Friday, April 17, 2026
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शैली त्रिपाठी का लेख – वृद्ध-विवाह : हास्यास्पद या ज़रूरत?

भारतीय संस्कृति के लिए विवादास्पद परन्तु एक बड़े वृद्ध समुदाय के लिए ‘प्रश्नचिह्न’  से अधिक ‘टैबू’ (निषेध) के बारे में लिखना आसान नहीं, मगर लिखने का साहस कर रही हूँ। मुझे विश्वास है कि आप इस बात की सच्चाई से पूर्णतः नहीं तो निश्चित रूप से, अंशतः सहमत हो पाएंगे।
मैं एक माध्यम वर्ग की सामान्य स्त्री हूँ। लेकिन यह लेख लिंग, जाति, धर्म, उम्र, संप्रदाय और धार्मिक बेड़ियों से मुक्त एक स्वतंत्र व्यक्ति और विचारक की तरह लिख रही हूं। मेरा प्रयास है कि हम सब इस विषय पर खुल कर बातचीत कर सकें। 
कुछ दिन पूर्व वैवाहिक(मेट्रीमोनियल) में किसी प्रगतिशील, सत्य को स्वीकारने वाले वरिष्ठ नागरिक का विज्ञापन देखा था, जो पत्नी की तलाश में था… तदोपरांत फ़ेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी, आपके समक्ष प्रस्तुत है –
“आवश्यकता है-
एक पढ़े-लिखे, समझदार इकहत्तर वर्षीय बूढ़े किसान को पढ़ी-लिखी, समझदार 50-60 के बीच की बुढ़िया चाहिए। बहुत पसंद आ जाने पर उमर में ढील दी जायेगी। शर्त एक ही है कि वासना रहित प्यार की लेन-देन में सक्षम हो। प्यार, पुस्तक और यात्रा में दिलचस्पी हो। परनिंदा से दूर रहे। जब भी किसी की चर्चा करे तो उसके गुणों की हो। सादा और स्वादिष्ट भोजन बनाने में निपुण हो। पुरुषों से सहयोग लेने की कला में पटु हो। ध्यान में दिलचस्पी हो तो कहना ही क्या! हँसमुख हो। निरर्थक बातें न करती हो। धन-लोभी न हो। सज्जनों के प्रति प्रेम और दुर्जनों के प्रति क्रोध से भरी हो। बूढ़े ने बुढ़िया से इतने गुणों की अपेक्षा इसलिए की है, क्योंकि ये गुण उसमें भी विद्यमान हैं।”
इस पर दी गई प्रतिक्रियाएं भी पढ़ीं। सभी ने इस विषय को मात्र मनोरंजन की दृष्टि से देखा था, तदानुकूल टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियायें भी थीं। कोई भी इसे गम्भीरता से सोचते हुए दिखाई नहीं दिया।
मैं आश्चार्यचकित थी। यहाँ यह बताना चाहूंगी कि मैं “अबला जीवन हाय…”, जैसी स्त्री नहीं हूँ, ना ख़ालिस पूजा, धर्म, व्रत में संलग्न रूढ़िवादी, ना किसी ए, बी, सी रॉय की तर्ज वाली वामपंथी न फेमिनिस्ट होने का दंभ भरने वाली झांसी की रानी नुमा… मैं एक सामान्य इन्सान हूँ, अपने विचार, अपने दृष्टिकोण को सामाजिक करने में भयभीत नहीं हूँ।
कृषि-प्रधान देश भारत में, कुछ दशाब्दियों पूर्व संयुक्त परिवार होते थे। क्योंकि खेत एक स्थान पर होते थे और वही आजीविका के साधन थे; तो पीढ़ी दर पीढ़ी सभी इसीपर निर्भर रहते थे। आर्थिक स्थिति सामान्यतः मज़बूत नहीं होती थी। कई पीढ़ियाँ साथ-साथ एक घर में रहती थीं। स्त्रियों की औसत आयु, पुरुषों की अपेक्षा कम थी। लेकिन विधुर वृद्ध या विधवा स्त्रियों को पारिवारिक ढांचे के कारण बहुत अधिक एकाकी जीवन, नहीं जीना पड़ता था।
समय बदला, खेती के अतिरिक्त आय के साधन बने। नौकरी पेशा समुदाय बना। स्थानांतरण नौकरी का एक आवश्यक नियम था। परिवारों का संयुक्त ढाँचा बदलने लगा। शिक्षा, व्यवसाय और नौकरी के कारण एकल परिवार अस्तित्व में आये।
अब घर के वृद्ध या वृद्धाएं (विधुर या विधवा) का एकाकी जीवन बढ़ा, तिरस्कार भी। उन्हें परिवार पर बोझ माना जाने लगा। छोटे घर, सीमित संसाधन, युवा गृहस्थ- अगली पीढ़ी की चिंता करें या मृत्यु-मुख पर बैठे बुजुर्गों की?
आय क्योंकि पर्याप्त नहीं थी, वृद्ध स्त्री-पुरुष आर्थिक रूप से परिवार और बच्चों पर निर्भर थे। जो भाग्यशाली थे उन्हें बच्चों की देखरेख मिली अन्यथा बूढों की स्थिति बिगड़ी। कुछ वृद्ध असहाय से सड़कों पर फेंक दिए जाते थे, महिलाओं को सरकारी खर्च पर चलने वाले वृद्धाश्रम में या माथुर-काशी के घाटों पर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता था।
