- पिता की सीख
सखाराम को वॄद्धाश्रम आये हुये काफ़ी दिन हो गये थे, लेकिन उसे अपने घर की याद खूब सताती थी , क्योंकि उसने अपना पेट काट- काटकर खड़ा जो किया था। पत्नि के गुजर जाने के बाद से जबसे उसने अपने घर की चाभियां अपनी बहू के हाथों में सौंप दी थी, उसी दिन से उसका बुरा हाल होना शुरु हुआ था।
उसने अपने बेटे से अपने ऊपर होने वाली दुर्दशाओं के बारे में बतलाना भी चाहा तो बेटे ने दो टूक उत्तर दिया था” पिताजी।।।समय के साथ चलना सीखें और समझौता करने की आदत। हमारे पा समय नहीं है कि आप की तिमारदारी करते फिरे।”
बेटे का उत्तर सुनकर उसने गहरी चुप्पी ओढ़ ली थी। अब वह अंदर ही अंदर गलने लगा था। एक दिन ऎसा भी आया के उसे वृद्धाश्रम भेज दिया गया,
वृद्धास्श्रम के अन्य लोग उसे ढाढस बंधाते लेकिन उसका धेर्य जबाब दे जाता। धीरे-धीरे अब वह वहाँ रहने का आदी हो गया था, लेकिन घर की यादें उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। जब तक वह घर में था ,अपने पोते के साथ खेलता ,हंसता, बतियाता था। उसे जब- तब उसकी याद आती। उसे याद आया की परसॊं पोते का जन्मदिन है। वह उसे बधाइयाँ देना चाहता था। उसने अपने बेटे के नाम एक पत्र लिखा।
प्रिय बेटे
परसों पप्पू का जन्मदिन है,। उसे मेरी ओर से बहुत -बहुत प्यार और अनेकानेक शुभकामनायें देना। शब्दों के अलावा अब मेरे पास है भी क्या जो मैं उसे दे सकता हूँ। उसे खूब पढ़ा-लिखाकर होशियार बनाना, लेकिन यह बात ध्यान रखना कि उसे इतना ज्यादा होशियार मत बना देना, अन्यथा एक दिन वह तुम्हें भी वृद्धाश्रम का रास्ता बतला देगा।”
- भैस के आगे बीन बजाना
कमलकांत और श्रीकांत गहरे मित्र थे। कमलकांत कालेज में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे,जबकि श्रीकांत अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए परचून की दुकान चलाता था। दोनों के बेटॊं के बीच भी गहरी मित्रता थी। दोनो साथ ही पढते भी थे। कमलकांत का बेटा क्लास मे हमेशा प्रथम श्रेणी मे पास होता जबकि श्रीकांत का बेटा फ़िसड्डी रहता।
फ़ुर्सद के क्षणॊं में दोनो मित्र बैठे चाय सुढ़क रहे थे। कमलकांत ने पहल करते हुए कहा:-“श्रीकांत बुरा न मानो तो एक बात कहूँ। तुम जिन्दगी भर पुड़िया बांधते रहे। क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारा बेटा भी आगे चल कर पुड़िया बांधता रहे। वह पढाई मे काफ़ी कमजोर है। उस पर थोड़ा ध्यान दिया करो।”
इस बात पर श्रीकांत को गुस्सा आया। उसने अपने मित्र को पलटकर जबाब देते हुए कहा-” मित्र।।बुरा न मानना। तुम्हारा बेटा पढ़-लिख कर ज्यादा से ज्यादा कलेक्टर बन सकता है। मैं अपने बेटे को राजनीति में उतारुंगा। राजनीति में अकल की कोई जरुरत तो होती।नहीं है। उसे तो केवल वाकपटु होना चाहिए। देखना दस-पांच साल में वह कितनी तरक्की करता है। एक दिन ऐसा भी आएगा कि वह प्रदेश का दमदार मंत्री बन जाएगा और तुम्हारा कलेक्टर बना बेटा उसके सामने खड़े होकर उसके आदेश की प्रतीक्षा करेगा। ऐसा भी हो सकता है कि उसे उसके जूते के तसमें भी न बांधना पड़े।”
अपने मित्र की बात सुनकर कमलकांत की हालत देखने लायक थी। उसे इस बात प़र गहरा क्षॊभ हो रहा था कि उसे भैंस के आगे बीन बजाना ही नहीं चाहिए था।
- जहरीला आदमी
एक खूबसूरत युवती ने जहरीले साँपॊं के बीच रहकर विश्व रिकार्ड तोड़ने की ठानी।
