज है और कुछ नहीं बस!
हार्दिक आभार भाई कृष्ण कुमार जी।
आपका धर्म इसलिए सबसे श्रेष्ठ है, तेजेंद्र जी, क्योंकि ये बातें खुल कर कहने, संशय मन में रखने और भगवान के अस्तित्व पर ही सवाल करने की अनुमति देता है। ऐसा article प्रकाशित करने पर कोई सर तन से जुदा करने नहीं पहुंच जाता। इस्लाम पर सवाल उठाइए, फिर देखिए क्या होता है! इस्लाम ही क्यों, आजकल तो सिक्खों में भी यही प्रचलन शुरू हो गया है! Christianity West में थोड़ी निराशावादी अवश्य बन गई है, पर यहां भारत में तो जोर शोर से conversion में लगे ही हुए हैं, क्योंकि उनका मानना है कि अगर आप Jesus के नहीं तो कहीं के नहीं रहेंगे! जहां तक भगवान के अस्तित्व का सवाल है, सनातन ही एक ऐसा धर्म है जो आपके नास्तिक होने को भी प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता है। और सिर्फ सनातन ही है जो मानता है कि ‘ जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तीन तैसी ‘! इसीलिए कोई भगवान को अल्लाह के रूप में देखे या Jesus के, Jehovah या भगवान बुद्ध – हमें स्वीकार रहा हमेशा। Unfortunately, हमारा यही सद्भाव अब हमारा दुश्मन बन गया है, और हमें अंत की ओर लिए जा रहा है। जिस दिन सनातन ख़त्म हो गया और इस्लाम और Christianity ने दुनिया पर कब्ज़ा कर लिया, आप ऐसा कुछ लिखना क्या, सोचने का भी अधिकार खो देंगे। ऐसे वीभत्स विश्व में मैं तो जिंदा भी नहीं रहना चाहुंगी! इसीलिए मुझे सनातनी होने पर गर्व है। ये सच है कि कमियां हम में भी हैं, क्योंकि हम भी इंसान ही हैं, पर खून के प्यासे दरिंदे तो नहीं! क्या इस भीषण कलयुग में यह बहुत बड़ी बात नहीं? और क्या हमारी हजारों साल पुरानी आस्था ही इस basic decency और human compassion के लिए जिम्मेदार नहीं? और अगर भगवान ने हमें नहीं बनाया, तो क्या हम गाजर- मूली की तरह यूंही उग गए?! यह तो Paradise Lost में Lucifer का argument है, जो न मुझे तब समझ आया था जब मैं English Literature में undergrad कर रही थी, और न अब समझ आता है!
संगीता जी मैं तो अपने संपादकीय में किसी भी धर्म को श्रेष्ठ या निकृष्ठ नहीं कह रहा। यहां तो सवाल यह है कि क्या सच में ईश्वर नाम की शक्ति का कोई अस्तित्व है या केवल इन्सान ने उसे बनाया है… एक कहानी है – Once Man and God went separately for a stroll. Suddenly they bumped into each other. Together they exclaimed, “Ah ! My creation “!!!
बेहद समीचीन विषय को बतौर संपादकीय उठाया है और यह धर्म संस्कृति के ठीक न्यूक्लियस का विषय है जिसमें श्रद्धा या किसी हद तक कहें तो अंधश्रद्धा और आडंबर भी शामिल हो जाता है और यह सब इतना गड्डमुड हो जाता है कि पूजा अर्चना के स्थल हों या कोई तीर्थ यात्रा बस वहां के मठाधीश उसी सुलभ को दुर्लभ और पैसे और रसूख वालों का ईश्वर बना देते हैं। तिरुपति के प्रसादम लड्डू में क्या मिला था यह सभी जानते हैं।
आदरणीय संपादक ने ग़ज़ब का साहस और साफ़गोई से बयान किया है यह तिलस्म।
इसके लिए उन्हें बधाई और सिर्फ बधाई।
भाई सूर्य कांत जी इस बार दो महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों की यात्रा के बाद दिल से यह आवाज़ निकली।
आदरणीय संपादक जी
हर तार्किक मनुष्य के मन में कभी न कभी ये शंकाएं उत्पन्न होती ही हैं। अधिकांश मामलों में ईश्वर पर आस्था केवल ऑटो सजेशन ही है। धर्म के नाम पर कर्मकांड से मनुष्य को एकता की शक्ति काअनुभव होता है , यह एकता की शक्ति हमें सुरक्षा का बहन कराती है। कुंभ महाकुंभ के आयोजन के समय धर्म के प्रति ऐसे विचार उठाना अत्यंत स्वाभाविक है।
जी सरोजिनी जी, मेरे संपादकीय का महाकुंभ से कुछ लेना-देना नहीं है। मुझे इस ट्रिप पर दो महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों की यात्रा करने का अवसर मिला। बस वही अनुभव साझा किए हैं।
पहली बात तो ये कि भगवान का अविष्कार नही होता निराकार शक्ति है ।धरती है, गगन है
जल है ,हवा हैअग्नि है ये सब संसार में मौजूद हैं इनके जरा से असंतुलन से सर्वनाश हो जाए ।
अतः सर्वशक्तिमान कुछ है तो वह पर्यावरण है हमें डरना तो इससे चाहिए लेकिन मनुष्य सबसे ज्यादा इसी से छेड़छाड़ कर रहा है ।
दूसरी बात धार्मिक स्थलों के प्रपंच तो ये कानूनी प्रक्रिया कर सरकारें प्रतिबंध लगा सकती हैं जैसे कि दक्षिण भारत के मंदिरों में
पंडा व्यवस्था प्रतिबंधित है।उत्तर भारत में इसका ज्यादा प्रसार है इसलिए लोगो की धर्म के प्रति आस्था कम होती गई ।समय के साथ धर्म की दुकानें बंद होंगी ।मोदी है तो मुमकिन है
दर्शन की बात करने से परिवर्तन नहीं होते परिवर्तन के लिए yogi का होना जरूरी है।
Dr Prabha mishra
आदरणीय, संशयवादी केवल प्रश्न खड़े कर सकता है। उस पर एक्शन तो सरकारी तंत्र को ही लेना होगा।
आदरणीय आपका संपादकीय बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है. कोई तो शक्ति है जो इस दुनिया को चला रही है. मेरा मानना है कि ईश्वर या कोई शक्ति, पूरे विश्व में एक ही है. समय के साथ साथ लोगों ने उसे अनेक नाम दे दिये हैं.
