पुरवाई के पाठकों को बताना चाहेंगे कि तुर्की ने अपना नाम बदल कर ‘तुर्किये’ क्यों रखा। दरअसल मामला कुछ ऐसा है कि तुर्की को अंग्रेज़ी में लिखा जाता था – ‘टर्की’ और टर्की एक पक्षी भी होता है, जिसका गोश्त क्रिसमस त्यौहार के दिनों में ईसाई देशों में ख़ास तौर पर बनाया जाता है। और दूसरी बात यह कि जब कोई इंसान अपने काम में असफल हो जाता है या बेवक़ूफ़ साबित हो जाता है, तो उसके बारे में कहा जाता है कि – “इस मामले में टर्की साबित हुआ!” (“he proved to be a turkey”) इस हिसाब से अंग्रेज़ी में शब्द ‘टर्की’ बेवक़ूफ़ी और असफलता का प्रतीक माना जाता है। अब देखते हैं कि एर्दोगन इस मामले में क्या साबित होते हैं!
भारत में हमेशा कहा जाता है कि दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए। यहाँ तक कि हमारे ऋषि-मुनि तो विद्या भी सुपात्र को ही दिया करते थे। जब तुर्की में 6 फ़रवरी 2023 को एक भीषण भूकंप आया, जिसमें करीब 55,000 लोगों की मृत्यु हो गई थी, तब ‘ऑपरेशन दोस्त’ के तहत भारत ने तुर्की की हरसंभव सहायता की थी।
भारत ने तुर्की को उस समय करीब 7 करोड़ की राहत सामग्री भेजी थी, जिसमें दवाइयां, चिकित्सा उपकरण, भोजन और टेंट आदि शामिल थे। भारत ने एनडीआरएफ की तीन टीमों को भी तुर्की में तैनात किया था। चिकित्सा सेवा के तौर पर भारत ने 60 पैरा फ़ील्ड हॉस्पिटल से 99-सदस्यीय चिकित्सा दल भेजा था। साथ ही भारत ने तुर्की को ड्रोन सहायता भी दी थी। भारत ने गरुड़ एयरोस्पेस के ड्रोनी ड्रोन और किसान ड्रोन भेजे, जो मलबे में फँसे लोगों का पता लगाने और दवाइयां और भोजन पहुँचाने में मददगार रहें।
वहीं हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान (रेजेब तैयप एर्दोगन) ने खुलेआम भारत के ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ की आलोचना की, और पाकिस्तान को तुर्की द्वारा निर्मित ड्रोन भी उपलब्ध करवाए। यही नहीं, उन ड्रोनों को चलाने के लिए सैनिक भी तुर्की ने पाकिस्तान में भेजे। सूचनाएं ऐसी भी मिली हैं, कि उनके दो ड्रोन-ऑपरेटर भी इस संघर्ष में मारे गये। पाठकों को स्मरण रहे कि तुर्की ने वर्तमान भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारत के विरुद्ध न केवल हर तरह की सैन्य सहायता पाकिस्तान को मुहैय्या करवाई, बल्कि खुल कर भारत के विरुद्ध बयानबाज़ी भी की।
जितने भी देश अस्त्रों-शस्त्रों का उत्पादन करते हैं, वे अपने उत्पादों को दुनिया भर के तमाम देशों को बेचते भी हैं। इसमें किसी अन्य देश को बुरा मानने का कोई हक़ नहीं है। अमेरिका पूरे विश्व को हथियार बेचता है… इसी तरह यूरोप के बहुत से देश और चीन विमान, मिसाईल, रॉकेट आदि की बिक्री करते हैं। मगर हथियार बेचना एक बात है और दो देशों में युद्ध की स्थिति में किसी एक के पक्ष में खड़े होकर दूसरे की आलोचना करना एकदम अलग। तुर्की और अज़रबैजान ने खुले रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया है। इसलिए उनके विरुद्ध भारत को कुछ कठोर निर्णय लेने पड़े हैं।
एक कहावत है कि ‘यार से ग़द्दारी नहीं और ग़द्दार से यारी नहीं!’ अब जब ‘ऑपरेशन दोस्त’ भारत से ग़द्दारी कर चुका है, तो उसे इसका ख़मियाज़ा भी भुगतना होगा। कहते हैं न कि मारना वहाँ चाहिए, जहाँ सबसे अधिक दर्द महसूस हो। इसलिए भारतवासियों ने एकजुट होकर तुर्की के बहिष्कार की घोषणाएं करनी शुरू कर दी हैं। भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है । जबकि विश्व अर्थव्यवस्था सूची में तुर्की का स्थान 17वां है। तुर्की के नेतृत्व को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए था।
