Sunday, April 19, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : रमकल्लो की होली (भाग – 9)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
मैंने तुम्हें चिठिया भेजी थी, तुम आए न? अपने यहाँ के चुनाव हो गए हैं। चुनाव के बाद होली थी। होली का रंग चुनाव में ही खिलने लगा था। इस चुनाव में तो नेताओं ने ऐसी होली खेली कि कछू पूछो न। होली-दिवाली, ईद, मुहर्रम सारे त्योहार इस चुनाव में खूब खिले। पहलूँ तो वे एक-दूसरे पर गौंत-गिलाव फेंकते रहे, फिर अपनी बाल्टियन से ऐसे गाढ़े रंग निकाले कि सबके मुँह रंग गए। उनके असली चेहरा तक भूल गए आदमी। पर हद रे नेता, किसी ने किसी की बात का बुरा नहीं माना। होली का आसौ-पासौ था, सो चुनाव में भी होली का रंग चढ़ गया था। होली में कौन बुरा मानता है? बुरा मानना भी नहीं चाहिए। होली ने चुनाव में ही अपना पूरा रंग दिखा दिया था।
मैं सोचती थी कि होली में आओगे, पर तुम न आए। खूब न आओ लेकिन वहाँ हिसाब से रहियो, नहीं तो होली में मस्तया जाव और मुँह उठाए फिरौ। दारू-आरू न पी लइयो काए से सोहबत में तुम जल्दी फँस जाते हो। नाली में कहीं गिर-गिरा पड़े तो तुम्हें वहाँ कौन उठाने आएगा। मैं तो यहाँ कोसों दूर पड़ी हूँ। दारू पीना अच्छी बात नहीं है। नशा तो शरीर का होता है, जब वही बिगाड़ लोगे, तो ऊपरी नशा थोड़े जिन्दगी पार लगा देगा। तुम यह न समझना कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ, तो कुछ भी करते रहो। अभी भले ही पता न चले, बाद में मुझे सब जानकारी हो जाएगी। रंग-गुलाल की होली
तो वहाँ भी खिलती होगी?
यहाँ की होली का हाल तुम जानते ही हो। इस त्योहार में जनी-मानस बौरया जाते हैं। इसे मदनोत्सव ऐसे ही नहीं कहा गया है। महुआ के फूलों की वास आती है, तो देह में अंगड़ाइयाँ उठने लगती हैं। न लुहरी जेठ देखती है और न जेठ लुहरी को। सब होरी के रंग में रंग जाते हैं।
रोहू सबेरे से दो बार मुझ पर रंग डाल गया है। मैंने कुछ नहीं कहा; क्या कहती ? होली का त्योहार साल में एक बार आता है, झिड़ककर क्यों त्योहार खराब करती? लला कह रहा था कि भौजी, भैया नहीं हैं, तो मुझसे ही होली खेल ले। प्राननाथ, तुम्हारे बिना होली खेलना अच्छा नहीं लगता है।