वृद्ध होने की परिभाषा थी – जीवन के प्रत्येक सुख, सुविधा, स्वाद और इच्छाओं से विहीन हो जाना। अत्यधिक सहिष्णु, किसी बात पर क्रोधित या अपमानित ना होना। जो मिल जाय उसी में सन्तुष्ट रहना। ना कपड़ों की चिन्ता, ना भोजन और स्वाद की, ना कोई शौक ना ही सुख आराम, मनोरंजन  तो सोच के बाहर का परिंदा था…। वृद्ध जीते जी मरे समान हो जाते थे। यदि कोई वृद्ध व्यक्ति, जीने की इच्छा रखता, स्वाद या पहनने-ओढ़ने की सुविधा चाहता, खुश रहता, गाने या नाचने कि इच्छा करता तो – “सींघ कटा कर बछड़ों में शामिल होना?” “जब बूढ़ भये बुढ़ासा, तब रह-रह करें तमसा”, “चढ़ी जवानी बुड्ढे नू”, “बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम” या “शौकीन बुढ़िया, चटाई का लंहगा”- आदि कहावतों से नवाज़ा जाता था। वृद्धावस्था को जीवन के सुख और भोग से विहीन मान लिया जाता था। 
जीवित वृद्ध, ऐसी सामाजिक रूढ़ियों और उपलम्भों का बोझ उठाए; असल उम्र से दस-बीस साल और बूढ़े, आमोद-प्रमोद, सुख-सुविधा से वंचित, जीवित-शव बन कर रह जाते थे।
समय बदला, आर्थिक प्रगति हुई। भारतीय पुरुषों की औसत उम्र बढ़ी, कम बच्चे और स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण महिलाओं की मृत्यु दर घटी और औसत उम्र में भी इज़ाफ़ा हुआ। सीनियर सिटीज़, चूंकि नौकरी-पेशा रहे या अपना धंधा-व्यापार किया तो आर्थिक रूप से सक्षम हुए। अपनी अगली पढ़ी को उन्होंने सुविधाएं दीं। फलतः बच्चे पढ़ाई करके देश-विदेश में नौकरी, व्यवसाय आदि करके; आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हुए। सामाजिक ढांचे में मूलभूत परिवर्तन हुए।
आज, “साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान?” का ज़माना है। व्यक्ति का स्वास्थ सत्तर-पचहत्तर साल तक ठीक रहता है। आर्थिक स्थिति अच्छी है, घर है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है। मात्र मूल आवश्यकताएं चलाने से अधिक संसाधन हैं। नई पीढ़ी पर अब मां-बाप, आर्थिक रूप से आश्रित नहीं। एक बड़ा वर्ग आज आत्मनिर्भर है। साठ-पैंसठ साल के स्त्री-पुरुष, एवरेस्ट के बेस कैम्प तक चढ़ाई कर रहे हैं, देश-विदेश की यात्राएं कर रहे हैं, अपने दम पर, संसाधनों पर सुख से जीने का प्रयत्न कर रहे हैं। सीनियर सिटीज़ हैं वो बूढ़े-जलापा नहीं। सब सुविधा हैं तो जीवन में बुढ़ापा ओढ़ने और सामाजिक अपवाद से डरने की ज़रूरत भी नहीं है।
उम्र का कोई भरोसा ना कभी था ना होगा। फलतः विधुर और विधवा आज भी हैं। आज एकल परिवार में, ऐसे एकाकी बुज़ुर्ग केलिए, बहुत सी दिक्कतें और चुनौतियां हैं। क्योंकि बच्चे या तो शहर, या देश से बाहर हैं, बेटी है तो वह भी नौकरी कर रही है या उसका ब्याह हो चुका है। एकल परिवार की यह त्रासदी है कि, वृद्धावस्था में बुज़ुर्ग मां-बाप, अकेले हो जाते हैं। जब तक पति-पत्नी दोनों ही जीवित हैं; अधिक दिक्कत नहीं होती। एकाध नौकर-नौकरानी के सहारे जीवन कटता रहता है। दोनों एक-दूसरे का दुःख-दर्द बाँट लेते हैं। कोई बीमार हुआ तो देखभाल कर लेते हैं या अस्पताल तक पहुंचा देते हैं।
आज का बुजुर्ग मृतप्राय, जीवन से विरक्त प्राणी बन कर नहीं जीना चाहता। क्योंकि मनुष्य मात्र की  इच्छाएं, सपने और शौक; आजीवन मरते नहीं ना ही मरती है सुख पाने की अभिलाषा… उम्र मात्र एक गिनती है।
ऐसे में यदि एकाकी स्त्री या पुरुष जीवन सांध्य में, जीवन साथी की चाह कर रहे हैं; तो यह अस्वाभाविक क्यों माना जा रहा है? क्यों हमारी परंपराएं और बेड़ियां आड़े आ रही हैं? क्यों हम इस आवश्यकता को स्वीकार नहीं पा रहे हैं? क्यों इसे ‘टैबू’ मान रहे हैं? क्यों उपहास कर रहे हैं?
क्या बुजुर्गों को साथ-प्यार की ज़रूरत महसूस नहीं होती? जिसके बच्चे अपने काम-धंधे से बाहर हैं, बच्चों पर उनके बच्चों की जिम्मेदारी है। पिता या मां, एकाकी किसी शहर के एक घर में अकेले रह रहे हैं। रिश्ते-नाते भी किसी का कितना भला करते हैं?
ऐसे में यदि कोई घर में फिसल कर चोट खा जाए? किसी को दिल का दौरा पड़ जाए? इसी तरह की कोई भी दिक्कत या दुर्घटना हो जाए तो… कोई उनकी जानकारी देने वाला या वाली भी नहीं रहेगा? यदि वे फ़ोन न कर पाए तो किसी को कोई जानकारी नहीं होगी कि अमुक को चोट लगी है, या दिल का दौरा पड़ा है या ब्रेन स्ट्रोक हो गया है या हड्डी टूट गई है आदि आदि…
जिसकी चिकित्सा सम्भव है वो भी असम्भव हो जायेगी। कहते हैं कि, “जीवन साथी की सबसे अधिक आवश्यकता बुढ़ापे में होती है।” दो समवयस्क व्यक्ति, यदि अपने सुख-दुःख साझा करके, एक-दूसरे का सहारा बन कर बुढ़ापे को सह्य और सुखद बना सकते हैं तो इसमें आपत्ति क्या है?
