Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – भारतीय भाषाओं और संस्कृति का वैश्विक योगदान

समस्या यह हुई कि विश्व तो आगे बढ़ता चला गया, मगर भारत पर लगभग एक हज़ार साल तक विदेशी राज करते रहें, और भारतीय संस्कृति और ज्ञान कहीं ओझल होता चला गया। हम एक अजीब सी गंगा-जमुनी सभ्यता के बारे में पढ़ते रहे, और भारतीय संस्कृति को भूलते चले गए। जब हमें ही अपनी संस्कृति की कोई बात याद नहीं रहेगी, तो हम उसे वैश्विक स्तर पर स्थापित कैसे कर सकते हैं?

चीनो अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा
रहने को घर नहीं है, सारा जहां हमारा
– साहिर लुधियानवी
मित्रों, ऑनलाइन ज़ूम वेबिनारों की एक समस्या है कि उसमें वक्ता विषय पर बहुत कम बोलते हैं। अधिकतर वे वही बोलते हैं, जो वे बोलना चाहते हैं। उपरोक्त विषय पर आयोजित एक ऑनलाइन संगोष्ठी में अधिकांश वक्ता यह बताते रहे, कि भारतीय संस्कृति कितनी पुरानी है, और भारतीय भाषाएँ कितनी महान हैं। वे विषय के मुख्य मुद्दे तक पहुँच ही नहीं पाए, कि दरअसल भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति का वैश्विक योगदान है, या नहीं है। 
जब कभी हम किसी भी विषय पर बात कहना चाहते हैं, तो उसके दो पहलू अवश्य होते हैं। एक पहलू होता है आँकड़ों का और दूसरा होता है व्यवहारिक, यानि कि ज़मीनी सच्चाई। आँकड़े पढ़ कर हम ख़ुश हो सकते हैं, और ज़मीनी हक़ीकत हमें व्यवहारिकता से जोड़े रखती है। 
जब हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति के वैश्विक योगदान के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमें याद आते हैं कवि इंदीवर, जिन्होंने मनोज कुमार की फ़िल्म ‘पूरब और पश्चिम’ के लिए एक गीत लिखा था – “जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने / भारत ने मेरे भारत ने / दुनिया को तब गिनती आयी / तारों की भाषा भारत ने / दुनिया को पहले सिखलायी।देता ना दशमलव भारत तो / यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था / धरती और चाँद की दूरी का / अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।
कवि इंदीवर यहीं नहीं रुक जाते, वे भारत की प्राचीन सभ्यता का ज़िक्र भी करते हैं, सभ्यता जहाँ पहले आयी / सभ्यता जहाँ पहले आयी / पहले जनमी है जहाँ पे कला / अपना भारत वो भारत है / जिसके पीछे संसार चला / संसार चला और आगे बढ़ा / यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया।
समस्या यह हुई कि विश्व तो आगे बढ़ता चला गया, मगर भारत पर लगभग एक हज़ार साल तक विदेशी राज करते रहें, और भारतीय संस्कृति और ज्ञान कहीं ओझल होता चला गया। हम एक अजीब सी गंगा-जमुनी सभ्यता के बारे में पढ़ते रहे, और भारतीय संस्कृति को भूलते चले गए। जब हमें ही अपनी संस्कृति की कोई बात याद नहीं रहेगी, तो हम उसे वैश्विक स्तर पर स्थापित कैसे कर सकते हैं?
मुझे निजी तौर पर कोस्टा कॉफ़ी और स्टार बक्स में जाकर भारतीय परंपरा के बारे में ज्वलंत उदाहरण मिला। मुझे याद आया अपना बचपन और माँ का गर्म दूध में हल्दी डाल कर पिलाना। आज के मॉडर्न ज़माने में वही हल्दी वाला गर्म दूध कोस्टा कॉफ़ी में पाँच पाउंड का एक गिलास मिलता है, जिसे ऐंठती हुई अंग्रेज़ी में कहा जाता है – ‘टरमर्रिक लाते!’ शायद आपको जान कर हैरानी होगी कि आज ब्रिटेन के रेस्टॉरेंटों में सबसे अधिक बिकने वाली डिश होती है – ‘चिकन टिक्का मसाला!’ भारत में चिकन मसाला होता था, और यहाँ चिकन टिक्का। मगर पूर्वी लंदन के एक बांग्लादेशी शेफ़ ने इस नए व्यंजन का आविष्कार कर डाला। 
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यदि रहा है, तो तिब्बत, चीन, जापान, म्यांमार, थाईलैंड जैसे देशों में बौद्ध धर्म का पहुँचना, और वहाँ का राष्ट्रीय धर्म बन जाना। महात्मा बुद्ध को ज्ञान तो ‘गया जी’ में मिला, मगर उनकी बातों को मानने वालों की संख्या विदेशों में भारत से भी अधिक है। 
दरअसल भारत में ही भारतीय परंपरा या संस्कृति, स्वतंत्रता के बाद से लगभग लुप्त होती जा रही है। अब भारत में भारतीय संस्कृति का स्थान ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ ने ले लिया है। तथाकथित गंगा-जमुनी संस्कृति ने कब भारतीय संस्कृति को अपदस्थ कर दिया, भारतीयों को कुछ पता ही नहीं चला। 
पाकिस्तान में जन्में और कनाडा में रहे पत्रकार तारक फ़तह ने भारतीय संस्कृति पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “भारत एकमात्र पुरातन सभ्यता वाला देश है, जहाँ आपको व्यवस्थित रूप से अपनी विरासत से नफ़रत करना… और उसे नष्ट करने आए आक्रमणकारियों का महिमामंडन करना सिखाया जाता है, और इसी मूर्खता को धर्मनिरपेक्षता कहते हैं।” 
मगर ऐसा कुछ तो है, जो इन हज़ार सालों के बाद भी हमारी संस्कृति को मिटने नहीं देता। आज भी योग, आयुर्वेद, दर्शन, कला, संगीत, नृत्य, और साहित्य के माध्यम से विश्व में हमारी संस्कृति की धाक महसूस की जा सकती है। 