तुर्की को शौक हो सकता है कि एक बार फिर ‘ऑटोमैन एम्पायर’ खड़ा किया जाए और तुर्की उसका ख़लीफ़ा बन जाए। मगर आज के हालात और आज का तुर्की, उस ज़माने से अलग हैं। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने हमेशा आतंकवादियों का साथ दिया है। ई.ई.यू. के लिए भी तुर्की एक शैतान बच्चे की तरह है, जो किसी भी समय कोई भी शरारत कर सकता है। एर्दोगन से पहले तुर्की एक आधुनिक प्रोग्रेसिव देश बन चुका था। मगर इस भाई ने वापिस अपने मुल्क को खींच कर इस्लामिक रिपब्लिक बना डाला।
एर्दोगन तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मसले में भारत के विरुद्ध और पाकिस्तान के समर्थन में बोलता रहा है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मुद्दा उठा कर और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ़) में भी मदद करके, पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ाने में परोक्ष रूप से सहायता की है।
तुर्की के पाकिस्तान प्रेम के कारण भारत में उसके विरुद्ध ग़ुस्से की लहर दौड़ चुकी है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और यहाँ आम जनता ही अपनी सरकार चुनती है। इसलिए जनता की आवाज़ की अनदेखी कर पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। अभी सरकार ने डिप्लोमैटिक स्तर पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं की है, मगर भारतीय जनता ने तुर्की के उत्पादों का बहिष्कार करने का शंखनाद कर दिया है।
यहाँ तक कि तुर्की के सेब, ड्राई फ़्रूट और नकली ज्यूलरी के आयात पर रोक लगा दी गई है। तुर्की के लिए अपनी छुट्टियों की सैर बुक कर चुके तमाम सैलानियों ने अपनी बुकिंग कैंसिल करवानी शुरू कर दी है। भारत के व्यापारिक संघों ने अपने दुश्मन देश के दोस्त को सबक़ सिखाने का मन बना लिया है।
2023 में 2.75 लाख भारतीय पर्यटक तुर्की गए थे। 2024 में अनुमानित संख्या 3.25 लाख सैलानियों की थी। अब बुकिंग 20–25% तक गिर चुकी है। कई टूर ऑपरेटरों ने बुकिंग रोक दी है। सेब बाजार में तुर्की के सेब के आयात में गिरावट दिखाई दे रही है। भारत में तुर्की से 1.6 लाख टन सेब आयात किया जाता है। कुल सेब बाजार में तुर्की की लगभग 6-8% हिस्सेदारी है। अब ग्राहक तुर्की सेब खरीदने से इंकार कर रहे हैं। सेब उत्पादक संघ ने भी तुर्की से सेब मँगवाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है।
भारत के बहुत से विश्वविद्यालयों ने भी तुर्की के विश्वविद्यालयों के साथ अपना-अपना समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) रद्द कर दिया है। इनमें जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जे.एन.यू.), जामिया मिलिया इस्लामिया एवं इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी आदि शामिल हैं। भारत सरकार तुर्की को अपने दुश्मन के रूप में घोषित करे या ना करे, भारत की जनता ने यह तय कर लिया है, कि तुर्की के साथ वही सुलूक किया जाए, जो मालदीव के साथ किया गया था।

यदि भारत-पाकिस्तान संघर्ष में तुर्की ने अपना असली चेहरा न दिखाया होता, तो एक राज़ से कभी भी पर्दा न उठ पाता कि तुर्की की एक कंपनी ‘सेलेबी’ भारत के 9 हवाई अड्डों पर यात्री एवं कार्गो हैंडलिंग करती है। जिनमें मुंबई, दिल्ली, कोच्चि, कन्नूर, बेंगलुरु, हैदराबाद, गोवा, अहमदाबाद व चेन्नई जैसे प्रमुख भारतीय हवाई अड्डे शामिल हैं।
‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’, तुर्की की सेलेबी ग्रुप का हिस्सा है। समाचार तो यह भी है कि इस कंपनी के मालिकों में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की पुत्री सुमेये एर्दोगन भी शामिल है। जैसे, कहा जाता है कि एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा… उसी की तर्ज़ पर बताया जाए तो सुमेये एर्दोगन के पति का नाम है सेल्कुक बेरागटार। यह वही व्यक्ति है जो कि बेराकटार सैन्य ड्रोन का उत्पादन करता है। इसी ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तान ने हाल ही के संघर्ष में भारत के विरुद्ध किया था।