मैंने पूड़ी-पपड़ियाँ बना ली हैं। भूरी भैंस का दूध ओंट लिया था, सो गुझियाँ गोंठ लीं। कोटेदार ने त्योहार में भी चीनी नहीं दी। नए राशन कार्ड से दे रहा था। पुराना उसने पहले ही जमा करवा लिया था। कह रहा था कि नया बना ही नहीं। कोटेदार को सौ रुपये जमा कर दिए थे कि नया राशन कार्ड बनवा देना। राशनकार्ड तो बना नहीं, सौ रुपये और खा गया। मैं लोकवाणी केन्द्र गई थी, उन्होंने नहीं बनाया। कह रहे थे कि अभी नहीं बन रहे हैं, जब बनने लगेंगे, तब आ जाना। बड़ी आफत में जान है। इसी से कहा था कि तुम आ जाते, तो राशनकार्ड बन जाता। बइयर-जनी को लोग टरका देते हैं।
परधान जी ने जॉबकार्ड में तीन हजार रुपइया मेरे खाते में डाल दिए थे। मैं बैंक से निकाल लाई थी। दो हजार परधान जी ने ले लिए, एक हजार मुझे मिल गए। एक हजार कौन कम है, भगे भूत को भभूत ही बहुत है। होली की सौदा उन्हीं रुपये से खरीद ली थी।
इस वर्ष चौकटा में खूब होली खिली। लट्ठमार होली में खूब मजा आओ। पहले तो मैं झिझकत रही लेकिन जब परधान जी ने अपनी पिचकारी से मेरी चोली भिंजा दी, तो मैं अपने आपको रोक न पाई। बरगए आदमी अपने मुँह से ऐसे-ऐसे शब्द काढ़त कि अकेले में भी शरम आ जाए पर मदन रसिया का ऐसा चमत्कार कि समूह में भी वह अश्लीलता भली लगत।
परधान जी को मैंने खूब लट्ठ मारे पर उनका मुँह बन्द न करा पाई। जाने काहे का मुँह बना है उनका। वे अपने मुँह से मिलन के गीत गाते ही रहे। उन्होंने अश्लीलता के सारे मानक ध्वस्त कर दिये थे। मुझसे तो… क्या बताऊँ तुम्हें। क्या करूँ, मैं भी मुस्करा पड़ी थी। कोई ये न सोचे कि मुझे भी गुदगुदी हो रही है, इसीलिए मैंने पल्लू से अपना मुँह ढँक लिया था। आँखें थोड़ी ढँकी जा सकती है। खुशी में आँखें भी चमक उठती है।
होली में तुम होते तो कछु और बात थी। तुम्हारी इतनी याद आई कि घर आकर मैंने गीले कपड़े तक न बदले और तुम्हें चिठिया लिखने बैठ गई। अब तो ऐसा लगता है कि कब तुम्हारे दर्शन कर लूँ। टैम मिले तो एक रात को हो जइयो फिर चाहे, तुरन्त लौट जइयो। फसल गदरया गई है। आधे चैत तक कटाई शुरू हो जाएगी। मैं अकेले कहाँ तक काटती रहूँगी। तुम साथ रहोगे, तो अनाज जल्दी घर आ जाएगा।
प्राननाथ डोनवरी, मैं यहाँ ठीक हूँ, तुम मेरी चिन्ता न करियो। कुछ उल्टा-सीधा लिख गई होऊँ, तो माफ करना।
आपकी 
रमकल्लो
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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10 टिप्पणी