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। दरअसल 21 जून उत्तरी गोलार्द्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है, और योग भी मनुष्य को दीर्घायु बनाता है। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 177 सदस्यों की सहमति के साथ 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली।
यह सर्वमान्य तथ्य है कि अंग्रेज़ी दवाइयां किसी मर्ज़ का इलाज करने में सक्षम नहीं हैं। वे केवल लक्षणों पर नियंत्रण कर सकती हैं। जबकि आयुर्वेदिक दवाइयां मर्ज़ का जड़ से इलाज करती हैं। भारत में स्वतंत्रता के बाद एम्स तो बहुत खुले हैं, लेकिन आयुर्वेदिक संस्थानों के बारे में केवल सवालिया निशान लगे हुए हैं। जब तक हम भारतीय संस्कृति और परंपरा को वर्तमान से नहीं जोड़ेंगे, तब तक भारतीय संस्कृति का विश्व में कोई विशेष योगदान नहीं हो पाएगा। 
फ़िजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका आदि कुछ ऐसे देश हैं जहाँ गिरमिटिया मज़दूरों को भारत से एक एग्रीमेंट के तहत ले जाया गया था। आज वहाँ भारतवंशी भारतीय संस्कृति के साथ न केवल रह रहे हैं, बल्कि भारत से अधिक भारतीयता के साथ वहाँ की सरकार भी चला रहे हैं। इंडोनेशिया की राजकुमारी आज भी अयोध्या के राम मंदिर के दर्शन करने आती है, जबकि भारत के राजनीतिक दलों के नेता वहाँ जाने से परहेज़ करते हैं। 
कुछ मित्रों का मानना है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और अमेरिका की उपराष्ट्रपति का भारतीय मूल का होना भी भारतीय संस्कृति की विश्व को देन है। मेरा मानना है कि यह ब्रिटेन और अमेरिकी समाज और राजनीति की महानता है, कि वे भारतवंशियों को भी समान अधिकार एवं अवसर प्रदान करते हैं। उन्हें भारतीय होने के कारण प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया, और न ही उन्होंने भारत के एजेण्ट के तौर पर कोई काम किया है। वे पूरी तरह से ब्रिटिश और अमेरिकी नागरिक हैं और वहाँ के नियमों के हिसाब से चुनाव जीतते हैं। 
अब बात करेंगे भाषा की। तो मित्रों, भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची के अनुसार, भारत की दो आधिकारिक भाषाएँ (हिंदी और अंग्रेज़ी) एवं 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं – असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू। किंतु इन 24 भाषाओं में से एक भी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। यानि कि भारत की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। 
अब समस्या यह है कि इनमें से कोई भी एक भाषा, भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है और न ही संसद की मुख्य भाषा है। भारतीय संसद की मुख्य भाषा आज भी अंग्रेज़ी ही है। यदि हमारे देश की कोई एक भाषा राष्ट्रभाषा नहीं है, तो भला कोई भी भारतीय भाषा विश्व में कैसे योगदान करने की क्षमता रख सकती है। 
हाल ही में महाराष्ट्र का नज़ारा पूरी दुनिया ने देखा कि हिंदी बोलने पर मुंबई और पुणे में भारतीय नागरिकों को कैसे थप्पड़ खाने पड़े। विश्व को यह संदेश अवश्य पहुँचा है कि भारत में हिंदी बोलने पर मार पड़ती है। इसलिए बेहतर यही है कि वहाँ जाकर अंग्रेज़ी में ही बात की जाए। इस तरह उनकी बात भारत की संसद भी समझेगी और राजनीतिक दल भी। 
भारत के अधिकांश सांस्कृतिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। दक्षिण में तमिल भाषा में भी कुछ ग्रंथों के बारे में जानकारी मिलती है। हमारी ज्ञान परंपरा ही हमारी संस्कृति है। यानि कि भारत की संस्कृति को यदि हमें पूरी तरह समझना है, तो संस्कृत भाषा की जानकारी ज़रूरी है। अन्यथा हम अपनी संस्कृति भी अनुवाद के माध्यम से ही सीख पाएंगे। 
हमें यह समझना होगा, कि पूरे विश्व में वैश्विक भाषा केवल एक ही है। ऐसा नहीं कि हमेशा यही स्थिति रहेगी। स्थितियाँ बदलती हैं, हालात बदलते हैं, देश बदलते हैं। जो स्थान आज अंग्रेज़ी का है, कल किसी अन्य भाषा को मिल सकता है। यदि हम भारतीय चाहते हैं कि वह स्थान हिंदी या किसी अन्य भाषा को मिले, तो इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी… केंद्रित प्रयास। 
इस संपादकीय के लिखने तक, हम सुबह से रात तक, जिन-जिन वस्तुओं का उपयोग करते हैं, उनमें से किसी का भी भारतीय संस्कृति या ज्ञान-परंपरा से कुछ भी लेना-देना नहीं। हमारी भाषाओं में कानून, मेडिकल, इंजीनियरिंग, एरोनॉटिकल साइंस आदि-आदि विषयों के सटीक ग्रंथ उपलब्ध नहीं हैं। वर्तमान दौर में  इस्तेमाल की जाने वाली किसी भी तकनीक का विकास भारतीय संस्कृति या ज्ञान से नहीं जुड़ा है। यह भारत सरकार का दायित्व है कि भारतीय संस्कृति को एक बार फिर प्रासंगिक बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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50 टिप्पणी