हैरानी तो यह होती है कि जिस देश (तुर्की) ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान खुल कर पाकिस्तान का साथ दिया, उसी देश की कंपनी ‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के उस क्षेत्र के ठीक सामने काम करती रही है, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं अन्य वीवीआईपी उड़ान भरते हैं। एअरफ़ोर्स के विशेष विमान भी वहीं से उड़ानें भरती हैं। ऐसे में यदि सेलेबी के कर्मचारी अपने मालिकों के दबाव तले कुछ गोपनीय जानकारी तुर्की के माध्यम से पाकिस्तान तक पहुँचा देते, तो कितना अनर्थ हो सकता था।
भारतीय जनता के दबाव तले भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन रेड्डी ने ‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ की भारत में काम करने के लिए आवश्यक सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी है। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कुछ चिंताएं व्यक्त की हैं, लेकिन इस बारे में खुलकर कुछ नहीं कहा है। भारत के नियमों के अनुसार, एयरपोर्ट पर आवश्यक सेवाएं देने वाली कंपनियों के लिए यह मंज़ूरी अनिवार्य है। इन सेवाओं में यात्रियों और सामान का प्रबंधन शामिल है।
‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ ने भारत सरकार के उस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें कंपनी की सिक्योरिटी क्लीयरेंस रद्द कर दी गई थी। कंपनी का कहना है कि ये फैसला बिना किसी तर्क के ‘अस्पष्ट’ राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर लिया गया है। इसके लिए कोई पूर्व चेतावनी भी नहीं दी गई थी। इस फैसले से न सिर्फ 3791 नौकरियों पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों का भरोसा भी डगमगाएगा।


भारत बहुत उदार देश है और गद्दारी से यारी ठीक नहीं…आपने बहुत ही उम्दा संपादकीय लेख लिखा है
बहुत सारी जानकारी भी हमें प्राप्त हुई
आभार
संगीता बहुत बहुत शुक्रिया।
बहुत अच्छा लेख है। इस लेख के माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण जानकारी मिली है।
स्नेहाशीष तबस्सुम!
Superb भैया श्री
बढिया बहुत ही खूब
थैंक्स कपिल!
बेहतरीन लेख …
निश्चित रूप से ढेरों नई जानकारियां प्राप्त हुई हैं….
कभी कभी लगता है कि हम इतने उदार क्यों हैं फिर लगता है ये कहावत कि “हमारी नियत ठीक है तो हमारे साथ ठीक ही होगा”वर्तमान में बिल्कुल भी काम नहीं कर रही है …..यारी से गद्दारी तुर्कियों को को निश्चित ही महंगी पड़ेगी..
शिवानी जी, सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
हमेशा की तरह जानकारीभरा और रोचक संपादकीय। दोस्ती एक तरफ इस्लामी भाईचारा एक तरफ। तुर्किये ने अपना कृतघ्न घिनौना चेहरा दिखा दिया है। भारत सरकार को सख्त होना पड़ेगा।
अरविंद भाई समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
I agree with the decision of common Indian citizen to boycott turkey influence in trade with India . Such a traitor should be uprooted from the soil . It’s a slap that Turkish people will remember in their life. India is strong enough to stand tall in the world forum of trade , business and relationship with his friends .
Thanks so much Raj. Your support is very important. Bless you.
वास्तविक रूप से देखा जाए तो.. भारत के साथ बुरा करने वालों की इस दुनिया में कमी नहीं है…
वहिष्कार होना ही चाहिए…
बहुत ही रोचक संपादकीय सर….
अनिमा जी, आपका समर्थन महत्वपूर्ण है।
बेहतरीन सम्पादकीय, जहाँ तक कोर्ट की बात है तो ज़्यादातर भारत का कोर्ट देश के दुश्मनों के समर्थन में ही दिखाई देता है
आलोक भाई, हार्दिक आभार।
तुर्किए द्वारा पाकिस्तान का साथ देने पर भारत ने जो कड़ा रवैया अपनाया है, वह सर्वथा सही किया है। तुर्किए भारत द्वारा की गई करोड़ों की मदद को भूल गया, यह कृतघ्नता नहीं तो और क्या है ?
