Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – न्यूयॉर्क का नया मेयर और भारत

ममदानी की जीत के पीछे ट्रंप का नकारात्मक रवैया तो एक कारण था ही, लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिन्होंने मतदाताओं के दिल में उनके लिए जगह बनाई। ममदानी ने पूरे चुनाव अभियान में मँहगाई के मुद्दे को पूरी शिद्दत से उठाया। सच यह है कि न्यूयॉर्क में मँहगाई की सुरसा इस कदर मुँह फैलाए बैठी है कि आम आदमी की ज़िंदगी कठिन होती जा रही है। ममदानी ने कहा कि सरकार का असली काम लोगों की ज़िंदगी आसान बनाना है। उनकी रैलियों में लगे बैनरों पर लिखा था- “एक ऐसा शहर, जिसे हम अफोर्ड कर सकें… और जहाँ हर किसी के पास अपना घर हो।”

हमने अक्सर कहानियाँ सुनी हैं कि अमुक इंसान पत्थर को भी हाथ लगाए, तो सोना बन जाए । मगर अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ऐसे इंसान हैं, जो सोने को भी हाथ लगाएं तो वह पत्थर बन जाए । उन्होंने अमेरिका समेत पूरी दुनिया की बैंड बजा रखी है। 
यदि वे सच में चाहते थे कि ज़ोहरान ममदानी को न्यूयॉर्क के मेयर के चुनाव में हराना है, तो उन्हें  केवल एक काम करना था-ज़ोहरान ममदानी का खुल कर समर्थन। और बस… जनता ट्रंप को सबक सिखाने के चक्कर में ज़ोहरान ममदानी को बुरी तरह से हरा देती।
मगर ट्रंप ने ठीक इसके विपरीत किया , उन्होंने ममदानी को तबाह करने के चक्कर में हर तरह की धमकी और चेतावनी दे डाली। न्यूयॉर्क की जनता ने ट्रंप को ऐसा जवाब दिया कि ट्रंप बगलें झाँकते दिखाई दे रहे हैं।  
हम भारतीय बहुत भावुक लोग हैं – आम आदमी भी और पत्रकार भी। ज़ोहरान ममदानी के बारे में लोग ऐसे बातें कर रहे हैं, जैसे वह उनके अपने घर का कोई सदस्य हों। कुछ पत्रकार तो फ़ेसबुक पर अजीबोगरीब सवालों वाले पोस्ट तक डाल रहे हैं- “क्या आपको पता है कि दिल्ली का मेयर कौन है?” यह सवाल उतना ही बेतुका है, जितना यह पूछना कि “अमेरिका का राष्ट्रपति तो डोनाल्ड ट्रंप है, ज़रा बताइए, भारत का राष्ट्रपति कौन है?”
भाई, सीधी सी बात है – भारत के महानगरों के मेयर केवल पदनाम मात्र हैं, जिन्हें जनता सीधे नहीं चुनती। जबकि न्यूयॉर्क शहर का मेयर राष्ट्रपति चुनाव की तरह जनता द्वारा चुना जाता है। इसलिए दोनों का आपस में कोई मुकाबला ही नहीं है। अगर तुलना करनी हो, तो अमेरिकी शहरों के मेयर की तुलना भारत के मुख्यमंत्रियों से की जा सकती है।
भारत के पत्रकार और लेखक अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा के अनुसार ज़ोहरान ममदानी की विजय और उनके व्यक्तित्व पर टिप्पणियाँ कर रहे हैं। ज़ोहरान ममदानी के विचार भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर काफ़ी नकारात्मक हैं। वे जितनी तीव्रता से डोनाल्ड ट्रंप का विरोध करते हैं, उससे कहीं अधिक उग्रता से नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते हैं। हाल ही में उन्होंने एक गुरुद्वारे में प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध विवादित बयान देते हुए कहा कि मोदी और भारत सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसक नीति अपनाते हैं।
राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि- ‘न्यूयॉर्क के लोग मेयर किसे और क्यों चुनते हैं, यह हमारा मामला नहीं है, लेकिन जोहरान ने गुरुद्वारे में जो कहा, वह परेशान करने वाला है। उन्होंने सवाल उठाया कि ममदानी की स्क्रिप्ट कौन लिख रहा है? गुरपतवंत सिंह पन्नू?’
हुआ यूँ कि 18 अक्तूबर को ब्रुकलिन में ज़ोहरान ममदानी ने इमाम वहाज के साथ मुस्कुराते हुए एक फ़ोटो खिंचवाई, जो देखते ही देखते मीडिया में वायरल हो गई। इमाम वहाज पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम विस्फोट की साजिश रचने और मुसलमानों को जिहाद के लिए उकसाने के आरोप लग चुके हैं।
तस्वीर के वायरल होने के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा- ये अनर्थ हो रहा है। कितनी शर्म की बात है कि सिराज वहाज जैसा शख्स ममदानी का समर्थन कर रहा है और उसके साथ दोस्ती निभा रहा है। इसने ही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को उड़ा दिया था।
अब स्थिति यह है कि जो भारत का वामपंथी मीडिया है, वह खुल कर ममदानी का समर्थन कर रहा है। नरेन्द्र मोदी का दुश्मन उनका दोस्त है। चुनाव जीतने के बाद ममदानी ने कहा, “मैं मुसलमान हूँ और इसके लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा”- यह बात उन्होंने अपने जीत के भाषण में कही।
मुझे आज तक ऐसा कोई अवसर देखने को नहीं मिला, जब किसी अमेरिकी मेयर ने चुनाव जीतने के बाद यह घोषणा की हो कि “वह मुसलमान है।” कल्पना कीजिए, यदि कोई यहूदी उम्मीदवार जीतने के बाद कहे कि “मैं यहूदी हूँ और इसके लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा,” तो भारत के मोदी-विरोधी पत्रकार उस पर किस कदर आक्रामक हो उठते!
जोहरान ममदानी के माता-पिता भारतीय मूल के हैं। उनके पिता का नाम महमूद ममदानी है जो कि पेशे से प्रोफ़ेसर और पत्रकार हैं । उनकी माँ मीरा नायर मूलतः हिन्दू हैं, और वे फ़िल्म निर्माता, निर्देशक हैं। उनकी पत्नी सीरियाई मूल की हैं और उनका नाम है रामा दुवाजी। 