  1. लखनलाल पाल जी
    रमकल्लो की होली को गंभीरता से पढ़ते समय एक बात बार-बार याद आ रही थी कि हमारे देश में बारह महीने कहीं न कहीं चुनाव होते हैं और निर्वाचन प्रक्रिया में अगर तीज़ त्योहार की झलकियां मिलती हैं तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है.
    रमकल्लो और प्रधान की बात से यह ज्ञात होता है, अब भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है.
    आखरी अनुच्छेद में रोमांस की झलक उभरतीं है लेकिन बहुत अल्प मात्रा में. आप की रमकल्लो अब डोनवरी कहते हुए अच्छा लगती है. पति के प्रति उसका प्रेम और आस्था प्रमाणित होती है.
    बहुत बहुत बढ़िया प्रस्तुति और आप को बधाई
    सादर

    • प्रोफेसर विजय महादेव गाडे सर जी, रमकल्लो अपनी सहज और साधारण बातों से सब कुछ कह जाती है। भ्रष्टाचार को सहजता से प्रस्तुत करना मेरी अपनी सोच थी। ज्यादा जोर-शोर वाली प्रस्तुति मन-मस्तिष्क में स्थायी नहीं होती है। जितनी जल्दी दिमाग में चढ़ती है तो उतनी जल्दी उतरती भी है। इस पात्र के सृजन के समय मेरे मन में यह भी आ रहा था कि इसे *एंग्री यंग वोमेन*( फिल्मी दुनिया के उधार शब्द) के रूप में ढाला जाए तो ज्यादा प्रभावी हो सकता है। फिर मन नहीं माना और उस भ्रष्टाचार को सहज रूप में व्यक्त होने दिया। इसको लिखते समय कई बार मुझे जूझना पड़ा।
      उ प्र विधान सभा 2017 के चुनाव होली के समय हुए थे। मैं उस चुनाव को पाती में लाना चाहता था फिर मन बदल गया। मैं नहीं चाहता था कि इसमें ऐतिहासिकता का ठप्पा लगे। घटनाओं का आना रचना को समृद्ध करता है पर तिथियां उसे कमजोर बना सकती थी।
      आपने पाती की गंभीरता वाली बात लिखी तो मेरी उस समय की सोच को बल मिल गया।
      आपके द्वारा *डोनवरी* शब्द की स्वीकृति ने होंठों पर मुस्कराहट ला दी है।
      पाती पर बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर जी।

  2. रमकल्लो की नौवीं पाती में भी दूसरी पातियों की तरह कथाकार ने लखनलाल पाल ने त्योहारों की प्रासंगिकता, उनकी पवित्रता, सामाजिक उपयोगिता आदि पक्षों को उद्घाटित करने के साथ ही उनकी पवित्रता नष्ट करने वाले तत्वों की सोच को रमकल्लो के माध्यम से उजागर किया है। यह पाती होली त्योहार को जोड़कर लिखी गई है। जिसमें महुआ की
    मादकता और होली की हुड़दंगता भी है।
    होली नवान्न यज्ञ भी है। याने कृषि पर्व है। हास्य, उल्लास, उमंग होली के आंतरिक भाव हैं। रंग, नृत्य, गायन आदि में पवित्रता होती है। श्रंगारिक सात्विक माँसलता होती है लेकिन कामुकता व अश्लीलता को किंचित स्थान नहीं मिलता। मगर परधान जैसे पियक्कड़ चरित्र भी गाँव में बसते हैं। उनकी नजर में स्त्री एक जिंस है, एक माँसल देह है। परधान जी का लार टपकाऊ फूहड़पन उनकी कामुक लंपटता को ही दर्शाता है।
    प्रधान का होली के बहाने रमकल्लो से अश्लील छींटाकशी करना एक तरह से उनकी चरित्रहीनता के साथ ही स्त्रियों के प्रति अमर्यादित आचारण को भी प्रदरू करता है।
    पाती में मद्य निषेध की भी पैरवी की गई है। रमकल्लो बड़ी संजीदगी से अपनी पति को शराब न पीने के लिए आगाह करती है। जबकि होली पर प्रायः कभी न पीने वाले लोग भी एक दो पैग लगा लेना अपना नैतिक धर्म समक्षते हैं।
    लेखक की अंतर्दृष्टि की तारीफ करनी होगी कि उसने रमकल्लो की पाती में केवल नायक और नायिका के विरह का ही वर्णन नहीं किया है बल्कि समूची
    गँबई संस्कृति को भी ऊपर उठाया है। समाज जीवन के जितने भी ऊँचनीच हो सकते हैं, सभी का बखूबी खुलासा किया है।
    डॉ० रामशंकर भारती

    • आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने अपनी टिप्पणी से पाती के उद्देश्य को अच्छे से रेखांकित कर दिया है। गंवई गांव की संस्कृति में कुछ त्योहार अपनी पवित्रता के साथ आते हैं पर होली अपने उमंग, उल्लास को लेकर आता है। पर इसका अति उल्लास फूहड़ता तक पहुंच जाता है।
      होली को मदनोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। मदन यानी कि कामदेव का उत्सव। उस समय वातावरण भी वैसा बन जाता है।
      लोग अब इस फूहड़ता का विरोध करने लगे हैं। शराब के नशे में और मामला बिगड़ जाता है। यही कारण है कि इस त्योहार में लड़ाई झगडे़ भी आम हो गए हैं।
      भारती जी आपकी प्रतिक्रिया हर चीज का सम्यक विश्लेषण कर देती है। होली पर आपका यह विश्लेषण रचना के उद्देश्य को सार्थक कर रहा है। बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  3. रमकल्लो की पाती में न जाने कैसा आकर्षण, मोह है जो बिना पढे रहा ही नहीं जाता।इस बार की होली और पति के बिना त्योहार न मना पाने का दुख भी शामिल हो गया है।विशेष रूप से चुनाव के दिनों में होली का आना न जाने कितने प्रतीकात्मक बिंब,कल्पनाशील स्थितियों के साथ यथार्थ भी परोस गया है।नेताओं का भर भरकर रंग खेलना ,चेहरों का रंगा पुता होना ,निरर्थक प्रलाप के बावजूद लोगों का बुरा न मानना आदि प्रसंग चुनावी होली में छिपे अनेक छल छंदों के कुरुप रंगों की भी उजागर करते हैं।अकेली स्त्री का सामाजिक वर्जनाओं के बीच मे अनैतिक कटूक्तियों को भी सहन करना एक सामाजिक सच्चाई है।कुछ पंक्तयोंओ में नारी मन की सुंदर दशा का भी चित्रण है जब वह पति को सतर्क करती है कि कहीं तुम बहक नहीं जाना ,गलतिया न कर बैठना -मैं सोचती थी कि होली में आनेता ओंओगे, पर तुम न आए। खूब न आओ लेकिन वहाँ हिसाब से रहियो, नहीं तो होली में मस्तया जाव और मुँह उठाए फिरौ। दारू-आरू न पी लइयो काए से सोहबत में तुम जल्दी फँस जाते हो। नाली में कहीं गिर-गिरा पड़े तो तुम्हें वहाँ कौन उठाने आएगा। मैं तो यहाँ कोसों दूर पड़ी हूँ। दारू पीना अच्छी बात नहीं है। नशा तो शरीर का होता है, जब वही बिगाड़ लोगे, तो ऊपरी नशा थोड़े जिन्दगी पार लगा देगा। तुम यह न समझना कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ, तो कुछ भी करते रहो। अभी भले ही पता न चले, बाद में मुझे सब जानकारी हो जाएगी। रंग-गुलाल की होली।यह एक पत्नी का स्नेह, फिक्र चिंता और हर हाल में पति को सुरक्षित देखने की लालसा भी है। रमकल्लो की पाती में आंचलिक रस,उमंग, उत्साह और संस्कति का सहज सरल रुप भी दर्शनीय है। समूचे बुंदेलखंड की बिंदास, सरल उन्मुक्त संस्कति का सुंदर सजीव वर्णन प्रभावित करता है ।बहुत बहुत बधाई सर। सादर प्रणाम।
    पद्मा मिश्र जमशेदपुर

    • पद्मा मिश्रा जी की टिप्पणी रमकल्लो के प्रति सहृदयता को तो दिखाती ही है साथ में लेखक की अपनी सृजना को सार्थकता प्रदान करती है। ऐसी टिप्पणियां लेखक को आगे और अच्छा लिखने को प्रेरित करती है।
      आपकी इस सार्थक टिप्पणी के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं

  4. सर जी!
    यह राम कल की नवीं पाती है

    रामकल्लो की नवीं पाती पढ़ी। चुनाव के रंग के बाद होली का रंग कुछ ज्यादा ही चढ़ा। गाँव पर भी और रामकल्लो पर भी।

    (गौंत-गिलाव का अर्थ नही पता)
    सच तो है ;होली के दिन बुरा मानना भी नहीं चाहिये।
    अब परधान जी लठ्ठ खाकर भी मुँह बंद नहीं कर रहे तो रमकल्लो बेचारी क्या करें?वैसे होली मिलन के गीत रहते ही ऐसे हैं! रसिया गीत और खेलने वाले भी रसिक- रसिया!
    अब प्राणनाथ को होली के लिये तो कम से कम आना ही चाहिये था

    उसने पूड़ी-पपड़ियाँ भी बना ली हैं। अपनी भूरी भैंस का दूध ओंटाकर गुझियाँ गोंठ लीं। कोटेदार इतना चालबाज निकला कि त्योहार में भी चीनी नहीं दी। नया राशन कार्ड दिया नहीं,पुराना पहले ही जमा करवा लिया । वह बेचारी अकेली कहाँ-कहाँ परेशान हो?