आदरणीय तेजेन्द्र जी ! आपके सम्पादकीय ने इस संदर्भ में कई नयी जानकारियाँ दी हैं। एतदर्थ हार्दिक साधुवाद।
माननीय शशि मैम, इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
प्रणाम सर
हिंदी साहित्य का एक नामचीन लेखक साहित्य के इतर वैश्विक मुद्दों पर इतनी साफ और स्पष्ट सोच रखता है हैरानी होती है। अभी तक यही सुना पढ़ा था कि सीमा तनाव के चलते यह प्रतिबन्ध लगाया गया और भारतीयों ने खुद से यात्राएं स्थगित कीं। लेकिन आपके सम्पादकीय ने इस मुद्दे पर समझ विकसित की है। बाकी कोर्ट इसमें क्यों दखल देगा यह बात समझ से परे है। बाकी आपकी चिंताएं भी सही हैं कि कोर्ट क्या बोलता है यह देखना होगा।
कुलमिलाकर बेहद संतुलित और वैश्विक समझ के साथ लिखा गया संपादकीय। शुक्रिया सर
प्रिय तेजस, पुरवाई पत्रिका का प्रयास रहता है कि हर मुद्दे को तमाम पहलुओं से जांचने के बाद ही पाठकों तक पहुंचाई जाए। इसी तरह हम पुरवाई के संपादकीय को औरों से अलग कर के देख सकते हैं। बहुत बहुत शुक्रिया।
मैंने जो शब्द लिखे, वो न जाने कैसे ग़लत सलत ढंग से यहाँ अपने आप टाइप होकर आ गये हैं। मेरे लिखे वाक्यों का रूप ही बदल गया है। मेरा सारा मूड ऑफ़ सा हो गया है।
कार्यवाही की जगह साझीदारी ….. और भी न जाने क्या क्या टाइप होकर आ गया है।
तेजेन्द्र जी ! कृपया मेरी भावनाओं को समझ लीजिएगा।
आदरणीय, आपने पहले सार्थक टिप्पणी लिखी और फिर उस टिप्पणी के बारे में लिखा, हमारा हौसला तो आपने दो बार बढ़ा दिया। इसी तरह स्नेह बनाए रखिये।
पुरवाई पत्रिका समूह के संपादकीय आजकल एक युद्ध या किसी आकस्मिक स्थिति के संवाददाता के डिस्पैचेज की मानिंद पाठकों को प्रस्तुत किए जा रहे हैं।इनमें त्वरित तड़ित विद्युती अंदाज़ ए बयां है।
इस बार का संपादकीय एक ऐसे देश यथा टर्की या तुर्किए की काली करतूतों की फेहरिस्त पर है जो शीर्षक से ही पता लगता है।कश्मीर का मुद्दा हो या पाकिस्तान से कोई और जुड़ा मुद्दा यह देश हमेशा भारत के विरुद्ध खड़ा दिखलाई देता है।
भूकंप की आपदा का सटीक ज़िक्र किया गया है जिसमें भारत सबसे पहले आगे आया और मानवीयता का परचम लहरा के रख दिया।पर यह अहसान फरामोश मुल्क अंग्रेजों की दी हुई उपाधि टर्की किसी काम का नहीं को ही चरितार्थ कर ब्रिटिश की बौद्धिक शक्ति को सही या सलाम करता नजर आया।
ग़ालिब साहब के शेर याद आ रहा है
ज़रा सी बात पर
बरसों के याराने गए
चलो अच्छा हुआ
कुछ लोग पहचाने गए।
एक और कड़वी कहावत भी प्रासंगिक है,रेत में पानी डालना,बस यही इस टर्की की फितरत रही है।
एक और कहावत बर्डस ऑफ द सेम फैदर फ्लाई टुगेदर और उसे पंजाबी भाषा में कहें तो चोर दा गवाह dadoo।पड़ोसी टर्की और अज़रबैजान के साथ कुछ ऐसा ही है।
यह रहस्योद्घाटन भी कम हैरतअंगेज नहीं है कि भारत के प्रमुख हवाई अड्डों की हैंडलिंग टर्की के प्रधानमंत्री की बेटी की कंपनी के माध्यम से हो रही थी।
उफ्फ,सांप को जेब में रख घूमना!?शायद धर्म निरपेक्षता इन्हीं जैसे कारकों और लोगों से नष्ट और भ्रष्ट होती है।
युद्ध बहुत कुछ सीखा कर जाता है और विशेषकर विजेता को।
हमारे भारत के लोकतंत्र को सलाम ,जिन्होंने टर्की और अज़रबैजान का व्यापारिक और पर्यटनीय बायकॉट कर दिया है।यह सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी ब्रह्मास्त्र है,ऐसी दानवता के प्रतीक अश्वत्थामा को काबू करने का।राजनैतिक और व्यापारिक परिदृश्य कुछ निखर कर सामने आया है ।कुछ राजनीतिक दलों के वोट बैंक और उसके आक्रामक नुमाइंदों के विचार ही बदल गए और गंगा जमुनी तहज़ीब को एक नया जीवन इस युद्ध और पाकिस्तान,टर्की और अज़रबैजान सरीखे दुष्ट देशों को सबक भी।
अर्दोगान हर लिहाज़ से बुद्धिमान अंग्रेजों के प्रदत्त खिताब को बरकार रखेंगे।
