Friday, April 17, 2026
होमकहानीरोचिका अरुण शर्मा की कहानी - बंद सुरंग

रोचिका अरुण शर्मा की कहानी – बंद सुरंग

अपनी पत्नी शिखा के देहांत के बाद विजय पहले से भी ज्यादा अकेला और असहाय सा हो गया था |
पत्नी शिखा के जाने के नौ वर्ष बाद शायद यही एक खुश-खबरी उसे मिली थी कि बेटे आर्यन को इंजीनीयरिंग में दाखिला मिल गया वरना जीवन एक वीराना था जिसमें सिर्फ जंगल में पेड़ों से टकराती हवा की साँय-साँय सुनायी देती थी | 
इंजीनियरिंग मुम्बई में ही दाखिला मिला यह और भी सुखद था, बेटे के सिवा अब और कोई तो अपना था नहीं  |
दफ्तर की मिसेज शाह अक्सर कहतीं “विजय अब भी देर नहीं हुई है, अपने बारे में सोचो आखिर ज़िंदगी की साँझ अकेले कैसे काटोगे?” 
“जाने दीजिये मिसेज शाह जैसे अब तक कटी, बाकी भी कट ही जायेगी, बस बेटा इंजिनीयर बन कर अच्छी नौकरी लग जाए तो जीवन फिर से हरा-भरा हो जाए” विजय फीका सा मुस्कुराया |
कामवाली  साफ़-सफाई कर जाती एवं कुक खाना बना देती, विजय एवं आर्यन लगभग पूरे दिन बाहर ही रहते |
दफ्तर में एक पार्टी थी, विजय शिखा के देहांत के बाद शायद ही किसी पार्टी में गया हो सो जल्दी घर लौट आया |
चाबी लगाई तो घर का दरवाजा खुला ही नहीं, अन्दर से बंद था | कौन हो सकता है अन्दर, वह सकते में आ गया, आर्यन तो सुबह कॉलेज के लिए घर से गया था|
उस ने घंटी बजायी, करीब पंद्रह मिनट बाद दरवाजा खुला, सामने आर्यन था | अन्दर अगरबत्ती की खुशबू फ़ैली थी, प्रसन्नता  से उसके होठों पर मुस्कान तैर गयी |
पानी लेने रसोई में गया, सिंक में पानी जमा हुआ पड़ा था |
उस ने पंप चला कर ब्लॉक साफ़  किया,  देखा अध जले से सिगरेट के टुकड़े सिंक में फँसे थे| उसके माथे पर शिकन की लकीरें आ गयी थीं | ‘आर्यन’ उस ने रसोई से ही आवाज़ लगाई, “ये तुम स्मोकिंग करते हो ?”
“नहीं पापा …ये तो मेरे दोस्त आये थे उन्होंने….इतना कह उस ने मुँह नीचे कर लिया |”
“बेटा मेरी अनुपस्थिति में ऐसे दोस्तों को घर न लाया करो, तुम्हारे पढ़ने-लिखने के दिन हैं, ऐसे दोस्तों से  दूर ही रहो …और आज तुम कॉलेज से जल्दी कैसे आ गए ?”