  1. हर बार की तरह आपका एक और विचारोत्तेजक संपादकीय जो कड़वी हकीकत बयां करता है।
    स्वार्थगत और कुटिल राजनीति देश को हर मोर्चे पर विखंडित कर रही है।

  2. अभी पिछली ही बातों को उठा रहे थे तब तक इसे भी उठाने का समय हो गया –

    साधुवाद-साधुवाद

  3. वाह क्या खूब,संपादकीय लिखा है।साहिर लुधियानवी के तंज़ से बात की शुरुआत की। इंदिवर को साथ कर भारतीय सभ्यता और संस्कृति की गहनता और महानता को इंगित करते हुए ,विदेशी आक्रांताओं और उनके द्वारा इतिहास के साथ छेड़छाड़ और अन्याय को केंद्र
    में रखकर पड़ताल करता बढ़िया संपादकीय।
    विदेशियों के षडयंत्र और गंगा जमुनी तहज़ीब की ख़बर लेते हुए एक जन जागरण करता संपादकीय आलेख।
    हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

  4. विश्व के पटल पर भले ही भारत का पर्याय हिन्दी को माना जाता है, लेकिन हम अपने ही देश में अपनी भाषा निश्चित नहीं करने दे रहे हैं। भारत में भी हिंदी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है लेकिन जो विरोध कर रहे हैं, वे अपनी भाषा के प्रति समर्पित नहीं हैं। राजनीति के दलदल में आकण्ठ डूबे हुए किसी के प्रति निष्ठावान नहीं हैं।
    हम अपने राष्ट्र में ही राष्ट्रभाषा हिन्दी को सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। अपनी पहचान विश्व में क्या बना पायेंगे। विश्व हमें अग्रणी देखने के लिए तैयार है लेकिन हम अपने ही देश में अपमानित किए जा रहे हैं। संस्कृत देवभाषा कही जाती है क्योंकि सबसे प्राचीन संस्कृति अंकित है और उसके बाद वह हिंदी में लाई गई। उसे विश्व में उसी रूप में ले जाना है तो इसी रूप में लेना होगा।

    • रेखा जी आपने संपादकीय के भाषा वाले हिस्से पर अपनी राय रखी है। बहुत शुक्रिया।

  5. तारक फ़तह साहब की भारतीय संस्कृति पर टिप्पणी सही लगाती है। आजादी के बाद व्यवस्थित रूप से अपनी विरासत से नफ़रत करना सिखाया गया, बुनियादी स्तर भारतीय संस्कृति / सभ्यता को नष्ट करने आए आक्रमणकारियों का महिमामंडन करना सिखाया गया, धर्मनिरपेक्षता के आड़ में भारतीय तथा सनातनी सभ्यता को कुचल दिया गया और एक अजीब सी गंगा-जमुनी सभ्यता को थोप दिया गया। आपने ठीक ही कहा है, “जब तक हम भारतीय संस्कृति और परंपरा को वर्तमान से नहीं जोड़ेंगे, तब तक भारतीय संस्कृति का विश्व में कोई विशेष योगदान नहीं हो पाएगा”। बड़ी दुःख की बात है कि आजादी के 78 साल बाद भी भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और राजभाषा के रूप में हिंदी का जो प्रावधान था 1976 अधिनियम में अंगरेजी के पिछलगू के रूप में मान्यता दे दी गई। हिंदी आज जीवित है इसके संचार और संपर्क गुण के कारण। NEP2020 में त्रिभाषी नीति कोई नई बात नही है, 1986 के कोठारी आयोग में भी थी लेकिन ठीक से लागू नहीं हो पाई। आज भाषा को ले कर जो स्थिति देश में है, ऐसे में विश्व को यह संदेश पहुँचना लाजमी है कि भारत में हिंदी बोलने पर मार पड़ती है, बेहतर यही है कि वहाँ जाकर अंग्रेज़ी में ही बात की जाए। हमारी ज्ञान परंपरा की भाषा संस्कृत रही है। भारतीय संस्कृति को जानने के लिए संस्कृत भाषा जाननी चाहिए ताकि मौलिक ग्रंथों से सीधे ज्ञान प्राप्त कर सकें। अब भारत में बी.जे.पी. शाषित कई राज्यों में नई शिक्षा नीति लागू के चलते मेडिकल, इंजीनियरिंग, पुस्तकों का हिंदी / क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद हो रहा है। अब भारत सरकार को चाहिए कि भारतीय ज्ञान संपदा और संस्कृति को प्रासंगिक बनाकर व्यापक स्तर पर प्रसारित करे।
    संपादकीय में कई मुद्दों को उठाया गया है जो बहुत ही प्रासंगिक लगते हैं। धन्यवाद।

    • भाई जयंत कर शर्मा जी, हिन्दी भाषा को लेकर भारत सरकार की ना तो कोई नीति है और ना ही नीयत। आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  6. आत्मविश्लेषण को विवश करने वाला संपादकीय। सच गंगा जमुनी तहजीब के प्रचार प्रसार के कारण गंगा अपने मूल गुणों से दूर होती गई। वर्षो की गुलामी ने भारतीयों को अपनी भाषा और संस्कृति से दूर कर दिया। आपने सही कहा है कि भारत से बाहर गये लोगों ने भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण रखा जबकि स्वयं भारतीय छदम धर्मनिरपेक्षता आड़ में स्वयं अपनी संस्कृति से दूर होता गया।
    व्यक्ति के रुप में मैं स्वयं पूरब पश्चिम के गाने को गुनगुनाती रही किन्तु मूल भावना को समझ नहीं पाई। ज़ब 2009 में शिकागो के स्वामिनारायण मंदिर में गईं तब वहां लिखा पाया कि आर्यभट ने जीरो की खोज की थी। गणित के अतिरिक्त स्पेस, शल्य चिकित्सा में भी भारत में पहले खोज हुई, यह बात भी वहां उद्धृत थी।