संपादक महोदय को प्रणाम।
सूर्य कांत शर्मा
भाई सूर्य कांत शर्मा जी, आपकी विस्तृत टिप्पणी संपादकीय को भिन्न कोणों से समझने में सहायता करती है। आप संपादकीय को केवल पढ़ते ही नहीं हैं, बल्कि उसे आत्मसात भी करते हैं। हार्दिक धन्यवाद।
नमस्ते सर
बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी
आभार अपूर्वा।
पुरवाई पत्रिका के इस बार का संपादकीय- “भलाई के बदले… बुराई लिए जा” आपरेशन सिंदूर में तुर्की द्वारा भारत के विरुद्ध पाकिस्तान को खुलेआम ड्रोन उपलब्ध करवाने पर केंद्रित हैं। तुर्की की इस हरकत से पूरे देश में उबाल आ गया है। उबाल का कारण यह नहीं है कि उसने युद्ध के समय पाक की सहायता की। कई देश कूटनीतिक स्तर पर ऐसा करते हैं। उबाल इस बात पर है कि तुर्की के लाखों लोग 2023 के भूकंप में दब गए थे तो भारत ने ‘आपरेशन दोस्त’ के तहत उनकी जी जान से सहायता की थी।
मुझे याद है जब हमारे जवान तुर्की से मानवीय कार्य करके वतन वापस लौटे थे और प्रधानमंत्री मोदी जी से मिले थे। उन्होंने वहां के अपने अनुभव शेयर किए थे। वहां के लोग हमारे जवानों से कह रहे थे कि आप शव ऐसे निकालना कि वे बेपर्दा न हों। जवानों ने इज्जत के साथ उनके शव निकालकर उन्हें सौंप दिए थे। हमारे जवानों के इस कार्य से प्रभावित होकर तुर्किए के लोग बोल रहे थे कि पहले नंबर पर हमारे लिए अल्लाह है और दूसरे नंबर पर आप लोग।
लेकिन वहां के लोग भूल गए ये सब। एहसान फरामोशी की बात तो देखिए कि भारतीय जवानों को मारने के लिए पाक को ड्रोन उपलब्ध करा दिए उस देश ने। तेजेन्द्र सर जी, आपके द्वारा प्रयुक्त यह कहावत – ‘यार से गद्दारी नहीं, गद्दार से यारी नहीं’ यहां बिलकुल सटीक बैठ रही है।
‘सेलेबी एअर पोर्ट सर्विस कंपनी’ जो तुर्की की कंपनी है,भारत के महत्वपूर्ण एअर पोर्ट के लिए घातक सिद्ध हो सकती थी। क्या पता घात कर भी दिया हो। वो तो हमारे जवानों ने किसी की कोई चाल चलने ही नहीं दी । भारत सरकार इस पर कुछ सोच जरूर रही होगी।
फिलहाल भरोसा किस पर किया जाए? पूर्वी पाकिस्तान से बने बांग्लादेश पर या आपरेशन दोस्त के तुर्किए पर। हम तो जिसकी भी जी जान लगाकर सहायता करते हैं वही काटने को दौड़ता है। भाई हम तो इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि साधु ,साधु होता है और बिच्छू, बिच्छू। दोनों अपने-अपने गुण-अवगुण नहीं छोड़ते हैं। भारत के लोग तुर्की का अपने स्तर से इलाज कर रहे हैं। भारत की जनता सरकार नहीं है पर जो काम सीधे तौर पर सरकार नहीं कर पाएगी वह काम जनता बखूबी कर लेगी। जिस सरकार को ऐसी जनता मिल जाए वह सरकार बड़ी भाग्यशाली होती है।
टर्की शब्द बेवकूफ का पर्यायवाची है। उसे बेवकूफ न कहा जाए इसलिए उसने अपना नाम तुर्किए रख लिया। मुझे लगता है कि भारतीय जनता इसको टर्की सिद्ध करने में पीछे न रहेगी।
तेजेन्द्र सर जी, आपका यह संपादकीय मुझे बहुत बढ़िया लगा। इसमें बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो नई जानकारी देती हैं। बहुत-बहुत बधाई सर आपको ।
भाई लखनलाल पाल जी, हमारा प्रयास रहता है कि हर विषय की गहराई से छान-बीन करने के बाद ही संपादकीय लिखा जाए। आपने विस्तार से अपनी सारगर्भित टिप्पणी के ज़रिए पाठकों को संपादकीय समझने में सहायता की है। हार्दिक आभार।
इतनी बेबाक़ और स्पष्ट संपादकीय के लिए साधुवाद। आपने बहुत सारी जानकारियों को साझा किया है, नाम को ले कर लिखी गई बातें मजेदार हैं।
इस विचार को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने की ज़रूरत है। सोशल मीडिया पर मैंने बहुत लोगों को तुर्की के प्रति सहानुभूति का भाव देखा है। उसमें कई नामचीन पत्रकार भी शामिल हैं।
