(पुरवाई के पाठकों को बताना चाहूँगा कि मैंने 21 वर्ष एअर इंडिया में केबिन क्रू मेंबर की हैसियत से नौकरी की है। जो लोग इस हादसे को लेकर सोशल मीडिया विशेषज्ञ बन रहे हैं, उन्हें सच में कुछ भी नहीं मालूम। जो एक्सपर्ट हैं, वे कभी बक़वास नहीं करते। जब तक ब्लैक बॉक्स डीकोड नहीं होता, सब को केवल प्रतीक्षा करनी चाहिए और चुप रहना चाहिए। इस समय मैं मानसिक रूप से बहुत विचलित हूँ। लग नहीं रहा था कि मैं इस सप्ताह संपादकीय लिख पाऊँगा। जैसा भी लिखा है, आपके सामने हैं। फ़िलहाल एअर इंडिया विमान हादसे पर किसी को भी अटकलें नहीं लगानी चाहिए … जाँच का नतीजा आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।)
जब हम किसी देश के नियम कानून से वाक़िफ़ हैं और उन्हें जानते-बूझते हुए भी उस देश में रहना चाहते हैं, तो उन्हीं नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए हिंसा पर उतारू क्यों हो जाते हैं? ब्रिटेन समेत यूरोप में अवैध आप्रवासियों की घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। हर वर्ष सैकड़ों घुसपैठिए विकसित देशों में घुसने के प्रयास में जान से हाथ धो बैठते हैं। बहुत से लोग इंग्लिश चैनल में डूब जाते हैं, तो बहुत से ट्रकों में ऑक्सीजन के अभाव में मारे जाते हैं। एक बात और ध्यान देने योग्य है कि जो लोग अपने देश से इसलिए भागते हैं, क्योंकि वे वहाँ दुखी और असंतुष्ट हैं और अवैध तरीके से किसी दूसरे मुल्क में बसने में सफल हो जाते हैं… वे वहाँ बसने के बाद अपने अपनाए हुए देश को अपने छोड़े हुए देश जैसा बना देना चाहते हैं।
ऐसे में यदि किसी देश की सरकार अपने नियमों के अनुसार अवैध घुसपैठियों को देश से निकालने का निर्णय लेती है, तो इसमें हाय-तौबा किस बात की है? जबकि आप कानून तोड़ कर उस देश में आए और वर्षों तक वहाँ की सुविधाएं भोगते रहे, आपको मालूम था कि आप ग़ैरकानूनी काम कर रहे हैं और एक दिन आपको कान पकड़ कर निकाला जा सकता है। यह समस्या हर विकसित देश के सामने आती ही है।
भारत में भी बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए एक बड़ी संख्या में रह रहे हैं। उन्हें लेकर भारत के राजनीतिक दलों में ख़ासी खींचातानी होती रहती है। कोई उसे वोट-बैंक कहता है, तो कोई उनके पक्ष में खड़ा हो जाता है। दिल्ली के शाहीन बाग़, जहांगीर पुरी और अन्य क्षेत्रों में हुई हिंसा की घटनाएं अभी तक हमारे दिमाग़ में ताज़ा हैं।
दिल्ली पुलिस की जाँच में दावा किया गया है कि दिल्ली में दंगे होने से पहले, दंगों के आरोपियों के खातों में और कैश के जरिए 1,62,46,053 रुपए आए थे। इसमें से दंगों के आरोपियों ने 1,47,98,893 रुपए दिल्ली में चल रहे करीब 20 प्रदर्शन वाली जगहों पर और दिल्ली में दंगा करवाने में खर्च किए। आरोपियों ने इन रुपयों से दंगों के लिए हथियार खरीदें और प्रदर्शन के लिए सामग्री भी खरीदी थी। आरोपियों के अकाउंट में भारत ही नहीं विदेशों से भी पैसा आया था। दावा किया था कि ओमान, कतर, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों से यह पैसा आया था।
अमेरिका और यूरोप ने उस समय भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी के बाण दाग़े थे। मगर हैरानी की बात यह है कि अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को अब ऐसा महसूस होने लगा है कि अमेरिका में चल रहे प्रदर्शनों, हिंसा और आगज़नी के पीछे डेमोक्रेट नेताओं और चीन का हाथ है।
रिपब्लिकन सांसद बिल एसेयली ने एक पोस्ट में लिखा – इन प्रदर्शनों की फंडिंग डेमोक्रेट समर्थित संगठनों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी संस्थाओं द्वारा की जा रही है।
एसेयली ने कहा कि ICE के खिलाफ यह प्रदर्शन चिरला ने आयोजित किया था। जिसे 2023 में बाइडेन प्रशासन के दौरान करीब 285 करोड़ रुपए की ग्रांट मिली थी। मार्च 2025 में होमलैंड सिक्योरिटी ने उनकी फ़ंडिंग पर रोक लगाई और बकाया राशि वापस ले लिया।
रिपब्लिकन नेताओं ने PSS पर भी शक जताया है कि उन्हें चीनी अरबपति नेविल सिंगहम से फंडिंग मिलती है। जो अमेरिका के विरुद्ध प्रदर्शन करने वालों की फ़ंडिंग करते हैं।
यानि कि हर देश में जब हालात बिगड़ते हैं तो सोच एक ही होती है कि फ़ंडिंग कहीं बाहर से हो रही है। जॉर्ज सोरोस एशियाई देशों को अस्थिर करने के लिए फ़ंडिंग करता है। अतः दर्द अमेरिकियों का भी विदेशी फ़ंडिंग को लेकर ही है।
डॉनल्ड ट्रंप ने अपने नये कार्यकाल की शुरूआत से ही आएं-बाएं-शांय बड़बोलेपन वाले बयान देने शुरू कर दिए, जिससे वैश्विक स्तर पर अमेरिका की मिट्टी-पलीद होने लगी। बजाय इसके कि वे अपनी नीतियाँ सरकार के माध्यम से लागू करवाते, उन्होंने इसका शोर मचाना शुरू कर दिया। चाहे मामला टैरिफ़ का हो या फिर रूस-यूक्रेन के युद्ध का, डॉनल्ड ट्रंप हर जगह अपनी नाक घुसेड़ने लगे। जिस तरह उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लॉदिमीर ज़ेलेंस्की की सार्वजनिक रूप से बेइज्ज़ती की, इसे किसी भी सभ्य देश से समर्थन नहीं मिला।
टैरिफ़ युद्ध ने अमेरिका के शेयर बाज़ार का भट्ठा बैठा दिया। रूस और यूक्रेन युद्ध ने डॉनल्ड ट्रंप को जोकर सिद्ध कर दिया और भारत-पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर में सीज़ फ़ायर की घोषणा करके, तो ट्रंप बुरी तरह से उपहास के पात्र बन गए। यद्यपि उन्होंने भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को एक मुद्दा अवश्य दे दिया – ‘नरेन्दर-सरेंडर!’