ममदानी का जन्म युगांडा में हुआ, लेकिन अमेरिका में पले-बढ़े हैं। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2018 में जोहरान को अमेरिका की नागरिकता मिल गई। उन्होंने क्वींस और ब्रुकलिन में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के लिए काम करके राजनीति सीखी।
दो साल बाद, 2020 में वे पहली बार न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के चुनाव में क्वींस के एस्टोरिया से जीते थे। वे क्वींस के एस्टोरिया और आस-पास के इलाकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जब ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे, तब भी भारत के पत्रकारों में सीधा-सीधा विभाजन दिखाई दिया, और आज भी आसानी  से उसे महसूस किया जा सकता है। 
ममदानी की जीत के पीछे ट्रंप का नकारात्मक रवैया तो एक कारण था ही, लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिन्होंने मतदाताओं के दिल में उनके लिए जगह बनाई। ममदानी ने पूरे चुनाव अभियान में मँहगाई के मुद्दे को पूरी शिद्दत से उठाया। सच यह है कि न्यूयॉर्क में मँहगाई की सुरसा इस कदर मुँह फैलाए बैठी है कि आम आदमी की ज़िंदगी कठिन होती जा रही है। ममदानी ने कहा कि सरकार का असली काम लोगों की ज़िंदगी आसान बनाना है। उनकी रैलियों में लगे बैनरों पर लिखा था- “एक ऐसा शहर, जिसे हम अफोर्ड कर सकें… और जहाँ हर किसी के पास अपना घर हो।”
ममदानी ने दिखावे या प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के बजाय सीधे मतदाताओं से संवाद किया, जो उनके दिल तक पहुँचा। उन्होंने स्पष्ट कहा- “अमीरों पर टैक्स लगाओ, बच्चों की देखभाल की सुविधाएँ बढ़ाओ, और हर इंसान के पास अपना घर होना उसका मूलभूत अधिकार है।”
सच्चाई तो यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बड़े नेता भी ममदानी का समर्थन नहीं कर रहे थे। मगर युवा तुर्क ममदानी ने इंटरनेट और सोशल मीडिया का सहारा लेकर अपने चुनावी अभियान को सफल बनाया। वे जनता से सीधे जुड़े। उन्होंने स्कैवेंजर हंट, फुटबॉल टूर्नामेंट और एल.जी.बी.टी.क्यू. बार में देर रात तक पॉप-अप इवेंट किए। न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि उन्होंने सभी पुराने नियम तोड़ दिए और सीधे लोगों से रिश्ता बनाया।
चौंतीस वर्षीय ममदानी ने युवा कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ा। कुछ कार्यकर्ता तो उम्र में उनसे भी काफ़ी कम थे। सुना तो यहाँ तक गया है कि उनके चुनाव क्षेत्र के बहुत से यहूदी मतदाताओं ने भी उनके हक में वोट डाले। 
ममदानी जीत कर न्यूयॉर्क के मेयर तो बन गए, मगर उनके सामने बहुत सी चुनौतियाँ भी खड़ी हैं। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल की तरह उन्होंने भी बहुत कुछ मुफ़्त बाँटने के वादे कर दिए हैं। ममदानी ने वादा किया है कि वे न्यूयॉर्क में सभी बच्चों के लिए फ्री-केयर शुरू करेंगे, सब्सिडी वाले घरों का किराया फ्रीज करेंगे, पब्लिक बसों में मुफ्त यात्रा देंगे और शहर की अपनी किराने की दुकानें खोलेंगे। इन सभी वादों को पूरा करने के लिए वे बजट में प्रावधान करने होंगे।
ममदानी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि इसके लिए अमीरों और बड़ी कंपनियों पर नए टैक्स लगाकर नौ अरब डॉलर जुटाए जाएंगे। लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इन वादों को पूरा करना आसान नहीं होगा। इसके लिए ममदानी को बहुत मेहनत करनी होगी। 
डॉनल्ड ट्रंप तो पहले से चेतावनी दे चुके हैं कि वे ममदानी की फ़ेडरल फ़ंडिंग रोक देंगे। यदि ट्रंप ऐसा करते हैं, तो ममदानी की मुश्किलें बहुत हद तक बढ़ सकती हैं।
ममदानी अपनी पार्टी के वामपंथी धड़े का समर्थन तो पा चुके हैं। सवाल यह है कि वे अपनी पार्टी के बाकी धड़े का समर्थन जुटा पाएंगे या नहीं। 
ज़ोहरान ममदानी की जीत के बाद न्यूयॉर्क सिटी में भारतीय-अमेरिकी और हिंदू समुदाय के एक बड़े वर्ग ने उनके विभाजनकारी बयानों पर गहरा रोष व्यक्त किया है। सिख समुदाय के नेता और मानवाधिकार वकील जसप्रीत सिंह ने ममदानी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “हमारे शहर में नफ़रत के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन ज़ोहरान अपने मंच का इस्तेमाल हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी को बढ़ावा देने और हमें धर्म के आधार पर बाँटने के लिए कर रहे हैं।”
जीतने के बाद ममदानी ने मंच पर हिन्दी फ़िल्म ‘धूम’ के गीत- ‘धूम मचा दे’ पर अपनी पत्नी के साथ झूम-झूम कर नाचे, और उनकी माँ मीरा नायर ने उन्हें गले लगाया। उन्होंने अपनी जीत के भाषण में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 15 अगस्त 1947 के भाषण के अंशों को दोहराया।  
भारत और अमेरिका के संबंध इस समय नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं, और ममदानी की जीत से इसमें किसी विशेष सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। वैसे भी, किसी एक राज्य या शहर के मेयर के भारत के साथ रिश्तों के आधार पर भारत-अमेरिका संबंधों का आकलन नहीं किया जा सकता। अब देखना यह होगा कि ममदानी वास्तव में एक सफल मेयर साबित होते हैं या फिर केवल ‘केजरीवाल का अमेरिकी संस्करण’  बनकर रह जाते हैं।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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38 टिप्पणी