ईश्वर के होने का एक जो प्रमाण मैं मानता हूँ, वो है उसके साक्षात दर्शन. हम कितनी भी कोशिश कर लें कितना भी किसी को याद कर लें. हमें स्वप्न में सब दिखाई दे जाता है लेकिन किसी भी रूप में ईश्वर नहीं दिखाई देता… ये बात मेरे लिए एक पहेली बनी हुई है.
हेमन्त भाई, ग़ालिब मियां इसीलिये तो कह गये, – दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है…
बड़ा सवाल है कि गर्भ-गृह या परम पवित्र स्थल इतना छोटा और तंग क्यों होता है कि उसमें बिना धक्का-मुक्की के प्रवेश किया ही ना जा सके?
सही सवाल भाई अरुण जी…
मैंने एक आलेख में पढ़ा था कि ईश्वर के होने के चार कारण स्वीकार किए जाते हैं सृष्टि सत्ता प्रयोजन और नीति। उसमे कहा गया था कि ईश्वर सर्वोच्च पूर्ण और सक्रिय सत्ता है जो एक सीमित शरीर में नहीं बन सकती लेकिन उसका अस्तित्व मनुष्य के ज्ञान प्रत्ययों के आधार पर संभव है है। प्रत्ययों का ज्ञान बुद्धि द्वारा संभव नही यह प्रत्यय मन की उपज है जो सृष्टि का आधार है ..सृष्टि सृजन को संज्ञा प्रदान करने वाले प्रत्यय मेंहदी ईश्वर की सत्ता विद्यमान है । जगत का अस्तित्व भी इश्वर की अवधारणा को प्रमाणित करता है। संसार की गतिशीलता ग्रहों की गतिशीलता जीवन की गतिशील था उसी सत्ता पर निर्भर है इसमें थोड़ा समय विचलन या विघ्न आ जाए तो सृष्टिणका संहार निश्चित है । ऐसे में उस सत्ता को स्वीकार करना अनिवार्य है और यही ईश्वर है। मानव शरीर और प्रकृति में भी एक व्यवस्था है । विश्व का कोई भी कार्य निष्प्रयोजन नहीं है प्रत्येक घटना में कार्य कारण सम्बन्ध रहता है इसका नियोजन कौन करता है ? …ईश्वर। किसी सीमित बुद्धि द्वारा विश्व का निर्माण संभव नहीं। ईश्वरीय सत्ता का विश्वास ही नैतिक नियमों और मूल्यों का आधार है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किए बिना शुभ और अशुभ के बीच अंतर संभव नहीं। संसार के सभी धर्म ग्रन्थों में ईश्वरीय सत्ता का ईश्वर अस्तित्व का उपदेश मिलता है। ब्रह्मांड का गंभीरता से अनुसंधान करने गंभीर वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि विश्व सृजन के नियमों का प्रतिपादन मानव से बहुत अधिक उत्कृष्ट किसी अदृश्य और अभौतिक शक्ति या सत्ता द्वारा ही संभव है यही शक्ति ईश्वर है।
रही बात ईश्वर के नाम पर व्यवसाय और प्रपंच की उस पर मैं भी कोई टिप्पणी देना नहीं चाहती क्योंकि। *मै भी तो वैसी ही हूँ*
किरण जी, ईश्वर के अस्तित्व को मानने की पहली शर्त है कि हमें ग्रंथों में विश्वास होना चाहिए।
आस्तिक भी कमोवेश संशयवादी होते हैं। ईश्वरीय सत्ता को लेकर एक भ्रम-विभ्रम की स्थिति बनी रहती है। मेरा बचपन और कैशोर्य साधु-संगत में ही बीता है। वहां भी मैंने डांवाडोल आस्था देखी है। यदि कोई सर्वोच्च सत्ता है तो निःसंदेह उसने ऐसी स्थिति जानबूझकर बना रखी है।
बहुत सुन्दर आलेख है।
हार्दिक बधाई!