देश-विदेश से तरह-तरह के जहरीले साँप बुलवाये गये और एक कांच का कमरा तैयार करवाया गया।
एक निश्चित दिन, उस काँच के कमरे मे उन सभी जहरीले साँपों को छोड़ दिया गया और उस सुन्दर युवती ने प्रवेश किया। खलबली-सी मच गई थी साँपों के परिवार में।
जहरीले साँपों के बीच रहकर वह तरह के करतब दिखलाती। कभी किसी को उठा कर गले से लपेट लेती तो कभी अपनी कमर में। ।कभी एक साथ ढेरों सारे सापों को उठाकर अपने शरीर मे जगह-जगह लपेट लेती, तरह-तरह के करतब वह दिखलाती। उसके कारनामों को देखने के लिये पूरा गाँव उमड़ पड़ा था।
स्थानीय समाचार पत्रों में उसके सचित्र समाचार प्रकाशित हो रहे थे। टीवी वाले भी भला पीछे कहाँ रहने वाले थे। वे अपने चैनलों के माध्यम से उसका लाइव। प्रसारण कर रहे थे। अब पास- पड़ोस के लोगों के अलावा पड़ोसी जिले से भी लोग आने लगे थे। फ़लस्वरुप वहाँ बेहद भीड़ जमा होने लगी थी। जिला कलेक्टर ने तथा पुलिस अधीक्षक ने उसकी पूरी सुरक्षा के व्यापक प्रबंध कर रखे थे। उस कांच के कक्ष के बाहर श्रध्दालु लोग पूजा-पाठ करने के लिये जुटने लगे थे। नारियल बेचने वाले,तथा फ़ूल बेचने वालों ने दुकानें खोल लिये थे। दर्शनार्थीयों में कोई उसे असाधारण साहस की धनी, तो कोई काली माँ का अवतार,तो कोई दुर्गा का अवतार कह रहा था।
आख्रिर अडतालिस घण्टे जहरीले सांपों के बीच रहकर उसने पुराना विश्व रिकार्ड तोड़ते हुये नया रिकार्ड बना ही डाला।
कमरे से बाहर निकलते ही उस बला की खूबसूरत युवती को भीड़ ने घेर लिया। हर कोई उसके गले मे फ़ूलमाला डालने तो बेताब नजर आ रहा था,विशेषकर युवातुर्क।
यह पहले से तयकर दिया गया था कि उसके बाहर आने के बाद उसका नागरिक अभिनन्दन किया जायेगा। एक बड़ा विशाल मंच तैयार कर लिया गया था ।उसे ससम्मान जयकारे कि साथ मंच पर लाया गया। मंच पर अनेक गणमान्य नागरिकों के अलावा एक अधिकार संपन्न नेताजी भी आमंत्रित थे।
उसके मंच पर आते ही भाषणों का दौर शुरु हुआ। भाषण पर भाषण चलते रहे। भाषणों के बीच, उस नेता ने उसे अपने आवास पर भोजन के लिये आंमंत्रित किया। पोर-पोर में ऎंठन और दर्द के चलते उसका मन वहाँ जाने के लिये तैयार नही हो रहा था, बावजूद इसके वह मना नहीं कर पायी।
देर रात तक भोजन का दौर चलता रहा। नींद के बोझ के चलते उसकी पलकें कब मूंद गई ,उसे पता ही नहीं चल पाया। अब वह पूरी तरह से नींद के आगोश में चली गई थी।
गहरी नींद के बावजूद उसने महसूस किया कि कोई उसके शरीर को कोई बुरी तरह से रौंद रहा है। चेतना में आते ही पूरी बात उसकी समझ में आ गई थी ।वह उठकर भाग जाना चाहती थी, लेकिन शरीर पर वस्त्र न होने की वजह से वह चाहकर भी भाग नहीं पायी थी और वहीं बिस्तर पर पड़ी-पड़ी आँसू बहाती रही थी और दरिंदा अपना खेल ,खेलता रहा था।
इस दुर्घटना के बाद से वह एकदम से गुमसुम -गुमसुम सी रहने लगी थी। बात-बात में खिलखिलाकर हंसने वाली वह शोख चंचल हसीन अब मुस्कुराना भी भूल चुकी थी और वह अब आदमियों के बीच जाने से भी घबराने लगी थी ,क्योंकि उसे पता चल चुका था कि वहाँ केवल सांपों के मुँह मे जहर होता है, जबकी, जबकी आदमी पूरा की पूरा जहरीला।
- तेल की चोरी