“पापा दो फैकल्टीज़ एब्सेंट थे ….सो नो क्लास |”
“ओके….पर पढ़ाई पर ध्यान दो …..तुम्हारे सिवा अब मेरा है ही कौन ? विजय ने आर्यन को गले से लगा लिया |”
आर्यन चुपचाप अपने कमरे की तरफ खिसक लिया |
अगले रविवार आर्यन व विजय दोनों घर में ही थे , हमेशा की तरह आर्यन रात को देर तक फिल्म देख कर सोया और सुबह देर तक जगा नहीं |
कामवाली ने मशीन में कपड़े डालने के लिए आर्यन के जींस की जेबें उलटी कर खाली कीं तो उसमें  बिलों के साथ कुछ टेबलेट्स भी थे जो उस ने डाइनिंग टेबल पर ला कर रख दिए थे |
विजय जैसे ही नाश्ते के लिए टेबल पर बैठा, उसका ध्यान उन टेबलेट्स पर पड़ा |
कुछ नए तरह की लग रही हैं ये टेबलेट्स …उलट-पुलट कर देखा कुछ समझ न आया |
विजय आर्यन के कमरे में गया …वैसा ही टैबलेट्स का खाली पत्ता उसके पलंग के साथ रखी टेबल पर भी था | उसने फिर से उलट-पुलट कर उसे देखा | ओह्ह्ह्हह उस का सर घूम गया …ये तो नशे की गोलियाँ हैं …मिसेज शाह एक दिन बता रही थीं कि आजकल कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ नशे की गोलियाँ इस्तेमाल करते हैं |
विजय से रहा न गया उस ने आर्यन को जबरदस्ती नींद से जगाने की कोशिश की …उठो बेटा आर्यन …बहुत देर हुई …छुट्टी का यह तो मतलब नहीं कि रात देर तक फ़िल्में देखो और दोपहर तक सोते रहो ….उसकी धड़कन बढ़ गई थी …मन में एक अजीब सी चिंता ने घर कर लिया था |
जैसे-तैसे आर्यन जगा ….एक घंटे तक सुस्ताता ही रहा ….उसकी आँखों की पुतलियाँ बड़ी और ज्यादा सफ़ेद नज़र आ रही थीं |
विजय ने आर्यन को टेबलेट्स दिखाते हुए पूछा, “यह क्या है आर्यन …?”
“पापा मालूम नहीं ….मेरे दोस्त की हैं ….शायद हमारे घर रख कर भूल गया, लाइये मुझे वापिस करिए मैं उसे लौटा दूँगा”  उसने अपना हाथ गोलियों की तरफ बढ़ाते हुए कहा | 
आर्यन की घबराहट को देख विजय की साँसें तेज चलने लगी थीं, उस का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था, फिर भी उस ने शांत रहने में ही भलाई समझी |
टेबलेट्स आर्यन को दे …वह खाली पत्ते को ले कर मेडिकल स्टोर गया | उस का शक बिलकुल ठीक था, वे नशे की गोलियाँ ही थीं | जिन्हें  आजकल हाई प्रोफाइल लोगों के बच्चे स्कूल व कॉलेज में फैशन के तौर पर लेते हैं |
वह लुटा-पिटा सा घर पहुँचा, जी चाहता था एक तमाचा जड़ दे आर्यन को | किन्तु अपने बिन माँ के बच्चे पर कैसे हाथ उठा दे, सो उसे समझाया और सोफा पर उसके पास बैठ कर हिदायत देने लगा “बेटा इस तरह के दोस्तों की संगत छोड़ दो, ये रईसों के बच्चे हैं, जिनके अपने व्यवसाय हैं, जिन्हें भविष्य की कोई चिंता और फ़िक्र करने की ज़रुरत ही नहीं | हमारा और उनका कोई मेल नहीं बेटा|”
“जी पापा” आर्यन ने भी हामी भरने में ही भलाई समझी |
विजय ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसे गले लगा लिया |
अगले दिन दफ्तर में विजय बहुत अनमना सा था |
“क्या बात है विजय कुछ उदास से लग रहे हो?” मिसेज शाह ने पूछा |
“नहीं कुछ खास नहीं |” 
“ख़ास नहीं मतलब कुछ तो है , देखो विजय मैं तुम्हारे  साथ काफी समय से काम कर रही हूँ | तुम अपना सुख-दुःख मुझ से साझा कर सकते हो, क्यों अकेले घुटते रहते हो?” 