एक सवाल यह भी उठता है कि आख़िर ट्रंप जो पिछली बार खुले रूप से भारत और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मित्र थे, उन्हें अचानक हुआ क्या है? हुआ शायद कुछ ऐसा है कि पिछले राष्ट्रपति जो बाईडन के कार्यकाल में डॉनल्ड ट्रंप के साथ एक आम आदमी और आम क्रिमिनल की तरह व्यवहार किया गया। इससे उनके दिमाग़ के कुछ पुर्ज़े अवश्य प्रभावित हुए। वे अपने नए कार्यकाल में पूरी तरह से एक नार्सिसिस्ट साबित हो रहे हैं। अंग्रेज़ी में कहा जाता है – आई, मी एण्ड माइसेल्फ़! ट्रंप शायद ऐसा आईना रखने लगे हैं, जिसमें अपना चेहरा देख कर, वे रोज़ पूछते हैं – “आईने! मुझको बता कि दुनिया में सबसे ख़ूबसूरत और अक्लमंद राजनेता कौन है?”
पता चला कि ट्रंप का परिवार क्रिप्टो करेंसी का बिज़नेस कर रहा है, तो पाकिस्तान ने खटा-खट ट्रंप परिवार के साथ क्रिप्टो करेंसी का एक समझौता साइन कर लिया। इस तरह पाकिस्तान ट्रंप का अज़ीज़ बन गया और वहाँ के ‘फ़ेल्ड मार्शल’ को अमेरिकी यात्रा का न्यौता भी मिल गया।
ट्रंप यहीं नहीं रुकें। उन्होंने घोषणा कर दी, कि वे ग़ैरकानूनी प्रवासियों यानि कि उनके हिसाब से घुसपैठियों को अमेरिका से निकाल बाहर करेंगे। एक बात कभी समझ नहीं आयी कि अमेरिका की प्रत्येक घोषणा डॉनल्ड ट्रंप ख़ुद क्यों करते हैं? उनके पास मंत्री, अफ़सर, अधिकारी सभी तो मौजूद हैं। उनको अपना काम करने दें और स्वयं कभी-कभार कोई वक्तव्य दे दिया करें।
अमेरिका की एक घोषित नीति है, कि यदि कोई ग़ैर अमेरिकी नागरिक को अमेरिका में बच्चा पैदा होता हैं, तो उस बच्चे को अमेरिकी नागरिकता स्वतः ही मिल जाएगी। मगर इसका उल्टा नहीं हो पाएगा। अर्थात उस बच्चे के जन्म लेने से, उसके माँ-बाप को अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी। जो भी व्यक्ति मेक्सिको या अन्य किसी देश से अमेरिका में प्रवासी के तौर पर आता है, उसे इस कानून की पूरी जानकारी होती है। मगर जब उन्हें अमेरिका से वापस जाने के लिए कहा जाता है, तो धरना प्रदर्शन, दंगा और हिंसा होनी शुरू हो जाती है। और यह हिंसा आगज़नी में बदल जाती है और उसके बाद दुकानें लूटी जाने लगती हैं।
फ़िलहाल लॉस एंजिल्स में तो हालात इतने ख़राब हो गए हैं, कि कर्फ्यू लगाने की घोषणा की गई है। राज्य के मेयर करेन बास ने मंगलवार को इसका ऐलान किया। कर्फ्यू रात 8 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक डाउन-टाउन इलाके में लागू रहेगा। यह कर्फ्यू इलाके में काम करने वाले लोगों और निवासियों पर लागू नहीं होगा। मेयर ने बताया है कि इलाके में बढ़ रही तोड़-फोड़ और लूटपाट की समस्या को कम करने के उद्देश्य से इसे लागू किया गया है। डॉनल्ड ट्रंप ने तो वहाँ हालात पर काबू पाने के लिए 4 हजार नेशनल गार्ड के अलावा 700 मरीन कमांडो को भी तैनात कर दिया है, ये कहते हुए कि हालात खराब हो रहे हैं। ज़रूरत पड़ने पर वे पूरी ताकत से निपटेंगे। वहीं, सोमवार-मंगलवार को लॉस एंजिलिस पुलिस ने करीब 1100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया।