हार्दिक धन्यवाद सर।
सोचते सभी ऐसे ही हैं लेकिन इतने साफ़ तरीक़े से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं
बधाई
हार्दिक धन्यवाद प्रदीप भाई।
आपने सम्पादकीय में जो प्रश्न उठाये हैं उससे हर कोई कभी न कभी जूझता भी है । पर वीआईपी दर्शन ,कर्मकांड, पंडे ,पूजा ,धर्म का एक हिस्सा हैं धर्म नहीं। मॉरीशस से ऐसे कुछ लोग राम को खोजने आये थे । कुछ दिन उन्होंने अयोध्या में कल्पवास किया तब उन्हें उनके प्रश्नों के उत्तर मिले। भगवान जहां बहुत कम माने जाते हैं मसलन नीदरलैंड । वह देश हैप्पीनेस इंडेक्स में सबसे ऊपर है मगर आत्महत्या के मामले में भी टॉप पर है ,वह भी मजबूरी नहीं मगर विचारवान आत्महत्या। खैर यह बहुत लंबी बहस है ,दो -तीन साल मैं भी इससे जुझा था युवावस्था में पढ़ाई के दिनों में,पर मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर मिल गए थे । दुनिया भर के वैज्ञानिक ,इंजीनियर जिन प्रश्नों को हल नहीं कर पाते उसे अपनी फाइनल रिपोर्ट में “एक्ट ऑफ गॉड” कहकर इतिश्री कर लेते हैं। पुरवाई के सम्पादकीय पढ़ने पर और पुरवाई का लेखक होने के बावजूद मेरा सात जन्म, चौरासी योनियों और चित्र गुप्त के रजिस्टर में पूरा यकीन है । मेरा विश्वास है कि मैं ज्यादा से ज्यादा अच्छा काम करूंगा तो स्वर्ग में मुझे बेहद आरामदायक स्थान मिलेगा और यदि इस जन्म के कर्मों की मेरिट अच्छी रही तो अगले जन्म में भी बढ़िया कुल में मेरा जन्म होगा। यानी मेरा मानना है कि नेकी करते रहो,चित्रगुप्त जी देख और गिन रहे हैं । सादर
भाई दिलीप आपको गुप्ता जी से दोस्ती मुबारक हो…
मेरे मन में भी अक्सर यही सवाल आता है कि क्या ईश्वर है इस दुनिया में? बहुत सारे सवाल जो मैं खुद से करती हूं लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिल पाता फिर मैं मन को समझाती हूं कि ईश्वर है लेकिन वह हमारे अंदर ही है और हम सब में है, हर जीव जंतु, पशु पक्षी में विद्यमान है अगर हम उसे नजरिए से देखें तो,,
बहुत सार्थक सम्पादकीय के लिए बधाई आपको
हार्दिक आभार सीमा। आपसे पुस्तक मेले मेंं मिल कर अच्छा लगा।
इस बार के संपादकीय ने संसार की सर्वोच्च सत्ता (जिस पर अधिकांश जन विश्वास करते हैं) पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया गया है। यद्यपि संपादक महोदय जी भी इस सत्ता को स्वीकार करते हैं। कम स्वीकार करते हैं या ज्यादा यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इसे किस रूप में स्वीकार करते हैं। इसे मैं आपकी ईमानदारी कहूंगा। कुछ लोगों को तो मैंने यहां तक देखा है कि घर में अच्छे ढंग से पूजा पाठ और बाहर बड़े वादी।
सच बात यह है कि हम मानव कभी नास्तिक हो नहीं सकते हैं। क्योंकि ये मान्यताएं सृष्टि के आरंभ से शुरू हो गई थी। इसलिए ये डीएनए में घुल-मिल गई है। अगर कोई कहता है कि मैं नहीं मानता हूं तो आप उसका विश्वास मत करें। हां उसको बुरा न लगे इसलिए चुप रह जाना चाहिए। बहस नहीं करना चाहिए। युवावस्था स्वयं में पूर्ण सत्ता होती है क्योंकि वह हर तरह से सक्षम होता है। वह कहता है कि मैं नास्तिक हूं तो माना जा सकता है। युवावस्था ढलते ही वह ईश्वर पर विश्वास करने लगता है। क्योंकि अब उसे मानसिक रूप से किसी सहारे की जरूरत होती है। उस अदृश्य शक्ति के सामने अपनी व्यथा-कथा बांची जा सकती है। किसी को पता भी न चलेगा।
रही बात झूठे पंडे पुजारियों या अंधविश्वासों की बात तो इसको देखने में कोई हर्ज नहीं है। आप देख सकते हैं कि लोग बेवकूफ बनने में भी कितने गर्व का अनुभव करते हैं। संपादकीय पढ़कर या किसी का सुधारवादी वक्तव्य बांचकर समझाएंगे तो हम पर ही चढ़ दौड़ेंगे। आपने यह विषय बहुत बढ़िया उठाया है। बढ़िया इसलिए है कि इसमें परमसत्ता के प्रति संशय नहीं है उन लोगों के लिए दुविधा भर गई है कि इस पर लिखें तो क्या लिखें। मतलब इस पार रहें या उस पार रहें। पाठकों का मानसिक श्रम करवाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया
भाई लखनलाल पाल जी आपने अपनी टिप्पणी में संभलते हुए भी बहुत कुछ कह डाला है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी का भगवान के अस्तित्व पर आधारित संपादकीय प्रश्नवाचक शैली में लिखा गया है। इस संपादकीय में तेजेंद्र शर्मा जी ने जो प्रश्न उठाएं हैं उनमें से उनमें से अधिकांश के उत्तर हमें श्रीमद् भागवत गीता देती है। श्रीमद्भगवदगीता में स्पष्ट लिखा गया है कि आप जैसा कर्म करेंगे तदनुरूप आपको फल की प्राप्ति होगी अर्थात ईश्वर कर्म आधारित व्यवस्था के अधीन फल के प्रदाता हैं और वास्तविकता यह है कि स्वर्ग और नरक की अवधारणा का मूल उत्सव इस धरती लोक में ही है न कि आकाश अथवा पाताल में ईश्वर निवास करते हैं। जहाँ तक ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न है तो इस मामले में मैं कट्टर आस्तिक हूँ और मानता हूँ कि जहाँ से विज्ञान प्रश्नों के उत्तर देने बंद कर देता है, वहाँ से ईश्वर उत्तर देना शुरू करते हैं। ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिनके उत्तर विज्ञान नहीं अध्यात्म देता है। हम आज तक हम यह पता नहीं कर पाए हैं कि हमारे पहले पुरखे कौन थे, पहला इंसानी जन्म कब, कहाँ और कैसे हुआ, मृत्यु क्यों, कब और कैसेहोती है और मृत्यु के बाद क्या होता है। इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें धर्म देता है जबकि विज्ञान एक समय के बाद यह कहने लगता है कि अब हमारे हाथ में कुछ नहीं है ईश्वर की शरण में जाओ और कई बार ईश्वर के चमत्कार दिखाई भी देते हैं। इससे स्पष्ट है कि कोई न कोई अदृश्य सत्ता अवश्य है जो हमें न सिर्फ संचालित करती है अपितु हमारे जीवन की विविध गतिविधियों को नियंत्रित भी करती है। अगर कोई ईश्वरीय शक्ति मानवीय स्वरूप में नहीं दिखती तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका अस्तित्व नहीं है। एक आदर्श जीवन जीने के लिए ईश्वर की उपस्थित सनातन धर्म में स्वीकार की गई है और विभिन्न प्रकार के धारण करने योग्य आचरण को ही धर्म कहा गया है। इसलिए चार आश्रम, चार पुरुषार्थ इत्यादि की संकल्पना की गई है। अतः बेहतर है कि ईश्वर पर प्रश्न चिह्न लगाने के स्थान पर हम ईश्वर के बताए हुए श्रेष्ठ मार्ग पर चलें।
सर जी, आध्यात्म के किसी भी जवाब के लिये विश्वास और श्रद्धा की आवश्यकता होती है। विज्ञान के तथ्य लॉजिकल होते हैं।
अच्छा संपादकीय है सर । इसमें मॉं के द्वारा पिलाई गई ईश्वर के प्रति आस्था की घुट्टी का ज़िक्र हमें पसंद आया । बहुत से विचार और व्यवहार ( जैसे धार्मिक स्थल के सामने स्वत: ही श्रद्धा से हाथ जोड़ लेना) हमें अपने जैसे लगे । व्यवसायी के जैसे पेश आते पंडे़-पुजारियों को देखकर ऐसी ही वितृष्णा भरे भाव हमारे मस्तिष्क में भी उपजते हैं । ऐसे में एक ही बात हमें समझ आती है कि ये अनेक धर्म, ईश्वर के अलग-अलग नाम और उनकी पूजा-अर्चना के तरीके हमारी( मनुष्य जाति)आस्थाओं और उस सर्वशक्तिमान ईश्वर के बारे में ज्ञान के सतहीपन की निशानी हैं।
हमारे वेदों में प्रकृति को ईश्वर माना गया है और इनकी ऋचाओं में जल,थल, सूर्य , चन्द्र इत्यादि को ही पूजा गया है। कालांतर में अपनी आस्थाओं को इंसानी रूप प्रदान कर हम मूर्ति पूजा में लीन हो गये। मंदिर बनने लगे तो पंडित जी स्वयं को ईश्वर का एजेंट मान उसी हिसाब से व्यवहार करने लगे। यहां पर हमारी आस्था और ईश्वर के बीच में इन एजेंटों की उपस्थिति को हम भी पसंद नहीं करते । भगवान की उपस्थिति इस जगत में और हमारे अंदर _एक विज्ञान का विषय है जिसपर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। धार्मिक स्थलों की ऊर्जा को महसूस करें तो ईश्वरीय शक्ति का भान होता है _इस सत्य के कारण मंदिरों में लोग जाते हैं लेकिन वहां भीड़ क्यों लग जाती है ,यह शुद्ध रूप से मनुष्यों के दोषपूर्ण प्रबंधन का परिणाम है। इसके कारण ईश्वर से अलगाव नहीं किया जा सकता ।
उस सर्वोपरि शक्ति ने मनुष्य बनाया है लेकिन उस शक्ति को रूप , मनुष्य ने अपनी सोच के अनुरूप दे दिया है और कहानियां भी गढ़ डाली हैं । उन्हें हम माने या ना माने, हमारे विवेक पर है ।
इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार रचना।
सर ….आपके विचारों से पूर्णतया सहमत ही नहीं हूँ बल्कि व्यवहार में भी आपके विचारों के अनुरूप हूँ। हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान हूँ क्योंकि प्रकृति को (नदी वृक्ष पहाड़ दरिया सबको देवी देवताओं का दर्जा देकर) मानव जीवन से जोड़े रखने का प्रयास किया गया है । कोई दबाव नहीं है follower के ऊपर लेकिन कर्मकाण्ड में विश्वास नहीं करती हूँ। हां मैं मानती हूँ कि ईश्वर मनुष्य की कल्पना मात्र है।लेकिन ब्रह्मांड में सुपर पावर है जिस के पास बार बार अपने विचारों को भेजते रहिए तो उसी के अनुरूप प्रतिक्रियाएं देने लगता है (लेकिन चमत्कार नहीं करता)ऐसा मेरा विश्वास हैं।