  1. इस बार का संपादकीय न केवल वैश्विक है वरन यह अमेरिकी होने के साथ-साथ भारतीय भी है। और कहीं ना कहीं धर्म के और शक्ति के मद से भी चूर चूर है ।
    मामदानी जहां ट्रंप की गैर ज़िम्मेदाराना बयानबाजी से आए और भस्मासुर की स्थिति में आ पहुंचे हैं।वे अपने प्रदेश और अपनाए हुए देश के लिए नुकसानदेह साबित होने भी जा रहे हैं । एक शब्द है फितरत सो ट्रंप और मामदानी दोनों ही ऐसा है,यानी ,,, प का मुंह ,, प सूंघ रहा है।
    फ्री की रेवड़ी की डायबिटिक कर देने वाली सड़ांध अब भारत से अमेरिका भी पहुंच गई है।
    आतंक की बदबू को साथ लिए अब अमेरिकी परिदृश्य भी वही फसल काटेगा जो वह दक्षिण एशिया में दशकों से कटवा और फिर रोपित करवा रहा है।
    पूर्व राष्ट्रपति श्री जो बाइडन का कथन अमेरिका अब गरीब हाथों से अमीर हाथों में जा रहा है अब और विस्तार पा रहा है,,अमेरिका अब अमीर के गुरूर और आतंक की चटनी चाटने वाला देश बनने को आतुर दिख रहा है।
    बढ़िया संपादकीय।