“नहीं, ऐसा कुछ नहीं सब ठीक ही है” विजय ने बात छुपाते हुए कहा |
अब अक्सर विजय का मन दफ्तर में कम ही लगता | कई बार घर की लैंड-लाइन पर फोन कर पता करता कहीं आर्यन घर पर तो नहीं | कभी-कभी जान बूझ कर जल्दी घर चला आता |
आज दफ्तर में अचानक ही वह सिर में दर्द और एसिडिटी जैसा महसूस कर रहा था |
विजय तुम घर जा कर आराम करो उस का साथी विनीत बोला, तुम्हारा काम मैं देख लूँगा, आजकल तुम ज्यादा परेशान नज़र आते हो | 
जैसे ही वह उठा, चक्कर खा कर वहीं गिर गया | झट से उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया, मालूम हुआ ब्लड-प्रेशर बढ़ा हुआ है | डॉक्टर ने चेक अप कर उसे आराम करने को बोला |
विनीत उसे उस के घर छोड़ने गया | जैसे ही उस ने फ़्लैट का ताला खोला, अन्दर सिगरेट के धुएं का भभका था | बियर की तीन बोतलें लुढ़की हुई पड़ी थीं और टी.वी. स्क्रीन पर ब्लू- फिल्म चालू थी |
अन्दर का दृश्य देख कर विनीत भी हैरान था किन्तु विजय की हालत देख कुछ न बोलना ही उचित समझा | 
विनीत ने विजय को उस के कमरे में पलंग पर लिटाया और पीने को पानी  दिया, तभी आर्यन घर के मुख्य दरवाजे से अन्दर घुसा | साथ में छोटे-छोटे  कपड़े पहने एक बाजारू सी दिखने वाली लड़की भी थी |
उन्हें देख आर्यन एक बार तो चौंका फिर बोला “आप बेवक्त घर पर कैसे पापा?”
विनीत ने वहाँ  खड़े रहना उचित न समझा सो दफ्तर को लौट गया | 
आर्यन वहीं बैठ कर सिगरेट के कश लगाता रहा और वह लड़की वहाँ से नदारद हो गयी |
विजय के सब्र का बाँध टूट गया था, कुछ समय तो बिस्तर पर पड़ा रहा फिर उठ कर ड्राइंग रूम में आया और चीख कर बोला “तो मेरी अनुपस्थिति में यह सब होता है घर में, कितना समझाया तुम्हें, चेन स्मोकर हो गए हो …ये नशा है …बर्बाद हो जाओगे तुम इसके साथ …और मुझे भी बर्बाद कर दोगे…कौन थी वो लड़की?”
उस ने कोई जवाब नहीं दिया, सिगरेट फूँक कर धुएं  के बादल बनाता रहा और दीवार के एक कोने में देखता रहा |
उसकी चुप्पी विजय को खाए जा रही थी …उस ने रिमोट लेकर टी.वी. पर चल रही ब्लू फिल्म बंद की और एक तमाचा आर्यन को जड़ दिया, “मुझ से बात करने के लिए फुर्सत है तुम्हें ?”