    मैं यहाँ यह भी बताना चाहूँगी कि दरअसल 628 ईस्वी में भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने पहली बार शून्य और उसके सिद्धांतों को परिभाषित किया, इसके पश्चात महान गणितज्ञ तथा खगोलविद आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली में शून्य का उपयोग किया।

    यहाँ तक कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं…

    “हम पर भारतीयों का बहुत बड़ा कर्ज है जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया, जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती थी।”

    बस हम भारतीय ही अपनी परंपराओं को सहेज नहीं पाये।

    चिंतन मनन तथा विश्लेषण के लिए के लिए विवश करते संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी, आपने संपादकीय के भारतीय संस्कृति वाले हिस्से पर बेहतरीन टिप्पणी लिखी है। विश्व के महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन की टिप्पणी उद्धृत करके भारतीय संस्कृति और विज्ञान का पाठकों को सही परिचय दिया है।

  7. पुरवाई पत्रिका का संपादकीय-” भारतीय भाषाओं और संस्कृति का वैश्विक योगदान” पर केंद्रित है। भारत का नागरिक संस्कृति को भूलता जा रहा है। ये आक्षेप अधिकतर हम पर लगते रहे हैं या लगाए जाते रहे हैं। इसमें सच्चाई भी है।
    इतिहास के साथ संस्कृति चिपकी हुई चलती है। हम इतिहास पढ़ते हैं और उस इतिहास में हमने क्या कमियां की है और क्या अच्छा किया है इस पर जरूर सोचते हैं। वर्तमान में उन कमियों की पुनरावृत्ति न हो उस पर गहन सोच-विचार भी करते हैं।
    इस विविधता भरे देश में एक जैसा होना संभव नहीं है। सभी की काॅमन चीजों को लेकर एकता की रस्सी मजबूत की जाती रही है। भारतीय संस्कृति सामासिकी संस्कृति रही है। इस संस्कृति में समय-समय पर उतार चढ़ाव आए हैं।
    भारत पुरानी सभ्यता का देश है। इस सभ्यता ने दुनिया को दर्शन, अध्यात्म, चिकित्सा के साथ वैज्ञानिक आविष्कारों से विश्व को परिचित कराया। इंदीवर जी का लिखा गीत भी इस बात की तस्दीक करता है जिसे आपने संपादकीय में कोट किया है।
    बौद्ध काल में शुरू हुए ये आविष्कार चरम पर पहुंचकर उसने मानवता के लिए नए दरवाजे खोले हैं। भारत में बौद्ध काल के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग के आविर्भाव के साथ इसमें गिरावट देखने को मिलने लगी थी। इसके बाद देश गुलामी के भंवर जाल में ऐसा फंसा कि उबरने में उसे हजारों साल लग गए। लेकिन भारतीय संस्कृति अपने वजूद को बचाने में सफल बनी रही। इस संस्कृति की मुख्य विशेषता है कि यह थोड़े में ही अपना गुजारा कर लेती है। छोटे से कमरे में, बिस्तर में, मां के लाड़-प्यार में, हल्दी वाले दूध में, रसोई घर में, कपड़ों में, तीज-त्योहार में ,शादी ब्याह में, यहां तक की मृत्यु में भी अपने अस्तित्व को बचाए रखती है। बलात् हटाए जाने पर भी यह हमारे भीतर कहीं न कहीं से साबुत निकल आती है। हम भूले-बिसरे लोग तो ऐसे ही है। हम संस्कृति को नहीं पालते हैं, संस्कृति हमें पालती है।
    वर्तमान में यह प्रश्न हमेशा उठता है कि भारत की राष्ट्रभाषा कौन है? जब घोषित ही नहीं है तो इसका उत्तर मौन के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इसके उत्तर अक्सर राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं। मुझे लग रहा है कि ऐसा होता रहेगा। इसका हल अंतहीन है। अब तो केवल हिन्दी से ही आशा है कि एक दिन वह स्वयं राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो जाए। वैसे हिन्दी ने अभी तक अपने आपको साबित किया भी है। साहित्य तो हिंदी में बहुतायत में और बहुत से लोगों द्वारा लिखा जा रहा हैं। हिन्दी को अधिकांश लोग बोल रहे हैं, समझ रहे हैं। टीवी, सिनेमा आदि से लोग मोटी कमाई कर रहे हैं। सुना है कि व्यापार हेतु विदेशी लोग भी हिन्दी में रुचि दिखा रहे हैं। वह लगातार अपने को विस्तृत कर रही है। इसी से संकुचित मानसिकता के लोगों के पेट ऐंठ जाते हैं। साहिर लुधियानवी जी ने ऐसे ही लोगों के लिए लिखा था ( आपने शुरुआत में कोट किया है) ।
    फिलहाल भाषा को लेकर राजनीति करना, मार-पीट पर उतारू हो जाना, बेफिजूल की बयानबाजी करना बिलकुल अच्छी बात नहीं है। इसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
    भाषा विवाद इस समय खूब उछाला जा रहा है। अब तो समय ही बताएगा कि लोग इसे किस तरह से ले रहे हैं।
    इस विषय पर संपादकीय लिखना चुनौतीपूर्ण रहा होगा,पर इसे आपने लिखा यह बड़ी बात है। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं सर।