    • भाई सूर्य कांत जी, इतने खुले रूप से इतनी बोल्ड टिप्पणी आप ही कर सकते हैं। आपने भस्मासुर का उदाहरण बढ़िया दिया है।

  2. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का पुरवाई के इस अंक का संपादकीय न्यूयार्क के नए – नवेले मेयर मिस्टर ममदानी के जीतने के निहितार्थ पर केंद्रित एक विश्लेषण परक संपादकीय है जो भविष्य की संभावनाओं/घटनाओं की दिशा का स्पष्ट संकेत करता है। वर्तमान समय अमेरिका में दिशाहीन नेतृत्व को लेकर संकट ग्रस्त है। अभी तक लोग बड़े बम ट्रंप साहब को झेल रहे थे अब छोटे अनार/ अनाड़ी ममदानी को झेलेंगे। वामपंथी होना तो कुछ ठीक भी है पर कुपंथी होना केवल दुर्भाग्य ही है। ज्वलंत मुद्दे पर इतना स्पष्ट और विश्लेषण परक संपादकीय संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय शर्मा जी अभिनंदन के पात्र हैं।

    • भाई अशोक जी, हम भी डर रहे हैं कि कहावत कहीं उल्टी ना हो जाए – “बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह!”

  3. यह सम्पादकीय भी बेहतरीन है हर बार की तरह। मामदनी के विषय में ठीक कहा आपने कि वह केजरीवाल का अमरीकी संस्करण ही होकर रह जाना है। इतने ‘फ्री’ के वादे हैं तो और क्या होगा। वैसे भी
    बिना सिर पैर की बातों ने कब किसी को सफलता के पार लगाया है । भारत की सत्ता का विरोध करके कौन सा तीर मार लेगा जाने।

    • निर्देश निधि जी, आपने एकदम सटीक टिप्पणी की है। Freebies के सहारे अधिक दिन नहीं काम चलता।

  4. आपकी अंतिम टिप्पणी पर ये कहना कि कहीं वे अरविंद केजरीवाल के अमरीकी संस्करण साबित न हो जाएं, एकदम से सही आंकलन है और निश्चिंत रहिए ऐसा ही होगा।

  5. सादर नमस्कार सर…
    विशेष संपादकीय इस बार भी…
    मेरा कहना यह है कि जो जैसा चक्रव्यूह रचाएगा वह स्वयं उसमें उलझ कर रह जाएगा। विदेशों में भारत बिरोधी एजेंडा चलाने से.. मोदी जी को और हम भारतीयों को और अधिक शक्ति मिलती है। एक छोटा सा पौधा किसी भी परिस्थिति में विकसित हो ही जाता है।.. यह तो हमारा विशाल भारत है। कितने भी षड़यंत्र कोई भी करें चाहे देश में हो या विदेश में… समग्र विश्व जनता है भारत क्या है..
    आपकी लेखनी सदैव असंख्य प्रश्नों को उजागर करती है…. साधुवाद

  6. सम्पादकीय के अंतिम हिस्से में ही पूरे आलेख का मर्म है ।
    अमेरिका की राजनैतिक उथलपुथल और भारत से तुलना पर अच्छे विचार दिए हैं आपने ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  7. ममदानी के विषय में विस्तृत ब्यौरा आपने दिया, उसका हिंदू विरोधी दृष्टिकोण उसे हमारे लिए तो नीचे ही गिराता है भले ही वो कितना योग्य हो….अच्छा होगा ऐसे लोग अरविंद केजरीवाल का दूसरा संस्करण बने