“क्यों मेरा दिमाग खा रहे हैं आप ? ये कोई अनोखा काम नहीं है | इस पीढ़ी के लगभग सभी बच्चे कर रहे हैं ये” वह आक्रोश में चीख पड़ा था |
“लेकिन बेटा हमारा परिवार ऐसा नहीं, हम सभ्य लोग हैं,  हमारी इज्ज़त है सोसायटी में |”
“होगी पर मेरी सोसायटी में जिस तरह इज्ज़त बनती है, मैं बना रहा हूँ और आपके भाषण की आवश्यकता नहीं  मुझे, आर्यन जोर-जोर से चीखने लगा था |”
विजय ने उसी महीने उसकी पॉकेट मनी बंद कर दी, “न रहेगा बाँस न ही बजेगी बाँसुरी | ये पैसे ही दुःख दे रहे हैं तुम्हें बेटा | रात-दिन एक कर मेहनत से कमाता हूँ, नशे में उड़ाने के लिए नहीं हैं मेरे पास पैसे |”
“हाँ, बहुत पैसे देते हैं आप मुझे …किस जमाने में जी रहे हैं डैड आप ?हज़ार रुपये महीने में क्या होता है ? दूसरे लोग कितना खर्च करते हैं” वह बेलगाम बोले जा रहा था |
विजय वहाँ से अपने कमरे में आ गया | उसे अगले दिन मीटिंग के लिए बैंगलोर जाना था, सुबह जल्दी फ्लाइट पकड़नी थी |
दो दिन बाद जब वह लौटा आर्यन घर में नहीं था | उसके स्पोर्ट्स शूज़ , बैग, बेल्ट सब सोफे पर फैले पड़े थे, पास में बैग अधखुला सा पड़ा था |  उसने बैग को खोल कर देखा, अन्दर सिरिंज एवं नशे की गोलियाँ…उफ्फ्फ्फ़ उसकी ह्रदय गति बढ़ गयी थी |  उस ने सारा बैग उलट-पुलट कर औंधा कर डाला | एक अजीब सी घुटन उसके अन्दर बढ़ती जा रही थी, महसूस हो रहा था जैसे साँसें थमने वाली हों , वह बुदबुदाया “मालूम होता है रेव पार्टी करके आया है |”
तभी बाहर से आर्यन की आवाज़ आयी तो विजय दरवाजे तक आया, “धूम मचा दे……धूम मचा दे” उस के दोस्त और वह नशे में झूमते हुए गा रहे थे और विजय को लगभग धक्का देते हुए घर में दाखिल हो गए  |
अन्दर आते ही वो और उसके दोस्त सोफे पर पसर गए | विजय का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था | 
तभी बिल्डिंग के सोसायटी ऑफिस से इंटरकॉम आया “मिस्टर विजय आप से बात करनी है आप अभी ऑफिस में आएँ प्लीज़ |”
वह ऑफिस में गया, मैनेजर ने उसे बैठने को कहा “देखिये विजय सर अच्छा तो नहीं लगता लेकिन अब पानी सर से ऊपर जाने लगा है, इसीलिए आप को बुलाना पड़ा | आप के बेटे के लक्षण ठीक नहीं, कल रात उसने बहुत हंगामा किया | आप की अनुपस्थिति में वह  और उसके दोस्त कुछ लड़कियों को यहाँ अक्सर लाया करते हैं, कई निवासियों ने ऐसी शिकायत की थी,  कल रात तो हद ही हो गयी | आपका बेटा आर्यन बालकनी से बाहर नीचे  लटका हुआ शोर-शराबा कर रहा था , हमने वाचमैन को भेज कर पता किया तो मालूम हुआ कोई लड़की अन्दर थी  | आर्यन पूरे नशे में था और वह उस लड़की को धमका रहा था कि यदि वह अपने घर गयी तो वह बालकनी से कूद कर जान दे देगा | जैसे-तैसे हमने उसे बालकनी की रेलिंग से खींच कर घर में अन्दर लिया, वरना कल अनहोनी भी हो सकती थी | उम्मीद है आप हमारी बात समझेंगे और शिकायत का मौक न देंगे |”
विजय शर्म से पानी-पानी हो गया था | लड़खड़ाते कदमों से वह अपने घर तक आया और एक जोरदार थप्पड़ आर्यन को लगा दिया  |
आज से तेरी सब यारी-दोस्ती बंद, जितना लाड़ -प्यार दिया उतना ही दुःख दे रहा है तू मुझे (गालियाँ ) क्या नहीं किया मैं ने तेरे लिए, किस बात का बदला ले रहा है तू ? उस ने एक लात आर्यन की पीठ पर मारी |