  8. भाई लखनलाल पाल जी आपने भारतीय संस्कृति की इतनी ख़ूबसूरत तस्वीर पेश की है कि पुरवाई के पाठक संपादकीय को और अधिक गहराई से समझ पाएंगे। आपको हार्दिक धन्यवाद।

  9. जितेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय ने तो उस दुखती नस को, जिस के दर्द को हम सब भूल गए थे, दबा कर उस छुपे हुए दर्द का एहसास करा दिया है जिसका इलाज बहुत पहले शुरू हो जाना चाहिए था। इसके लिए जितनी बार भी साधुवाद दिया जाए, बहुत कम है। एक हज़ार साल की ग़ुलामी ने तो को नुक्सान किया वो तो बात समझ में आती है क्योंकि देश ग़ुलाम था। लेकिन 1947 के बाद तो जो नुक्सान हुआ है उसके लिए तो उस समय के नेता ज़िम्मेवार हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो लोगों को बेवकूफ़ बनाकर अपनी गद्दी कायम रखी, उस मूर्खता की वो नेता ज़िन्दा मिसाल हैं।
    आज ए.आई. के ChatGPT और PERPLEXITY से मैं ने सवाल किया कि “वैज्ञानिक दृष्टी से विश्व की सर्व शुद्ध भाषा कौन सी है?” उन दोनों के उत्तर पढ़कर मैं एक बार तो ख़ुशी से पागल हो गया क्योंकि दोनों ने “संस्कृत” को ही इस श्रेणी में बताया।
    ChatGPT का कहना है कि: Computational linguistics (कंप्यूटर भाषाविज्ञान) में भी संस्कृत को एक “machine-friendly” भाषा माना गया है। NASA के एक शोध पत्र में यह दावा किया गया था कि संस्कृत “most unambiguous” भाषा है।
    PERPLEXICITY का कहना है कि: विभिन्न भाषाविदों और अध्ययनों के अनुसार संस्कृत को “सर्वाधिक शुद्ध” या “spiritually/linguistically pure” भाषा के रूप में मान्यता दी गई है। अंतरराष्ट्रीय शोध और संस्कृत पर केंद्रित कई वैज्ञानिक अध्ययनों में इसे spiritually pure और scientifically structured बताया गया है।

    इस सब के बावजूद भी, दूसरी ओर, भारत के अधिकाँश पढ़े लिखे, संस्कृत को तो छोड़ो, हिन्दी में भी बात करने में अपनी तौहीन समझते हैं।

    आपने अंग्रेज़ी और आयुर्वेद इलाज की तुलना की है। मुझे भी कैनेडा में साठ साल से ऊपर हो गये हैं। अभी तक, भारत के आयुर्वेद के मुकाबले में, यहाँ का जो मैडिकल सिस्टम है वो अपने आप में बहुत यूनीक है। जैसा आपने लिखा है, यहाँ मरीज़ को मरने तो नहीं देंगे, लेकिन उसकी बीमारी को ठीक भी नहीं करेंगे और सारी उमर के लिये दवाई पर ड़ाल देंगे। मेरे एक मित्र long term care में हैं जहाँ उनको बीस गोलियाँ रोज़ खानी पड़ती हैं। बीमारी को जड़ से उख़ाड़ने का जो concept आयुर्वेद में है, वो अंग्रेज़ी इलाज में नहीं है।
    काश ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाली कहावत लोगों के दिल और दिमाग़ पर घर कर जाए और हम इस ‘गँगा-जमुनी’ तहज़ीब को छोड़ कर भारीय भाषा और संस्कृति को वैश्विक बनाएँ।

    • विजय भाई अपने दिल का दर्द आपने शब्दों में उंडेल दिया है। आपके शहर के तारक फ़तह ने स्थिति को ख़ूबसूरती से समझाया है। आपका दिल से शुक्रिया।

  10. अत्यंत महत्वपूर्ण विचार एवं चिंतन। हम सबकुछ समझते हैं पर फिरभी कुछ नहीं समझते.. क्या बिगड़ जाएगा यदि हमारी संस्कृति लुप्त भी हो जाएगी… सर हमारे देश में अपनी मातृभाषा में पढ़ना लिखना भी low grade समझा जाने लगा है… अंग्रेजी में बात करना केवल फैशन नहीं बुद्धिमता का प्रतीक बन चुका है…
    आपका कहा संपूर्ण सत्य है… हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है.. और यदि हिंदी को राष्ट्रभाषा की मान्यता देने में हीन राजनीति चलती रहेगी तो… एकदिन ऐसा आएगा आज की पीढ़ी अपना अस्तित्व खो बैठेंगे… साधुवाद

    • अनिमा जी आपका दुःख समझ सकता हूं। इस विषय पर मेरे संवेदनाएं आपके साथ हैं।

  11. हमेशा की तरह आपका संपादकीय प्रभावशाली है।इस बार भी बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है।साधुवाद।