यदि कोई एकाकी वृद्ध या वृद्धा जीवन-साथी खोज रहे हैं तो उसमें अनैतिक, असामाजिक और आपत्तिजनक क्या है? बुढ़ापे का विवाह, यौन-सुख या सन्तान प्राप्ति के लिए तो सम्भव नहीं है। चलिए मान लेते हैं कि यौन सुख भी शामिल है, तो भी हमारे पूर्वज “धर्म, अर्थ काम, मोक्ष” को पुरुषार्थों की श्रेणी में रख गए हैं।
कामेच्छा भी कोई अप्राकृतिक इच्छा नहीं है। यह है; तभी धरती पर जीवन है, बच्चे हैं, युवा हैं। ‘काम’ जीवन को सरस बनाता है, पति-पत्नी का सम्बन्ध ही कामाश्रित है। बात यहां भिन्न इसलिए है कि प्रजावर्धन इस उम्र में सम्भव नहीं। यदि सम्भव भी हो, तो शिशु के स्वास्थ्य की कोई गारंटी नहीं। सबसे बड़ी बात, भारत के परिप्रेक्ष्य में यह भी है कि, देश जनसंख्या आधिक्य से पहले से ही पीड़ित है। लेकिन गर्भ निरोधक साधनों से इसका कोई भय नहीं रह जाता।
हम यदि इस तथ्य से इन्कार करना चाहते हैं या आँखें चुराना चाहते हैं तो, कुछ आंकड़े ज़रूर देखें कि पॉर्न साइट का उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप में काफ़ी अधिक है। मानी हुई बात है कि नौकरी-पेशा, पढ़ाई आदि संघर्षों में व्यस्त रहने वाली युवा-पीढ़ी की तुलना में सीनियर सिटीज़्स के पास अधिक समय है और मन… ये उम्र की सीमा से कब बंधा है? (बस अपने तक सीमित रखना है, पढ़ना, स्वीकारना सभी का निरा निजी मामला है, ये सामाजिक स्वीकारोक्ति नहीं है)
उपरोक्त बातें मात्र शंका निवारण और सामान्य रूप से उठने वाले प्रश्न का उत्तर है। प्रमुख मुद्दा है एक सहारा, कुछ सुविधाएं, बीमारी या आकस्मिक दुर्घना पर कोई ऐसा हो जो एंबुलेंस, रिश्तेदारों को सूचित कर सके। जीवन के लिए ‘फर्स्ट-एड’ की तरह आवश्यक। इसके अतिरिक्त वृद्ध जीवन में  थोड़ी सी खुशी, तनिक सी सुविधा…कौन सा जघन्य अपराध है?
एक विदेशी वृद्ध महिला से ‘बाली’ (इंडोनेशिया) में मुलाकात हुई। वह पैंसठ साल की थी, उसके दो बच्चे अमेरिका में बसे थे, तीन नाती पोते थे। वह ख़ुद ऑस्ट्रेलिया से, बाली घूमने आई थीं। अपने पति के साथ, जो सत्तर वर्ष के थे, जिन्होंने पाँच साल पहले ही विवाह किया था।
महिला ने बताया कि, बच्चों के विवाह और विदेश में बसने के बाद, अचानक पहले पति की मृत्यु का सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ। वह डिप्रेशन का शिकार हो गईं, कई अन्य बीमारियों से ग्रस्त, बिस्तर में पड़ी थी। चिकित्सा के दौरान, आज के पति उसे मिले थे। वह डॉक्टर थे, विधुर थे। दवा लम्बी चली। इस दौरान दोनों को एक दूसरे को समझने का मौका मिला। दवाओं के साथ किसी हमदर्द का साथ पाकर, महिला का स्वास्थ्य सुधरा। फिर दोनों ने अपने-अपने बच्चों को बात करके, यह दूसरी शादी की और अब सुख से रह रहे हैं। इस समय दस दिन के लिए, बाली घूमने आए हैं। 
आप सोचिए कि यदि ये दोनों बुज़ुर्ग अलग-अलग, अपने दुःखों में डूबे, जीवन जीते रहते या किसी एक बच्चे पर या बारी-बारी से सभी बच्चों के ऊपर बोझ बने जीते तो; क्या उनके मन में ये विचार भी आता कि विश्व पर्यटन करें? अपनी स्वयं की जिन्दगी आत्मनिर्भर हो कर जियें?
आप ही बताएं इसमें आपको क्या दोष नज़र आता है? ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता? इसमें कौन सी असामाजिकता या अनैतिकता है? कहां रूढ़ियां टूट रही हैं? यही वह भारत है; जहाँ बाल-विधवा आजीवन, मात्र अपने शारीरिक और मानसिक जरूरतों की अनदेखी करती, जीवन जीने की सज़ा भोगती थीं! फिर विधवा-विवाह केलिए प्रयत्न हुए। सतीप्रथा को ख़त्म करने वालों का नाम इतिहास में अमर हो गया। यानी रूढ़ियों का टूटना ज़रूरी है।
हम भारतीय हैं। जहां धर्म की परिभाषा है – “धारणात् धर्मः इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः।” यानी जो प्रजा(जनसंख्या) को धारण करे वह ही धर्म है। ऐसे में, वृद्ध-विधुर या वृद्धा-विधवाओं के विवाह को हम क्यों मान्यता नहीं दे सकते? आप सभी सुधी पाठकों का आह्वान है, ऐसे ज्वलन मुद्दे को समझने और बेबाक राय देने का।
बदलाव स्वाभाविक है, युग बदलता है तो युगधर्म भी बदलता है। बदलाव का अस्वीकार मनुष्य का स्वभाव है लेकिन बदलने की शक्ति भी मानव के पास है।
शैली
शैली
सम्पर्क - [email protected]
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21 टिप्पणी

