Wednesday, February 11, 2026
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कमलेश कुमार दीवान की कलम से रेखा राजवंशी के नज़्म संग्रह “ये कितनी बार होता है” की समीक्षा

पुस्तक : ये कितनी बार होता है 
लेखक : रेखा राजवंशी सिडनी आस्ट्रेलिया 
                         प्रकाशक : एनी बुक पब्लिकेशन नई दिल्ली भारत वर्ष                        
सुप्रसिद्ध कवियत्री रेखा राजवंशी जी की नज्मों की किताब “ये कितनी बार होता है”नवीन संग्रह है। ऑस्ट्रेलिया की लेखिका और कवयित्री अपनी रचनाओं से आधुनिक हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही है। 
नज़्म के इस संग्रह में 60 नज़्में है, जिसमें हर बार “ये कितनी बार होता है”और यदा-कदा “ये अक्सर सोचती हूँ  मैं” आता है। नज़्में गहरे अहसास लिए है जिन्हें शब्दशः बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।  नज़्में पढ़ते हुए जेहन में जो शब्द चित्र बनते हैं, वे सरल,सहज, सुस्पष्ट भी है और पाठकों को नज्मों के माध्यम से लेखिका की कलम से जोड़ते हुए चलते हैं, जैसे नज़्म “तुम्हारी याद” –  
ये कितनी बार होता है
सहर जब मुस्कराती है
कि खुशबू मोगरे की
जब मेरे कमरे में आती है
तुम्हारी याद आती है 
यादें ज़िन्दगी से जुड़ जाती हैं और हर पल हमारे अतीत को दोहराती हैं – चाय में घुले मसाले की सौंधी खुशबू, धूप में इंद्रधनुष के रंग, होली, दीवाली, बरसात, टेलीफोन की इमोजीज़ और भी अनेक अवसरों पर तब तुम्हारी याद आती है और ये कितनी बार होता है। जीवन में साहचर्य और उसके एकांतिक दृष्टा मन से अनेक बिंब प्रस्तुत करती नज़्में हमें शुरुआत से ही पढ़ने के लिए बाध्य करते चलती है । नज़्म तुम्हारे अक्स में लिखा है कि –
कि मैं कुछ नहीं कह पाती
कि तुम कुछ सुन नहीं पाते
मगर फिर भी यकीं है
तुम मुझे यादों के दामन में लिए,
दुनिया के उस कोने में
अक्सर सोचते होगे
कि मुझको ढूंढते होगे
ये कितनी बार होता है।
बेहोश सोती किताबें, पतझड़, अंधेरे शिप में तुम, फ़िरदौस, कन्फ्यूजन, सरगोशी,जिस्म या रूह अच्छी नज़्में है। लव या लस्ट नज़्म में बहुत ही खूबसूरत अंदाज और सलीके से नजदीकियों को बयां करते हुए कुछ अलहदा बात कह दी है जैसे…
ये अक्सर सोचती हूँ  मैं
कि मुद्दत बाद
जब तुम मुझको देखोगे
तो क्या बस लस्ट होगी?
इश्क होगा, या कभी
कुछ भी नहीं होगा
ये अक्सर सोचती हूँ  मैं….
वक्त के टुकड़े, तुम्हारा चश्मा,सबा, बुलबुला, पुरानी डायरी, किरच,लाफानी, वक्त ए रूखसत आदि अच्छी नज़्में है कुछ पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूँ गा…
सबा शीर्षक नज़्म में लिखा है –
कि तुम नजदीक आते हो
मेरे शाने पे बोसा ले
गुलाबी रंग में लिपटे
कई मंज़र दिखाते हो
तो मैं पिघली हुई सी
ओस बनके मुस्कराती हूँ
तुम्हारे सीने से लगकर
मैं खुद को भूल जाती हूँ
ये कितनी बार होता है 
इसी प्रकार नज़्म लाफानी में परम तत्व को बयां करते हुए कहा है कि…
वो जो हर शय में है लेकिन
न कोई शक्ल है उसकी
न कोई जिस्म है उसका
न कोई आदमी है
नाम भी कोई नहीं जिसका
खुशी में है, गमी में है
बसा हर पल सभी में है  
नज़्म के आखिर में लिखा है कि….
न ये सच है न वो सच है
सभी कुछ है यहां फानी
कि सच और झूठ के भीतर
ही जो है,वो है लाफानी
ये अक्सर सोचती हूँ  मैं
ये कितनी बार होता है 
रेखा राजवंशी जी की नज़्में खूबसूरत अंदाज लिए हुए गहरे अहसास को प्रतिबिंबित करती है।  
“ये कितनी बार होता है “नज्म संग्रह पठनीय है गायकी के लिए लिए भी अनेक नज़्में मुफीद है जैसे अच्छा होता कि नज़्म संग्रह में लेखिका कुछेक शब्दों के मायने समझा देतीं जैसे लस्ट, फानी, लाफानी आदि।
सभी नज़्में सहज सरल भावाभिव्यक्ति हैं, अपनी जीवन के अहसासों को जिस प्रकार खूबसूरत रंग दिए हैं उनमें ये कितनी बार होता है की अविरलता अद्वितीय है जो हमें महान कवयित्री मीरा बाई के कृष्ण के प्रति अनुराग और भक्ति की याद दिलाती हैं। प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा ईश्वर से मिलन का मार्ग खोलती है। इहलोक से परलोक और नश्वर से अनश्वर  तक का भाव लिए ये नज़्में अनूठी हैं।  
कमलेश कुमार ‘दीवान’
नर्मदा पुरम, मध्यप्रदेश, भारत वर्ष – 461001
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3 टिप्पणी

  1. *कमलेश कुमार दीवान की कलम से रेखा राजवंशी के नज़्म संग्रह “ये कितनी बार होता है” की समीक्षा*

    रेखा राजवंशी के नज़्म संग्रह “ये कितनी बार होता है” पर आपकी समीक्षा पढ़ी। आपने जो उदाहरण चुने सभी काबिले तारीफ है।
    आपको पढ़कर किताब पढ़ने का मन हुआ।
    जो काफी अच्छा लगा-

    कि मैं कुछ नहीं कह पाती
    कि तुम कुछ सुन नहीं पाते
    मगर फिर भी यकीं है
    तुम मुझे यादों के दामन में लिए,
    दुनिया के उस कोने में
    अक्सर सोचते होगे
    कि मुझको ढूंढते होगे
    ये कितनी बार होता है।

    ये अक्सर सोचती हूँ मैं
    कि मुद्दत बाद
    जब तुम मुझको देखोगे
    तो क्या बस लस्ट होगी?
    इश्क होगा, या कभी
    कुछ भी नहीं होगा
    ये अक्सर सोचती हूँ मैं….

    सबा शीर्षक नज़्म में लिखा है –
    कि तुम नजदीक आते हो
    मेरे शाने पे बोसा ले
    गुलाबी रंग में लिपटे
    कई मंज़र दिखाते हो
    तो मैं पिघली हुई सी
    ओस बनके मुस्कराती हूँ
    तुम्हारे सीने से लगकर
    मैं खुद को भूल जाती हूँ
    ये कितनी बार होता है ।
    आपको वह रेखा जी को दोनों को ही बहुत-बहुत बधाइयाँ।

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