न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार अवैध आप्रवासियों को बाहर निकालने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन अमेरिका के 12 राज्यों के 25 शहरों तक फैल चुके हैं। सैन फ्रांसिस्को, डलास, ऑस्टिन, टेक्सास और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. शशि थरूर ने डॉनल्ड ट्रंप के बारे में सोशल मीडिया पर वायरल एक साक्षात्कार में कहा, कि “मुझे लगता है कि डॉनल्ड ट्रंप का व्यक्तिगत व्यवहार उतना सुखद या प्रिय नहीं है, जितना कि कोई प्रतिष्ठित अमेरिकी राजनीतिक व्यक्ति में देखना चाहेगा। मुझे अमेरिका में अपने कार्यकाल के दौरान चार या पाँच अमेरिकी राष्ट्रपतियों से मिलने का अवसर मिला। दोनों बुश सीनियर और जूनियर और बिल क्लिंटन दोनों के साथ विस्तृत बातचीत का सौभाग्य मिला। ओबामा के साथ काफ़ी संक्षिप्त बातचीत हुई। मेरा मतलब है, ये एक निश्चित वर्ग, एक निश्चित विशिष्टता वाले लोग हैं, और मैं राजनीति नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि इस सूची में दो रिपब्लिकन और दो डेमोक्रेट राष्ट्रपति शामिल हैं। लेकिन एक निश्चित राजनीतिक करिश्मा, राजनेताओं जैसी गंभीरता और बौद्धिक गुणवत्ता कुछ ऐसे मामले हैं, जिनकी मुझे इन सज्जन में कमी दिखाई देती है।”
डॉनल्ड ट्रंप बिना सोचे-समझे बोलते हैं और उसके बाद यू-टर्न लेते हैं। ‘X’ के मालिक एलॉन मस्क के साथ ट्रंप की दोस्ती, नाराज़गी और फिर मस्क का माफ़ीनामा, दोनों ही उन्हें हँसी का पात्र बनाते हैं। इन दोनों का व्यवहार स्कूली बच्चों जैसा रहा है। अब तो इनका परिपक्व और ज़िम्मेदाराना व्यवहार ही अमेरिका का सम्मान वापस दिलवा पाएगा।
इस बार का संपादकीय प्रवासी अवैध घुसपैठ और हिंसा पर केंद्रित है।
यह भी एक समीचीन और ज्वलंत मुद्दा है।
युद्ध और युद्ध के साथ ट्रेड युद्ध भी!अवैध रूप से घुसपैठियों को देश के कानून के तहत वापिस भेजना,,इस मुद्दे को सटीक अंदाज़ में शोकेस किया।
इन्हीं घुसपैठियों द्वारा चाहे भारत हो एशिया का कोई देश हो और अब अमेरिका में भी अब आतंक या दंगे कराने के सबूत मिल रहे हैं और विदेशी फंडिंग के साथ अर्थात प्रायोजित आतंक यथा भारत की राजधानी दिल्ली।जब भारत के नेतृत्व ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब करना चाहा तो इसी अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आगे सरका कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।
अमेरिका भी अब चीन से ट्रेड युद्ध में उलझा है।चीन पर यही अमेरिका अब आरोप लगा रहा है कि उसके यहां पर दंगे या अस्थिरता में चीन का ही हाथ है।
ट्रंप का आना एक दुस्वप्न की तरह है।पाकिस्तान को पहले नाटकीय अंदाज़ में कुछ ब कुछ कहना और फिर Cryptocurrency का व्यापार करना।ये सभी अब इसी भारत के पक्के वाले दोस्त कहे जाने वाले
महामहिम की महिमा है।
जो बाइडन का कथन याद आ रहा है कि अमेरिका अब गरीब या मिडिल क्लास के हाथ से छूट कर व्यापारी और अमीर हाथों में जा रहा है।अतः यह संपादकीय समय के साथ अपने पाठकों को एक विचार दृष्टि दे रहा है।
भारत की विमान दुर्घटना पर भी की गई टिप्पणी एक अनुभवी और। परिपक्व संपादक को छाप छोड़ती है।
इतने साफ और सटीक संपादकीय के लिए संपादक एवं पुरवाई परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
भाई सूर्य कांत जी, आपने संपादकीय को सही मायने में खंगाला है और गहराई से उसकी व्याख्या की है। हार्दिक धन्यवाद।
वाह जी हर बार की तरह एक बहुत ही सुंदर शब्दों और एक नई, विस्तृत जानकारी के साथ बहुत ही सुगठित संपादकीय के लिए तेजेन्द्र जी बहुत ही आभार.. आपकी पारखी नजर को सलाम….
हार्दिक धन्यवाद मधु जी।
इस बार पुरवाई के संपादकीय का विषय – प्रवासी… घुसपैठिए… और हिंसा है। यह समस्या अब आम होती जा रही है। हर देश की अपनी संस्कृति होती है और अपने नियम कानून। आप्रवासी जब अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में जीवनयापन के लिए जाते हैं तो उन्हें वहां के नियम कानूनों को मानना चाहिए। नियम कानूनों के दम पर ही ये देश विकसित हुए हैं। उन्होंने मानव हित के लिए ही कानून बनाए हैं। बनाए ही नहीं वहां के लोगों को प्रशिक्षित भी किया है।
लेकिन विकासशील देशों के लोग वहां जाते हैं तो अपनी उस गंध को नहीं छोड़ना चाहते हैं जिसके कारण उनके अपने देश भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। दादा …आप लोग वहां के कायदे कानूनों को मानकर यदि जीवनयापन करोगे तो समस्या नहीं आएगी। घुसपैठ करके किसी देश में अवैध रूप से रहना यह किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता है।
अगर कोई देश बुरी तरह से एक्शन लेता है तो अच्छा तो नहीं लगता है। वह देश इन्हें बाहर तो निकालें पर मानवता बनाए रखनी चाहिए।
रही बात प्रदर्शनों की तो ये हर देश दूसरे देश को अस्थिर करने के लिए प्रपंच रचते ही है। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि मेरा कुत्ता टामी और तुम्हारा कुत्ता कुत्ता। हर देश के खुफिया तंत्र होते हैं और वे सारी जानकारी उपलब्ध करवाते हैं। सरकार उससे कैसे निपटती है यह उसके कूटनीति पर निर्भर करती है। दिल्ली दंगों को भारत सरकार ने जिस धैर्य और चतुराई से निपटा है वह काबिले-तारीफ है। उस समय की स्थिति बहुत बिगड़ चुकी थी। सरकार जोश में आ जाती तो देश जल जाता।
महाराजाधिराज ट्रंप के लिए तो अमेरिका की जनता भी सिर पटक रही होगी कि उन्होंने किस जोकर को राष्ट्रपति बना दिया। जनता भी क्या करे? वह विकल्पों से जूझ रही है। बाइडेन को देख लिया था। कमला हैरिस जी पिछड़ गईं बचे महाराजाधिराजा सो उन्हीं को भुगत रही है जनता। अमेरिका के सम्मान को जितना ट्रंप महोदय जी ने गिराया है उतना किसी राष्ट्रपति ने नहीं गिराया है। उनके कार्य-व्यवहार से उनके अपने दूर होते चले जा रहे हैं।
सर विमान हादसा बहुत ही दुखी कर गया। आपकी मनःस्थिति को हम समझ रहे हैं।
भाई लखनलाल पाल जी, आप अद्भुत हैं। कितनी जल्दी संपादकीय को पढ़ कर इस कदर सार्थक टिप्पणी कर पाते हैं।
क्या कहने भ्राता श्री
हमेशा ही सच्चाइयों से रूबरू कराते हैं आप साधुवाद
कपिल कुमार
बेल्जियम
हार्दिक आभार कपिल भाई।
रोचक और ज्ञानवर्धक लेख है। इस लेख से काफ़ी बारीक और महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं हमें।
स्नेहाशीष तब्बसुम।
आज के वैश्विक परिदृश्य के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार मंथन है ।
भारत में हुई दर्दनाक प्लेन दुर्घटना हो, विभिन्न देशों के बीच छिड़े हुए युद्ध हो ,आतंक हो या गैर कानूनी अप्रवासी समस्या चारों तरफ अशांति नज़र आ रही है।समाधान ढूंढे जा रहे हैं परमिल नहीं रहे ।
Dr Prabha mishra
आदरणीय प्रभा जी बहुत बहुत धन्यवाद।
आपने अपने अनुभवों के साथ सही विश्लेषण किया है यह बात सही है अधिकांश लोग तह तक जाते नहीं हैं
हार्दिक धन्यवाद संगीता।
पुरवाई ‘ के इस अंक का मुख पृष्ठ सम्पादकीय -चिंतन का जीवंत प्रतीक है ।
सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा एक प्रतिष्ठित कहानीकार के रूप जाने जाते हैं ,यह उनके जीवन का एक विशेष पहलू है कि 21 वर्षों तक एअर इंडिया में केबिन क्रू मेंबर के रूप में उन्होंने नौकरी की है। अहमदाबाद विमान दुर्घटना से मन विचलित होना स्वाभाविक है । जब भारत सहित दुनिया के अन्य देशों के जनमानस को यह सर्वथा अकल्पनीय मानवीय त्रासदी की कारुणिकता व्यथित कर रही तो ऐसी मनोदशा में सम्पादकीय लेखन संभव हो पाना उनकी सम्वेदना की समरसता और दायित्व बोध का परिचायक है ।
विमान दुर्घटना की मार्मांतक वेदना इतने गहरे धँसी है कि अन्य बातों के समावेश की गुंजाइश न रहते हुए भी “प्रवासी… घुसपैठिए… और हिंसा” सम्पादकीय अत्यंत तथ्यपरक तथा तर्क संगत बन गया है । यह तेजेन्द्र जी के व्यक्तित्व की सर्व ग्राह्यता का विशेष गुण तथा चिंतन की व्यापकता का परिचायक है ।एतदर्थ बधाई और सामाजिक -साहित्यिक जागरूकता के लिए साधुवाद ।
अंक पठनीय है ।अन्य सामग्रियाँ भावों एवं विचारों यें अनुप्राणित हैं ।
—मीनकेतन प्रधान ,
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
मो.नं. 9424183086
14/6/25
प्रिय भाई मीनकेतन जी इस सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।
बहुत बढ़िया
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय।
आदरणीय संपादक महोदय,
घुसपैठियों की समस्या हर देश की अपनी समस्या है और इसे सुलझाने का हर देश का अपना तरीका हो सकता है। जहां तक माननीय ट्रंप जी के व्यवहार की बात है, जिसने होटल ,कैसिनो ,रियल एस्टेट जैसे धंधों में काम किया हो जिनमें केवल व्यवसायिकता ही आपका सबसे बड़ा गुण मानी जाती है,ऐसे व्यक्ति से शाइलाॅक जैसे व्यवहार की ही आशा करनी चाहिए।,
“एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा”
यह मुहावरा तो ट्रंप जी के लिए सबसे उपयुक्त है -अति अर्थवादी व्यापारों का अनुभव और ऊपर से अभिनय से मिली ख्याति , सोने पर सुहागा, तो ऐसे व्यक्ति से और क्या आशा करनी चाहिए?।
हार्दिक धन्यवाद सरोजिनी जी।
विचारोत्तेजक आलेख हार्दिक साधुवाद एवं बधाई
धन्यवाद भाई।
“फेल्ड मार्शल” …… हा हा। खबरों में पढ़ा कि अमेरिका ने इस फेल्ड मार्शल को सैनिक परेड में निमंत्रण की खबर से कन्नी काट ली है। मतलब इंकार किया है। ट्रंप मूलतः व्यवसायी है। उसे किसी और पहलू से कोई मतलब नहीं। क्रिप्टो करेंसी के चक्कर में पाकिस्तान जैसे आतंकवादियों के पालने और भुक्खड़ देश से मधुर संबंध बना लेना यही दर्शाता है।
अहमदाबाद की एअर इंडिया की दुर्घटना सचमुच हृदय विदारक, झकझोरने वाली है। तमाम दुहरी सुरक्षा व्यवस्थाओं के बावजूद पलक झपकते इतनी बड़ी दुर्घटना घटना निःशब्द करती है। दिमाग काम ही नहीं कर रहा कि आखिर हुआ क्या होगा? क्या अगले संपादकीय में आप कुछ प्रकाश डालेंगे?