    भई! जबकि प्राणनाथ जानते हैं कि गाँव में होली का माहौल कैसा रहता है तो होली पर तो आना था! पर नहीं आए।

    रमकल्लो समझदार होती जा रही है। कितने अच्छे से उसने अंग्रेजी में लिखा है डोनवरी!
    सब कुछ लिखकर यह भी लिख देती है कि चिंता न करें। और समझ भी रही है कि कुछ उल्टा सीधा ऐसा इसमें लिखा है होली की वजह से, जिससे बुरा मान जा सकता है। तो माफी भी माँग ली ।अब बेचारी उसका क्या दोष? प्राणनाथ तो छोड़ कर गए हैं!
    चिठिया का जवाब ही नहीं दे रहे हैं।

    बेचारी रामकल्लो ही है जो चिट्ठी पर चिट्ठी लिख रही है।अभी भी उसका प्रेम ,उम्मीद और इंतजार जिंदा है। चिट्ठी लिखना जारी है,कोई आधुनिक पत्नी होती तो अभी तक शहर पहुँच गई होती यह देखने के लिए कि वहां चल क्या रहा है?

    सर जी!
    पाती पढ़ते-पढ़ते रमकल्लो एक जीवित पात्र, बहुत अपनी सी बन गई है। उसका दुख अपना दुख सा महसूस होने लगा है। आपसे एक गुजारिश है, एक चिट्ठी हम उसके प्राणनाथ को लिख रहे हैं ,वहाँ तक पहुँचा दीजियेगा। जब रमकल्लो की पाती जा रही है तो यह भी साथ ही साथ चली जाएगी।

    आदरणीय रमकल्लो के प्राणनाथ जी!

    हम रमकल्लो की करीबी सखी ।
    आप तो जाकर परदेस में बैठ गए!बेचारी हमारी सखि रमकल्लो हर महीने के हिसाब से पाती लिख रही है। और आप हैं कि उसकी पाती का जवाब ही नहीं दे रहे!
    एकाध दिन के लिए आ ही जाइए तो उसे चैन पड़े। हमको उसके लिए बहुत पीड़ा हो रही है। अब हमारी सखी जो है; तो हमें तो उसका ध्यान रखना ही पड़ेगा ना?
    तो जल्दी से अब आने का प्लान बनाइये।

    रमकल्लो की सखी
    पाती की इस बेहतरीन श्रृंखला के लिए आपको बधाई!

  5. नीलिमा करैया जी, आपने तो रमकल्लो को खूब ढांढस बंधा दिया है। आप जैसे समीक्षक का उपन्यास के पात्र से इतना घुल-मिल जाना अभिभूत कर देता है। आपकी समीक्षा पढ़कर मन खुश हो गया।
    गौंत-गिलाव का तात्पर्य गोबर और कीचड़ से है। बुंदेलखंड में होलिका दहन के दूसरे दिन बाद मतलब परवा को लोग उसका कट्टौ(सूतक) करते हैं। सारे घरों की गोबर से लिपाई पुताई करते हैं और अनावश्यक बर्तन भांडे घर से बाहर निकालकर फेंक देते हैं। उसी समय लोग एक-दूसरे पर गोबर और कीचड़ फैंकते हैं। अगले दिन बाद यानी कि दूज को रंग की होली खेलते हैं। इस दिन महिलाएं इकट्ठी होकर पुरुषों से लट्ठमार होली खेलती हैं। पुरुष अश्लील गीत गाते हैं या अश्लील बातें करते हैं।
    संगीत में रुचि रखने वाले लोग ढोल मंजीरा आदि वाद्य यंत्रों के साथ निर्गुण और सगुण के साथ लोककवि ईसुरी की श्रंगारिक फागें भी गाते हैं। अब काफी कुछ बदल गया है।
    बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

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