  8. इस बार का संपादकीय-‘न्यूयॉर्क का नया मेयर और भारत’ , ममदानी की राजनीतिक यात्रा के साथ उसके व्यक्तिगत जीवन पर प्रकाश डाला गया है। युवाओं का राजनीति में आना अच्छी बात है।
    चुनाव में अब जीत के फार्मूले काफी बदल चुके हैं। मैं लोकतांत्रिक देशों की बात कर रहा हूं। यहां जो जितना आक्रामक होता है वह जल्दी ही जनता के बीच पोपुलर हो जाता है। वादों के तड़के सफल होने में अपनी भूमिका निभा जाते हैं। एक वर्ग विशेष या धर्म विशेष पर टिप्पणियां जीत के मार्जिन को बढ़ाता है। यदि राजनेता को गोटियां सही से फिट करनी आती हैं तो वह अपने लोगों के बीच हीरो बनकर उभरता है।
    डोनाल्ड ट्रम्प इस मामले में बहुत कमजोर है। प्रश्न तो यह भी उठ सकता है कि डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति पद फिर से कैसे जीत गए! तो मैं कहूंगा कि पिछले कार्यकाल का वेटेज उन्हें मिला था। इस बार उन्होंने अमेरिकी पावर का जमकर दुरुपयोग किया। जिसके कारण उन्होंने अपनी पर्सनैलिटी का जबरदस्त नुकसान किया। इस संसार में आज भी वचनबद्धता व्यक्ति को महान बना जाती है। वचनबद्धता का यह गुण 60% तक हो तो इसे उच्च कोटि का मान लिया जाता है। राजनीति में इससे ज्यादा हो भी नहीं सकता है। ट्रंप शाम को कुछ कहते हैं और सुबह कुछ। यही कारण है कि विश्व के साथ स्वयं उनके देश में उनकी पोपुलर्टी का ग्राफ नीचे आ गया है।
    आपने लिखा है कि ममदानी का ट्रंप सपोर्ट कर देते तो ट्रंप से चिढ़ी जनता ममदानी को मेयर न बनने देती। लेकिन ट्रंप यहां तक नहीं सोचते हैं।
    एक समय अमेरिका का विरोध करके विश्व के राजनेता अपने देश में चुनाव जीतते थे। आज भारत का विरोध, खासकर भारतीय प्रधानमंत्री का विरोध करके अमेरिका चुनाव जीतने लगा है।
    ममदानी ने इसी ट्रिक से मेयर पद जीत लिया है। रही वादों की बात तो वादे हैं वादों का क्या? कुशल राजनेता अन्य मुद्दे लेकर इस वादे को पीछे कर लेते हैं। ममदानी क्या करेंगे यह तो समय बताएगा। वादे के मामले में ममदानी की तुलना भारतीय राजनेता अरविन्द केजरीवाल से करना थोड़ा जल्दी लग रहा है। क्योंकि केजरीवाल का पराभव दुनिया देख चुकी है। उसकी काट भी ढूंढकर ही चलेंगे ममदानी।
    आपने पत्रकारों की विचारधाराओं की बात इस संपादकीय में की है। ये तो चलेगा ही। लोकतंत्र में इसका होना जरूरी है। जनता किस पर रीझती है ये ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि आम जनता विचारधाराओं से नहीं बंधी होती है।
    इस बार की संपादकीय में भी आपने ट्रंप महोदय का जिक्र अच्छे से किया है। मैं भी ट्रंप महोदय का जिक्र गुजार हूं।

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने डॉनल्ड ट्रंप, ममदानी, अमरीकी जनता, वोटर, केजरीवाल – तमाम मुद्दों को खंगाल दिया है। आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है।

  9. ज़ोहरान ममदानी एक सच्चे समाजवादी और लोकतांत्रिक नेता हैं। वे भारत-विरोधी नहीं हैं, बल्कि निरंकुशता और सत्तावादी शासन के खिलाफ हैं। चुनाव अभियान के दौरान ट्रम्प और अन्य नेताओं ने उन्हें कम्युनिस्ट, खतरा और यहाँ तक कि अपमानजनक शब्दों से नवाज़ा। ममदानी ने इसका मुकाबला डटकर किया और न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर बनकर इतिहास रचा। उनकी जीत दिखाती है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ तानाशाही से ऊपर है। वे भारतीय मूल के होने पर गर्व करते हैं, पर अन्याय और दमन के खिलाफ खड़े होना उनकी विचारधारा है। यह जीत सिर्फ न्यूयॉर्क की नहीं, बल्कि दुनिया भर में स्वतंत्रता और समानता की जीत है।