आर्यन वहीं लुढ़क गया, “सॉरी पापा ..सॉरी पापा …मैं सुधर जाऊँगा, मुझे माफ़ कर दो पापा …कोई शिकायत का मौक़ा नहीं दूँगा …मुझे माफ़ कर दो पापा”  उसने विजय के पैर पकड़ लिए थे और जमीन पर पसरा पड़ा था | 
“कल से सीधे कॉलेज से घर और घर से कॉलेज ….उसके अलावा घर के बाहर कदम रखा तो मैं तेरी टाँगे तोड़ दूँगा |न तुझ से मिलने कोई यहाँ आयेगा न तू कहीं जाएगा |”   
“सब ठीक है पापा ….लेकिन मेरा तो कॉलेज से नाम ही कट गया है” उसकी आँखों में कोई शर्म नहीं थी |
“क्या …मुझे खबर तक नहीं ….ऐसा कैसे ? कल ही तेरे प्रिंसिपल से मिलता हूँ |”
अगले दिन विजय कॉलेज में प्रिंसिपल से मिला और प्रिंसिपल के खूब हाथ-पैर जोड़े | अपने पहचान के लोगों का वास्ता दिया और फिर से उस को कॉलेज में फीस भर कर दाखिला दिलाया |
“लेकिन एक बात आप लिखित में दीजिये मिस्टर विजय कि आपका बेटा आइंदा से नशे की हालत में कॉलेज नहीं आयेगा, हमारे कॉलेज का रेप्युटेशन खराब होता है उसकी ऐसी हरकतों से |”
“जी सही फ़रमाया आपने, मैं ध्यान रखूँगा |”
विजय महीने भर की छुट्टी ले कर घर बैठ गया था |  स्वयं आर्यन को कॉलेज छोड़ कर व लेकर आता | आर्यन अब नशे के लिए तड़प गया था | विजय उसे डॉक्टर के पास ले गया, जहाँ नशा छोड़ने हेतु उपचार किया जाता था | उसे वहाँ नशा मुक्ति के लिए अस्पताल में रखा गया किन्तु एक दिन वह मौक़ा पा कर वहाँ से भाग निकला और अपने घर आ गया |
“पापा मुझे अस्पताल में मत रखो मैं नशा नहीं करूँगा, अच्छा इंसान बनूँगा पापा, सब बुरी आदतें छोड़ दूँगा, आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगा पापा प्लीज़” वह छोटे बच्चे की तरह विजय के पैरों में गिरकर  गिड़गिड़ा रहा था | 
विजय मन ही मन खुश हुआ कि शायद अब वह सुधर जाएगा | उसने सोचा वैसे भी शाम का समय है सो एक रात घर में रहने देता हूँ, कल फिर इसे नशा मुक्ति हेतु अस्पताल छोड़ दूँगा |
अपार्टमेंट में क्रिसमस पार्टी चल रही थी,  बिल्डिंग में बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम रखा गया था और सभी बच्चे विभिन्न वेशभूषाओं में थे | रात को पड़ोस के घर से खबर आई कि पार्टी के बीच से ही उनकी चार वर्षीय बच्ची गायब हो गयी | विजय भी पड़ोसी होने के नाते उस की खोजबीन में लग गया, रात के अँधेरे में सब उसे पार्किंग, स्विमिंग पूल के आस-पास, खेल-कूद के मैदान में ढूँढ रहे थे | आर्यन भी अपने पिता की मदद के लिए साथ में आ गया | 
विजय उसे देख कर बहुत प्रसन्न हुआ, “हाँ बेटा ऐसे ही नेक काम में समय लगाओ …अच्छा  सोचो …अच्छा करो” उसने आर्यन का हाथ अपने हाथ में ले लिया था |   
बच्ची कहीं न मिली, अगले दिन उस बच्ची के माता-पिता के पास फिरौती माँगने के लिए फोन आया, “पाँच लाख रुपये ले कर फलाँ स्थान पर आ जाओ और अगर पुलिस को सूचना दी तो बच्ची की लाश पाओगे |” 
उस बच्ची के माता-पिता विजय से खास सम्बन्ध रखते थे सो वह भी उनके साथ गया  | 
जैसे ही उन्होंने दिए गए ठिकाने पर पहुँच कर फिरोती वालों को फोन किया, सैंटा क्लॉज़ का कॉस्टयूम पहने कोई बच्ची को लेकर सामने आया | उन्होंने  फिरोती की रकम दे कर बच्ची को छुड़ाया | विजय काफी देर तक अपने पड़ोसी के घर पर रुका रहा | रात के करीब दो बजे जब वह घर लौटा तो देखा आर्यन घर में निर्वस्त्र बैठा सिरिंज ले कर अपनी जाँघों की नसें ढूंढ रहा था | विजय ने उस के सर के बालों को जोर से खींचा और उसे लगभग घसीटते हुए चीखा , “तू सुधरेगा कि नहीं ?”