कुछ ज्यादा या गलत लिख गया हो तो क्षमा चाहती हूँ।
सीमा जी, आपने मन की बात सच्चे ढंग से कह दी है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय शर्मा जी, आपका प्रश्न जहाँ तक ईश्वर के अस्तित्व को लेकर है कि वह मानव कल्पना है या इससे इतर कोई स्वतंत्र सत्ता और उसका तार्किक आधार क्या है एवं उस पर विश्वास कैसे किया जाय| इस सम्बन्ध में भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों ही धाराओं में पर्याप्त चिन्तन हुआ है जिसे हम ईश्वर मीमांसा के नाम से जानते हैं|पाश्चात्य में प्रथम दार्शनिक चिंतक थेल्स को माना जाता है जिसका समय 6 वी शदी ई. पू. है, लेकिन इस समय में तो भारत में बौद्ध एवं जैन धर्म का उदय हो चुका था, इससे काफी पहले भारत में वैदिक काल में वेदों की रचना जिसमें संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषदों का बृहद ज्ञान सामिल है जिसमें आपके इन सभी प्रश्नों पर बड़े विस्तार से चर्चा की गई है, 18 पुराण, रामायण, महाभारत श्रीमद्भगवद्गीता सब इसी काल के ग्ंथ हैं| सर मेरा ज्ञान आपके सामने सूर्य के सामने दीपक जैसा है फिर भी भारतीय दर्शन की तत्वमीमांसा का यह मूल प्रश्न रहा है-ईश्वर का का अस्तित्व है, नहीं है, एक है, अनेक है, जड़ है, चेतन है आदि-आदि|यहाँ मैं आचार्य शंकर के अद्वैत वेदान्त का उत्तर लेना चाह रहा हूँ जिससे मैं सदैव सहमत एवं संतुष्ट रहा हूँ| उनके अनुसार एक मात्र ब्रह्म सत्य है बाकी सब मिथ्या है, यहाँ मिथ्या वह है जो न सत्य है न झूठ| वे तीन तरह की सत्ता मानते हैं प्रातिभासिक, व्यावहारिक, पारमार्थिक| प्रातिभासिक सत्ता पानी का बुलबुला, क्षणिक रूप से सत्तावान हैअभी देखा तुरंत खत्म|दुसरी व्यावहारिक सत्ता है जैसे स्वप्न सो के जागने पर सब समाप्त|सपने में डर जाना घबराहट, पसीना- पसीना होना आम बात है, यहाँ प्रश्न उठता है सपने की चीजे सही थीं या नहीं|सपने में धनवान जगने पर कंगाल|इस जगत एवं ईश्वर की सत्ता भी व्यावहारिक ही है लेकिन जब तक हमारे ज्ञान चक्षु नहीं खुल जाते, हम अज्ञान की नींद से नहीं जाग जाते तब तक यह जगत एवं ईश्वर दोनों सत् परिणामी एवं सत्य प्रतीत होंगे| ज्ञान चक्षु खुलने पर अहं ब्रह्मास्मि तत्वमसि। अयं आत्मा ब्रह्म का भान हो जायेगा लेकिन सो जाने जो पावे| मेरी स्थित आप लोगों से बहुत नीचे है|ईश्वर है या नहीं यह जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि हममें यह जानने का सामर्थ्य , काबिलियत है कि नहीं|काबिल बन जाएंगे तो पता चल जाएगा, नहीं तो इन प्रश्नों नें तो अर्जुन को बिचलित कर दिया था हम लोगों की क्या बात, जब तक साधना से कृष्ण जैसा कोई समर्थ सारथी या गुरु नहीं मिलेगा, दिव्य दृष्टि नहीं मिलेगी तो साक्षात्कार भला होगा कैसे| सोइ जानइ जेहि देइ जनाई, जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जायी| बिनु सतसंग विवेक न होई, बिनु हरि कृपा सुलभ नहिं सोई| सीमित बुद्धि से सामान्य आंखों से ईश्वर को कैसे देख पाएंगे हम जब वह असीमित है, निराकार है , शुद्ध चैतन्य है केवल तो असीमित अनुभव करने वाला मन उसे कुछ अनुभव कर सकता है , धुंधला, हल्का, स्पष्ट नहीं क्योंकि मन की गति उससे बहुत कम है|ईश्वर ज्ञान होने के पूर्व तक केवल श्रद्धा एवं विश्वास का विषय है, लेकिन बहुतों को ज्ञान हुआ है………., जब तक मैं खुद शहद न खाऊं उसकी मिठास नही बता सकता न कोई मुझे किसी उपाय से समझा सकता| एक ही सहज तरीका है शहद खिला दिया जाय|शायद इसी तरह ईश्वर वाणी का या सामान्य तर्कों से सिद्ध करने का विषय न होकर अनुभव करने, जानने एवं भक्ति तथा प्रेम का विषय है|मुझसे अज्ञानता में कुछ ज्यादा लिखा गया हो तो सभी पाठकों एवं परम आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी से हाथ जोड़कर माफी मांगता हूँ| सबहि नचावत राम गोसाईं|
आपके प्रत्येक तर्क से मै सहमत हूं। अपने धार्मिक विचारों को ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में इस प्रकार प्रगट किया है:
https://sarokartheconcern6.wordpress.com/2024/08/14/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b2/
आभार भाई हरिहर झा जी। आपकी टिप्पणी को पढ़ते हैं।