  10. आज का संपादकीय न्यूयॉर्क का नया मेयर और भारत, भारत और अमेरिका के सन्दर्भ में आज की परिस्थितियों का समग्र विश्लेषण करता बेहद विचारणीय संपादकीय है।
    पहले भारत, अमेरिका की ओर देखता था किन्तु आज स्थिति विपरीत है। चाहे ट्रम्प हों या ममदानी, भारत का अनुसरण कर रहे हैं चाहे ट्रम्प का अमेरिका को महान बनाने का नारा या महंगाई को इंगित करते ममदानी का नारा- एक ऐसा शहर, जिसे हम अफोर्ड कर सकें… और जहाँ हर किसी के पास अपना घर हो। इसके साथ फ्री की बीमारी को अरविंद केजरीवाल से जोड़ते हुए यह अनुमान कि कहीं वह ‘केजरीवाल का अमेरिकी संस्करण’ बनकर तो नहीं रह जायेंगे, पाठकों को अवश्य सोचने को मजबूर करेगा।

    अमेरिका में ट्रम्प की लोकप्रियता का गिरता ग्राफ आपके इस वाक्य में निहित है कि अगर ट्रम्प ममदानी का समर्थन करते तो ममदानी हार जाते।

    ‘धूम मचा दे…’ गाने पर ममदानी का अपनी पत्नी के साथ नाचना भी भारत के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है। इसका कारण उनकी माँ मीरा नायर का भारतीय होना भी है।
    लेकिन इसके साथ ही गुरूद्वारे में जाकर में प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध विवादित बयान देते हुए यह कहना कि मोदी और भारत सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसक नीति अपनाते हैं, अवश्य विचारणीय है। सुखद पहलू यह है इसके विरोध में न केवल भारत वरन अमेरिका में भी आवाज उठी है।

    अमेरिका के मेयर और भारत के मेयर की चयन प्रक्रिया तथा उसके महत्व के बारे में पाठकों को रोचक जानकारी देने के लिए साधुवाद।

    • आदरणीय सुधा जी, आपने संपादकीय के हर पहलू पर नज़र डाली है। हर कोण से संपादकीय का विष्लेषण किया है। स्नेह बनाए रखें।

  11. इस सप्ताह के अपने संपादकीय में आप ने ज़ोहरान ममदानी की जीत व उस पर ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया को एक व्यापक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है जिस के प्रतिघात भविष्य में देखने को मिलेंगे।
    शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

    आप ने समग्रता की दृष्टिकोण

    • आदरणीय दीपक जी पुरवाई के संपादकीय से आपका जुड़ाव हमारा उत्साह बढ़ाता है। आप हर सप्ताह अपना स्नेहिल आशीर्वाद प्रेषित करती हैं। हार्दिक आभार।

  12. विषय कोई भी हो, वह आपकी लेखनी को ज़िम्मेदाराना रूप दे ही देती है, साथ ही पाठकों को विषय पर गंभीरता के साथ मनन करने के लिए विवश भी कर देती है -अस्तु साधुवाद !!

  13. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    अप्रत्याशित संपादकीय है यह हमारे लिये। कुछ दिनों से समाचार देखना नहीं हो पा रहा।

    ममदानी के चुनाव प्रचार का चुनाव मुद्दा तो महत्वपूर्ण था। आम आदमी की समस्या महंगाई है और जरूरत है आसान ज़िन्दगी। इस आग पर घी का काम ट्रंप के नकारात्मक रवैया ने किया।जीत उसके लिये आसान हो गई। चुनाव प्रचार में मतदाताओं से सीधा संपर्क बहुत मायने रखता है पर आज के समय में इंटरनेट और सोशल मीडिया का भी चुनाव प्रचार में बहुत बड़ा हाथ है।
    राजनीति आजकल इतनी आसान नहीं रही पद चाहे जो भी हो लेकिन चुनौतियाँ कम नहीं होतीं।
    ममदानी के चुनावी घोषणाओं भारत के चुनावी घोषणाओं की याद दिला दी। यह प्रेरणा निश्चित रूप से भारत से ही ली गई। पर यह ध्यान नहीं रखा गया की दोनों जगह की राजनीतिक स्थितियाँ बिल्कुल अलग है।