“पापा मैं मर जाऊँगा, इस के बिना मैं मर जाऊँगा …मुझे माफ़ करो पापा |” 
विजय दनदनाता हुआ आर्यन के कमरे में गया | वहाँ के दृश्य को देख उसके पूरे बदन में सनसनी सी दौड़ गयी, वही सैंटा क्लॉज़ का कॉस्टयूम वहाँ उलटा खुला पड़ा था | उस ने आर्यन को एक लात मारी, “कहीं का नहीं छोड़ा तूने मुझे (गाली) ….तू….तू  बच्ची को पार्टी से अगुवा कर ले गया, बस यही बाकी रह गया था ? हमारे पड़ोस की बच्ची को भी नहीं  छोड़ा तूने ? हे ईश्वर इसे पैदा होते ही क्यों न उठा लिया तूने, कमबख्त न खुद जी रहा है न मुझे चैन से रहने देता है |”
“यदि वे पुलिस को बुलाते तो ?”
“मैं क्या करूँ पापा आपने मेरी  पॉकेट मनी भी तो बंद कर दी है, मुझे जीने दो पापा, इसके बिना मैं मर जाऊँगा पापा|” 
विजय ने उसे एक और लात मारी, आर्यन रसोई की तरफ भागा …वहाँ से पैना चाकू ले कर उस ने विजय पर वार किया | विजय के चेहरे पर चाकू से गहरा घाव हो गया था | वह वहीं पास में डाइनिंग टेबल की कुर्सी का सहारा ले कर बैठ गया |
उसके आँसू रोके नहीं रुकते थे | बच्चे की तरह दहाड़ें मार कर रोने लगा था वह, किन्तु उसके आँसू पोंछने वाला तो कोई था ही नहीं | वह स्वयं को आज बहुत मजबूर, कमजोर और लाचार महसूस कर रहा था |  
तभी एक लड़की घर में दाखिल हुई | आर्यन ने पोर्न फिल्म लगाई और उस लड़की के कपड़ों के अन्दर-बाहर हाथ फिराने लगा |
उस दृश्य को देख विजय की आँखें स्वतः  ही बंद हो गयीं, उसके मन में अपने बेटे के प्रति घृणा उतर आयी,  हालात से मजबूर हो वह कमरे में चला गया | आज यह घर उसे नर्क समान लग रहा था “कहाँ जाऊँ, क्या करूँ ?” वह तड़प उठा था | 
रात भर पोर्न फिल्म चलती रही और वह लड़की आर्यन की जाँघों और पीठ की मालिश करती रही, उसकी नसें ढूँढ-ढूँढ कर कर उसे इंजेक्शन देती रही | वह आर्यन को उत्तेजित करने का खूब प्रयास करती किन्तु वह तो अपना शरीर खो बैठा था, ज़िंदा लाश सा सोफे पर पड़ा रहा बस | 
सुबह चार बजे धाड़ से दरवाजे की आवाज़ आयी | विजय घबराया हुआ कमरे से बाहर आया, उसने देखा लड़की वहाँ से जा चुकी थी और आर्यन नशे में पड़ा था |
विजय ने उसे पीठ  पर उठा कर उसके कमरे में लिटाया | आज उसे वह दिन याद हो आये जब वह छोटे से आर्यन को उसके ननिहाल में दशहरे मेले में ले गया था, वह जलते रावण को देखना चाहता था किन्तु भीड़ में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, उसने आर्यन को अपने कंधों पर बैठा लिया था | आर्यन तालियाँ बजा-बजा कर जलते हुए रावण को देखने का आनंद ले रहा था  और खुशी के मारे उसने अपने पिता को चूम लिया था | विजय की आँखों से आँसू ढुलक कर गालों तक आ गए थे, वह आर्यन के पलंग पर उसके पास बैठ गया और उसकी पीठ और माथे पर हाथ फेरने लगा, अपने बेटे के मोह में मजबूर पिता, इस से मार्मिक दृश्य शायद कोई और हो ही नहीं सकता था |   