दीपावली की रात सेठ गोविन्ददास की आलीशान कोठी जगमगा रही थी। सेठजी इस समय देवी लक्षमीजी की पूजा में व्यस्त थे। चौकीदार मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहा था। तभी एक १२-१४ साल का लडका दबे पांव आया और एक पात्र में दियों में से तेल निकालने लगा। चौकीदार के पैनी निगाहों से वह बच नहीं पाया। लड़के को ललकारते हुये उस चौकीदार ने उसे पकड़ने के लिये दौड़ लगा दी। अपने पीछे उसे आता देखकर लड़के ने भी दौड़ लगा दी, लेकिन पैर उलझ जाने से वह गिर पड़ा और और उसके हाथ का पात्र भी दूर जा गिरा।
अब वह चौकीदार की पकड़ में था। रौबदार कड़क आवाज में उसने लगभग डांटते हुये उस लड़के से तेल चुराये जाने का कारण जानना चाहा ,तो उस लड़के ने रोते हुये बतलाया” भैयाजी, माँ तीन दिन से बीमार पड़ी है। उसका बदन तवे जैसा तप रहा है। मैने उसके लिये खिचड़ी बनायी और माँ को खाने को दिया तो उसने मुझसे कहा कि यदि खिचड़ी को थोड़े से तेल में छौंक देगा तो शायद उसे खाने में कुछ अच्छा लगेगा। घर में तेल की एक बूँद भी नहीं थी, तो मैने सोचा कि यदि मैं दियों से थोड़ा तेल निकाल लूं तो काम बन जायेगा। इसी सोच के चलते मैंने तेल चुराने का मन बनाया था।”
लड़के की बात सुनकर चौकीदार का कलेजा भर आया। उसने अपनी जेब से पचास रुपये का नोट उस लड़के की तरफ़ बढ़ाते हुये कहा” ले ये कुछ पैसे हैं। किसी किराने की दुकान से खाने का मीठा तेल खरीद लेना और खिचड़ी फ़्राई कर अपनी माँ को खिला देना और बचे पैसॊं से दवा आदि खरीद लेना।जानते हो जिस तेल को चुराकर तुम भाग रहे थे,वह तेल करंजी का क्डुवा तेल था।यदि तुम उस तेल से खिचड़ी फ़्राई करते तो उसको न तो तुम्हारी माँ खा पाती और न ही तुम ।”
इतना कह कर वह वापिस लौट पड़ा था। मुठ्ठी में नोट दबाये वह लड़का, तब तक वहीं खड़ा रहा था, जब तक कि चौकीदार उसकी आँखों के सामने से ओझल नहीं हो गया ।
- छोटी सी चिड़िया।
“ रामदीन, जरा ब्ड़े बाबू को मेरे कमरे में भिजवाना। ।” बडॆ साहब ने चपरासी को हुक्म बजा लाने को कहा।
“ मे आई कम इन सर”। बड़े बाबू ने कमरे में प्रवेश करने के पहले कहा।
“ हाँ, तुम अन्दर आ सकते हो ।”साहब ने कहा ।
“ देखो, मुझे बार घुमा-फ़िराकर कहने की आदत नहीं है। एक हफ़्ते के अन्दर मुझे पचास हजार रुपये चाहिए। इसका इन्तजाम कैसे हो सकता है,वह तुम जानो।”
“ बिल्कुल हो जाएगा सर। आप चिन्ता न करें।” बड़ा बाबु अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसने अपने टेबल की ड्राज से कोरे कागज निकाले। टाईपराईटर में फ़ंसाया और एक लेटर टाईप किया। और साहब के कमरे में जा पहुँचा। “ ये क्या है?” साहब ने कहा।
“ कुछ नहीं हुजूर ।।। यह एक छोटा सा कागज का पुर्जा है।
“ बड़े बाबू, तुम्हारा दिमाक खराब तो नहीं है। तुम जानते हो कि बीच सेशन में किसी का ट्रान्सफ़र नहीं किया जा सकता।”
“ हुजूर जानता हूँ। प्यारेलाल इसी शहर में कई बरस से कुण्डली मारे बैठा है। फ़िर उसकी बीवी भी सरकारी नौकरी में है। फ़िर हमने उसका ट्रान्सफ़र थोड़े ही किया है। उसे तो हमने प्रमोशन दिया है। मैं जानता हूँ वह इतनी दूर नहीं जाएगा। आर्डर मिलते ही वह सिर पर पैर रखकर दौड़ा चला आएगा। और हमें मनचाही रकम दे जाएगा। बस आप इस कागज पर अपनी छोटी सी चिड़िया बिठा दीजिए और देखिये ये चिड़िया क्या कमाल दिखाती है ।”
“ समझ गया। तुम बहुत ही होशियार आदमी हो ।”
“सर, ऐसी बात नहीं है। मैं तो आपका सेवक हूँ। और आपकी सेवा करना ही मेरा धर्म है ।”
- गोवर्धन यादव
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