    ट्रंप समझ ही नहीं पा रहा कि दुनिया का बैंड बजाते -बजाते उसका खुद का भी बैंड बज सकता है।
    अगर ट्रंप ने यह चेतावनी दी है कि वह ममदानी का फ़ेडरल फंड बंद कर देगा तो यह सिर्फ चेतावनी नहीं है। वह ऐसा कर सकता है।

    वैसे सिर्फ केजरीवाल ही नहीं यहाँ हर पार्टी कुछ ना कुछ मुफ्त बाँटने का ऐलान कर रही है।
    मेयर के चुनाव अमेरिका में कैसे होते हैं, यह तो हमने आपके ही किसी पुराने संपादकीय से जाना था, पर एक उत्तरदायित्वपूर्ण पद पर जीतते ही
    *गुरुद्वारे में* प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध, मोदी और भारत सरकार के लिये इस तरह का बयान देना उचित नहीं वह भी गुरुद्वारे में। कम से कम धार्मिक स्थलों पर तो समस्त दबावों से परे रहें, भले ही वह व्यक्तिगत चिंता ही क्यों न हो,पर राजनीति!!!! हद ही है। पहले ट्रंप से निपट ले उसके बाद मोदी को देखे तो बेहतर है।

    1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम विस्फोट की साजिश रचने वाले इमाम वहाज के साथ फोटो खिंचवाने वाली बात वाजिब संदेह तो उठाती है। ऐसे में तो उसका साथ देना भी उचित नहीं लगा।
    क्या मुसलमान होने के कारण गलती करने पर भी या गलत काम करने पर भी माफी न मांगने का अधिकार मिल जाता है? वास्तव में यही तानाशाही सोच है।

    ऐसा लगता है कि ट्रंप का ध्यान हटने के लिये यह भी कम नहीं, शायद उसकी नजर और दिमाग दुनिया से हटके थोड़ा बहुत इधर केंद्रित हो सके ।
    दो विरोधी जब आमने-सामने रहते हैं तो नजरों का केंद्र सामने ही रहता है। ऐसा अनुभव कहता है क्योंकि आमने-सामने की लड़ाई जल्दी और ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती है।
    बहरहाल देखते हैं आगे- आगे क्या होता है।

    जहाँ तक भारत की बात है, भारत आदतन अपने ही तर्ज पर राग अलापने के लिए फेमस है।

    जिस तरह ममदानी का आपने परिचय दिया।
    बुजुर्गों द्वारा कही गई एक कहावत याद आ गई।
    कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा,भानुमति ने कुनबा जोड़ा।
    सांप्रदायिक भेदभाव आखिर वहाँ भी पहुँच ही गया। यह बेहद दुखद है।
    फिलहाल तो यही कहा जा सकता है आगे-आगे देखें होता है क्या?
    संपादकीय के माध्यम से देश दुनिया की महत्वपूर्ण जानकारियों से, खबरों से रूबरू करवाने के लिये विज्ञान से समृद्ध करने के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी पुरवाई का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नियमित लेखन होता रहे। आज पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। अमरीका के अंदरूनी हालात का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। आपने संपादकीय का गहराई से अध्ययन और विश्लेषण किया है। हार्दिक धन्यवाद।

  14. आदरणीय संपादक महोदय,
    इस अंक का संपादकीय पढ़ने
    के बाद तो मैं सोच में डूब गई हूं क्योंकि उनके इस कथन को कि’ मोदी जी के नेतृत्व काल में भारत में उनके धर्म के लोगों के प्रति कठोर व्यवहार हो रहा है’, को विपक्ष अब तक क्यों नही ले उड़ा ? राहुल गांधी को तो अब तक अपने भाषणों में इसको कई बार उधृत कर देना चाहिए था! ममदानी की विजय का कुछ विशेष असर भारतीय पत्रकारों पर नहीं दिखाई पड़ रहा है, संभवत: इसका कारण बिहार का चुनाव हो ।
    ऐसा लगता है कि अमेरिका की ग्रह दशा इस समय अच्छी नहीं चल रही है।
    ‘अंदर की बात’ बताने के लिए धन्यवाद!!