अगली सुबह जब आर्यन को  होश आया, वह अपने जींस की जेबें टटोल रहा था, कभी पर्स में तो कभी बिस्तर के नीचे रुपये ढूँढने लगा | रुपये गायब थे …शायद रात को वह लड़की उठा कर ले गयी थी | 
एक महीने की छुट्टी ख़त्म हो गयी थी, विजय दफ्तर गया तो मन बहुत उदास था | मिसेज शाह ने हमेशा की ही तरह विजय के हाल-चाल जानने चाहे | परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर आज विजय ने  थोड़ा कुछ उन्हें बताया, किन्तु दफ्तर में बैठ कर कहाँ पूरी स्थिति बयान कर पाता सो दफ्तर के बाद विजय ने उन्हें घर आने का आग्रह किया | अपने पुराने कुलीग की तकलीफ में वे साथ देना चाहती थीं सो उस के साथ गाड़ी में बैठ कर वे उसके घर आ गयीं | 
आर्यन घर में नहीं था |
विजय ने चाय बनाई और मिसेज शाह को एक प्याला दे कर स्वयं भी सोफे पर बैठ कर अपने घर की स्थिति उन्हें बताने लगा  |
तभी आर्यन घर के मुख्य दरवाजे से दाखिल हुआ  और मिसेज शाह को देखा | न नमस्ते न सम्मान, “वाह रंगरेलियाँ ….वाह रंगरेलियाँ ….कहता हुआ वह मिसेज शाह के पास आया और धीरे से उनके कान में बोला, “नाइस चॉइस …ये मेरे पापा हैं न जब से मॉम गयी हैं बेसब्रे हुए हैं और इतना कह उस ने पोर्न मूवी लगा दी एन्जॉय डैड …एन्जॉय योर लाइफ|” 
मिसेज शाह समझ गयी थीं कि वहाँ एक पल भी रुकना उचित नहीं सो वहाँ से चली गयीं | विजय अपने आप को बहुत मजबूर, असहाय और बेइज्जत महसूस कर रहा था | वह फिर अपने कमरे में बंद हो गया | तभी दरवाजे की घंटी बजी, विजय ने अपने कमरे के दरवाजे को आधा सा खोल दिया और बाहर की तरफ देखने लगा | आर्यन ने घर का मुख्य दरवाजा खोला, एक नई लड़की अन्दर दाखिल हुई, फिर पिछली रात की तरह पोर्न मूवी …आर्यन निर्वस्त्र सोफे पर पड़ा था और वह लड़की उसकी पीठ और जाँघों पर जैसे आटा गूंध रही थी | उसकी जाँघों पर मार-मार  कर नसें ढूंढ कर सिरिंज लगा रही थी | करीब तीन बजे विजय को कुछ अजीब सी आहट हुई, वह कमरे के बाहर आया | उस ने देखा लड़की जाने की  जिद कर रही थी | आर्यन बालकनी से लटका था …उसे जाने को मना कर रहा था | विजय माथे पर हाथ रख सोच की मुद्रा में चुपचाप देखता रहा और शून्य में खो गया | 