जितेन्द्र भाई: आपने अपने इस बार के सम्पादकीय में बहुत सारे प्रश्न पूछे जिन में आपके पहले प्रश्न का मेरे पास केवल एक ही उत्तर है। और वो है विश्वाश। बचपन से सनातनी वातावरण में बचपन बीता और बड़े हुए और यह रहन सहन जीवन का वो अटूट अंग बन गया जहाँ पर इसको चुनौती देने का सवाल ही नहीं उठता। इसका सब से बड़ा लाभ जो देखा है वो है अशान्त मन की शान्ती।
कुछ साल पहले कैनेडा से जब, कुछ मित्रों के साथ, हम ने भारत के दक्षिण की यात्रा का प्रोग्राम बनाया तो वहाँ के सभी मन्दिरों में जाने का मौका मिला। हम तो पूरी श्रद्धा से वहाँ गए लेकिन मन्दिरों में सफ़ाई की कमी और भीड़ को कन्ट्रोल न करने की व्यवस्था बहुत ख़ली। सब से अधिक बात जो ख़राब लगी वो थी दर्शन की दो दो लाइनें; एक फ़्री वाली और एक पैसे देकर जाने वाली। आख़िर यह भेदभाव क्यों? ऐसे ही एक बार त्रिपुति बालाजी के दर्शन के लिए गए। दर्शन के लिए वहाँ का जो हाल देखा मन बहुत खट्टा हुआ। हर तरह की कोशिश के बावजूद, जिस में हाई प्राइस टिकट भी थे, हम मन्दिर के अन्दर नहीं जा पाए और निराश होकर लौट आए। भारत के मन्दिरों में इतना चढ़ावा आता है फिर भी दर्शन करने आने वालों की सहूलियत का पूरी तरह से ध्यान क्यों नहीं रखा जाता। सोचने की बात है।
विजय भाई आपने अपने विश्वास के बावजूद मेरी बात का समर्थन कर दिया । हार्दिक धन्यवाद।
विचारणीय। मनुष्य ने ईश्वर का सृजन किया। चार्ल्स डार्विन ने ओरिजिन आफ स्पीशीज और डिसेंट आफ मैन में बहुत ही कनविंसिंग तरीके से स्पष्ट कर दिया था कि कोई दैवीय सृजनकर्ता नहीं है। सृष्टि का विकास हुआ है। किंतु मनुष्य एक अनुष्ठान प्रिय प्राणी है। उत्सव प्रेमी है। और उसकी यह प्रवृत्ति भी उसकी पशु विरासत से ही विकसित पुष्पित हुई है। हाथी अपने मृत साथी के इर्द-गिर्द घूमकर शोक मनाते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं?
कई अन्य पशु पक्षी अपने रहवास को अलंकृत करते हैं। बोवर बर्ड तो प्रणय कुटीर बनाती है। ऐसे ही भावनात्मक व्यवहार का विकास मानव में उच्च स्तर पर हुआ और उसने भी अपने ही स्वरुप में एक अति शक्तिशाली, सर्वव्यापी अलौकिक गुणों से संपृक्त सत्ता ईश्वर को बना लिया। रामानुजन के ईश्वरीय समर्पण को आप क्या कहेंगे? आदि शंकराचार्य निराकारी होते हुये भी शिव और देवियों के ऐसे स्रोत रचे हैं कि विस्मय होता है। आशय यह कि मनुष्य की प्रज्ञा प्रणम्य है। वह आस्थावादी हो या अनास्थावादी।
एक सारगर्भित टिप्पणी भाई अरविंद जी। हार्दिक धन्यवाद।
आ. संपादक महोदय!
सादर, सस्नेह नमस्कार
आपके हर संपादकीय से कुछ हटकर है यह विषय!आपके अधिकांश विषय समसामयिक जागृत कराने हेतु होते हैं। जबकि यह विषय सृष्टि के आदि से जुड़ा है। आपने सही कहा है कि संभवतः :कुछ मित्र इस विषय पर चर्चा करने से नाराज़ भी हो सकते हैं। वैसे होना नहीं चाहिए क्योंकि कोई कहे अथवा न कहे सबके ही मन में इस प्रकार के विचार तरंगित होते हैं। हो सकता है हममें से कुछ स्वीकार न करें लेकिन मुझे यह उतना ही सत्य लगता है जितना मैं अभी साँसें ले रही हूँ।
यह कुछ ऐसी बात नहीं हो गई कि पहले मुर्गी या अंडा?
भगवान ने हमें बनाया अथवा हमने भगवान को? इसका स्पष्ट उत्तर आम मनुष्य से लेकर साधु-संत में से किसको प्राप्त हुआ है?
बालपन से हमारे मस्तिष्क में जो चीज़ें बैठ गई हैं, उनका निकलना इतना आसान तो होता नहीं है।
मैं बहुत शिक्षित माँ – पिता की एकमात्र बची-खुची संतान हूँ। माँ संस्कृत की सीधी सादी अध्यापिका और पिता की विषयों में पीएचडी और वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए ताउम्र देश – विदेशों में भटकते रहे।
धर्म के नाम पर आर्यसमाजी परिवार में जन्म व लालन-पालन और विवाह सनातन धर्मी परिवार में। माता जी अनेकों नियमों के पालन में विश्वास रखने वाली और मैं उनके अनुसार बिलकुल फूहड़ जिसे आसानी से कुछ समझ ही न आए।
माँ पापा से हमेशा सुना ‘अहं ब्रह्मास्मि’ वही ठुकाई हुआ था मस्तिष्क में। कभी माता जी से ऐसे प्रश्न भी पूछ बैठती कि उनको लगता मैं जंगल में पली बढ़ी हूँ। वो जो करवाती, चुपचाप करती रहती। उनके जाने के बाद सब भूल गई। बहू आई तो उसे स्पष्ट बोल दिया जैसे तुम्हें करना हो करो, मुझे कुछ याद नहीं रहा तो मेरे जाने के बाद उसे कैसे रहेगा
माँ आर्यसमाजी होने के बावज़ूद हर त्योहार पर पकवान बनातीं। बड़े होकर जब पूछा कि हम तो आर्यसमाजी हैं फिर त्योहारों पर वे क्यों सब करती थीं?