  12. विचारणीय विषय पर ज्ञानवर्धक एवं आँखें खोलने वाली जानकारी,। हार्दिक धन्यवाद।

  13. आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर आपकी हर संपादकीय का कोई जवाब नहीं,लाजवाब होती हैं
    दरअसल भारतीय संस्कृति की जड़े इतनी गहरी और मजबूत है कि दुनिया लाख कोशिश कर ले उन्हें पूरी तरह उखाड़ ही नहीं सकती, यह वह बरगदी जड़े हैं जो सिर्फ जड़ों में ही व्याप्त नहीं रहती बल्कि तने और शाखों और पत्तों से भी निकल कर सभी दिशाओं में फैल सकती है,
    सबसे मजबूत उदाहरण लोग कभी भी अपने ईश्वर को नहीं भूलते, वह जिस भी धर्म में हो उनके अपने ईश्वर की एक छवि होती है उसका वह अनुपालन करते हैं ,
    ओर एक तरफ हम देखते हैं *इस्कॉन *के माध्यम से हमारे देश की संस्कृति धर्म को किस तरह पाश्चात्य देशों के द्वारा अपनाया जा रहा है और वह उसका मूल रूप से पालन करते हैं, जबकि वे पूर्ण विकसित देश कहे जाते है,ओर वास्तव में है भी,कुछ तो विशेष हे ही,
    भारतीय लोगों में योग्यता, गुणवत्ता, ईमानदारी ,बुद्धिमानी ,कूट-कूट कर भरी है, तभी विदेश में हमारे देश के अति योग्य व्यक्ति नामचीन पदों पर आसीन है ,
    अपने स्वयं ही लिखा है और हम भी जानते हैं कि हमारे देश का एक गीतकार इंदिवर जी ने मात्र एक गीत में देश की संस्कृति के बारे में अक्षर सा बयां कर दिया ऐसा गीत आज तक भारत के लिए न किसी ने लिखा है न लिख पाएगा , चंद लाइनों में इंदिवर जी ने देश की सभ्यता संस्कृति के बारे में सब कुछ कह दिया।
    अब भला कोई बताएं कि इसकी सभ्यता संस्कृति ,भाषा की जड़े कौन उखाड़ पाएगा ? भारत का बौद्ध धर्म का विस्तार चीन म्यांमार, जापान, तिब्बत, थाईलैंड में जड़ें फैलकर विस्तार लेकर अपना अस्तित्व कायम कर चुकी हैं वहीं फिजी मॉरीशस त्रिनिदाद दक्षिण अफ्रीका मॉरिशस मलेशिया वियतनाम इंडोनेशिया नेपाल
    जैसे देशों में भाषाई संस्कृति ने अपने पैर जमा लिए हैं
    वहां हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता हमारी भाषा कभी नहीं मिट सकेगी।
    दअरसल हमारे देश की बागडोर जिन राजनीतिज्ञों के हाथ में हैहोती है वह पद पाते ही देश के प्रति अपनी उत्तरदायित्वों को भूल जाते हैं वरना ऐसी कौन सी बात है की 24 भाषाओं में से एक भी भाषा हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं हो सकी,
    क्या परेशानी है की हमारी संस्कृत भाषा अब प्राइमरी पाठ्यक्रमों से भी गायब है ,ऐसी कई बाते हैं जो होना चाहिए पर नहीं है,चंद स्वार्थवश
    कुछ देश के पानी में भी ऐसी सहजता सरलता भोलापन है की जनता सब कुछ जानते हुए भी मूर्ख बनती रहती है और पेंडुलम की तरह इधर-उधर होती रहती है
    देश की सशक्त साफ सुथरी सुदृढ़ राजनीति भी देश की सभ्यता संस्कृति की संवाहक होती है,यही कमी कहे या कमजोरी,या कानून का पालन की अवहेलना,
    लेकिन चाहे कुछ भी हो, कुछ तो बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी।
    अब पुरवाई में ही देखिए आप जैसा आला संपादकीय हर बार नया दृष्टिकोण नई बात, नई समस्या, नया समाधान ,नई सोच ,भला कितने लोग दे पाते हैं ?
    आपको सेल्यूट है सर

    • कुन्ती जी, आपकी टिप्पणी हमारे लिए हमेशा महत्वपूर्ण होती है। ज्ञान का भंडार! हार्दिक धन्यवाद।

  14. पुरवाई का यह संपादकीय भारतीय संस्कृति और ज्ञान के वैश्विक योगदान से न केवल परिचय कराता है बल्कि इसका स्पष्ट और बेबाक मूल्यांकन भी करता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है और हमारी ज्ञान परंपराओं ने विश्व को जीवन जीने जीने की राह दिखाई। विज्ञान, गणित, चिकित्सा, दर्शन, धर्म, योग, साहित्य और कला के क्षेत्रों में भारत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। परंतु लगभग हज़ार वर्षों की ग़ुलामी ने देश की ज्ञान परंपरा को मानो छिन्न भिन्न कर दिया और हम स्वयं भी उस ज्ञान परंपरा को भूल से गए। प्राचीन ज्ञान पर कोई शोध नहीं हो सका और हम पाश्चात्य आधुनिकता के अंधे अनुयायी हो गए । आज़ादी के बाद वैज्ञानिक सोच के विकास पर ज़ोर दिया गया लेकिन इस दिशा में कुछ ख़ास प्रगति नहीं हुई । आज भी जब बिहार के पूर्णिया जिले में एक परिवार के पाँच लोगों को डायन बताकर ज़िंदा जला दिया जाता है (करीब एक महीने पहले) तो यह सोचने विवश हो जाते हैं कि क्या हम वाक़ई इक्कीसवीं सदी के भारत में हैं जो ख़ुद को विश्व गुरु कहते अघाता नहीं है। अंधविश्वास में जकड़े इस समाज में ऐसी घटनाओं पर कोई बात नहीं होती , एक लाइन की ख़बर के साथ ही इसकी इतिश्री हो जाती है ।
    आपने सच कहा है कि हम अपने आसपास जो भी विकास देख रहे हैं वह आधुनिक विज्ञान की देन है । इसमें भारतीय प्राचीन ज्ञान का कोई योगदान नहीं है और सरकार को यह चाहिए कि प्राचीन भारतीय ज्ञान पर शोध हो और इनसे नए अनुसंधान का मार्ग प्रशस्त हो ।