आप अकेले इन्सान हैं जिन्होंने ‘फ़ेल्ड मार्शल’ पकड़ा है। बहुत बहुत शुक्रिया।
आपने अपने संपादकीय- प्रवासी,घुसपैठिये…और हिंसा में सच कहा है कि ज़ब हम अपना देश छोड़कर किसी देश में बसते हैं तो हमें उस देश के नियम और कानूनों को मानना चाहिए किन्तु सच तो यह है कि ऐसा नहीं होता क्योंकि जो वैध तरीके से नहीं जाता, वह तो नियम तोड़ने की मानसिकता के साथ ही जाता है। जो पार्टियां वोट बैंक के लिए इन्हें समर्थन देती हैं वे इन घुसपैठियों का अप्रत्यक्ष रुप से समर्थन ही करती हैं जो निंदनीय है।
भारत में तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
इतनी अधिक है कि कभी -कभी लगता है, हमारे देश कि आधी आबादी तो सरकार का विरोध करते-करते देश द्रोह पर उतर आई हैं, तभी आज तक घुसपैठियों की समस्या का हल नहीं हो पाया है। इनके लिए रोहिंग्या, बांग्लादेशी घुसपेठिये नहीं, वोट बैंक है। जगह -जगह इन्हें बसा कर देश की डेमोग्राफी चेंज की जा रही है।
जहाँ तक डोनाल्ड ट्रम्प की बात है उनकी इमेज एक ऐसे राष्ट्रपति की बन गई है जो स्वयं को मसीहा समझता है। आज स्थिति यह है कि वह हर देश की समस्या में टांग अड़ाने के साथ उन्हें सुलझाने का दावा कर स्वयं को अनिश्चित मानसिकता वाला व्यक्ति सिद्ध करने पर तुला है जो न केवल अमेरिका वरन पूरे विश्व की लिए ख़तरे कि घंटी है।
अहमदाबाद वाली प्लेन दुर्घटना ने सभी को विचलित कर दिया है। यह बात सच है कि सिर्फ अनुमान के आधार पर दोषारोपण करने की बजाय दुर्घटना के कारणों की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस भयानक दुर्घटना में एक व्यक्ति का बचना, किसी चमत्कार से कम नहीं है।
सभी दिवंगत आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि।
सदा की तरह संतुलित संपादकीय।
सुधा जी आप पुरवाई के प्रत्येक संपादकीय को गहराई से पढ़ती हैं और निष्पक्ष टिप्पणी करती हैं। बहुत बहुत शुक्रिया।
वैसे लग तो यही रहा था कि प्लेन हादसे को लेकर संपादकीय होगा, पर आपने सही कहा- जब तक जाँच पूरी नहीं होती सही रिपोर्ट नहीं आती तब तक कुछ भी कहना ठीक नहीं।
आपने 21 साल के लंबे समय तक इस क्षेत्र में काम किया है इसलिये आपकी तकलीफ स्वाभाविक है।
एक इंसान के साथ कई जिंदगी जुड़ी रहती हैं। एक इंसान नहीं जाता, बहुत कुछ जाता है। बहुत सारे रिश्ते, बहुत सारे सुख-दुख, बहुत सारे सपने,भविष्य की चिंताएँ, जीवन के न जाने कितने और कौन-कौन से रंग चले जाते हैं, न जाने क्या-क्या चला जाता है।
इस तरह के घावों को वक्त ही भरता है। और बाकी तो सब्र रखना पड़ता है। वैसे तो सारे आश्वासन भी खोखले ही लगते हैं।
लेकिन संपादकीय का उत्तरार्द्ध विचारणीय है। इस बार का संपादकीय प्रवासी घुसपैठियोंऔर हिंसा पर है।लोग जिस थाली में खाते हैं ,उसी थाली में छेद करते हैं।
अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में जब रहते हैं तो वहाँ के नियम कानून को मानना ही चाहिये।यह तो कुछ इस तरह हुआ “चोरी ऊपर से सीनाजोरी”।
अधिक पैसा कमाने की ललक विदेश की ओर आकर्षित करती है,। हालत ऐसी हो जाती है कि “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।”संजय दत्त की नाम पिक्चर याद आ गई।
यह समस्या आज विश्व स्तर पर भारी पड़ रही है। विश्व स्तरीय समस्या बन गई है। और सबसे बड़ी अशांति का कारण भी।
बचपन में कभी पढ़ा था कि *हर काम व्यवस्थित करना चाहिये,क्योंकि अव्यवस्था से असंतोष होता है, असंतोष से अशांति होती है और आशांति से कलह।”*
तब यह बात विद्यार्थी जीवन के लहजे से सीख के तौर पर कही गई थी ,अपनी चीजों को व्यवस्थित रखने के संदर्भ में ताकि समय पर सब चीजें मिल जाएँ। ढूँढना न पड़े।
लेकिन यह बात जीवन में भी उतनी ही अर्थपूर्ण है व्यवस्था चाहे किसी भी देश की,सरकार की हो, समाज की हो या परिवार की हो। सुचारू रूप से ही चलना चाहिए आप जहाँ हैं,आपको वहांँ के नियमों का पालन करना ही चाहिये और कोशिश करना चाहिए कि आपके कारण किसी को परेशानी ना हो। लेकिन हर जगह अप्रवासी परेशानी ढा रहे हैं।