“पड़ौसी में से पूरी – कचौरी, हलवे, खीर, मालपूओं की सुगंध आए और बच्चे को लगे कि हमारे यहाँ क्यों नहीं? बस, इसीलिए।” उनका उत्तर ठीक लगा।
यज्ञ घर का एक अहं हिस्सा था जिसकी सुगंध से आज भी वातावरण में पावनता महसूस होती है।
माता जी के साथ मंदिर भी जाती रही किंतु उनके बाद वह भी कम हो गया और कुछ मांगने जाना तो शुरू से अजीब महसूस करवाता था। आर्यसमाज में भी ऐसे अहं व बाँटने की बातें महसूस कीं कि लगा जो करना है घर पर ही कर लो न! मिलना तो वही है जो प्रारब्ध में है तो युद्ध क्यों?
जीना है तो आनंदित रहकर मन को शांति मिलती है। हाँ, वह बात पक्की है कि मंदिर के आगे से निकलने पर हाथ सवत: ही जुड़ जाते हैं। कुछ बड़े होने पर एक ज़बर्दस्त परिवर्तन यह अवश्य हुआ कि प्रकृति से बना, पंचभूतों से बना शरीर प्रकृति की अनुकंपा का धन्यवाद हर पल करने लगा, किसी बात का विरोध करने का औचित्य समझ नहीं आता।
भगवान वह शक्ति महसूस होती है जो जीवन जीने में सहायक होती है।
बहुत से संस्मरण स्मृति खंगाल गए हैं। कुछ पहले ही लिखे जा चुके हैं, कुछ इस संपादकीय को पढ़कर समय आने पर स्वतः लिखे जाएंगे।
बहुत लंबा लिख गई यदि अभी न विराम दिया तो न जाने कब तक लिखती रहूँ?
क्या यह नहीं लगता कि हम अपनी अपनी सुविधा व मन के अनुसार एक नए भगवान को गढ़ लेते हैं वर्ना प्रकृति में सब कुछ तो अंतर्निहित है।
यदि किसी मित्र का मन दुखाया हो तो दोनों हाथ जोड़कर क्षमा संपादकीय के लिए साधुवाद जिसने मुझे तो न जाने कहाँ कहाँ की सैर करवा दी।
प्रणव जी आपने लिखा है कि – भगवान वह शक्ति महसूस होती है जो जीवन जीने में सहायक होती है।
मैं बस इसी महसूसने का तर्क ढूंढने का प्रयास कर रहा हूं। आपकी लंबी और विस्तृत टिप्पणी के लिये आभार।
मुझे लगता है, हम सभी इस मन:स्थिति में जी रहे हैं।
जी कोई भी सोचने वाला व्यक्ति इसी मनःस्थिति में जियेगा।
मेरे मन में भी अक्सर ऐसे सवाल आते हैं! ऐसा क्यों होता है मुझे पता नहीं? ऐसे प्रश्न करो मैं रोकना चाहती हूं पर रोक नहीं पाती? मैं आज तक भी नहीं हूं नास्तिक भी नहीं! फिर क्या हूं मुझे पता नहीं।
भाग्यम जी, हम लोग ही संशयवादी यानी कि Agnostic कहलाते हैं।
Your Editorial of today is a candid expression of your skepticism regarding the existence n nature of God and the various names that are given to Him in different religions.
You also raise the question whether mankind invented God or we are His creation.
Very thought- provoking and disturbing question.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak ji thanks a lot for your comment. This question does keep on bothering me. Since, I am an agnostic, I keep questioning!
ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता आज का आपका संपादकीय चिंतन मनन के लिए प्रेरित करता है। ईश्वर है या नहीं, अनादि काल से व्यक्ति के मन को मथता रहता है और रहेगा। दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय, यह बात अक्षरश सत्य है।
सनातन धर्म में तो कण -कण में ईश्वर व्याप्त है, माना जाता है।
शायद इसीलिए प्रकृति के हर रूप को पूजा जाता है। धरती को माँ मानने के साथ हम नदियों तथा गाय को भी माँ मानते हैं। इसका कारण इनका संरक्षण ही मुख्य उद्देश्य है।
परम सत्ता है या नहीं लेकिन यह सत्य है कि अगर दुःख के समय इंसान उस परम सत्ता से मन का तारतम्य बिठा ले तो मन को शक्ति अवश्य मिलती है।
सुधा जी, श्रद्धा, विश्वास, दुःख, सुख आदि तर्क के सामने ढह जाते हैं।
तेजेन्द्र जी!