तुम भी कहाँ समझी थी शिखा मेरे समझाने पर …सहेलियों के साथ डिस्को-पब्स में रात बिताना तुम्हें बहुत आकर्षित करने लगा था | मैं ने इस दिखावे की ज़िंदगी में तुम्हारा साथ न  दिया, तुम ने मुझ से किनारा करना शुरू कर दिया | बॉय फ्रेंड बनाया …मेरे गाढे पसीने की कमाई तुम उस पर लुटा रही थीं | जब मैं टूर पर होता तुम रात को उसे घर में बुला लेतीं …मैं ने बहुत समझाया था तुम्हें …तुम नहीं समझीं …नशा करने लगी थीं | कितनी बार शराब पी कर घर आतीं  और एक रात मैं ने तुम्हें बाहर जाने से क्या रोक दिया तुम नाराज़ हो गयीं | मैं ने तुम्हारे सब क्रेडिट-डेबिट कार्ड बंद कर दिए ….पैसे भी कम ही देता …तुम अक्सर नाराज़ होतीं …घर के गहने बेचने लगीं ….मैं ने वो भी बैंक लॉकर में डाल दिए | एक दिन जब मैं टूर पर गया तुमने मेरे पीछे से पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली …एक नोट छोड़ गयीं जिसमें लिखा था तुम  स्वयं इस खुदकुशी की ज़िम्मेदार हो | बड़ा उपकार किया शिखा …उफ्फ्फ कैसी अंधेरी सुरंग है ये …जिसमें इंसान अगर एक बार  घुसता है तो घुसता ही चला जाता है …न जाने क्या दिखाई देता है उसे इस अंधकार में …क्या मज़ा आता है …? बस बढ़ता जाता है … लेकिन दूसरा छोर नहीं …बाहर आने का कोई रास्ता नहीं …बंद सुरंग है ये नशा |
जोर से दरवाजे की  आवाज़ आयी …विजय वर्तमान में लौटा | वह लड़की वहाँ से चली गयी थी, आर्यन अभी भी बालकनी से बाहर को लटका था | 
विजय बालकनी के पास गया, आर्यन ने हाथों से रेलिंग पकड़ी हुई थी | नशे की हालत में उस के शरीर में जान नहीं थी | उसकी मुट्ठियों की पकड़ ढीली पड़ गयी, एक हाथ छूट गया …विजय वहीं खड़ा होकर देखता रहा, आर्यन को बचाने की कोशिश भी न की |  अगले ही पल वह काग़ज़ के टुकड़े के समान लहराता हुआ पन्द्रहवीं मंजिल से नीचे जा गिरा था | विजय  लड़खड़ाते  कदमों से अपने कमरे में लौट आया था | 
धमाके की आवाज़ से वाच मैन दौड़े आए | फिर थोड़ी ही देर में विजय के घर की घंटी बजी, वह आँखें मलता हुआ घटनाक्रम से अनजान बना हुआ बाहर आया | वाचमैन पसीना-पसीना था उसने आर्यन के बारे में विजय को बताया |  विजय नीचे जा कर आर्यन की लाश के पास अपना सर पकड़ कर बैठ गया और मातम मनाने लगा|
रोचिका अरुण शर्मा
रोचिका अरुण शर्मा
कविताएँ, आलेख, कहानी, दोहे, बाल कविताएँ एवं कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित | 'जो रंग दे वो रंगरेज' कहानी-संग्रह प्रकाशित | चार साझा कहानी-संग्रहों में भी कहानियाँ शामिल | गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान, दिल्ली द्वारा “काका कालेलकर सम्मान वर्ष २०१६ सहित अनेक सम्मान प्राप्त । सम्प्रति - डाइरेक्टर सुपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी प्राइवेट लिमिटेड | संपर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest