दीवार पर टँगी ढोलकी को उतार उसकी रस्सियाँ कसने में निमग्न चंपा बहुत हड़बड़ाहट में थी। दोनों पैर फैलाकर बैठी चंपा उसकी रस्सियाँ कसती जाती, दो–चार हाथ ढोलकी पर मार आवाज़ पर गौर करती जाती। जब वह ठीक हो गई, उस पर थाप मार उसे एक किनारे रख दिया।
“हूँ! अब ठीक है।“
बुदबुदाकर वह अपने सिंगार–पटार में व्यस्त हो गई।
गुलाबी साड़ी को अपने पैबंद लगे हरे साये के ऊपर लपेटा, छोटे बालों में नकली चोटियाँ लगाकर लाल फुदने लगाए। चोटियों को झुलाती हुई आईने के सामने जा खड़ी हुई। आईने के ऊपर रात को उतारकर चिपकाई गई रमोला बिंदी खिलखिला रही थी।
उसे उखाड़कर अपने भवों के बीच चिपका दिया। अब चूड़ियों की बारी थी। उसे नित नई चूड़ियाँ बदलना अच्छा लगता है। अपने मर्दाने हाथों में हरी–गुलाबी चूड़ियाँ डालने की कोशिश की तो दो–चार टूट कर बिखर गई… छुन.. .छन्न… छनन !
हाथ में खून रिस आया। हमेशा की तरह उसके हृदय के भीतर ‘छनाक‘ की आवाज़ के साथ कुछ टूटा और वह अतीत में खोने लगी। वह प्रायः अपने अंदर टूटते आत्म–विश्वास के साथ अपने अतीत में जा गिरती ।
“कित्ता देर सिंगार–पटार करेगी री? जल्दी चल। किस मरद पर बिजुरी गिराने का इरादा है?”
रानी की आवाज से वह चिंहुक उठी।
“हम एकदमे रेडी हैं। चलो।“
वे दोनों ढोलकी को गले में लटका आँगन में खड़ी हो गईं। उन दोनों को इंतजार था सिमरन का। सिमरन के साथ चमेली भी आनेवाली थी। उन चारों को आज इस शहर के पॉश एरिया में जाना था। यूँ तो आजकल वहाँ से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंकी गई थीं वे। फिर भी एक घर ऐसा था, जहाँ की दादी के लिए वे सब महत्त्वपूर्ण बनी हुई थीं।
“लो, सिमरन, चमेली और फुलवा भी आ गई।”
बाहर जाकर झाँक आई रानी के बताते ही मर्दाने चाल में लचक घोलती चंपा अपने कंधे पर की ढोलकी पर एक थाप मार बाहर चल दी।
बाहर सिमरन अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी। उसके बालों में सस्ती क्लिपें चमक रही थीं। आज उसने लाल–लाल लिपस्टिक से पूरे होंठ रक्तिम कर लिये थे। फुलवा ने कंधे पर टँगे ढोलक को उतारकर नीचे रखा और बताने लगी,
“देखो ये सतलड़ी मैंने कल ही खरीदी है।“
नकली सतलड़ी की चमक में सबकी असली हँसी घुल–मिल गई।
थोड़ी देर बाद ही वे पाँचों उस ओर बढ़ रही थीं, जहाँ के एक नए घर में एक बच्चे का जन्म हुआ था और उन्हें बधाई गाने के लिए बुलाया गया था। रानी जानती है कि जब तक बच्चे की दादी उनसे बच्चे को निहुछा न ले, उसके शुभ–अशुभ की चिंता से मुक्त नहीं होती।
रानी और चंपा अपनी टेढ़ी–मेढ़ी चाल से आगे–आगे चलती रहीं, बाकी सब पीछे–पीछे। मरदाने चाल में औरतपन को घोलती इन स्त्रियों का स्रियोचित शौक सबके लिए अचंभित करनेवाला था।
हालांकि अब पहले की तरह उन्हें घास नहीं डाला जाता।
राह चलनेवाले थोड़ा रुक इन लोगों की भाव–भंगिमा का मज़ा लेते रहे। किसी ने इन्हें छेड़ने की कोशिश नहीं की। बल्कि कन्नी काट किनारे से ही निकलते रहे।
लहराती–इठलाती वे जब रामदयाल की कोठी के सम्मुख पहुँचीं, खुद–ब–खुद चंपा के मुँह में थूक भर आया।
“आक थू… आक थू !”
भरपूर घृणा! उसने हिकारत से उतनी बड़ी कोठी का जायज़ा लिया। अंदर से एक नारी स्वर सुनाई पड़ा,
“अब टी.वी. देखना बंद करो मधु।“
“हाँ माँ! बस थोड़ी देर।”
एक ठिनठिनाती आवाज आई।
आवाजें कोठी की दीवार के पासवाले कमरे से आई थी। सबने सुना और आगे बढ़ गई पर चंपा के कान वहीं ठिठके रहे। शरीर भले ही नहीं, लेकिन आत्मा भी।
उसने होंठों से बाहर बह आई पान की पीक को दाहिने हाथ से रगड़कर पोंछा।
“हुँह!… मधु?… चंपा कोई नहीं है इस हवेली की?”
घृणा की एक और लहर!
कोठी के कठोर फैसले ने चंपा को इन लोगों के बीच पहुँचाया था। प्रौढ़ चंपा कभी उन्हें माफ नहीं कर सकी। एक लंबी जिंदगी गुजार चुकी थी वह।
गंतव्य पर पहुँचते ही धड़धड़ाती हुईं सब आँगन में जा चिल्लाने लगीं, “हाय–हाय ! …ऐ बबुआ की माय… दादी, कहाँ हो… आओ बिल से बाहर।“
दो दिन पूर्व ही रेवा अस्पताल से लौटी थी। उसका बेटा अभी सो रहा था। वह उसे न उठाना चाहती थी, न ही उसे इन लोगों में, इन लोगों की बधाई में रुचि थी।
वह माँजी के आने के पहले आँगन में निकल आई,
“देखिए, आप सब यहाँ ये सबbखेल मत दिखाइए। इनको एकदम पसंद नहीं है।“
“आय–हाय! बहूरानी हमारे अँगने में तुम्हारा क्या काम है?”
चंपा थी।
“पूरा जिनगी हम तुम्हारे घर के सब बच्चन लोग का बधाई गाते रहे। आसीस देते रहे, अब हमें भगाती हो।“
रानी भी बोल पड़ी।
“हाय–हाय बहूरानी !”
कइयों ने हाथ नचाया।
“हाय बहूरानी, बुलाओ अपनी सास को। हम उनके बोलाने पर आए हैं… तुम्हें हम नहीं सोहाते हैं पर तुम्हारा लाडला हमारे गोदी में ही खेल…।“
चंपा की बात अधूरी रह गई। रेवा बीच में ही बोल पड़ी थी,
“…आप सबको मैं यूँ ही रुपये, चावल वगैरह दे दूँगी। पर ई सब…। ओह!ये डाँस–वाँस अब नहीं…।“
रेवा की बात भी उन लोगों के हाथों के झटकते–लहराने में अधूरी रह गई।
रेवा ना–ना करती रह गई।
“ऐसे कुबोल तो न बोल बहूरानी। हाय–हाय!”
कहती हुई रानी जबरन उसे धक्का–सी देती उसके कमरे में घुसकर पालने पर सो रहे बच्चे को उठा लाई। एक ही हाथ में बच्चे को थामे जब वह बाहर आई, रेवा का कलेजा मुँह को आ गया। उसका इकलौता नवजात कुनमुनाया पर रेवा को नहीं सौंपा गया उसे।
धम से बैठ गई रानी, चंपा, सिमरन, चमेली आदि उस आँगन में चारों ओर।
“अरे रे!”
चिल्लाती रह गई रेवा।
रेवा की सास ऊपरी तल्ले पर स्थित रसोईघर में सोंठ बना रही थी, उसे उतारकर वे नीचे आईं।
“सही समय से आ गईं तुमलोग। तुमलोग का आशीर्वाद विशेष है। बच्चों को बहुत फलता है।“
और उनके इशारे पर लहरा उठी उन सबकी घेरदार साड़ी। गोल–गोल चक्करघिन्नी! बच्चे को बारी–बारी से थाम, वे कभी इस चक्कर घूमतीं, कभी उस। सस्ते फिल्मी गीतों पर दौर चलने लगा।
ढोलक की थापें–ढम!… ढम!…ढम!… सोहर –
“रुपइया लेबो भौजी लाल के बधाई
ऐहे रुपइया मोरे ससुर की कमाई है
अठन्नी ले लो ननदी लाल के बधाई
ढम… ढम… ढम! सारा आँगन गुंजायमान। मुहल्लेवाले भी खींचे चले आए थे। सब इस तमाशे को बड़े अचरज एवं उत्सुकता से देख रहे थे। कुछ लोगों के मन में वितृष्णा भी उपज रही थी। कौतुक ! महा कौतुक! किसी ने पहली बार देखा था–किसी ने कई बार। किसी ने हर बार।
चंपा चक्कर काटती, सस्ता नृत्य दिखलाती दर्शकों के पास जाती तो वे दूर भागने लगतीं… थोड़ी वितृष्णा…थोड़ा डर…थोड़ी घृणा भी।
लेकिन वे सब अपने में मगन थीं। वे सब नाचती रहीं…नाचती रहीं…नाचती ही रहीं।
कभी आँचल के नीचे बच्चे को छिपाया, कभी एक हाथ से ऊपर उठाया, बेखौफ।
उनके हर कदम पर रेवा का कलेजा हाथ से निकला जा रहा था, पर यह साँस रोक कर सब देख रही थी। खासकर जब वे बच्चे को आँचल में दबाए तेज कदमों से लगातार गोल–गोल घूमतीं।
बीच में टोकना फायदेमंद नहीं था, यह रेवा समझ चुकी थी। बस दम साधे भगवान, भगवान करती रही वह।
सब जब भरपूर आशीष लुटाकर, थककर बैठ गईं,
रेवा ने जल्दी से बेटे को गोद में लेना चाहा। रानी आँचल में बच्चे को छिपाए रही। वह रोने लगा था, रेवा बेचैन।
वह रसोई के अंदर गई। सूप में भरकर चावल और दो हजार रुपये लाकर दिए।
“इतना कम ?…नए चलेगा।“
रानी ने हाथ झटके।
चंपा फिर से चंपा बन चुकी थी। उसने कहा,
“हाय–हाय बहू, हम इतना अनमोल आसीस दे रहे हैं। और तुम्हारा हाथ इतना तंग है?”
ना–हाँ के बीच रानी बच्चे को कसकर थामे रही। अंततः चार हजार इक्यावन पर बात बनी। वे पुनः बच्चे को सूप पर लिटाकर नाचने लगीं एवं निहुछकर उसे माँ की गोद में डाल दिया।
“लो बहूरानी! तेरा बेटा जुग–जुग जिएगा। कोई अलाय–बलाय इसको छू नय सकता।“
रानी को अपने आशीर्वाद पर पक्का भरोसा।
शिखंडियों के आशीर्वाद से उनका पोता ठीक रहेगा, यह विश्वास पाते ही सास की आत्मा को शांति मिली।
वे सब फिर से असीसते हुए ढोलक को कंधों पर लटका लौट पड़ीं।
पुनर्जन्म
———-
“मैंने बैलों को खुद निमंत्रण दिया है, अब वे मारने लगें तो दोष बैलों का तो नहीं।“
रवि ने बड़बड़ाकर हाथ में बँधी घड़ी की ओर देखा। तीन–साढ़े तीन के बीच का समय।
एक आधी उजियारी, आधी अँधेरी कोठरी में तख्त पर लेटा रवि। अजीब–सा कुछ… क्या? अनचीन्हा… अनजाना।
धूम्र गंध भी अजीब। एक रहस्यमय वातावरण में लिपटा सब कुछ। सामने बहुचरा माता की तस्वीर। कुछ भी देर में उसके हाथ से घड़ी भी हटा दी गई।
वह पूर्णतः नंग–धड़ंग लेटा है। सामने बहुचरा माता के पास घुटनों के बल बैठी दाई बुदबुदाकर शक्ति माँग रही है…अपने चाकू में…स्वयं में भी। रवि ठीक से कुछ नहीं जानता। बस, इतना जानता है कि उसके निर्वाण की तैयारी चल रही है।
वह भयभीत नहीं है। अचंभित जरूर है। साँस रोककर तख्त पर लेटे–लेटे ही सबके क्रिया–कलाप को परख रहा है।
“हे माता, सफल…।“
दाई की आधी बुदबुदाहट उस तक पहुँच रही है, आधी नहीं।
माता बहुचरा से शक्ति प्राप्त दाई किसी को भी अपनी कौम में शामिल कर सकती है, यह उसने सुन रखा था।
आज प्रत्यक्ष देखने का अवसर है। वह कुछ–कुछ बुदबुदाहट सुन पा रहा है, कुछ नहीं।
रवि के सामने अपनी माँ घूम रही है। माता बहुचरा बस अब आशीर्वाद देने को हैं। लेकिन उसकी जन्मदात्री उसकी आँखों के आगे क्यों छा रही है? उसको नहलाती माँ… उसको चलाती माँ… उसको हँसाती–गुदगुदाती माँ… पैंया–पैंया चलते बेटे पर इतराती माँ… दौड़ती–थकती माँ… वह बचपन की गलियों में क्यों भटक रहा है, यह रवि समझ नहीं पा रहा है।
उसे अपने कैशोर्य की माँ की भी याद है। बीस वर्ष के रवि की आँखों में पढ़ाती, समझाती, डाँटती, दुलराती माँ भी घूम रही है।
यौवन के द्वार पर कदम रखते ही रवि के निर्णय से अनजान पर उसके हाव–भाव के स्रियोचित गुण से चौंकती, बनाव–शृंगार के नवीनतम कल्पनातीत आडंबरों को परखती, बिंदी–टिकुली में उलझे व्यक्तित्व को जाँचती, पढ़ाई से उचट–उचट जाते ध्यान को लिपिस्टिक की पर्तों में लिपट जाते देखती हुई कभी चौंकनी, कभी घबराती कभी बहुत कुछ समझ जाती उसकी माँ…माँ क्यों याद आ ही रही है?
“हे बहुचरा माय, मुझे भी शक्ति दो। मैंने जो माँ के सपनों को रौंदकर यहाँ तक की दूरी तय की है, वह…।”
वह भी उनकी कुलदेवी से प्रार्थना करने लगा।
दाई माँ पास आ रही है…धीरे–धीरे।
‘अपनी माँ को दूर जाना चाहिए, जल्दी।‘ वह यही चाह रहा है।
लेकिन अपनी माँ ज्यों साँस रोककर पैर की आहट दबाकर उस तक आती थी, उसके हाथ–पैरों को टटोलती थी, उसके होठों की लिपिस्टिक को आँचल से धीरे से पोंछती थी। उसकी पायल को धीरे से खोलती थी… वैसे ही धीरे से हुई आ पहुँची फिर उसकी माँ।
उसने कसकर आँखें मींच लीं। जैसे माँ रेवा… हाँ, ‘रेवा‘ के आने पर मींच लिया करता था।
रवि के कपड़े उतरे हुए हैं… उसके गले में पड़ी चेन को, जिसे माँ ने उसके पन्द्रहवें जन्म–दिन पर दिया था, उतार दिया गया है। दाई माँ की सहयोगी उसके बाल काट चुकी है। उस पर जल छिड़ककर उसे शुद्ध किया जा चुका है।
उसे वे दोस्त भी याद आ रहे हैं, जिन्होंने उसकी हँसी उड़ा–उड़ाकर उसे पूरी तरह से शक्तिहीन कर दिया था। वे दोस्त भी जिन्होंने उसके स्त्रैण गुण पर कटाक्ष किया था। रवि को अपना लजाना–शर्माना सब याद आ रहा है।
पर आज क्रोध–शर्म–घृणा कुछ भी नहीं। सारे राग–द्वेष से ऊपर हो चुका है वह।
अब वह योगी हो गया है… निर्वाण प्राप्त कर नया जन्म पाएगा वह। बस, कुछ यादें हैं। टीसें मारना चाहती हैं। वह इजाजत नहीं देता।
वह संन्यासी हो गया है। काम–क्रोध से परे। विज्ञान का छात्र रवि नहीं जानता था, जिंदगी को क्या दिशा मिलेगी पर उसे अपने निर्णय पर अफसोस नहीं है।
उसने मरने की कोशिश भी तो की थी। हार गया था…नींद की गोलियाँ गटकनी थी बीस, दस में ही रुक गया था।
“माता… माता… माता बहुचरा!”
दाई के मुँह से आवाजें।
“माँ… माँ… ‘रेवा‘!” रवि के अंतरमन में आवाजें।
“मेरा निर्णय सही नहीं है माँ?”
फिर स्वगत,
“हाँ! सही है। मेरा निर्णय एकदम सही है।“
अब देवी बहुचरा के पास से उठकर दाई माँ उस तक आ गई है। बुद्बुदा रही है। आत्मविश्वास से भरी है।
और खच! खचाक! खच!
शांति…घनघोर शांति!
अनगढ़ जीवन…अप्रशिक्षित दाई माँ के हाथों एक ऑपरेशन और वह पुनर्जन्म को प्राप्त। एक पिन–सी चुभन…चीटियों के काटने–सी चुभन और बस।
शांति…घनघोर शांति।
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चालीस दिनों तक नव–प्रसूता–सा ध्यान रखा गया रवि का।
उसके बाद तीन बार नहलाया गया। महावर के रचाव से रवि के दोनों पैर खिल उठे। बचपन में जब माँ आलते से उसके पाँव रंग दिया करती थी, दादी उसके पैरों को चूमते–चूमते रुक जाती थी। कहती थी,
“बच्चों के तलवों को नहीं चूमना चाहिए, नहीं तो वे कभी नहीं चलते हैं।“
वह भी तो कुछ ही कदम चल पाया उनके साथ।
उसे नये कपड़े पहनाए जाने लगे। लाल गोटेवाली साड़ी, लाल छींटदार ब्लाउज। हाथों में लाल–पीली चूड़ियाँ, बालों में क्लीपें, बिंदी। और लिपिस्टिक की चाहवाले रवि को लिपिस्टिक भी लगाई गई।
माता बहुचरा की पूजा–अर्चना करते हुए वह अपनी माँ रेवा को अब उतनी शिद्दत से याद नहीं कर पा रहा था।
उसके सामने उसकी नई माता की तस्वीर थी और होंठों पर प्रार्थना। उसने आँचल से सिर ढंककर खड़ी अपनी गुरु चंपा की ओर देखा। साड़ी के आँचल से खोलकर गुरु को एक सौ पचास रुपये दिए।
साथ में अपनी पुरानी यादों से छुटकारा के लिए अपनी चेन भी दे दी। पैसों को सबमें बाँट दिया गया।
“बताओ तुम्हारी गुरु कौन है?”
“चंपा।“
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“र…।“
“बोलो, तुम्हारा नाम क्या है?”
“का… काज… काजल।“
निर्वाण के समय रखे गए नाम को बारंबार रटाया गया था उसे।
गुरु चंपा ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार किया। चंपा ने सर से आँचल खिसका उसे आशीर्वाद दिया।
“चंपा की चेली…चंपा की चेली। पान का पत्ता कहाँ है रे?” “जल्दी ला न चमेली।“
आवाजों के बीच पान का हृदयाकार पत्ता लाया गया। रवि के पास का हृदय गुम गया। वह जानता है, आज माँ या दादी या पापा ही देख लें उसे, उनका हृदय हाथों से बाहर चला जाएगा।
“पान के पत्ते पर पाँच रुपया रख और अपने गुरु को दे।”
रानी की कर्कश आवाज गूंजी। उसने तत्काल आज्ञा का पालन किया।
ढम।… ढम! नाच का नया दौर चला। सब झूमकर नाची। इक्कीस वर्ष की उम्र में रवि हिजड़ों की जमात में शामिल हो गया। स्वेच्छा से।
धीरे–धीरे सुबह का उजाला क्षितिज को लालिमायुक्त कर रहा था। उसी समय रवि…काजल के अंदर की दुनिया में कालिमा फैल रही थी। उधर पहले दिन का सूर्योदय, इधर मन के आकाश पर सूर्यास्त हो रहा था।
उस दिन उठते ही बहुत–बहुत रोया वह।
“आज चंपा काजल को उसका इलाका दिखलाने ले जाएगी।“
रानी ने कहा तो चंपा खुद भी तैयार होने लगी, रवि को भी किया।
पर चंपा का मन बारंबार उचाट हो रहा है। गोरी–चिट्टी, मर्दानी लंबाई की चंपा को वह कोठी याद आ रही है। वह दिन भी, जब वह पहली बार रानी, सिमरन, बेला और चंपा के साथ अपने इलाके में गई थी।
चंपा कभी नहीं भूलती कुछ। उसके जेहन में कैद उसका अपना बचपन जैसे छलांग लगाता कूद आया।
जन्मजात अधूरापन।
‘फिर भी क्या माता–पिता गले से लगाकर नहीं रख सकते थे।‘
‘चाहा ही नहीं होगा।‘
यह जन्मजात हिजड़ा जो थी।
यह काजल खुद ही रवि का चोला उतारने आ पहुँची थी पर चंपा को तो माँ–बाप खुद इन लोगों को सौंप गए थे।
‘क्या उस बड़ी–सी कोठी में तनिक जगह नहीं थी?’
‘परिजन ऐसा भी कर सकते हैं? सामाजिक भय ने उनके कर्तव्य को, उनके सहज स्नेह को, उनके ममत्व को परास्त कर दिया। वे कायरों की तरह भाग निकले?’
चंपा के मन पर अक्सर प्रश्नों की बौछारें घन–सा चोट पहुँचाती हैं। इस सत्य को अब तक पचा नहीं पाई है।
चंपा लगातार सोचे जा रही है। अचानक घृणा की एक लहर फिर उठी,
“आक थू! आक थू! मेरा जूती से…।“
फिर उसका ध्यान कानों में टॉप्स पहनती अनमने काजल की ओर मुड़ गया।
“रवि! यह तूने क्या किया? खुद काजल बन गईं?”
न चाहते हुए भी चंपा के मन में उठा। उस दिन की याद ताजा।
उस दिन रास्ते में जाती रानी और चंपा को रवि ने जा घेरा था।
“सुनिए… सुनिए। आपसे हमें बात करनी है।“
“आय–हाय! हमसे? हमसे बात करोगे छोकरे? डर नहीं लगेगा?”
“हाय! हाय! देखो तो…बित्ते भर का छोकरा और…हँसी–ठट्टा करोगे का?”
दोनों बारी–बारी से पूछने लगीं।
“अरेऽरे! नहीं–नहीं। अम्मा आप…।“
“अम्मा?”
चंपा साथ में थी। जोर से हँस पड़ी।
“छोकरे! काहे को हमारा टेम खराब करता है। अभी बोहनी का बेरा है। रस्ता मत काट। जा भाग ।”
हाथ नचाती रानी ने कहा तो बदलें में गौर से उन्हें देखकर उसी तरह हाथ नचाते हुए, लचक–लचककर वह अविचल आग्रह करने लगा कि वे उसे अपने अड्डे पर ले जाएँ। ले ही नहीं जाएँ, उसे अपनी जमात में शामिल भी कर लें।
“आय हाय तू भी?”
चौंकी दोनों।
चंपा ने नज़ाकत के साथ अपने खुले मुँह पर हाथ रखा।
“किसका चिराग है रे तू?”
“होगा किसी जनखे का।“
ऐसे लोगों के लिए रानी के मुँह से इसी तरह की गाली निकला करती थी।
चंपा रवि को खींचकर सड़क के किनारे लेती आई थी। उसने उसे समझना चाहा था।
“ई क्या निरनय लें रहे हो बच्चा?”
उसने स्पष्ट देखा था कि रवि की आँखों में आँसू की झिलझिलाहट है।
उसे उस समय भी अपने विगत की याद आई थी। उसने लाख पूछा था, रवि ने कुछ नहीं बताया। वह जान न पाई कि अपनी फटी बाँसवाली आवाज से उसने ही इस किशोर के जन्म पर बधाइयाँ गाई थीं।
यह बात वह आज भी नहीं जानती। पर पता नहीं क्यों, जब भी किसी नए हिजड़े को देखती, उसका मन बैठने लगता। और उसे अपनी कोठी याद आने लगती। खासकर तब से, जब से वह अपने जन्म का सच जान गईं थी। पर
माता–पिता, दादा–दादी की बेरुखी के बारे में जानकारी होते ही कसम धर ली थी चंपा ने कि कोठी की ओर पेशाब भी नहीं करेगी।
जिसकी यादों में वहाँ का कोई गलियारा, कमरा जरा भी शामिल नहीं है। उम्र ही इतनी कम थी। पर कसक में वह कोठी जरूर याद आती।
काजल बने रवि को लेकर गुरु चंपा नया पाठ सिखाने चल दी। उसे रास्ते भर समझाती गई,
“भूलकर भी किसी अन्य के इलाके में नहीं जाना।“
“क्यों ऐसा?”
“सबके अलग–अलग इलाके बँटे हैं।“
काजल सब काम आज्ञानुसार करने लगी। वह कभी कहीं जबरन बधाइयाँ गाने पहुँचती, कभी बुलावे पर। कभी अस्पताल से ही नए बच्चे के जन्म की खबर मिलती, कभी उसकी सहेलियाँ खबर लातीं। बाकी दिनों में वह दुकानदारों, हलवाइयों से उगाही करती।
किसी तरह पेट पल रहा था। इस बीच वह सबों के साथ दिल्ली, मेरठ, गुजरात, उड़ीसा में होने वाले समारोहों में भी भाग ले चुकी थी।
एक बार तो बुरी तरह मार भी खा चुकी थी। दोनों डेरे से साथ निकले। बीच में चंपा दूसरी ओर निकल गई, काजल दूसरी ओर। उसे पता नहीं चला, यह इलाका उसका नहीं। यह शुरू–शुरू की बात है।
वह एक दुकानदार के सामने लटके झटके दिखला ढोलक पर थाप मार कुछ माँग ही रही थी कि कई हिजड़ों ने घेर लिया। लात–जूतों की वर्षा होने लगी। सबने पकड़कर उसके गजभर हो गए बालों को उस्तरे से मुड़ दिया। फुदने के साथ अलग पड़ी चुटिया को देखकर काजल पिटाई का दर्द भूल गई।
“इसे समझा दे, इधर का रुख नय करे। नय तो लातम–जुत्तम से पीठ पुजाई कर देंगे।“
एक ने कहा, दूसरी भी पीछे नहीं रही,
“अपना इलाका छोड़ इधर काहे आई? हम कभी जाते हैं?”
सबने उसे चंपा के हवाले करते हुए समझाया था। सबने उसकी गुरु चंपा से उसे परंपरागत सजा देने की बात कही थी।
पर चंपा का काजल के प्रति सहज लगाव ने उसे सजा देने नहीं दी। बल्कि रात को लहसुन तेल में पकाकर चंपा उसके चोटिल अंगों में मालिश करती रही। हल्दी पकाकर चूने के साथ मिलाया और थोप दिया। कई दिनों तक काजल कहीं नहीं जा सकी थी।
फिर काजल ने कोई गलती नहीं की थी।
माता बहुचरा देवी के मंदिर में दर्शन के लिए रानी चंपा और काजल अहमदाबाद गईं। अहमदाबाद में माई बहुचरा का मंदिर देखकर काजल अचंभित। काजल के मन की आसक्ति, प्रेम सब देवी के सामने जाते ही खो गया। माता की आराधना में घंटों प्रार्थनारत रह जब वह उठी, अजीब–सा सुकून का अनुभव होता रहा।
उसने गौर किया, तब से वह और भी विरक्त होती जा रही है। न उसे कोई नर आकर्षित कर पा रहा है, न ही नारी। किसी पर नजर पड़ती भी तो वह एक तटस्थ नजर होती। राग–विराग से परे !
एक बार किसी ने पूछा,
“आपकी जात क्या है? कौन–सा धर्म मानते हैं आप लोग?”
“धरम?… जाति?…हम इन झमेलों में नहीं पड़ते। हमारा कोई धरम नहीं, कोई जात नहीं।”
“हम न हिंदू हैं, न सिक्ख। न मुसलमान, न इसाई। और इसीलिए हम सब इंसान हैं।“
यह चंपा थी। सब रेल से यात्रा कर रहे थे कि सामने की सीट पर बैठे कई युवकों में से एक ने पूछा था काजल से परन्तु जवाब चंपा ने दिया।
रानी को पता नहीं क्यों, लोगों के अनावश्यक सवालों, अनावश्यक उत्सुकता से बहुत नाराज़गी होती। वह सीट पर आलती–पालथी मारकर बैठी थी। एक पैर नीचे रखते हुए चिंघाड़ी,
“हम सिरफ हिजड़ा होते हैं और कुछो नई। हमको धरम–करम, जाति में मत बाँध।“
काजल के कान बजते रहे। करीब दस–बारह साल के बाद उसे तुलसी चौरा पर दीपदान करती दादी, शाम को संझा दिखलाती माँ याद आई। सूर्य को अर्घ्य देते पिता भी।
बरसों बाद उसने अँधेरी कोठरी में पड़ी संदूकची से जनेऊ निकाला था और उसे घंटों सहलाती रही थी।
कब से छिपाकर रखा गया जनेऊ उसके सहलाने की अदा से इठलाकर ऐंठने लगा। लौटते ही पहला काम यही किया उसने।
“ये क्या काजल ? हम किसी धर्म–जाति के बंधन में नहीं बँधे रहते।“
आगे समझाया,
“इसी से तो हमारे लिए सब लोग समान हैं। जो लोग धर्म–कर्म करते रहते हैं, वे ही मरने–मारने की बात में ज्यादा उलझते हैं।“
थोड़ा पढ़ी–लिखी बिंदिया ने उसे टोका।
चंपा आगे बढ़ आई और उसकी पीठ पर हाथ रखा।
“अरे ! इसको तो खूब ताप चढ़ आया है री? कल से ही थोड़ा बोखार था।“
बुखार पर पाँच दिन तक पारासीटामोल ने समय–समय पर राज किया, अंततः हार मान ली। जब तक उसे डॉक्टर को दिखलाने का निर्णय लिया जाता, हिचकी. .. हिचकी पर हिचकी।
जल समाधि
————–
काजल का शव आँगन में पड़ा था। चारों ओर घेरकर खड़ी सहेलियाँ रात होने का इंतजार कर रही हैं। बाहर लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बज रहे हैं।
कल सरस्वती पूजा थी। आज मूर्तियों का विसर्जन होना है। सभी चिंतित,
“ऐसे में लाश को छिपाकर ले जाना कैसे संभव होगा?”