आपका इस बार का संपादकीय पढ़ा। आपके प्रश्नों में आपकी सोच की आकुलता महसूस हुई।आपने अपने प्रश्नों के बरक्स अपनी सोच के पक्ष में बहुत से तर्क रखे हैं।यह
विषय तो असीम हैं जिस पर संभावनाएँ कभी समाप्त नहीं होंगी। आपको तो क्या किसी को भी संतुष्ट करना आसान नहीं। लेकिन विषय से संबद्ध आपकी तरफ से आए हुए प्रश्नों को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस विषय पर बहस की काफ़ी गुँजाइश है पर
इस संबंध में हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं कि हमारी आस्था हमारी परवरिश पर आधारित है। हम ईश्वरीय शक्ति में विश्वास रखते हैं। आपके संपादकीय की सोच से दूसरे पक्ष के तर्क समझने का प्रयास कर रहे हैं। सादर
चलते -चलते तुलसीदास जी की मानस की एक चौपाई याद आ गई।
“हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहु विधि बहु संता।”
हर बार की तरह बेहतरीन संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
आदरणीय नीलिमा जी, आपने सच्चे मन से अपनी बात रखी। बहुत अच्छा लगा। हार्दिक धन्यवाद।
आपका संपादकीय देर से पढ़ा परंतु पढ़कर अच्छा लगा । धर्म या आस्था को लेकर आपने पूरी बेबाकी से अपनी बात रखी है और अंत में कहा है मैं भी तो वैसा ही हूं। दरअसल हमारा वैसा ही होना हमारे संस्कारों का प्रतिफल है। हम जिन संस्कारों और मान्यताओं के बीच पले बढ़े होते हैं वे हमारे भीतर इतने गहरे पैठ जाते हैं कि आजीवन हमारे साथ रहते हैं और जब कभी मौक़ा मिलता है तमाम तर्कों के बावजूद ईश्वर के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।
वैसे भी आस्था में तर्क की गुंजाइश नहीं होती। कहते हैं, if you love me, don’t judge me.
अगर आप तर्क कर रहे हैं तो आपकी आस्था अधूरी है। लेकिन प्रश्न यह है कि हमारी आस्था की बुनियाद क्या है ? या यों कहें इसकी उत्पत्ति कैसे होती है। मानव विज्ञान कहता है धर्म की बुनियाद में तीन कारक हैं – डर, अज्ञानता और लालच । इन्ही तीन वजहों से धर्म की उत्पत्ति होती है। अगर ये तीन बातें इंसान अपने भीतर से निकाल दे तो शायद उसे ईश्वर की आवश्यकता न हो।
सृष्टि के आरंभ में मनुष्य जब प्राकृतिक घटनाओं जैसे तूफ़ान , बारिश , आग ,भूकंप आदि के बारे में अनभिज्ञ था उसने इन घटनाओं से बचने के लिए प्रकृति के अनेक तत्वों की उपासना शुरू कर दी।
डर और अज्ञानता का तो आलम आज भी यह है कि गाँवों में कोई चलते फिरते रास्ते में भी सिंदूर से टीका करके उस पर अच्छत छिड़क दे तो अधिकांश लोग उस पर पैर रखने से डरने लगते हैं। अगर गलती से पैर लग भी जाए तो किसी अनिष्ट की आशंका में कान पकड़ कर माफ़ी मांगने लगते हैं। ऐसा डर और अज्ञानता के कारण ही होता है ।
दुख की घड़ी में इंसान को कोई ना कोई आलंब चाहिए होता है और यह आलंब उसे इस ईश्वर में ही मिलता है। किसी वस्तु को पाने की चाह में वह तमाम तरह की मन्नते मानता है।
डर , अज्ञानता और लालच से धर्म की उत्पत्ति के सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। इसलिए इंसान के अंदर जब तक ये तीन कारक मौजूद हैं तब तक धर्म में उसकी आस्था बनी रहेगी ।परंतु इसे लेकर की जाने वाली तर्कपूर्ण और विवेकसम्मत बातों से शायद अंधविश्वास थोड़ा कम हो। इस लिहाज़ से आपकी टिप्पणी सार्थक है , इससे हम सहमत हों या असहमत।
भाई तरुण कुमार जी आपकी टिप्पणी ने मुझे अपना संपादकीय समझने में सहायता की है। मैंने आपकी टिप्पणी को तीन बार पढ़ा। मैं लंदन में आपकी सोच का हमेशा प्रशंसक रहा। मगर यह टिप्पणी तो मुझे किसी भी विषय को समझने में सहायक सिद्ध होगी। हार्दिक आभार। भारत में आपसे ना मिल पाने का अफ़सोस है। मगर दिल्ली से बाहर हवाई यात्राओं का बहुत दबाव रहा।
बहुत ही शानदार और सटीक शायद डर ही ईश्वर का दूसरा रूप है
और लालच डर को भी मार देता है
मुझे हमेशा से लगता है कि दुख से ज्यादा डश्र से ईश्वर को याद किया जाता है
बेहद शानदार और एक और सबसे अलग विषय
हमें हमारे ईश्वर से पंडे, मौलवी, मंदिर, मस्जिद दूर करते हैँ, हमारा ईश्वर हम स्वयं हैँ, हम जब कुछ भी मानव कल्याण, परोपकार करते हैँ तो हमारी चेतना एक शब्दतीत सुख का अनुभव करती है, वो ईश्वरीय चेतना है, जब भी कुछ बुरा या अहितकर कार्य करते हैँ वो चेतना चेतावनी देती है, उसे सुन लिया तो ईश्वर और नहीं सुना तो राक्षस ! हम सब परमात्मा के अंश आत्मा का शरीर हैँ, उसी के कर्म कर रहे होते हैँ, जब तक परमात्मा सांसे दे रहा होता है, ये शरीर चलता है, जैसे ही सांसे देना बंद करता है, इस शरीर की यात्रा बंद हो जाती है। ये इंसानी नहीं, ईश्वरीय संचालन है । आपने गीता तो पढ़ी ही होगी अब आप कृपया उड़िया बाबा के बारे में पढ़ें, संशय खत्म हो जाएंगे या कि ध्यान की अवधि को 40 मिनिट से आगे ले जाएँगे तो आपको ब्रह्म के दर्शन भी हो सकते हैं ।