    • तरुण भाई, आपने संपादकीय के मर्म को पकड़ कर एक सारगर्भित टिप्पणी की है। मैं आपकी टिप्पणी को दो बार पढ़ गया। हार्दिक धन्यवाद।

  15. भारतीय संस्कृति और भाषा का विश्व पर एक महत्वपूर्ण और स्थायी प्रभाव पड़ा है। भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलू, जैसे कि धर्म, दर्शन, कला, और साहित्य, दुनिया भर में लोगों को प्रभावित करते हैं। भारतीय भाषाएँ, विशेष रूप से हिंदी, भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और भी बढ़ने की संभावना है।

  16. कटु सत्य। आपने एक महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत विषय का बेहतरीन विश्लेषण किया है। कब तक हमारा देश राष्ट्र भाषा विहीन बना रहेगा। कब तक हम अंग्रेज़ी का आँचल थामे चलते रहेंगे?भाषा पर राजनीति समाप्त होगी तभी हिन्दी का सम्मान हो पाएगा। तभी हमारी संस्कृति, सभ्यता, दर्शन, विचार जीवित रह पाएँगे।
    ज्ञानवर्धक जानकारी देने के लिए साधुवाद।

  17. हमेशा की तरह इस बार भी सम्पादकीय देश के ज्वलंत और गम्भीर विषय को लेकर है। सच में संस्कृति, सभ्यता, भाषा, ज्ञान परम्परा को समझना, बचाना , ज़मीनी हक़ीक़त से जोड़ना- आज महत्वपूर्ण और असली मुद्दे हैं।

  18. सादर प्रणाम भाई।
    आज संपादकीय का विषय मौलिक, ज्वलंत और विचारणीय है। मै जहां तक समझ पायी अपने अल्प ज्ञान से कि भारतीय संस्कृति में निहित मौलिक शोध,चिकित्स
    कार्य शैली,गणितीय प्रतिभा अंतरिक्ष ज्ञान को वो सम्मान नहीं दिला पाये जिसकी वो अधिकारिणी थी।और वो विदेशों की खोज बन गई। हिन्दी की जगह अंग्रजी
    ने ले ली। भारतीय संस्कृति में , इतिहास,साहित्य, मानवीयता, योग व सृजन की मौलिक ज्ञान परंपरा ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।यह हमारी संस्कृति और पहचान का अभिन्न अंग है। सदियों से मानवता के पथ प्रदर्शक के रुप में हमने मैत्री प्रेम और वैश्विक सद्भावना का संदेश विश्व को दिया है।बसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा हमारे नैतिक आदर्शों का मूल मंत्र रही है।
    “अयं निज : परोवेति गणना लघुचेतसाम् ,
    उदार चरितार्थ तु वसुधैव कुटुम्बकम्।
    आज विश्व जहां अनेक विवादों वादों और युद्ध के नाम पर हिसा की आग में जल रहा है ,वही हमारी संस्कृति ने मानव मात्र से प्रेम करना सिखाया। अनावश्यक युद्ध, हिंसा,अराजकता से परे विश्व को अनेक बौद्धिक चेतना और मानवीयता का मूल मंत्र भी दिया है। पौराणिक कथाओं एवं वेदों में व्याप्त करुणा के स्वर सामगान की तरह जहां गूंजते रहे हों,वह भारत विश्व गुरु की उपाधि से.विभूषित था।
    परंतु आपने सही लिखा है कि हम ही अपनी संस्कति को अक्षुण्ण नहीं रख पाये। वर्षों की गुलामी ,राजनीतिक गलियारों में रोज बनते बिगडते संविधान के टूटते नियम भी हमें एक राष्ट्र भाषा नहीं दे सके।जबकि किसी भी देश की राष्ट्र भाषा उसकी संस्कृति की प्राण होती है।संस्कृति,परम्परायें, कला,देश विदेश तक पहुंचाने का एकमात्र साधन भाषा ही है।हम केवल आवाज उठाते हैं ,उनकी गूंज कुछ देर तक सुनाई पड़ती है फिर एक मौन छा जाता है। हिन्दी सर्वकालिक लोकप्रिय प्रचारित भाषा है इसमें कोई शक नही है लेकिन बहुभाषा भाषी देश में एक सर्वमान्य भाषा न होकर हम आपस में ही मराठी तेलुगू कन्नड के खेल खेलते रहें,बस यही नियति है क्या?
    आपने संपादकीय में जैसा लिखा मै शतप्रतिशत सहमत हूं।
    भारत में ही भारतीय परंपरा या संस्कृति, स्वतंत्रता के बाद से लगभग लुप्त होती जा रही है। अब भारत में भारतीय संस्कृति का स्थान ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ ने ले लिया है। तथाकथित गंगा-जमुनी संस्कृति ने कब भारतीय संस्कृति को अपदस्थ कर दिया, भारतीयों को कुछ पता ही नहीं चला। *
    सुंदर, सारगर्भित सार्थक संपादकीय के लिए हृदय से आभार भाई। इस पर चर्चा होनी चाहिए जिसकी धमक सत्ता के गलियारों तक पहुंचे,और हमारी आवाज भी सुधी जाये।।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • पद्मा इस विस्तृत टिप्पणी और जानकारी के लिए हम आभारी हैं। पुरवाई के पाठकों को संपादकीय समझने में ख़ासी सहायता मिलेगी।