उनकी परंपरा के अनुसार उसे रात के अँधेरे में खड़े ही खड़े ले जाना था। कोई देख लेता तो वह अमीर बन जाता।
इस धारणा के कारण असंमजस की स्थिति में पड़ी रानी ने अंततः एक रास्ता ढूँढ निकाला,
“हमलोग देर रात को जाएँगे।“
“हाँ! अभी तो शाम ही है। सभी लोग नदी पर ही होंगे।“
चंपा भी राजी।
काजल की मृत देह को न जलाया जा सकता था, न गाड़ा। उसे बस जल में समाधि दी जा सकती थी। परंपरा के निर्वाह के लिए उन्हें आठ–साढ़े आठ बजे रात तक इंतजार करना पड़ा।
“बाहर गाजा–बाजा का आवाज कम हो गया है। भीड़ भी नहीं है।“
चमेली बाहर गली में खड़ी थी। लौटकर चंपा और रानी को बताया।
“थोड़ा देर में एकदम सुनसान हो जाएगा। तब चलना।“
रानी की बात कोई नहीं उठाता है। बेला, सिमरन तैयारी करने में व्यस्त।
रात और गहराई। सबने शव पर लात–जूतों की वर्षा करते हुए काजल की मृत देह बाहर निकाली। रहस्यमय चुप्पी! बस बुदबुदाहट रानी के होठों की,
“फिर ई जनम न पाना…अगले जनम में पूरा होना, अधूरा नहीं।…जा बेटी, जा।“
रानी ने अपनी चप्पल खोली। दनादन शव पर वार करने लगी। परंपरा वह कैसे छोड़ दे। चंपा ने भी वैसे ही चप्पल से मारते हुए उसका अनुसरण किया। शव यात्रा के साथ सभी नदी की ओर बढ़ चलीं।
तट पर पहुँचते ही खड़ी लाश को जल समाधि दी गई। सबने धीरे–धीरे मृत काजल को जल में समाते देखा। जल में हिलोरे उठीं। उन सबके मन में भी। एक दिन उन सबका यही हाल…
ठीक उसी समय एक रिक्शा उधर से गुजरा। संबंधी के घर से रेवा अपने पति के साथ लौट रही थी।
“कल सरस्वती पूजा थी न?”
“हाँ रेवा! भूल गई?”
“याद है, हमने रवि की खल्ली छुआई कितनी धूमधाम से की थी?”
“हाँ! अभी वह कहीं नौकरी कर रहा होता। पता नहीं, कहाँ गया? कहाँ होगा अभी?”
कसक पिता के मन में भी कम नहीं।
वे चौंक पड़े अचानक।
“अरे! देखो तो…”
“लगता है, किसी मूर्ति का भसान कर रहे हैं लोग।“
कहते ही रेवा का उन्मादी अट्टहास जल तरंगों को दहला गया।
उधर संन्यासी जल–समाधि ले चुका था।
प्रिय अनिता
आपकी कहानी पुनर्जन्म पढ़ी। थोड़ी वीभत्स लगी।
बहुचरा माता वाली बात समझ में नहीं आई। इस देवी का नाम पहली बार सुना।
किसी भी माँ के लिये यह स्थिति बड़ी दर्दनाक होती है।
कहानी को पढ़कर ऐसा ही लगा कि ईश्वर या तो जन्म न दे पर अगर दे तो सही -सही हालत में दे। ऐसा लगा कि कहानी लिखने के पूर्व काफी खोजबीन की गई है।
इस परिश्रम के लिये बधाई।
आप बहुत गहराई से समझकर प्रतिक्रिया देती हैं नीलिमा जी.
बहुचरा माई हिजड़ों की आराध्या हैं. अहमदाबाद में मंदिर है।
हाँ, काफी अध्ययन के पश्चात् लिखी गई है.. सस्नेह धन्यवाद!