  1. अति विचारणीय आलेख है.. आदरणीया शैली जी। इस विषय पर प्रकाश डालकर कई प्रश्नों का समाधान भी किया है आपने। वास्तव में वृद्धावस्था अत्याधिक संवेदनशील अवस्था है। अकेलेपन एवं बीमारिओं से लड़ते हुए निराश्रित जीवन जीने से अच्छा है कि यदि कोई साथी मिल जाए तो बाकि जीवन सहज हो जाए
    । किंतु भारतीय संस्कृति एवं परम्परा को अनदेखा नहीं कर सकते। तो ये प्रश्न तो जन्म लेंगे ही। और बहुत कम समय है… यह परिवर्तन भी यथाशीघ्र आ जाएगा।

    बहुत ही सुंदर आलेख

    • हार्दिक धन्यवाद अणिमा जी, आपकी साकारात्मक प्रतिक्रिया पढ़ कर तसल्ली हुई कि कोई तो समझ सका इस समस्या को और उसकी आवश्यकता का समर्थन किया। युगधर्म बदलता है, परंपराएं आवश्यकतानुकूल बदलती हैं।
      बदलाव शनै:-शनै: होता है। मनसा, वाचा कर्मणा… विचार इसी क्रम में कार्य रूप धारण करते हैं।
      मुख्यसम्पादक तेजेंद्र जी ने मेरे विचारों का प्रकाशित करके , वाचिक रूप दिया आपके समर्थन से इसे बल मिला । पुनः साधुवाद

  2. बहस का मुद्दा है। महत्वपूर्ण पहलुओं पर विश्लेषण किया गया है लेकिन मेरे अपने विचार से मैं कतई वृद्धावस्था विवाह के पक्ष में नही। इस आलेख के लिए लेखक को बधाई।

  3. रिंकू जी आपने लेख पढ़ा, प्रतिक्रिया दी, हार्दिक आभार। यदि वृद्धावस्था का विवाह आप उचित नहीं मानती, इसके पीछे के कारण या इससे उपजे दोषों की संभावना के बारे में भी कुछ जानकारी दी होती तो आपका पक्ष समझने में सुविधा होती।
    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  4. आप की बात सर्वथा उचित और विषययानुकूल है। यदि व्यक्ति साधन संपन्न और समर्थ है तो उसे जीवन की शाम रोते हुए क्यों गुज़ारनी चाहिए। अकेला पन बहुत पीड़ादायक और डरावना होता है।इस समय यदि कोई सही कम्पेनियन मिल जाए तो सौभाग्य की बात है जो निस्वार्थ भाव से प्रेम संबंध निभाने की अहमियत समझता हो। संपत्ति पर कब्जा करने, ऐयाशी करने या अपने शौक पूरे करने की दृष्टि से किया गया समझौता और भी कष्ट दायक हो जाएगा। बच्चे बीच में भागीदारी की कोशिश न करें।यह सौभाग्य कठिन तो है किन्तु आवश्यक भी है। बुद्धिमान, विवेक शील, और संयमी युगल यदि हों तो जीवन स्वर्ग बन सकता है वरना और भी भयंकर त्रासदी जीवन में हो सकती है। संगीत,कला और साहित्य प्रेमी लोग इस समय को सार्थक बना सकते हैं।