रीटा, आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपने आप को सेक्युलर साबित करने के चक्कर बहुत कुछ उल्टा सीधा बोल जाते हैं। हमारा काम सच्चाई को सामने लाना है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय महोदय,
टर्की से तुरकिये होने की कहानी तो मजेदार लगी , अब भला हर थैंक्सगिविंग पर कौन जिबह होना चाहेगा !!लेकिन सेलेबी सर्विसेज का रहस्योद्द्घाटन तो रोमांचक और भयकारी लगा।
सूक्ष्म शोध के लिए बधाइयां और धन्यवाद।
आप सतत हमारा ज्ञानवर्धन करते रहें, इस शुभकामना के साथ
सरोजिनी जी, आपकी टिप्पणी ने संपादकीय की सफलता की घोषणा कर दी है। हार्दिक धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: आप ने जो टर्की नाम का परिचय दिया है और टर्की देश को तुर्किय बदलने की वजह बताई है वो बिल्कुल सही है। टर्की नाम को अगर टर्की ही रहने दिया जाता तो इस से बहतर और कोई बात ही नहीं होती। केवल नाम बदलने से चरित्र तो नहीं बदल सकते। टर्की पक्षी की तरह जो बेवकूफ़ थे, वो आज भी बेवकूफ़ हैं और भविष्य में भी बेवकूफ़ ही रहेंगे चाहे वो किसी भी नाम से अपने आप को जिताएं। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुर्की के राष्ट्रपति जनाब एर्दोगन साहब अपने अतीत को याद करके ख़लीफ़ा बनने का सपना देख रहे हों और मुस्लिम देशों के आगे अपने को महान सिद्ध करना चाहते हों क्योंकि आजकल बहुत से और मुस्लिम देश भी अपने आपको इसलाम का ठेकेदार कहने लगे हैं। शायद उन्हें इस बात का अभी तक एहसास नहीं हुआ है कि आजकल के माहॉल में उनका ख़लीफ़ा बनना बिल्कुल मुमकिन नहीं है।
बुरे समय में भारत ने टर्की की इतनी मदद की और उसका यह अंजाम कि खुले आम भारत के शत्रुओं का स्मर्थन और भारत की पीठ में ख़ंजर। इस बात को लेकर भार्तियों ने और भारत सरकार ने भी वहाँ मार की है जहाँ मियाँ एदर्गेन के पेट पर जब लात लगेगी और भारत से जो कमाई होती थी वो समाप्त हो जाएगी तब छटी का दूध याद आजाएगा और “हींग लगे न फटकरी और रंग चोखा चढ़ जाए” वाली कहावत साकार हो जाएगी। आजका भारत नया भारत है जहाँ “दोस्तों से गद्दारी और गद्दारों से दोस्ती” किसी भी हालत में नहीं होगी। विपरीत हालातों से लड़ना और दुशमन को मुँह तोड़ जवाब देना भारत को आता है। इस से पहले कि तुम्हारा भी वही हाल हो जो तुम जैसे हाकिमों का हुआ है, संभल जाओ और कौन तुम्हारा दोस्त है और कौन तुम्हारा दुशमन, उसे पहचानो।
भाई विजय विक्रान्त जी आपकी टिप्पणी की हम प्रतीक्षा करते हैं। आप हर संपादकीय को गहराई से पढ़ते हैं और बेहतरीन टिप्पणी करते हैं। टर्की और तुर्किए को लेकर आपने मज़ेदार बात कही है। आप हमारा उत्साह इसी तरह बढ़ाते रहें। हार्दिक आभार।
भलाई के बदले बुराई…यह तो सदा से होता आया है। आपने अपने संपादकीय में टर्की का नाम तुर्कीये करने के बारे जो कहा है वह रोचक है किन्तु आज भी वह टर्की ही है।
जहाँ तक भलाई की बात है। सिर्फ टर्की ही नहीं, भारत ने कोरोना के समय अनेक देशों को वैक्सीन भेजी उस समय तो सभी ने भारत का एहसान माना फिर वही ढाक के पात। पाकिस्तान के साथ भी हम यही करते रहे हैं लेकिन वह हर बार हमें डसने को आतुर रहता है किन्तु इस बार भारत ने दिखा दिया कि आज का भारत समर्थ है तथा नागरिक के तौर पर भी यदि देश का हर नागरिक देश के लिए कुछ भी कर सकने के लिए तत्पर हो तो कोई भी देश उनकी ओर आँख उठाकर भी देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। इसी का परिणाम है टर्की का बहिष्कार करना।
संतुलित एवं पाठकों को जानकारी देने वाले संपादकीय के लिए साधुवाद…
आदरणीय सुधा जी, इस उल्लेखनीय टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार। स्नेह बनाए रखें।
In due course Erdogan will prove to be a Turkey.