    • सरोजिनी जी पुरवाई का प्रयास रहता है कि खोज बीन करके अंदर की बात का पता लगाया जाए। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  15. बेहतरीन संपादकीय उत्तम समीक्षा
    वाकई यह बहुत अजीब बात है कि एक मेयर अपने आप को यह कहे कि वह किस धर्म का है! बाकी देखिए अमेरिका किस राह पर है…

  16. बेहद सटीक व सधा हुआ सम्पादकीय। ममदानी का मोदीजी की आलोचना करना इस बात को दर्शाता है कि विश्व भर में मोदी जी की अलग ही पहचान है।

  17. लगता है कि भारत में मुफ़्त रेवड़ियाँ बाँटने की, जो दुर्गंध भरी प्रथा, केजरीवाल ने शुरू की थी वो बीमारी अब अमरीका में भी आगई है और ममदानी ने न्युयॉर्क के मेयर के चुनाव में उसका पूरा फ़ायदा उठाया है। ममदानी और केजरीवाल जैसे लोग मुफ़्त बिजली पानी इत्यादि का वायदा करके जीत भी जाएँगे, थोड़े से अपने वायदे भी, किसी हद तक, पूरे करेंगे और उसके बाद, देश के ख़ज़ाने को खाली करके, चले भी जाएँगे। लेकिन इन के जाने के बाद, इनकी खिलाई हुई मलाई के कारण, जो deficit हुआ होगा उसका भुगतान करने का समय आएगा तो उसका सारा बोझ, आगामी टैक्सों के बढ़ जाने के कारण, कौन उठाएगा? वो होगी इन्हीं मुफ़तख़ोरौं की औलाद!!!!
    अमरीका के केस में, क्या यह सब न्युयॉर्क की जन्ता ने वोट डालने से पहले सोचा है? शायद नहीं!!!!!!! ममदानी ने तो “धूम मचा दे” की ट्यून पर अपनी बेग़म के साथ नाच किया था लेकिन ममदानी के जाने के बाद न्युयॉर्क की जन्ता को “न ख़ुदा ही मिला न वसाले सनम – न इधर के रहे न उधर के रहे” की ट्यून पर नाच करने का मौका मिलेगा।

    • भाई विजय विक्रान्त जी, आपका ग़ुस्सा आपकी टिप्पणी में महसूस किया जा सकता है। आप वहां रहते हैं। आप वहां के हालात को सही समझ सकते हैं। इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  18. अमेरिका में घटित कोई भी प्रसंग पूरे विश्व के लिए खबर बन जाता है किंतु ममदानी का मेयर के रूप में चयन भारत में कुछ अन्य कारणों से भी बहुत चर्चित हुआ है। मीरा नायर का पुत्र होना एक महत्वपूर्ण कारक है जिससे ममदानी में भारतवासियों की विशेष दिलचस्पी है दूसरे न्यूयॉर्क की दस प्रतिशत आबादी भारतीयों की है इसलिए वहां की सत्ता भारतवंशियों के लिए महत्व रखती है।
    लगता है पूरे विश्व के नेता लोक लुभावने वादों से जनता को आकर्षित करते हैं, फिर चाहे वह पूरे होने योग्य हों न हों। ममदानी निश्चित ही अपवाद नहीं हैं। मोदी का विरोध, नेहरू के भाषण का उद्धरण उनकी कार्य पद्धति का एक संकेत है। तसल्ली वाली बात है कि वह न्यूयार्क को निम्न- मध्यम आय वर्ग के लोगों के योग्य बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं।
    अरविंद केजरीवाल का उदाहरण आपने बहुत अच्छा दिया। वह राजनीति में एक नई उम्मीद बनकर उतरे थे किंतु उनकी पार्टी भी एक सामान्य पार्टी बनकर रह गई और राजनीति के दलदल से वह भी बच नहीं सके।
    एक सुविचारित संपादकीय के लिए हार्दिक धन्यवाद।

    • विद्या जी आपने बहुत कम शब्दों में संपादकीय की पूरी व्याख्या कर दी है। हार्दिक आभार।

  19. बेहतरीन सम्पादकीय। जोहरान ममदानी की मेयर पद की जीत का बहुत बढ़िया विश्लेषण किया है आपने। साधुवाद ।

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