  5. ————– एक आधुनिक समस्या से जूझता सार्थक लेख। विषय का विवेचन और विश्लेषण तर्कपूर्ण है। वृद्धावस्था में विवाह करना या न करना , व्यक्तिगत परिस्थिति पर निर्भर करता है। यह एक विचारपूर्ण समस्या है और बढ़ती जा रही है।

    • हार्दिक आभार लेख को पढ़ने और महत्वपूर्ण विचार साझा करने के लिए। वास्तव में यह एक समस्या है, जिससे समाज में कई विसंगतियां भी पैदा हो रही हैं। अच्छा लगा कि आप जैसे मनीषी ने इस समस्या का संज्ञान लिया और साकारात्मक प्रतिक्रिया दी। यह वास्तव में एक व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन “लोग क्या कहेंगे” पता नहीं कितने निर्णयों से रोक लेता है। एक जीवन मिला है, उसे खुल कर जी नहीं सके तो ईश्वर के दिए इस मनुष्य शरीर रूपी वरदान के साथ क्या हम न्याय कर सके।
      पुनः धन्यवाद

  6. अति सुन्दर, समसामयिक, विचारणीय ही नही अपितु अनुकरणीय लेख।
    इतने संवेदनशील मुद्दे को अपनी भावप्रवणता तथा स्पष्ट दृष्टिकोण से आपने बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।
    भारतीय धर्म संस्कृति की दुहाई देकर समाज के इस वर्ग को उनकी शारीरिक, मानसिक ,सांसारिक और भावनात्मक संबल से दूर रखना किसी भी प्रकार से उचित नही है।
    लेख के लिए अनेकानेक साधुवाद

    • साधुवाद जयंती, तुम्हारी इतनी सुलझी टिप्पणी पढ़ कर मन अभिभूत हो गया।
      धर्म की दुहाई, वह धर्म जो “धारण” करने के लिए बना समाज, मनुष्य और सृष्टि को?
      मनुष्य को मनुष्य न बने रहने देना कहां का न्याय है? स्त्री को देवी बना कर, मनवासुलभ सुख, आक्रोश, कुंठा और दुःखों से दूर कर दिया, पुरुष को भर्ता बना कर, पति देवता बना कर मावसुलभ सभी त्रुटियां, भोगों और आनंद से…
      आखिर कब तक हम इन गलत व्याख्यानों पर अटक कर धर्म के मूल को नहीं समझ सकेंगे? मानव को मानव सुलभ रूप से जीने का अधिकार आखिर कब दे सकेंगे।
      ढेर सारा प्यार और साधुवाद

  7. बेहद संवेदनशीलता से लिखा गया आलेख, जो आज की वास्तविकताओं पर औचित्य पूर्ण ढंग से आधारित है।
    सही कारण और सही औचित्य पूर्ण वाले समाधान बेहद रोचक परंतु सटीक और वस्तुनिष्ठ तरीके से वर्णित किए गए हैं ।
    इस लेख की खासियत यह है कि यह उपदेश नहीं देता वरन स्थिति को सामने रखकर और उदाहरण से अपने मत को बहुत ही स्वीकार्य रूप से पाठक के सामने रखता है ।
    इतने रोचक सहज सरस और समीचीनआलेख के लिए लेखिका को बधाई हो

  8. शैली जी, आपका लेख पढ़ा! बेहतरीन सुलझी हुयी सोच! हमारे देश में इस सोच को अपनाने में शायद कई सदियाँ और लगेंगी! व्यक्तिगत रूप से मैं इस सोच को बिलकुल सही मानती हूँ! समाज ने हमेशा से ही ऐसी किसी भी विचारधारा को दबाने की कोशिश की है चाहे वह वृद्ध अवस्था में प्रेम की चाहत हो, साथ और साथी की चाहत हो या फिर शारीरिक आकर्षण ही हो! समाज को रोती बिलखती वृद्ध (या फिर युवा ) विधवा शायद एक हंसती हुयी विधवा से ज्यादा सही लगती है! और शायद उस उम्र के पड़ाव तक पहुँचते पहुँचते ख़ास तौर पर स्त्रियां अपनी शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक शक्ति भी खो देती हैं जिसके कारण यदि ऐसी कोई भावना उनके अंदर आती भी है तो समाज से लड़ने की ताकत नहीं जुटा पातीं! ज़रुरत है युवा समाज की सोच बदलने की जो अपने वृद्ध माता पिता को मानसिक शक्ति दे सकें! मेरा मानना है की यदि युवा बच्चे अपने वृद्ध माता पिता का साथ दे सकेंगे तो समाज से लड़ने की सिर्फ ताकत ही नहीं देंगे बल्कि शायद देर से सही पर एक नए और खुली विचारधारा के समाज की नीव भी डालेंगे! आपके लेख की हृदय से सराहना एवं बहुत बधाई!