विस्तृत जानकारी दी है आपने इस संपादकीय के माध्यम से।
स्नेहाशीष आशुतोष!
बहुत बढ़िया संपादकीय। अच्छी जानकारियां एक साथ। हार्दिक शुभकामनाएं
हार्दिक धन्यवाद प्रगति।
बहुत बढ़िया संपादकीय सर ।
धन्यवाद रक्षा।
तेजेन्द्र जी!
शीर्षक के मामले में तो आपको महारत हासिल है। “भलाई के बदले बुराई लिये जा। पढ़कर एकाएक मुस्कुराहट तो आ ही जाती है।
संपादकीय सिर्फ समाचार या सूचना नहीं! खबर विशेष के साथ संपादकीय से हर बार कुछ नया सीखने को मिलता है, जानने को मिलता है। समृद्ध भी हो रहे हैं और ज्ञान भी बढ़ रहा है। साथ ही देश छोड़ ,दुनिया का भी परिचय मिल रहा है। इसके लिए आपको पहले बधाई और शुक्रिया भी कहना तो बनता ही है।
भाषाओं की भी बड़ी खूबियाँ हैं।तुर्की देश का भी नाम है और भाषा का भी नाम है।अंग्रेजी उच्चारण में टर्की हो जाता है। और टर्की लिखते ही शब्द का अर्थ ही बदल जाता है। अर्थ भी ऐसा जो लज्जाजनक है।
तुर्की अगर पक्षी है तो निश्चित रूप से बदनसीब है बिचारा वह पक्षी जो विशेष अवसर पर भोज्य बनता है।
वैसे ऐर्दोगन ने अपने दिमाग से काम नहीं लिया यह तो तय है। दिमाग होते हुए भी जो दिमाग से काम न ले वह बेवकूफ तो होगा ही। एक मुहावरा है हवन करते हाथ जलना। भला काम करो और नुकसान उठाना पड़े। बस ऐसा ही कुछ यहाँ पर हुआ है बेचारे न जाने क्या सोचकर पाकिस्तान की मदद की और उसके खुद के लेने के देने पड़ गए।
यह बात तो बिल्कुल सही है कि युद्ध एक अलग चीज है लेकिन युद्ध की स्थिति में किसी एक के पक्ष में खड़े होना वह भी ऐसा, जिसने जरूरत पड़ने पर जी- जान से मदद की और हर तरह से की-और जब उसे जरूरत पड़ी तो आप दुश्मन के साथ मिल गये इसे कहते हैं एहसान फरामोश।
दिनकर की एक पंक्ति याद आ रही है रश्मिरथी से-
*जब नाश मनुज का छाता है*
*पहले विवेक मर जाता है।*
जब विवेक है ही नहीं तो बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय की उम्मीद की भी नहीं जा सकती।
कहावत अच्छी लगी- *यार से गद्दारी नहीं और गद्दार से यारी नहीं*
“ऑपरेशन दोस्त” का अर्थ ही जो न समझ पाए उसका अब दोबारा ऑपरेशन करना जरूरी है! अब “ऑपरेशन गद्दारी” पर अमल होगा!
ईश्वर चाहता था कि तुर्की का राज खुले इसीलिये *विनाश काले विपरीत बुद्धि* वाली स्थिति बनी।
‘सेलेबी’ बिल्कुल नई जानकारी है और आश्चर्यजनक लगी। अच्छा ही हुआ कि वक्त पर पर्दाफाश हो गया। वरना कोई बड़ा नुकसान भी हो सकता था ।ईश्वर ने खैर की।
मी लॉर्ड तो “आँख के अंधे, नाम नयनसुख टाइप की स्थिति में है।
विवेक कब और किस तरह लगेगा यह तो राम जाने।
एक महत्वपूर्ण संवाद की के लिए आपको बहुत-बहुत शुक्रिया।
आदरणीय नीलिमा जी आपने शीर्षक से लेकर संपादकीय के हर बिंदु पर गहराई से बात की है। हमारा उत्साह बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार आपका।
Informative and thoughtful article.