  19. इस बार भी आप ने हमारा ध्यान एक ज्वलंत विषय की ओर दिलाया है। निस्संदेह हमारे भारत की परंपरा, संस्कृति तथा वैज्ञानिक सैद्धांतिकी हमारी विशिष्ट धरोहर हैं।
    यह विचारणीय है कि इन मौलिक व लाभप्रद धरोहरों के प्रति हम संपूरित सजगता नहीं दिखा रहे हैं।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

  20. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    *भारतीय भाषाओं और संस्कृति का वैश्विक योगदान?*

    ☝️यह इस बार के संपादकीय का विषय है।

    इस दृष्टि से अगर भाषा के बारे में विचार किया जाए तो भारत भाषा की दृष्टि से भी प्रांतीय स्तर पर बँटा हुआ है। किंतु फिर भी देश के 10 राज्यों व एक केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली की भाषा हिंदी है।

    भारतीय गणराज्य की राजकीय भाषा भी हिंदी ही है, लेकिन अंग्रेज़ी के साथ। तमिलनाडु छोड़ हर राज्य में प्रारम्भिक स्तर की शिक्षा में हिंदी अनिवार्य है। बिहार (साथ में झारखंड) देश का पहला राज्य था, जिसने खड़ी बोली से निकटतम संस्कृतनिष्ठ मानक हिंदी को राज्य की प्रथम आधिकारिक भाषा घोषित किया था।

    हिंदी भाषी एवम् प्रथम भाषा हिंदी वाले राज्य हैं – उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, एवं हिमाचल प्रदेश।

    इस दृष्टि से हिंदी एकमात्र ऐसी भाषा है जो सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है। इस दृष्टि से इसे राष्ट्रभाषा तो बनाया जाना चाहिये। लेकिन बदकिस्मती यह है‌ कि देश में ही उसका विरोध है। हिंदी के लिये पहली आवश्यकता यही है कि वह अपने देश की राष्ट्रभाषा तो बने जो कि हर हाल में बहुत ज्यादा जरूरी है। हमारी राष्ट्रभाषा हमारी पहचान होती है।

    दूसरी बात संस्कृति की! जिस तरह भाषा किसी राष्ट्र की पहचान होती है इस तरह देश की संस्कृति विदेश की पहचान होती है और भारत की भी संस्कृति भारत की पहचान है, किंतु जैसा कि आपने बताया कि हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, खोते जा रहे हैं, हमारी अपनी संस्कृति का अवमूल्यन हो रहा है। यह 100 फीसदी सही है। जब हमारे अपने ही देश में हमारी भाषा और हमारी संस्कृति अपनी पहचान स्थिर नहीं रख पा रही है तो विश्व में स्थापित करना मुश्किल होगा तो फिर वैश्विक योगदान पर तो प्रश्न-चिन्ह ही लग जाता है। यह भी सही है कि हमें अपनी संस्कृति का स्वयं ही सम्मान करना होगा तभी हम किसी अन्य से उसके सम्मान की अपेक्षा कर सकते हैं।

    पत्रकार तारक फतह के शब्द कील की तरह चुभे। आधे से अधिक हिंदुस्तान की सच्चाई यही है सो क्या कहा जाए?

    जैसा कि आपने बताया, और जो सत्य भी है कि आज भी योग, आयुर्वेद, दर्शन, कला, संगीत, नृत्य और साहित्य के माध्यम से विश्व में हमारी संस्कृति की बात महसूस की जा सकती है।

    वैसे आजकल लोगों का रुझान आयुर्वेद की तरफ जा रहा है। विदेशों में भी आयुर्वेद को पसंद किया जा रहा है, किंतु जल्दी लाभ की दृष्टि से लोग एलोपैथी की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं।

    जहाँ तक हम जानते हैं बड़े-बड़े शहरों में आयुर्वेदिक हॉस्पिटल भी हैं और समाज आयुर्वेद की तरफ बढ़ रहा है।

    आपके संपादकीय का आखिरी पैराग्राफ बहुत महत्वपूर्ण है और काबिले गौर।

    वैसे और ज्यादा तो हम नहीं जानते हैं लेकिन फिर भी इंजीनियर्स, डॉक्टर्स और साइंटिस्ट य तीनों भी किसी भी अन्य देशों के मुकाबले विदेशों में सर्वाधिक भारतीय ही हैं। (जो कि भारत के अंग्रेज़ीदां संस्थानों से पढ़े हैं)।

    लेकिन इन सबके बावजूद भी जो प्रश्न संपादकीय में उठाया गया है उस पर विचार करना जरूरी है । हमारी भाषा व संस्कृति हमारी पहचान है। हमारी धरोहर है। हमें उसकी कद्र करनी ही होगी।

    संपादकीय विशेष के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

    कुरवाई का आभार।

  21. पुनश्च-

    वैसे भाषा की दृष्टि से अगर देखा जाए तो हिंदी के प्रचार और प्रसार की दृष्टि से भारतेत्तर साहित्यकारों ने अभिनंदनीय कार्य किया है ।वह भी काबिले तारीफ है जो विश्व में हिंदी को प्रतिस्थापित और प्रतिष्ठित कर रहे हैं। इसी की एक कड़ी है आपको ब्रिटेन का MBE पुरस्कार व अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों की लंबी श्रृंखला।

    साथ ही वे अन्य सभी जो विदेशों में है लेकिन जिनके नाम हमें याद नहीं और जो निरंतर हिंदी के लिए काम कर रहे हैं।

    और फिर संस्कृति के प्रचार और प्रसार का एक माध्यम भाषा भी है।

    शुक्रिया आपका याद दिलाने के लिये।

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