  9. आपने लेख के उन बिंदुओं पर ध्यान दिया जो वास्तव में मेरा मेरे उद्देश्य थे, स्थिति स्पष्ट करना और पाठकों को स्वयं निर्णय देने के लिए आमंत्रित करना। गम्भीर विषय को यदि रुचिकर ढंग से प्रस्तुत ना किया जाए तो सामान्यतया पाठक उत्सुक नहीं होते। इसी लिए फेस बुक के रोचक उद्धरण को दिया था। प्रसन्नता हुई कि आप जैसे मनीषी इस विषय की गम्भीरता को समझ सके और अपने महत्वपूर्ण और साकारात्मक दृष्टिकोण को साझा किया। हार्दिक धन्यवाद।

  10. सामन्य जनमानस की सोच और सम्वेदना से प्रायः अछूता विषय उठाया गया है शैली के द्वारा।
    अकेलेपन कीं समस्या से जूझ रहे बुजुर्गों के साथ ही युवा वर्ग की चेतना को भी जागृत करने वाला सहज और रोचक प्रयास स्तुत्य है। अनेकशः साधुवाद शैली तुम्हें !

  11. शैली त्रिपाठी जी को जितना साधुवाद दिया जाए वो कम हो होगा। एक पीढ़ियों से प्रचलित दकियानूसी दोगली और आडंबरपूर्ण सोच पर बिना कुछ किए कड़ा प्रहार किया गया है।
    तिस पर भी बेहद संवेदनशीलता से लिखा गया आलेख, जो आज की वास्तविकताओं पर औचित्य पूर्ण ढंग से आधारित है।
    सही कारण और सही औचित्य पूर्ण वाले
    समाधान बेहद रोचक परंतु सटीक और वस्तुनिष्ठ तरीके से वर्णित किए गए हैं ।
    इस लेख की खासियत यह है कि यह उपदेश नहीं देता वरन स्थिति को सामने रखकर और उदाहरण से अपने मत को बहुत ही स्वीकार्य रूप से पाठक के सामने रखता है ।
    इतने रोचक सहज सरस और समीचीन आलेख के लिए लेखिका को बधाई हो।

  12. बहुत विश्लेषणात्मक लेख है शैली जी! इस विषय पर गंभीरता से लिखने के लिए साधुवाद! वास्तव में एकल परिवार में ऐसी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं और इनके समाधान के लिए ही शायद वृद्धाश्रमों की वृद्धि हो रही है। कई जगहों पर तो एकाकी वृद्धों को, घर में बात चीत करने केलिए, अखबार पढ़कर सुनाने के लिए, बेटों बेटियों जैसा माहौल बनाने के लिए,,, सर्विस सेंटर बन गए हैं।
    भावनाओं का आदान प्रदान मानव को शांति देता है, आनंदित करता है और इसलिए उसे किसी साथी की जरूरत पड़ती है। और दो व्यक्ति अगर एक ही अवस्था में हों तो साथी बन सकते हैं।
    भारत का इतिहास इससे अछूता नहीं रहा है,,, वियोग,, नियोग और संयोग समाज में आवश्यकता के अनुसार अपनाए गए हैं। पाशविक कामना से नहीं, अपितु सामाजिक आवश्यकता के अनुसार,,,
    टिप्पणी लंबी हो जाएगी इसलिए विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं ,,, लेकिन आत्मा शुद्ध हो तो प्रत्येक कार्य जो समाज के हित में है,,, भारत में स्वीकृति मिली है,,, जिन्होंने इतिहास को कहानी की तरह पढ़ा है वे ही ऐसी घटनाओं को व्यंग्यात्मक समझेंगे,,,,,

  13. सुश्री शैली जी,
    इस सामाजिक रूप से अति प्रासंगिक
    और विचारोत्तेजक लेख के लिए बधाई।
    एकाध शताब्दी पहले के पाश्चात्य सामाजिक जीवन का वर्णन करने वाले धनवान लोग स्त्री -पुरुष दोनों) बढ़ती आयु के एकाकीपन से बचने के लिए ‘कम्पैनियन’ रख लिया करते थे। आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति के लिए यह प्रथा मुझे सदैव सम्माननीय लगी है।

    ‘विवाह ‘नाम का सीधा संबंध यौन-संबंध से माना जाता है। जिस देश में विवाहित जोड़े का भी बड़ों के सामने हाथ पकड़ना तक अशोभनीय माना जाता हो, उस देश में पौत्र दौहित्रों के आगे वरिष्ठों का विवाह इतनी सहजता से स्वीकार्य नहीं होगा।
    हां, सामाजिक व्यवस्था का बदलाव देर सबेर इसे स्वीकार करवा लेगा।समय लगेगा ।
    हां सामाजिक परिस्थितियों के बदलने

  14. आप को धन्यवाद क्योंकि अकेले व्यक्ति की व्यथा और दुर्बलता की दूखती‌ नस को टटोलकर आप ने उसकी दवा देकर इस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया है। सनातन हिन्दू धर्म के प्रति संवेदनशील रहते हुए भी यह कहना चाहता हूं कि आपद् धर्म भी महत्वपूर्ण है और उसे भी उतना ही महत्व मिलना आवश्यक है। कोई समस्या होती है इसलिए मनुष्य दुसरा विवाह करता है और बुढ़ापे में तो साथ की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है इसलिए आपके आलेख का मैं समर्थन करते हुए आप को बधाई देते हुए कहता हूं –
    भविष्य में परिवर्तन निश्चित ही होगा, इस आशावाद के साथ!