साधुवाद ! शुभं भवतु
हार्दिक धन्यवाद सुषमा जी।
Your Editorial this time throws light on the name Turkey n it’s connotations n how it has now been named differently.
The Armenian genocide during the first World War that took place in Turkey has been marked among the greatest horrors of the world.
Let us see which way the camel turns now.
Warm regards, Tejendra ji
Deepak Sharma
Supportive as usual. Thanks so much Deepak ji.
You have also pointed out here how Turkey was helped by India when there had been an earthquake and now when India needed support,Turkey supported Pakistan with its armaments.
Good that now Turkey’s true colors in the form of its betrayal have come to light,India has banned Turkish goods n hit its tourism by way of cancelation of flights
Warm regards
Deepak Sharma
Warm re
This is an important aspect of the editorial Deepak ji. Well picked up by you.
भूल सुधार
ऊपर दी गई टिप्पणी में कवि हाथरसी की जगह कवि गिरधर पढ़ा जाए। गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हैं।
आपकी बात का संज्ञान ले लिया गया नीलिमा जी।
बेहतरीन आलेख
इतनी टिप्पणी देखने के बाद कुछ कहना बाकी नहीं रह जाता है।पर आप जिस निष्पक्षता से और संवेदनशील दृष्टि से संपादकीय लिखते हैं वहां मेरे जैसे कितने ही पाठक अपने ज्ञान की धार तेज करते हैं शायद कहने की आवश्यकता नहीं है।
साधुवाद सर नये और महत्वपूर्ण विषय पर लेखनी के लिए
डॉ रौबी, बहुत बहुत शुक्रिया।
आज का यह संपादकीय कहानी को एक पूर्ण साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करता है, जिसे हिंदी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों, भारतीय ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों के पूर्वग्रह, जिसमें कहानी संग्रहों को सम्मान न प्राप्त होने जैसे चिंतनीय और परिवर्तनशील विषयों को भी उठाया गया है। आपके संपादकीय का आरंभ “एक कहानीकार होने के नाते (जिसने अब तक कोई उपन्यास नहीं लिखा और जो आज तक अपने लेखन के शैशव काल!में है)”स्वयं मे एक गंभीर व्यंग्यपूर्ण प्रश्न उठाता है, जिसमें कहानी विधा को लेखक की शैशव काल अवस्था मानने की मानसिकता व स्वतंत्र विधा के रूप में न मानने की परंपरा पर सार्थक प्रतिरोध है,जिसे आपने विभिन्न सशक्त साहित्यिक प्रमाणों के माध्यम से तर्कसंगत सिद्ध किया है। साथ ही बुकर सम्मान के लिए लेखक व कृति के अनुवादक,जो की मूल कृति को उसके भाव सहित लक्ष्य भाषा में भाषांतरित करता है,को समान अधिकार प्रदान करने का नियम, जिसके द्वारा अनुवादक का उचित श्रम जो मूल लेखक की कृति के मूल अर्थ का संरक्षण तो करता ही है, लेखक की भावनाओं, और भाषा, शैली को भी मूल कृति के अनुरूप बनाए रखने के गुरुतर दायित्व का निर्वहन करता है, जिसमें चूक होने के कारण ही गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर जी को ‘गीतांजलि’ का अनुवाद स्वयं करना पड़ा था; के वैशिष्ट्य को भी परिलक्षित करता है।
कहानी व उपन्यास के इतिहास और अंतर को स्पष्ट करते हुए इस संपादकीय के माध्यम से निश्चय ही यह सिद्ध हो जाता है कि कहानी अपने आप में एक सशक्त विधा है,जो उपन्यास की जननी है। निश्चय ही बुकर अवॉर्ड की ज्यूरी से प्रेरित होकर साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ भी इस दिशा में अग्रसर हो यही शुभेच्छा है। हिंदी साहित्यिक विडम्बना पर गंभीर विवेकपूर्ण और विचारशील संपादकीय।
यथातथ्यता के साथ सटीक विश्लेषण किया है. तुर्की और भारत के संबंधों में भी सही तर्क दिए गए हैं. हार्दिक बधाई!