भारत में तो जो साइबर अपराधी है ज्यादातर बंगाली ही है।
पैसे देकर दंगे करवाना बहुत ही गंदी राजनीति है। इस तरह की गंदी राजनीति में ज्यादातर मध्यम वर्ग के लोग पिसते हैं ,वे लोग जो कहीं से कहीं तक किसी राजनीति में इंवॉल्व नहीं होते।
ट्रंप तो मानसिक रूप से ही बीमार महसूस होते हैं। उनकी दिमाग की हालत ठीक नहीं है। अमेरिका ने ऐसे व्यक्ति को चुना है यही आश्चर्य जनक है।
सारी दुनिया में राजनीति की हवा प्रदूषित हो रही है दुनिया संदेह और आशंकाओं के घेरे में है।
अमेरिका को इतनी बुरी स्थिति में इतने गैर जिम्मेदार, विक्षिप्त राष्ट्रपति के अधीन पहले कभी देखा हो ऐसा याद नहीं आता। शशि थरूर ने बिल्कुल सही कहा है ट्रंप के लिये।
वैसे तो संपादकीय का वैचारिक गंभीरता से बड़ा पक्का नाता रहता है। लेकिन इस बार का विषय हर देश की शासकीय व्यवस्थाओं की दृष्टि से अप्रवासियों के कारण चिंतनीय है।
आपके संपादकीय वैश्विक स्तर की जानकारियों से बौद्धिक स्तर पर समृद्ध कर रहे हैं, यह भी किसी पाठशाला से कम नहीं।
बहुत-बहुत शुक्रिया तेजेन्द्र जी आपका
पुरवाई का आभार तो बनता है।
आदरणीय नीलिमा जी, आप हमेशा संपादकीय को पूरी तरह से खंगालती हैं और विस्तृत टिप्पणी देती हैं। आपका हृदय से आभार।
संजीदा विषयों को शब्द देना हमेशा कठिन होता है और ऐसे विषय जिनकी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भर्त्सना हो रही हो उस मे से एक को खुले मंच पर सटीक और तार्किक संपादकीय में प्रस्तुत करना तेजेन्द्र जी की सतर्क पत्रकारिता को पुष्ट और प्रमाणित करता है l विदेशी धरती पर रह कर विश्व की महाशक्ति के प्रथम व्यक्ति के राजनीति और रणनीति को ऐसी कसी भाषा में खोलना कि पत्रकारिता का धर्म भी निभ जाए और बात चोट भी पूरी करे l भारत सहित विश्व के सभी देशों में अवैध घुसपैठ और इसके भयावह परिणामों को बड़ी दिलेरी से वर्णित करते संपादकीय को व्यंग्य ने और चुटीला बना दिया .. बात खरी है..दूसरों के घर आग लगाने को तत्पर जब अपने घर पर बने तो कैसे त्रियाचरित्र रचते है संपादकीय खुल कर बताता है … मुझे तो तेजेन्द्र जी ने जो सलाह दी है मंत्री महोदय ko कभी कभार वक्तव्य देने की उसी में उसका कल्याण दिख रहा है… पर जो घुसपैठ के कारण, घुसपैठियों की नकारात्मकता से प्रभावित उन्नत देशों का वातावरण भयंकर परिणाम ..इस घुसपैठ के उन्मूलन का प्रश्न उठाना और सुधीजन ke समक्ष रखना संपादकीय का बेहतर और सुखद पक्ष है l इस विषय पर बहुत से राष्ट्रों को विमर्श की ज़रुरत है l बेहद जरुरी विषय पर लिखने के लिये साधुवाद आदरणीय l
किरण जी, जब अकादमिक क्षेत्र के प्रतिनिधि संपादकीय से जुड़ पाते हैं, यह बेहतरीन ख़ुशी का बायस बन जाता है। हार्दिक धन्यवाद।
डोनाल्ड ट्रम्प में गंभीरता की कमी को पूरा विश्व देख रहा है। दुखद यह है कि वे अपने बचकाने व्यवहार से अपने पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचा रहे हैं । मूलतः व्यवसायी हैं तो वैश्विक मसलों को भी अपने स्वार्थ के चश्मे से देख रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के समय इनका उछल-उछलकर यह घोषित करना कि उन्होंने सीज़फायर करवाया है , खीज तो पैदा कर ही रहा था था , हास्यास्पद भी था। वे क्रेडिट लेने को उतारु अपरिपक्व इंसान नज़र आ रहे थे।
विश्व शान्ति को निकले ट्रम्प बाबा अपने घर की अशान्ति सम्हाल नहीं पा रहे हैं।
घुसपैठियों की समस्या विकराल रूप लिये जा रही है । इसके खात्मे के लिए त्रस्त देशों की सरकारें यदि मिलकर कोई कदम उठायें तो शायद कारगर साबित हो।
आजका सम्पादकीय अनेक मुद्दों पर एक साथ सोचने को प्रेरित कर रहा है। नहीं लिखे जाने की स्थिति में भी इतना विचारणीय सम्पादकीय लिख दिया है आपने सर… साधुवाद आपको !
रचना जब युवा पीढ़ी संपादकीय से जुड़ पाती है तो अतिरिक्त ख़ुशी मिलती है। हार्दिक धन्यवाद।
काफी विचारपूर्वक, स्पष्ट शब्दों में आपने अपनी बात रखी है. निश्चित रूप से इसमें आपका अनुभव एवं गहन अभ्यास परिलक्षित होता है. घुसपैठियों का मुद्दा आपने उठाया है जो चिंताजनक है. अहमदाबाद एयर क्रैश एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. ईश्वर मृतात्माओं को सद्गति प्रदान करें. डॉनल्ड ट्रम्प की नीति पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. तकदीर का धनी आदमी है. उनकी नीतियों एवं कार्यशैली को झेलना हम सबकी मजबूरी है. इस विचारोत्तेजक सम्पादकीय के लिए साधुवाद.
डॉ. रमेश यादव, मुंबई
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रमेश भाई आपने संपादकीय के हर पहलू को खंगाला है। हार्दिक धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: गुजरात में जो एयर इण्डिया प्लेन के हादसे के बारे में आप ने जो लिखा है वो एक बहुत ही दु:खद घटना हुई है। कोई भी नहीं चाहता कि कभी भी ऐसी कोई दुर्घटना हो। यह एक बहुत ही कॉंप्लैक्स मामला है। जब तक पूरी जाँच न हो जाए, “घटना क्यों और कैसे हुई” के बारे में कुछ भी कहना कोरा बकवास करना है। थोड़ी से शौहरत के लिये बहुत से लोग अपना मुँह खोले बिना नहीं रहते और उनके मुँह से जो प्रवचन निकल रहे होते हैं उन्हें यदि “मुर्दा बोले कफ़न फ़ाड़े” की श्रेणी में लिया जाये तो ग़लत नहीं होगा। क्या ज़रूरत है गला फ़ाड़ कर कुछ भी कहने की। जांच के बाद सब पता चल जाएगा। अभी अभू भारत के दूरदर्शन टीवी पर सुधीर चौधरी के “डीकोड” प्रोग्राम पर सुना कि “ब्रिटिश एयरवेज़” और “एयर इण्डिया” के बोइंग के 787 ड्रीमलाइनर प्लेनों को उड़ान लेने के कुछ देर बाद ही वापस जाना पड़ा।
घुसपैठियों के चरित्र के बारे में जो लिखा है वो बिल्कुल ठीक है। जिस देश ने इन्हें पनाह दी है वहीं आकर अपने पुराने ढ़र्रों को अपनाना चाहते हो यह इनके डीएनए में है और इसकी मिसालेँ ब्रिटेन और अन्य युरोपियन देशों में मिल जायेँगी। भारत की तो बहुत बड़ी बदकिस्मती है कि सत्ता खोने के बाद इन घुसपैठियों को वोटों की खातिर काँग्रेस पनाह ही नहीं दे रही है बल्कि भारत के नागरिक बनने में पूरी सहायता भी कर रही है।
तीसरी बात आती है ट्रंप की तो हर देश के मामले में अपनी टाँग फँसाना तो इन का ट्रेडमार्क है। अपने जिगरी दोस्त मोदी के बारे में काँग्रेस को “नरेन्द्र सरैण्डर” का गुरू मन्त्र देकर, जैसा आपने कहा है, अपने दिमाग़ी पुर्ज़े के ढ़ीला होने का सबूत दिया है। मैं तो तक कहूँगा की राष्थ्रपति ट्रंप के दिमाग़ का स्कर्यु इतना ढ़ीला हो गया कि वो अब गिर गया है। एक सम्पादकीय में तीन तीन विषयों को बख़ूबी कवर करने के लिये बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई हमेशा की तरह आपने संपादकीय के हर पहलू को सही से खंगाला है और हर बिन्दु पर अपनी बात रखी है। बहुत बहुत शुक्रिया आपका।
एयर इंडिया विमान हादसे से आज पूरा देश व्यथित और मर्माहत वहां आपका मजबूती के साथ लोगों को चेतावनी देना कि इस घटना के संबंध में अटकलें लगाना बंद करें जांच एजेंसियोः को अपना काम करने दें बहुत ही उपयुक्त, सार्थक एवं सामयिक लगा।अन्यथा सोशल मीडिया ने तो इस भयावह घटना को इतना तोड मरोडकर प्रस्तुत किया है कि आम जनता दिग्भ्रमित होकर तरह तरह की कहानियों के जाल में उलझ गई है।अचानक बहुत सै विशेषज्ञ सामने आ गए हैं और अपनी अपनी राय समीक्षा दे रहे हैं जो जांच को प्रभावित कर सकते हैं।आपके संपादकीय में घुसपैठिए आप्रवासी जनों पर भी चिंता प्रकट की गई है जिससे आज भारत ही नहीं पूरा विश्व त्रस्त है।किसी भी देश का अपना अनुशासन नियम होते हैं उनका उल्लंघन कर सुरक्षा के नियमों की धज्जियां उडाकर अनधिकृत प्रवेश कदापि उचित नहीं है।भारत के एक छोटे से राज्य झारखंड में भी बांग्लादेशियों ने मजदूरो के रूप में प्रवेश किया और धीरे धीरे यहां की स्थानीय राजनीति ,हिंसात्मक गतिविधियों में भी शामिल होनै लगे हैं।यहां तक कि उनके नाम भी बदल जाते हैं ,जिससे पहचान करना भी मुश्किल हो जाता है। जैसा कि आपने लिखा है ‘भारत में भी बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए एक बड़ी संख्या में रह रहे हैं। उन्हें लेकर भारत के राजनीतिक दलों में ख़ासी खींचातानी होती रहती है। कोई उसे वोट-बैंक कहता है, तो कोई उनके पक्ष में खड़ा हो जाता है।
आज विश्व में भी ऐसी ही स्थिति है। बहुत ही सटीक विश्लेषण और यथार्थ तथ्य प्रस्तुत किया गया है इस संपादकीय में जो परिस्थितियों का सही आकलन करने में सफल है।बहुत बहुत बधाई हो भाई, सुंदर, सार्थक, सारगर्भित संपादकीय के लिए। सादर प्रणाम ।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रिय पद्मा जब आप हर सप्ताह संपादकीय को पढ़ने के लिये समय निकालती हैं और उस पर सारगर्भित टिप्पणी भी करती हैं। इस बार भी आपने गहराई से टिप्पणी की है। बहुत बहुत धन्यवाद और स्नेहाशीष।
अंजु जी, संदेश पहुंच नहीं पाया।
आप के इस सप्ताह का संपादकीय हमें अंतरराष्ट्रीय उथल- पुथल के बीच ट्रंप की दखलअंदाज़ी के बारे में हमें अवगत करवाने के साथ-साथ घुसपैठियों की समस्या की बात भी करता है।
सदैव की भांति हमें विभिन्न विचार- विमर्श व समस्याओं के आवाह- क्षेत्र पर रोशनी डालते हुए हमारी जानकारी व सोच को समृद्ध करता है।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी, संपादकीय पर आपकी टिप्पणी हमारे लिये हमेशे महत्वपूर्ण होती है। हार्दिक आभार।
आदरणीय संपादक महोदय आपने अपने संपादकीय में एक बार फिर से ज्वलंत मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है । कहते हैं अगर आपको बिना कारण सीख देने वाले हज़ार मिल जाते हैं लेकीन सीख मानने वाला एक नहीं मिलता । इसी प्रकार आपने अपने संपादकों जो दो मुख्य मुद्दों पर चर्चा की है वह कुछ इसी तरह है। आपने विमान सेवा में लंबे समय तक काम किया है आपको विमान तकनीक से लेकर अन्य कई विषयों की सही जानकारियाँ प्राप्त होंगी इसलिए आपकी लोगों के अपने मान- अनुमान लगाने की प्रवृत्ति आपको कष्ट दे रही है । दूसरी बात यह भी है की आप केवल अनुमान के आधार पर स्वयं को भ्रमित ही नहीं कर रहे बाक़ी जनता में भी रोष उत्पन्न कर रहें हैं । जिससे जनता का सरकार से विश्वास उठ रहा है । दूसरी बात घुसपैठियों की वह तो आपसे और हमसे ज़्यादा अच्छी तरह कौन समझेगा । किस तरह से 2016 के बाद नीदरलैंड सहित यूरोप के लगभग सभी देशों की स्थिति एक सी ही है। भारत की स्थिति इससे थोड़ी भिन्न है । वहाँ इन घुसपैठियों का कोई लेखा जोखा नहीं होता वहाँ यह सिर्फ़ वोट बैंक होते हैं । लेकिन यूरोप में जहाँ यह ग़लत ढंग से आते हैं और जबकी इन्हें पता होता है की यहाँ ग़लत ढंग से रहने से इनका कोई भविष्य नहीं होता है, फिर भी आपकी और मेरी कमाई पर यहाँ टिके रहते हैं । आपकी और मेरी कमाई इसलिए कहाँ क्योंकि हम नौकरी करते हैं और इनके कारण हमें ज़्यादा टैक्स और कम सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं । नीदरलैंड में यह हालत हो गई है कि नीदरलैंड की जनता के रहने के लिए घर नहीं हैं । नीदरलैंड की अपनी जनता फ़ूड बैंक की शरण में जा रही है और इन्हें सब कुछ थाली में परोस कर मिल रहा है। इसी के चलते एक सप्ताह पहले यहाँ की सरकार गिर गई । इसलिए एक तरफ़ लगता है की ट्रंप का यह फ़ैसला सही है । दूसरी तरफ़ उसका हर जगह अपनी टॉंग अड़ाने की आदत से अब वह सब जगर हँसीं का पात्र बन गया है। जहाँ तक ऑपरेशन सिंदूर की बात है तो ऑपरेशन सिंदूर हुआ बहुत लोग खुश भी हुए किन्तु वह चार आंतकवादी अभी तक हाथ नहीं लगे जिनके कारण यह हुआ । सीज फायर करके एक सही कदम उठाया गया । पाकिस्तान के पास खोने को कुछ नहीं है किंतु भारत प्रगति में बहुत आगे आया है ऐसे में यदि यह ऑपरेशन युद्ध का रूप लेता तो भारत और भारत की जनता का बहुत नुक़सान हो सकता था ।
आपने हमेशा की तरह फिर से एक सोच और संदेश अपने संपादकीय में दिया है । सार्थक संपादकीय के लिए धन्यवाद