  15. प्रिय शैली जी आपके वृद्धावस्था पर लिखे गए लेख से में प्रथम दृष्टया ही अपनी सहमति हां में जताती हूं ,
    बहुत ही सारगर्भित सामयिक जरूरत के हिसाब से भी उत्कृष्ट आलेख की रचना की है आपने,
    प्रिय हालांकि भारत वर्ष में अभी न्यूनतम मात्रा में ही प्रचलित है ,आगे जाकर लोग स्वतः ही स्वीकार करेंगे ,
    जिस प्रकार सती प्रथा बंद हुई ,विधवा विवाह पुनर्विवाह में तब्दील हो गया ,ऐसे ही
    वृद्ध स्त्री पुरुष भी विधुर या वृद्ध स्त्रियां वैधव्य पूर्वक जीवन न बिता कर अपने अनुसार द्वितीय विवाह कर सकेंगे ,
    अभी दिक्कत ये है कि स्त्रियों का आर्थिक रूप से निर्भरता कम होने से वे अपनी जिंदगी का निर्णय लेने में डरती हैं ,
    दूसरा संभ्रांत वर्ग के लोग एक नहीं दो दो विवाह करले उन्हें कोई कुछ नहीं कहता ,वहीं मध्यम वर्ग हमेशा अपने सुख की बजाय सामाजिक तथाकथित मर्यादा को देखता है ,क्योंकि दअरसल आजकल के लोग अपने दुख से दुखी नहीं दूसरे के सुखों से ज्यादा दुखी रहते हैं, ऐसे ही असामाजिक व्यक्तियों की वजह से पुरुष तो एक बार निर्णय ले भी ले ,स्त्रियां नहीं ले पाती ,असफलताओं से डरती हैं ,कहीं पुनर्विवाह सफल न हुआ तो परिवार चैन से जीने नहीं देगा ,
    परंतु
    सब देखते ही जायेंगे ये बदलाव आना ही है ।
    जिंदगी न मिलेगी दोबारा की तर्ज पर,उत्तम स्वास्थ्य चिकित्सा,जीवन आयु में वृद्धि,आमदनी की स्त्रोत, भौतिक संसाधन की वृद्धि,
    सब कुछ होने पर,ओर आजकल स्त्रियों में भी दुनिया का आधा भाग में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने की होड,एवं आत्मनिर्भरता,उन्हें निर्णय लेने में सक्षम बना रही है

    प्रिय शैली जी आपने जो उदाहरण भी दिए हैं
    वे भी आगे मान्यता प्राप्त करेंगे ,बशर्ते बढ़ती उम्र में पारदर्शिता रखते हुए सोच समझ कर निर्णय लिए जाए तो वृद्ध भी अपनी सुविधानुसार जिंदगी को भरपूर जी पाएंगे।
    बदलाव स्वाभाविक है।
    कुन्ती हरिराम झांसी

  16. आदरणीय शैली जी!

    सबसे पहले तो हम यह कहेंगे कि आपने अच्छा विषय उठाया है जो आज की जरूरत भी है। और इस विषय पर लिखना है एक साहसिक कदम है आपका।

    हर वह नया नियम या सोच, जो परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ना चाहती है, प्रारंभ में उसका विवाद तो होना तय ही है। और ऐसे विषय पर लिखने के लिए आपने जो साहस किया है उसको हम सलाम करते हैं।

    पेपर में इस तरह के वैवाहिक विज्ञापन तो पिछले कई वर्षों से हम भी पढ़ रहे हैं इसलिये इस विषय से हमारा पुराना परिचय है।पर खुलकर इस तरह से इस विषय पर चर्चा करने की हिम्मत आपसे मिली फिर यह समयानुकूल भी है।

    लिस्ट पढ़कर एकाएक हँसी आई।कैसे पता चलेगा कि जो आना चाह रही है और आपको पसंद भी आ गई तो वह आपकी शर्तों पर खरी उतरेगी ही। पर अपनी सोच और चाहत तो लिखी जा सकती है।

    वैसे आजकल तो युवा लड़कियाँ भी अपनी पसंद का ही वर चाह रही हैं अभी एक परिचय सम्मेलन में लड़कियों की चाहतें सुनकर हमारे होश ही उड़ गए।
    कई युवा लड़कों की ही शादियाँ मुश्किल हो रही हैं और लड़कियाँ और लड़के दोनों की उम्र बढ़ती जा रही है।
    कालचक्र जिस तरह से करवट बदल रहा है, या कहें “मैं समय हूँ “की ताकत नजर आ रही है।

    सभी देख रहे हैं कि परिवार “हम दो और हमारे दो” में सिमट गया है कई परिवार तो उसमें किसी पाँचवे की तो गुंंजाइश ही नहीं रखते इसलिए बुजुर्ग लोगों का एकाकीपन निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
    हर विषय के,काम के अपने-अपने गुण और दोष हैं, अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हैं। और परिणाम से सभी अनजान रहते हैं, लेकिन फिर भी परिणाम के बारे में संभावित विचार करते हुए ही निर्णय लेते हैं। बाद में फिर चाहे जो भी हो।
    जो लोग वृद्ध आश्रम में रहते हैं उन लोगों को इस क्षेत्र में जरूर आगे आना चाहिये,अगर संभव हो तो ,ऐसा हम सोचते हैं।
    जो लोग परिवार में रहते हैं उनके लिए थोड़ा कठिन हो सकता है।

    भारत से अलग विदेशों में तो यह बहुत सहज है। वहाँ कोई समस्या ही नहीं है।
    समय ,स्थितियाँ व परिस्थितियों को देखते हुए हर बढ़ती उम्र में निराश्रित जीवन से उभरने की दिशा में यह एक परिपक्व सोच है।
    इससे अलग एक कथन है- *समरथ को नहीं दोष गुसाईं*
    जो लोग समर्थ हैं -पैसों से, ताकत से, पद से; उन्हें सब कुछ सज जाता है। उन पर कोई उंगली भी नहीं उठाता। ना लोग, न समाज और अगर उठाएँ तो भी कुछ बिगड़ता नहीं उनका और न ही उन्हें इस बात की चिंता होती।
    संसार के सारे नियम, कानून, जाति ,धर्म और भी जो-जो कुछ निशाने की ज़द में हैं विवाद की दृष्टि से, वह सब कमजोर और असमर्थ लोगों के लिये है जबकि सबसे ज्यादा जरूरत उन्हीं की है और उन्हीं को है।
    वृद्धावस्था के एकाकी जीवन और उससे उत्पन्न समस्याओं के निराकरण की दृष्टि से और सामाजिक चेतना की परिवर्तनशीलता की दृष्टि से यह लेख एक सकारात्मक संदेश देता है।
    हालांकि ऐसा हो भी रहा है कहीं-कहीं और हुआ भी है किंतु एक समस्या के तौर पर अगर इसे देखा जाए तो निराकरण के लिए विवाह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है। और हम इससे पूर्णतया सहमत हैं। वह बात अलग है कि हम ऐसा नहीं कर पाए।
    आज इस लेख के बहाने हमें एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। सन् 2006 में जब हमारे साथी को आभास हुआ कि वह शायद नहीं बचेंगे,तब उन्होंने कहा था हमसे कि,” हम तुम्हारे अकेले होने की कल्पना भी नहीं कर सकते।तुम दूसरी शादी कर लेना।”
    वह समय बहुत कठिन था। पर हमने कभी यह सोचा भी नहीं।जबकि तब उम्र 55थी।
    हमारे सामने हमारी साथी टीचर थी जिसकी ज्यादा उम्र नहीं थी और जो शादी के 1 माह बाद ही रोड एक्सीडेंट में पति की मृत्यु हो जाने के बाद भी दूसरी शादी नहीं कर सकी क्योंकि उनके समाज में ऐसा नियम नहीं था। हमारे स्कूल के पहले बैच की एक स्टूडेंट थी हमारी बेटी की क्लास फेलो शादी के बाद इसके हस्बैंड की डेथ हो गई लेकिन समाज में ऐसा नहीं होता था इसलिए वह दूसरी शादी नहीं कर पाई उसके तो छोटे-छोटे दो बच्चे भी थे एक बेटा और एक बेटी और फिर सास भी थी जिसे बड़े जेठ ने रखने से इनकार कर दिया था।सबसे पहले जाति-बंधन की इन रूढ़ परंपराओं से आजादी जरूरी है। इन संकुचित सोचों से जब ऊपर उठ पाएँगे तो वृद्ध विवाह भी आसान हो जाएगा।

    वैसे कम, किंतु यह हो रहा है। हमारी छोटी बेटी के चाचा ससुर ने दूसरी शादी तब की जब उनके खुद के दो बेटों की शादी हो चुकी थी।परिवार सब कुछ ठीक था, लेकिन फिर भी वह अकेलापन महसूस करते थे।और जिस स्त्री से शादी की उसकी तीसरी शादी थी। दो पतियों ने तलाक दे दिया था। अभी-अभी कुछ महीने पहले ही चाचा ससुर की डेथ हुई है।
    अब दिक्कत यह है कि चाची सास को पहली पत्नी के बच्चे रखना नहीं चाह रहे।कारण उनका स्वभाव है।

    अंततः सोच अच्छी है, अमल होना ही चाहिये जरूरतमंदों को हर भय से मुक्त होकर इस दिशा में आगे आना चाहिये।

    वैसे पुरुषों के लिए यह कठिन नहीं लेकिन स्त्रियों के लिए मर्यादाओं के बंधन हैं।
    एक बात और है कि अभी तक तो पुरुष ही पहल करते नजर आए हैं। लॉकडाउन के कुछ साल पहले पेपर में एक गुजराती और काफी वृद्ध दंपत्ती की वैवाहिक फोटो छपी थी। वह शादी धूमधाम से उनके बच्चों ने ही करवाई थी।
    अगर परिवार में बच्चे हैं, तो यह तय है कि बच्चों की परमिशन भी जरूरी है और अगर बच्चे स्वयं आगे रहकर यह करते हैं तो कोई देर नहीं लगेगी इस परंपरा के टूटने में।
    एक नेक चिंतनीय और समयानुकूल विषय पर लिखे गए इस लेख के लिये शैली जी का बहुत-बहुत बधाइयाँ।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का तो आभार बनता ही है।

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