सड़क का भी एक दर्शन होता है—खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं—चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं।
सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं—कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव—सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है—आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो—जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं—यह नियति का मामला है, सड़क का नहीं।
सड़क और संसद का रिश्ता भी बड़ा दार्शनिक है। आदमी कब सड़क से संसद पहुँच जाए और कब संसद से सड़क पर लौट आए—कहा नहीं जा सकता। जनता सड़क के रास्ते ही नेताओं को संसद का पता देती है और उसी रास्ते से वापसी का न्योता भी। इसलिए सड़क है तो संभावनाएँ हैं—धरने की, हड़ताल की, रैली की, जाम की, और कभी-कभी नंगे नाच की भी। सड़क लोकतंत्र की खुली प्रयोगशाला है।
सड़क है तो गड्ढे हैं। गड्ढे हैं तो मरम्मत है। मरम्मत है तो बजट है। बजट है तो फाइलें हैं। फाइलें हैं तो अफसर का चूल्हा जलता है। सड़क सरकार का बहुउद्देशीय औजार है—शौचालय, पेशाबघर और कचरा निस्तारण की कई योजनाओं से बचा लेती है। लोग सड़क पर ही अभ्यास कर लेते हैं, और सड़क “राइट एट योर डोरस्टेप” कचरा सेवा दे देती है—बिना टेंडर, बिना उद्घाटन।
कोरोना के दिनों में जब सड़कें सूनी हुईं, तो उन्हें भी बुरा लगा। पर जल्दी ही फैक्ट्री मालिकों ने मजदूरों को निकाला और सड़कें फिर गुलज़ार हो गईं। मजदूरों के रेलों ने सड़कों को धन्य कर दिया—माँ की गोद फिर भर गई।
सड़कें हैं तो एक्सीडेंट हैं। ट्रैफिक पुलिस का डंडा अभियान निरंतर है। चालान से जेबें भी फुल टॉस फूल रही हैं । सड़कें हैं तो फुटपाथ हैं, और फुटपाथ हैं तो उन पर सोते लोग। वरना नशे में धुत रईसों को कुचलने के लिए लोग मिलेंगे कहाँ? सड़कें ही तो हैं जो रील और सेल्फी प्रेमियों की कर्मभूमि हैं—जहाँ जोखिम जितना बड़ा, व्यू उतने ज़्यादा।
सड़कें हैं तो सड़कछाप गुंडे भी हैं। राजनीति की प्रारंभिक पाठशाला यही है। रेहड़ियों से शुरू हुई हफ्तावसूली आगे चलकर बड़े घोटालों का पाठ्यक्रम बनती है। सड़क कैडर तैयार करती है—छुटभैये से गैंगस्टर तक ।
आजकल सड़कों पर ध्यान कम है। ध्यान दें भी तो कैसे—सड़कें बड़ी बेवफ़ा हैं। बनाई नहीं कि उखड़ने को तैयार। इतना भी सब्र नहीं कि एक चुनावी कार्यकाल पूरा हो जाए। मरम्मत का बजट पास होते-होते नेता बदल जाता है और क्रेडिट कोई और ले जाता है। समाधान सरल है—हर नेता अपने नाम की सड़क बनवाए। चुनाव हार जाए तो सड़क उठाकर घर ले जाए।
सड़कें माँ जैसी हैं—बिल्कुल गाय की तरह। पान की पीक, कचरा, मल-मूत्र—सब समेट लेती हैं, बिना शिकायत। तभी तो आपने देखा होगा—गायें और उनके अधिकृत-अनधिकृत पतियों, यानी सांड—सड़क पर आराम से जुगाली करते हुए। स्टाफ का मामला है जी—जैसे रेलवे में टीटी अपने स्टाफ को सीट दिला ही देता है।
अब प्रश्न उठता है—माँ तो सड़क है, बाप कौन? हर कोई पूछता है, “सड़क तेरे बाप की है क्या?” पर बाप का पता आज तक नहीं चला। मिलते ही सूचना दी जाएगी।
कभी-कभी सड़कें उधड़ती हैं ताकि शहर को ग्रामीण जीवन की झलक मिल सके—कंक्रीट, धूल, मिट्टी—ज़मीन से जुड़े रहने का प्रशिक्षण। चिकनी सड़क पर खेलेंगे तो बच्चों की इम्युनिटी कहाँ बनेगी?
सड़कें पतित-पावनी भी हैं—मोक्षदायिनी। प्राचीन योगियों की परंपरा आज सड़कें निभा रही हैं—कहीं दुर्गम, कहीं अदृश्य, कहीं कीचड़, कहीं खाई। हैं भी, नहीं भी—ब्रह्मस्वरूप। फाइलों में हैं, वादों में हैं, पर चलने में अक्सर नहीं। न शुरुआत दिखती है, न अंत। कोई पूछे, “यह सड़क कहाँ जाती है?”—भाग्यशाली हैं वे जिनकी जाती है। यहाँ तो सालों से देख रहे हैं—नज़र ही नहीं आती।
सड़कें वही हैं—जहाँ चाहो मोड़ लो, बिना शिकायत। और अगर सरकारी बजट की हों, तो नेता जी उन्हें अपने बंगले तक भी ले जा सकते हैं। सड़कछाप सड़क—बस महसूस करने की चीज़ है। मानने की, जानने की नहीं।
- डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गर्ग हॉस्पिटल, स्टेशन रोड, गंगापुर सिटी, राजस्थान – 322201
